
भारतीय संसदीय वामपंथी अब खाये-पिये-अघाये तबकों का एक नकली पैगंबर बन कर उभड़ा है, जिसकी जड़ें वामपंथी आवरण से निकलकर दलाल-पूंजीपति के बेडरूम तक जा पहुंची है. यह अकारण नहीं है कि संसदीय वामपंथी जड़ समेत उखड़कर पछाड़ खा रही है और तथाकथित ‘सुअरबाड़े’ में मूंह मारने को विवश है. अब वह भारतीय समाज के मेहनतकशों को कोई भी दिशा दे पाने में असमर्थ है.
भारी अराजक उथल-पुथल से दुःखी हमारा यह समाज जब अन्ना आन्दोलन के साथ जा खड़ा होता है तब भौचक्क वामपंथी ऊंगली उठा-उठा कर बिदकने के अलावा और कुछ नहीं कर पाता. और यही से शुरू होता है भारतीय संसदीय राजनीति में वामपंथियों की अप्रासांगिकता की ओर बढ़ता कदम.
अन्ना आन्दोलन जो अपने मूल में बुर्जुआजी स्वभाव लिये होने के बावजूद, समाज के एक तबके को झकझोरने का काम किया. पर स्वभावतः अपने अवसान की ओर चले जाने के पूर्व अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की स्थापना कर जिस तरह भारतीय समाज के दुःखी आम जनता के बीच एक उम्मीद की किरण जगायी, जहां एक तरफ वह संसदीय वामपंथियों के कब्र पर एक आखिर कील की तरह ही साबित हुई वहीं अरविन्द केजरीवाल को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की जमीन पर एक बेहतरीन विचारक के तौर पर स्थापित किया.
सुबह से लेकर रात्रि तक माक्र्स से लेकर माओ तक की गाथा गाने वाले संसदीय वामपंथियों को अपने देश की हकीकत का कुछ पता ही नहीं चलता है. जो जितना ज्यादा माक्र्स और माओ की उक्तियों को जितनी तेजी से उदृत कर सकता हो, वह उतना ही बड़ा वामपंथी माना जाता है. ऐसे में भारतीय समाज की सच्चाई से मूंह कब का फेर चुके वामपंथी अगर भारतीय समाज में अप्रसांगिक हो जाये तो, यह अतिरेक नहीं है.
अरविन्द केजरीवाल को वामपंथी मानने की भूल नहीं करना चाहिए क्योंकि संसदीय वामपंथी धारा आज जिस सड़ांध से गुजर रही है, वह किसी उपमा के लायक नहीं रह गया है. घोर प्रतिक्रियावादी स्वरूप लिये नन्दीग्राम का प्रणेता बन गये वामपंथी के पास अपनी सड़ांध से अब समाज को अंधेरी गुफा में धकेलने के अलावे कोई अन्य कार्य नहीं रह गया है. ऐसे में अरविन्द केजरीवाल आज जिस दृढ़ता के साथ भारतीय शासकवर्ग के सामने एक चुनौती पेश की है वह संसदीय वामपंथियों के लिए एक सपना भी नहीं रह गया था. यथा, अंबानी-अदानियों पर मुकदमा दायर करने का साहस वामपंथी कभी नही कर पाया.
अरविन्द केजरीवाल भारतीय पतनशील फौजी गुण्डे के सामने कितना समय टिक पायेगा यह तो कोई नहीं जानता है, पर आज वह जिस दृढ़ता के साथ आम मेहनतकश तबके के साथ जा जुड़ा है, और प्रतिक्रियावादियों के निशाने पर टिका है, वह अपने आप में अद्भूत साहस और उनके वैचारिक दृढ़ता को दर्शाता है.
सोवियत संघ में सत्ता हासिल करने के बाद ही लेनिन ने वहां की सामाजिक-जनवादी मजदूर पार्टी का नामाकरण कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ सोवियत संघ किया था. सवाल उठता है क्या बिना कम्युनिस्ट पार्टी और माक्र्स से लेकर माओ तक के उद्दरणों को रटे वगैर जनता की सेवा नहीं की जा सकती ? क्या माक्र्स के उद्दरण को रटने और बिना अटके रिकार्डर की तरह उगल डालने की क्रिया के वगैर द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की बुनियादी अवधारणाओं को नहीं अपनाया जा सकता ? अगर हां, तो फिर अरविन्द केजरीवाल के वैचारिक सोच को आगे क्यों नहीं बढ़ाया जाना चाहिए ?
लेखनी अच्छी है ।
Mayawati has decided to go to supreme Court, let us see what happens there.