Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home ब्लॉग

बैंकों में हड़ताल आखिर क्यों ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 26, 2018
in ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

बैंकों में हड़ताल आखिर क्यों ?

सरकार के मन की बात बैंककर्मियों ने खूब सुनी और रगड़ कर काम भी किया. सरकार किसे अपना मानती है ? 14 लाख बैंककर्मी और उनके 1 करोड़ आश्रित मध्यमवर्गीय परिवार के लोगो को या 100-500 लुटेरे पूंजीपतियों को ?

बैंककर्मियों द्वारा बैंकों में हड़ताल किया गया है. उन बैंककर्मियों की पीड़ा को न तो यह सरकार सुनना चाहती है और न ही सत्ता के चापलूस मीडिया घराना इसे दिखाना ही पसंद करता है. ऐसे में सोशल मीडिया उन तमाम बंचितों को अपनी बात रखने के लिए सार्थक आधार प्रदान करता है, सोशल मीडिया. यही कारण है कि केन्द्र की मोदी सरकार देश के तमाम मीडिया घरानों को खरीदने और धमकाने के बाद अब उसकी गिद्ध-दृष्टि अब सोशल मीडिया पर जा टिकी है, ताकि इसके जनवादी स्वरूप को खत्म कर सके.




यह तो भविष्य तय करेगा कि सोशल मीडिया पर बंचितों के आवाज को उठाने की आजादी केन्द्र की मोदी सरकार कितना दबा पायेगी, परन्तु यह तो साफ हो चुका है कि सोशल मीडिया पर भाजपा के बैठाये गुंडों में अब इतनी हैसियत नहीं बची है कि वह जनता की आवाज को दबाने के लिए शोर-शराबा कर सके.

You might also like

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

बहरहाल बैंककर्मियों ने भी अपनी को उठाने के लिए सोशल मीडिया को ही अपना सहारा माना है, और सरकार और दलाल मीडिया के द्वारा खलनायक के बतौर पेश की जा रही अपनी छवि के खिलाफ अपनी मांगों को सीधे और सपाट लहजों में आम लोगों के बीच रखा है. हम पाठकों के सामने उन बैंककर्मियों के शब्दों में ही उनकी पीड़ा को यहां बयां कर रहे हैं, जो उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से आम जनों के बीच रखा है क्योंकि लोकतंत्र ही नहीं बल्कि तमाम समाजव्यवस्थाओं में भी जनता ही सर्वोपरी होती है और वही सबसे ज्यादा ताकतवर होती है :




नवम्बर 2017 से 10 लाख बैंक कर्मियों की वेज रिविजन पेंडिंग है, हर बार की तरह इस बार भी सरकार ने बैंककर्मियों के वेतन को लेकर लम्बा मौन व्रत साध रखा है. हड़ताल कभी भी बैंकर की पहली चॉइस नहीं होती.

बैंककर्मी अपनी जायज मांगों को लेकर जब असहाय और मजबूर से हो जाते हैं, तभी निर्विकल्प होकर अपने 14 लाख बैंककर्मियों और उसके परिवार के आर्थिक सुरक्षा के लिए हड़ताल करते हैं, उसके बदले सैलरी कटवाते हैं और सड़कों पे उतरते हैं.

समान कार्य हेतु समान वेतन सभी के लिए संविधान प्रदत मानवाधिकार है, पर स्थिति बिलकूल पलट दी गयी है. यहां अधिक कार्य और कम सैलरी का फार्मूला लगा दिया गया है. जोखिमपूर्ण कार्य का अंतरराष्ट्रीय औघोगिक सिद्धांत कहता है कि हाई रिस्क हो तो हाई सैलरी देनी चाहिए. बैंक का कार्य पूरी तरह जोखिमपूर्ण है.




पूछिये किसी कैशियर से कि पूरी जिन्दगी में वो कितने रूपये कैश काउंटर पर गंवाता है ? पूछिये किसी ऑफिसर से कि कैसे किसी काम में छोटी-छोटी गलतियों के लिए अक्सर स्टॉफ एकाउंटेबिलिटी रिपोर्ट का शिकार होता है ? नोटबंदी में ऐसे कितने ही कैशियरों ने लाखों का लोन लेकर मोदी जी की योजना को सफल बनाने का विशाल बलिदान दिया. अब जब सैलरी की बात होती है तो हर बार बैंक में घाटे में है, का राग अलापने लगते हैं. जबकि सच्चाई है 99 बैंककर्मियों का इस पाप में कोई योगदान नहीं.
.
नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग कुछ उच्च प्रबंधन और सरकार के साथ मिलकर लूट का खेल खेलते हैं और बदनाम आम बैंककर्मियों को किया जाता है. ये समझने के बात है कि क्या एक बैंक क्लर्क, ऑफिसर या मैनेजर 1000 करोड़ और 10,000 करोड़ का ऋण देता है ? नहीं न ? मगर सत्ता में बैठे कुछ लोग आम बैंकरों को अगुंठा छाप और अनपढ़ समझने लगते हैं.




सरकार की लगभग हर योजना कहीं न कहीं बैंकर के गर्दन और पीठ पे ही लादी जाती है. काम इतने कि मानो 24 घंटे भी कम पड़ जाए. समय पे काम न हुआ तो … सुसाइड को उकसाने वाले तालिबानी इंग्लिश मीडियम में जानलेवा पत्र भेज दिया जाता है.

कुल मिलाकर के ये माने, इधर कुआं उधर खाई है. एक पतली सी गली है और टॉप स्पीड में गाडी भी चलाना और ख़बरदार जो किसी को खरोंच भी आई तो नौकरी पे जीवन-मरण का प्रश्न.

2016-17 में एक लाख अठावन हज़ार करोड़ का ऑपरेटिंग प्रॉफिट हुआ, जिसमें एक लाख बीस हज़ार करोड़ अमीरों के लोन को एडजस्ट करने में चला गया. क्या इसलिए की पार्टी चंदा का 90 कॉरपोरेट लोग देते है ? सरकार को लगता है कि गरीब वोट बैंक है और आमिर पार्टी चंदा का खजाना. 14 लाख बैंकर न तो वोट में निर्णायक है, न चंदा देने की औकात है इसलिए हमारी फ़िक्र नहीं.




हमारे सर्विस कंडीशन में कहीं नहीं लिखा है कि प्रॉफिट होगा तभी सैलरी मिलेगी या बढ़ेगी. सरकार के मन की बात बैंककर्मियों ने खूब सुनी और रगड़ कर काम भी किया. सरकार किसे अपना मानती है ? 14 लाख बैंककर्मी और उनके 1 करोड़ आश्रित मध्यमवर्गीय परिवार के लोगो को या 100-500 लुटेरे पूंजीपतियों को ?




Read Also –

फर्जी सरकार के फर्जी आंकड़े
70 साल के इतिहास में पहली बार झूठा और मक्कार प्रधानमंत्री
भाड़े का टट्टू उर्जित पटेल का भी इस्तीफा : गंभीर संकट की चेतावनी
नागरिकों की हत्या और पूंजीतियों के लूट का साझेदार
नोटबंदी से सजा नकली नोटों का बाजार




[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

राजनीतिक बहसों का उच्च मापदंड !?

Next Post

1857 के विद्रोह को प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कहने का क्या अर्थ है ?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

ब्लॉग

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

by ROHIT SHARMA
December 22, 2025
ब्लॉग

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

by ROHIT SHARMA
November 25, 2025
ब्लॉग

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

by ROHIT SHARMA
November 20, 2025
ब्लॉग

‘राजनीतिक रूप से पतित देशद्रोही सोनू और सतीश को हमारी पार्टी की लाइन की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है’ : सीपीआई-माओवादी

by ROHIT SHARMA
November 11, 2025
ब्लॉग

आख़िर स्तालिन के अपराध क्या था ?

by ROHIT SHARMA
November 6, 2025
Next Post

1857 के विद्रोह को प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कहने का क्या अर्थ है ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

एक मोदीभक्त का कबूलनामा !

March 16, 2020

सेलेब्रिटी का नंगा हो जाना क्या नंगापन नहीं है ?

July 23, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.