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बाजार की अनिवार्यताएं विचारों की जमीन को बंजर बनाती हैं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 2, 2021
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बाजार की अनिवार्यताएं विचारों की जमीन को बंजर बनाती हैं

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

कोई अगर यह सोचता है कि निजी विश्वविद्यालय डिग्रियां देने के अलावा वैचारिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का स्पेस भी देंगे तो उनके लिये प्रताप भानु मेहता का मामला उदाहरण बन सकता है. प्रोफेसर मेहता को अशोका युनिवर्सिटी से इसलिये रुखसत होना पड़ा क्योंकि वे प्रबंधन की नजरों में युनिवर्सिटी के लिये ‘लायबलिटी’ बन गए थे क्योंकि उनके सत्ता विरोधी विचारों के कारण युनिवर्सिटी के परिसर विस्तार और कोर्स संचालन संबंधी फाइलों को सरकारी स्तर पर अटकाया जा रहा था.

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अब जिस दौर में प्रताप भानु मेहता जैसे लोग किसी युनिवर्सिटी के लिये ‘एसेट’ होने के बजाय ‘लायबलिटी’ होने लगें उसे अंधेरे का दौर ही कहना होगा. और हमें मानना होगा कि उच्च शिक्षा में निजी निवेश की बातें बाहरी तौर पर जितनी व्यावहारिक और आकर्षक लगती हों, यथार्थ में वे विचारों की हत्या करने के काम ही आती हैं. आप लाभ-हानि के फार्मूले पर चलते परिसरों में वैचारिक स्वतंत्रता की बयार बहने की कल्पना कर ही नहीं सकते.

पश्चिम के देशों में ऐसे विश्वविद्यालयों के उदाहरण हैं जिन्हें सरकारी अगर नहीं कह सकते तो यह भी नहीं कह सकते कि वे मुनाफा की संस्कृति से प्रेरित और संचालित हैं. उनकी संरचना वैसी सपाट नहीं है कि उन्हें लाभ कमाने के उपकरण मात्र की संज्ञा दी जा सके. इसमें उन देशों के परिपक्व लोकतंत्र और चैरिटी की भी बड़ी भूमिका है. दुनिया के ऐसे कुछ नामचीन विश्वविद्यालयों ने विचारों के उद्गम और प्रसार में ऐतिहासिक भूमिकाएं निभाई हैं. लेकिन, भारत में जो निजी विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ती जा रही है उनमें अधिकतर तो बाकायदा दुकानों की तरह हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य ही है अधिकाधिक मुनाफा अर्जित करना, इसके लिये सत्ता-संरचना से तालमेल बिठा कर चलना आवश्यक शर्त्त है.

जहां मुनाफा अर्जित करने और सत्ता के प्रति अनुकूल बने रहने का आग्रह रहेगा वहां विचारों के पनपने और विकसित होने की कल्पना करना बेमानी है. प्रतिरोध के विमर्श की तो कोई गुंजाइश ही नहीं. बाजार की अनिवार्यताएं विचारों की जमीन को बंजर बनाती हैं. वे मूल्यहीनता का ऐसा संसार रचती हैं जहां मनुष्य संवेदनाओं का वाहक नहीं, बल्कि विपणन और प्रबंधन का कोई निष्प्राण उपकरण मात्र है. यही कारण है कि जितने भी निजी संस्थान खुलते गए हैं, अधिकतर तकनीकी शिक्षा के प्रति ही रुझान ही रखते हैं. उनका ही बाजार है, भले ही इन संस्थानों की डिग्रियां लेकर निकलने वालों में आधे से अधिक लोग किसी लायक न हो पाए.

भाषा, साहित्य और सोशल साइंस से जुड़े विषयों के शिक्षण के प्रति अधिकतर निजी संस्थानों ने कभी उत्साह नहीं दर्शाया. यह स्वाभाविक भी है क्योंकि लाखों की वार्षिक फीस देकर इतिहास, हिन्दी या समाजशास्त्र जैसे विषयों की पढ़ाई करने वालों की संख्या नगण्य हो होगी. जाहिर है, सोशल साइंस और साहित्य आदि की पढ़ाई के लिये मुख्य रूप से सरकारी संस्थानों पर ही निर्भरता रहेगी लेकिन, यहां भी संस्थानों को स्वायत्तता देने के नाम पर उनका कारपोरेटीकरण करने की प्रवृत्ति हावी हो रही है. जैसे कि उदाहरण सामने आ रहे हैं, स्वायत्त घोषित संस्थान अपनी फीस में अनाप-शनाप बढ़ोतरी करते जा रहे हैं जबकि फैकल्टी को वाजिब से आधे वेतन पर नियुक्त कर रहे हैं, वह भी अनुबंध पर. शिक्षा का कार्पोरेटाइजेशन साहित्य और सोशल सांइस के शिक्षण को हतोत्साहित करेगा, जो कि कर भी रहा है. यह अप्रत्यक्ष रूप से विचारों को कुंद और हतोत्साहित करने की एक प्रभावी प्रक्रिया है.

किसी समाज में अगर विचारहीनता पसरती जा रही है तो उसकी शिक्षण प्रक्रिया और शैक्षणिक संस्कृति को देखना होगा कि इसके लिये वह कितनी जिम्मेदार है. भारत इसका एक सटीक उदाहरण है जिसने बीते दो-ढाई दशकों में अपने सरकारी शिक्षण तंत्र को घिसटने और खुद की मौत मरने की राह पर ला खड़ा किया है. इनकी कब्रों पर निजी तंत्र की अट्टालिकाएं खड़ी होती गई हैं जिन्होंने मूल्यहीनता का एक नया साम्राज्य स्थापित किया है. इसने ऐसी पीढ़ियों को तैयार किया है जो प्रतिभाशाली तो हैं, उनकी जगमगाती शैक्षणिक उपलब्धियां भी हैं, किन्तु जो विचारों के प्रति न कोई विशेष आग्रह रखतीं, न सम्मान रखतीं हैं.

जगमगाती उपलब्धियों के साथ वैचारिक दरिद्रताओं को ओढ़ती जा रही पीढियां मुनाफा आधारित शिक्षण तंत्र और प्रक्रिया की स्वाभाविक उपज हैं. यही कारण है कि हम ज्ञान के क्षेत्र में प्रतिभाओं का उत्कर्ष तो देख रहे हैं लेकिन ज्ञान के साथ वैचारिक उत्कर्ष के उदाहरण नगण्य होते जा रहे हैं.

जो तंत्र प्रतापभानु मेहता और अरविंद सुब्रह्मण्यम जैसों को सहन नहीं कर सकता वह किस तरह नए स्वतंत्रचेता विचारकों को जन्म दे सकता है ? हम ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जिसमें संस्थानों का प्रबंधन ज्ञान और वैचारिक उन्मेष के अद्भुत समन्वय को यथासंभव हतोत्साहित करने में सत्ता का सहयोग करता है. यह सत्ता-सापेक्ष संस्कृति प्रतिरोध के विमर्शों को षड्यंत्रों से घेरती है, मनुष्यों के पक्ष में उठने वाली आवाजों को कुंद करने के हरसंभव प्रयास करती हैं.

एकाध अपवादों को छोड़ मुख्यधारा के मीडिया ने अशोका युनिवर्सिटी बनाम प्रतापभानु मेहता के मुद्दे की उपेक्षा ही की. वे यही कर भी सकते थे क्योंकि वे जैसे बन चुके हैं, उनसे मनुष्य सापेक्ष और विचार सापेक्ष मुद्दों पर बात करने की उम्मीद की ही नहीं जा सकती.

लेकिन, यह संकेत है कि हम ऐसे दौर में आ पहुंचे हैं जहां विचारों की जगह सिमटती जा रही है, सैद्धांतिक प्रतिरोध के खिलाफ संस्थानों और सत्ता-संरचना का गठजोड़ मजबूत होता जा रहा है और वैचारिक रीढ़ की हड्डी सीधी करके संस्थानों के साथ काम कर पाना कठिन होता जा रहा है. हर कोई प्रतापभानु मेहता नहीं होता जो किसी संस्थान की नौकरी का विवश आश्रित नहीं, न हर कोई अरविंद सुब्रह्मण्यम हो सकता है जो अपनी नौकरी की चिंता छोड़ विचारों की राह में आने वाले अवरोधों के खिलाफ खड़ा हो सकता है.

सत्ता-संरचना वैचारिक स्पष्टताओं और अभिव्यक्तिगत स्वतन्त्रताओं के खिलाफ हमेशा, हर दौर में षड्यंत्र करती रही है लेकिन अब, सत्ता और कारपोरेट का मजबूत होता गठजोड़ विचारों के खिलाफ अप्रत्यक्ष षड्यंत्र नहीं रचता, बल्कि प्रत्यक्ष आ खड़ा होता है. यही कारण है कि शिक्षण-तंत्र को ऐसा आकार दिया जा रहा है जो ज्ञान तो दे, लेकिन मूल्यों और विचारों के साथ उसका सामंजस्य न हो। बाजार के लिये मूल्यहीन और विचारहीन समाज ही श्रेयस्कर होता है. तो, बाजार शिक्षण तंत्र पर काबिज होकर अपने अनुरूप मनुष्यों को और समाज को गढ़ रहा है.

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