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‘खैरमकदम’ से शुरू होकर ‘मुर्दाबाद’ तक पहुंचने में कई वर्ष लग गए इन बाबू लोगों को

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 20, 2021
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'खैरमकदम' से शुरू होकर 'मुर्दाबाद' तक पहुंचने में कई वर्ष लग गए इन बाबू लोगों को

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

अपनी हड़ताल के दौरान बैंकों के बाबू लोग नारे लगाते देखे गए – ‘नीति आयोग, मुर्दाबाद.’ इसमें कोई हैरत की बात भी नहीं थी क्योंकि यह नीति आयोग ही है जो व्यापक निजीकरण का खाका खींच रहा है. यह उसी की दृष्टि है जिसके अनुसार बैंकों के निजीकरण की ओर कदम बढ़ाए जा रहे हैं. तो, नीति आयोग का मुर्दाबाद तो बनता है.

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हैरत तब भी नहीं हुई थी जब इन्हीं बाबू लोगों के बड़े हिस्से ने योजना आयोग को अप्रासंगिक ठहराए जाने का समर्थन किया था और उसकी जगह नीति आयोग के गठन की घोषणा का उल्लास के साथ खैरमकदम किया था. एक वह दिन था और एक आज का दिन है.

खैरमकदम से शुरू होकर मुर्दाबाद तक पहुंचने में कई वर्ष लग गए इन बाबू लोगों को. हालांकि, इस बीच नीति आयोग से जुड़े अधिकारियों और विशेषज्ञों ने कभी भी निजीकरण को लेकर अपने विचारों को नहीं छुपाया. वे शुरू से ही स्पष्ट थे कि पब्लिक सेक्टर की इकाइयों से लेकर स्कूल और अस्पताल तक निजी हाथों को दे देना चाहिये. यहां तक कि नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने तो ‘कंप्लीट प्राइवेटाइजेशन ऑफ एलिमेंट्री एडुकेशन’ जैसी खतरनाक बातें भी की. वे सरकारी जिला अस्पतालों तक में निजी हिस्सेदारी बढ़ाने की न सिर्फ वकालत करते रहे थे बल्कि इस विचार को मूर्त्त रूप देने के लिये योजनाओं पर काम भी कर रहे थे.

गौर करने की बात यह है कि यह सब 2019 के आम चुनाव से बहुत पहले, नरेंद्र मोदी की सरकार के पहले कार्यकाल के पूर्वार्द्ध में ही हो रहा था. जब योजना आयोग को खत्म कर नीति आयोग का गठन किया गया था तो कहा गया था कि बदलते दौर में भारत के विकास को दिशा देने में इसकी बड़ी भूमिका होगी.

लेकिन, शुरू से ही स्पष्ट था कि नीति आयोग में ऐसे विशेषज्ञों का जमावड़ा है जो हर मर्ज का इलाज निजीकरण में ही तलाशते हैं. वे कल्पनाशून्य विशेषज्ञ भारत की विशिष्ट आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार योजनाएं बनाने में कोई भी रुचि लेने के बजाय सब कुछ कारपोरेट के हवाले करने की योजनाओं पर काम करते रहे. और इधर, राजनीतिक नेतृत्व जम कर राष्ट्रवाद, धर्मवाद, अस्मितावाद, मिथकीय अतीत के सहारे पुनरुत्थानवाद आदि को विमर्श के केंद्र में स्थापित करता रहा.

ये पढ़े लिखे बाबू लोग, जो आज नीति आयोग का मर्सिया गा रहे हैं, तब इस ओर ध्यान देने की जरूरत भी महसूस नहीं कर रहे थे कि असल में नीति आयोग है क्या, यह कर क्या रहा है और इसके किये का हमारे या हमारे बाल-बच्चों के भविष्य पर कैसा असर पड़ेगा ? जिस दिन अमिताभ कांत ने प्रारम्भिक शिक्षा के ‘कंप्लीट प्राइवेटाइजेशन’ की जरूरत बताई थी और सरकारी अस्पतालों में निजी वार्ड बनाने की कार्य योजनाओं पर काम शुरू किया था उस वक्त इस बाबू वर्ग का बड़ा हिस्सा राजनीतिक सत्ता के गढ़े गए नैरेटिव्स का मुखर प्रवक्ता बन कर अपने ड्राइंग रूम्स को संवेदनहीन विचारहीनता की उत्सवस्थली में बदल रहा था.

यह जरूर है कि बैंकिंग-बीमा सहित तमाम पब्लिक सेक्टर इकाइयों की कर्मचारी यूनियनों ने शुरू से ही निजीकरण की किसी भी योजना का विरोध किया और यदा-कदा धरना-प्रदर्शन भी करते रहे. लेकिन, इनका महत्व रस्मी विरोध से अधिक कभी नहीं रहा क्योंकि दिन में ‘निजीकरण मुर्दाबाद’ का नारा लगाने वाला बाबू रात के प्राइम टाइम में टीवी पर चीखते एंकरों के शोर में पाकिस्तान को धूल चाटते और अपने देश को महाशक्ति बनते देख सब कुछ भूल जाता रहा.

यह उस देश के शहरी मध्यवर्ग की आत्महंता आत्ममुग्धता थी जिसने इस तथ्य को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया कि जिस देश में दुनिया के सबसे अधिक बेरोजगार बसते हों, सबसे अधिक कुपोषित माताएं और नौनिहाल बसते हों, जहां के किसानों की आत्महत्या की दर दुनिया में सर्वाधिक हो, जहां के कस्बाई-ग्रामीण इलाकों की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त हो वह किसी भी सूरत में विश्व महाशक्ति तो नहीं ही बन सकता.

आर्थिक उदारवाद से उपजी समृद्धि और राजनीतिक वर्ग के गढ़े गए नैरेटिव्स से उपजी विचारहीनता ने शहरी मध्यवर्ग को विकल उपभोक्ता में बदल डाला जिसके उपभोग की ललक कभी कम न होती हो. खुद के स्वार्थों में डूबे और नतीजे में घोर आत्मकेंद्रित होते इस वर्ग ने इस देश की दो तिहाई आबादी, जो निहायत ही निर्धन है, के सरोकारों से खुद को न केवल पूरी तरह काट लिया बल्कि उनके शोषण का लाभान्वित भागीदार भी बन गया.

जो निजी क्षेत्र के कामगारों के बढ़ते शोषण से आंखें मूंदे रहे, श्रम कानूनों में मनुष्य और मनुष्यता विरोधी बदलाव लाती राजनीतिक सत्ता के समर्थन आधार बने रहे, जब खुद उनके बिल में पानी जाने लगा तो आज बिलबिलाते चूहों की तरह निकल कर, सड़कों पर इधर-उधर जमावड़े लगा कर ‘ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे हैं. वे आंदोलित हैं और सरकार को धमकी दे रहे हैं कि उनकी मांगों पर अगर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में वे और अधिक ‘उग्र’ आंदोलन करेंगे.

कितनी हवाई और निराधार कल्पनाएं कर रहे हैं ये बाबू लोग कि सरकार उनके आंदोलन से ठिठक जाएगी और उनकी संस्थाओं का निजीकरण नहीं होगा. वे चाहते हैं कि हर चीज का निजीकरण हो जाए लेकिन उनके संस्थान का निजीकरण न हो ताकि नौकरी की सरकारी सुरक्षा के साथ वे नियमित और अबाध मोटी पगार पाते रहें और प्रस्तावित निजी रेलवे प्लेटफार्म के लकदक माहौल में आरामदेह निजी एक्सप्रेस ट्रेन की प्रतीक्षा करते रहें, कि निजी ट्रेन की सुविधासम्पन्न बोगियों में सफर करते छुट्टियां मनाने मनपसंद जगहों पर जाते रहें कि अपने बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में पढ़ाते रहें, महंगे निजी अस्पतालों में अपना इलाज करवाते रहें.

वे निजीकरण के विरोध में आज नारे लगाते देखे गए लेकिन उनसे बढ़कर निजीकरण का कोई पैरोकार नहीं रहा. वे आंदोलन कर रहे हैं और सोचते हैं कि इससे शायद कोई फर्क पड़ जाए. कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. जैसे, निजीकृत हो चुकी या होती जा रहीं पब्लिक सेक्टर की अन्य इकाइयों के कर्मियों के आंदोलन से कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि, बतौर आंदोलनकारी, चरित्र बल के मामले में सब के सब एक समान हैं.

दुनिया के इतिहास में आज तक कोई भी ऐसा आंदोलन सफल नहीं हुआ जिसके आंदोलनकारियों की जमात बतौर आंदोलनकारी, चरित्रबल के मामले में दरिद्र हो. आंदोलनकारियों का चरित्र आंदोलन का चरित्र निर्धारित करता है.

चाहे जितने मुर्दाबाद कर लें, आज दो सरकारी बैंक निजी हो रहे हैं, कल चार होंगे, परसों आठ होंगे. आज सौ रेलवे प्लेटफार्म निजी हो रहे हैं, कल हजार होंगे. जैसे, शुरू में बड़े शहरों में निजी स्कूल खुले और धनाढ्य-नवधनाढ्य वर्ग ने उस पर पैसों की बरसात कर उसे अंगीकार किया, आज कस्बों-गांवों में भी निजी स्कूलों की भरमार है और रिक्शावाला, दिहाड़ी मजदूर भी अपना पेट काट कर बच्चों की फीस भरने के लिए विवश है, क्योंकि यह तथ्य स्वीकृत कर लिया गया है कि बच्चों को अगर बड़ा आदमी बनना है तो निजी स्कूलों में ही विकल्प हैं.

आप निजीकरण विरोधी नारे लगाते रहो, उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे आपके नारे का दम जानते हैं. वे जानते हैं कि जल्दी ही आपका दम उखड़ जाने वाला है. उपनिवेशवाद से लड़ने में सामूहिक भागीदारी ने आंदोलन को प्रभावी बनाया था, नवउपनिवेशवाद ने इस सामूहिकता को ही नष्ट कर अपना जाल बिछाया है. हितों के अलग-अलग द्वीपों पर लड़ती कामगारों की जमातें लड़ाई शुरू होने के पहले ही हार रही हैं.

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