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कोरोनावायरस के आतंक पर सवाल उठाते 12 विशेषज्ञ

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 13, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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हमें कुछ ऐसे सवाल पूछने चाहिए जैसे ‘आपको कैसे पता चला कि यह वायरस खतरनाक है ?’, ‘यह पहले कैसा था ?’, ‘क्या पिछले साल भी हमारे साथ ऐसी ही चीज नहीं हुई थी ?’, ‘क्या यह कुछ नया है ?’ मुझे इस बात की गहरी चिंता है कि सामान्य जीवन के इस लगभग सम्पूर्ण लॉकडाऊन का सामाजिक, आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर परिणाम – स्कूल और व्यवसाय बंद, एकत्रित होने पर प्रतिबंध – लंबे समय तक चलेंगे और संभवतः प्रत्यक्ष रूप से वायरस द्वारा उत्पन्न विपत्ति की तुलना में कहीं अधिक विपत्तिजनक होंगे. शेयर बाजार में समय के साथ वापस उछाल आ जाएगा, लेकिन कई व्यवसाय कभी नहीं उबर पाएंगे. इसके परिणामस्वरुप जो बेरोजगारी, गरीबी और निराशा उत्पन्न होगी, उसके कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य सबसे पहले संकटग्रस्त होगा. प्रस्तुत आलेेेख अन्तर्राष्ट्रीय अंग्रेजी पत्रिका द गार्जियन में 24 मार्च, 2020 को प्रकाशित हुआ है, जिसका हिन्दी अनुवाद हम अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं.

कोरोनावायरस के आतंक पर सवाल उठाते 12 विशेषज्ञ

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पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

नीचे हमारी बारह चिकित्सा विशेषज्ञों की सूची है, कोरोनोवायरस के प्रकोप पर जिनकी राय मेन स्ट्रीम मिडिया में प्रचलित आधिकारिक कहानियों, और सोशल मीडिया में बहुत प्रचलित मीम्स के ठीक उलट है.

डॉ. सुचरित भाकड़ी माइक्रोबायोलॉजी के विशेषज्ञ हैं. वह मेंज की जोहान्स गुटेनबर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल माइक्रोबायोलॉजी एंड हाइजीन के प्रमुख रह चुके हैं और जर्मन इतिहास में सबसे अधिक उद्धृत किए जाने वाले अनुसंधान वैज्ञानिकों में से एक थे. वह क्या कहते हैं –

हमें डर है कि नए वायरस से 1 मिलियन संक्रमित लोगों के कारण अगले 100 दिनों में प्रति दिन 30 मौतें होंगी लेकिन हमें इस बात का अहसास नहीं है कि सामान्य कोरोना वायरस पॉजिटिव 20, 30, 40 या 100 रोगी हर दिन अभी ही मर रहे हैं.

[सरकारों के COVID19 विरोधी उपाय] अड़ियल, बेतुके और बहुत खतरनाक हैं. लाखों लोगों की जीवन प्रत्याशा कम हो रही है. विश्व की अर्थव्यवस्था पर इसका भयावह प्रभाव अनगिनत लोगों के अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है. चिकित्सा देखभाल पर इसके परिणाम बहुत गहरे हैं. जरूरतमंद मरीजों के लिए सेवाएं पहले ही कम कर दी गई हैं, ऑपरेशन रद्द कर दिए गए हैं, ओपीडी खाली हैं, अस्पतालों में कर्मियों की कमी हो रही है. यह सब कुछ हमारे पूरे समाज पर गहरा असर डालेगा. इन सभी उपायों का परिणाम आत्म-विनाश और सामूहिक आत्महत्या के अलावा और कुछ नहीं होने जा रहा है.

https://youtu.be/JBB9bA-gXL4

डॉ. वोल्फगैंग वोडर्ग एक जर्मन चिकित्सक और पल्मोनोलॉजी के विशेषज्ञ, राजनीतिज्ञ और यूरोपिय परिषद के संसदीय असेम्बली के पूर्व अध्यक्ष हैं. 2009 में उन्होंने स्वाइन फ्लू महामारी के खिलाफ यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया के इर्द-गिर्द हितों के कथित टकरावों की एक जांच बिठाया था. वह क्या कहते हैं –

वैज्ञानिकों द्वारा राजनीतिज्ञों के दरबारी जैसा व्यवहार किया जा रहा है. वे वैज्ञानिक जो अपने संस्थानों के लिए धन प्राप्त करना चाहते हैं, वे वैज्ञानिक जो सिर्फ मुख्यधारा में तैरते हैं और इसमें से अपना हिस्सा पाना चाहते हैं और अभी उनके बीच से चीजों को देखने का एक तर्कसंगत तरीका गायब है.

हमें कुछ ऐसे सवाल पूछने चाहिए जैसे ‘आपको कैसे पता चला कि यह वायरस खतरनाक है ?’, ‘यह पहले कैसा था ?’, ‘क्या पिछले साल भी हमारे साथ ऐसी ही चीज नहीं हुई थी ?’, ‘क्या यह कुछ नया है ?’ यह चीज गायब है.

https://youtu.be/p_AyuhbnPOI

डॉ. जोएल केटनर मैनिटोबा विश्वविद्यालय में सामुदायिक स्वास्थ्य विज्ञान और सर्जरी के प्रोफेसर, मैनिटोबा प्रांत के पूर्व मुख्य सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी और संक्रामक रोग अंतर्राष्ट्रीय केंद्र के चिकित्सा निदेशक हैं. वह क्या कहते हैं –

मैंने इस तरह की कोई चीज कभी भी नहीं देखा है, कोई भी चीज कहीं भी नहीं जो इसके आसपास भी ठहरती हो. मैं महामारी के बारे में बात नहीं कर रहा हूं, क्योंकि मैंने 30 महामारियों को देखा है, हर साल एक. इसे इन्फ्लूएंजा कहा जाता है और सांस की बीमारी उत्पन्न करने वाले अन्य वायरस, हम हमेशा नहीं जानते कि वे क्या हैं लेकिन मैंने कभी इस तरह की प्रतिक्रिया नहीं देखा है, और मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि ऐसा क्यों हो रहा है ?

मुझे जनता के बीच जा रहे संदेश, लोगों के संपर्क में आने के डर, इन्सान की तरह लोगों के साथ एक ही स्थान में रहने, हाथों को मिलाने, लोगों से मिलने के बारे में चिंता है. मुझे उससे संबंधित, कई परिणामों की चिंता है.

हुबेई में, हुबेई प्रांत में, जहां अब तक सबसे अधिक मामले और मौतें हुई हैं, रिपोर्ट किए गए मामलों की वास्तविक संख्या प्रति 1000 लोगों में 1 है और रिपोर्ट की गई मौतों की वास्तविक दर 1 प्रति 20,000 है तो शायद यह तथ्य चीजों को परिप्रेक्ष्य में रखने में मदद करेगा.’

http://www.pratibhaekdiary.com/wp-content/uploads/2020/04/checkup-IpW5ilaP-20200315.mp3

 

डॉ. जॉन लोआनिडिस, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में स्वास्थ्य अनुसंधान और नीति के और बायोमेडिकल डेटा साइंस के मेडिसिन के प्रोफेसर हैं, और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड साइंसेज में सांख्यिकी के प्रोफेसर हैं. वह स्टैनफोर्ड प्रिवेंशन रिसर्च सेंटर के निदेशक और स्टैनफोर्ड (मेट्रिक्स) में मेटा-रिसर्च इनोवेशन सेंटर के सह-निदेशक हैं.

वह यूरोपियन जर्नल ऑफ क्लिनिकल इन्वेस्टिगेशन के एडिटर-इन-चीफ भी हैं. वह आयोनिना स्कूल ऑफ मेडिसिन के स्वच्छता और महामारी विज्ञान विभाग में अध्यक्ष, के साथ-साथ टफ्ट्स यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में सम्बद्ध प्रोफेसर भी रह चुके हैं.

एक चिकित्सक, वैज्ञानिक और लेखक के रूप में उन्होंने साक्ष्य-आधारित चिकित्सा, महामारी विज्ञान, डेटा विज्ञान और नैदानिक अनुसंधान में योगदान दिया है. इसके अलावा, उन्होंने मेटा-रिसर्च के क्षेत्र का भी संचालन किया है. उसने दिखाया है कि अधिकांश प्रकाशित शोध प्रमाण अच्छे वैज्ञानिक मानकों को पूरा नहीं करते हैं. वह क्या कहते हैं –

जितने रोगियों में SARS-CoV-2 का परीक्षण किया गया है, उनका गंभीर लक्षणों और बुरे परिणामों वाले रोगियों की संख्या के साथ कोई तुलना ही नहीं है क्योंकि अधिकांश स्वास्थ्य प्रणालियों में परीक्षण क्षमता सीमित होती है, निकट भविष्य में चयन में पूर्वाग्रह की स्थिति और भी बिगड़ सकती है.

एक स्थिति में जहां एक पूरी, बंद आबादी का परीक्षण किया गया था, वह था डायमंड प्रिंसेस क्रूज जहाज और उसके क्वारंटाइन किए गए यात्री. इस मामले की मृत्यु दर 1.0% थी, लेकिन यह काफी हद तक बुजुर्गों की आबादी थी, जिसमें कोविड -19 से मृत्यु दर काफी अधिक होती है.

क्या कोविड -19 मामले की मृत्यु दर इतनी कम हो सकती है ? नहीं, बुजुर्ग आबादी में उच्च मृत्यु दर की ओर इशारा करते हुए कुछ लोग कहते हैं. हालांकि, यहां तक कि कुछ तथाकथित हल्के या कामन-कोल्ड-प्रकार के कोरोना वायरस से, जिनके बारे में दशकों से जानकारी है, बुजुर्ग लोगों के संक्रमित होने पर नर्सिंग होम में मृत्यु दर इससे काफी अधिक, 8% तक हो सकती है.

अगर हमें उन मामलों में एक नए वायरस के बारे में नहीं पता होता, और व्यक्तियों की पीसीआर परीक्षणों वाली जांंच नहीं की गई होती, तो ‘इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारी’ के कारण होने वाली कुल मौतों की संख्या इस साल असामान्य नहीं लगेगी. अधिक से अधिक, हमने लापरवाही से यही दर्ज किया होता कि इस सीजन में फ्लू की स्थिति औसत से थोड़ा-सा ज्यादा खराब है.

‘क्या एक फिजूल सी चीज बन रही है ? जैसे-जैसे कोरोनावायरस की महामारी जोर पकड़ती जा रही है, हम विश्वसनीय आंकड़ों के बिना ही निर्णय लेते जा रहे हैं’ – स्टेट न्यूज़, 17 मार्च 2020.

डॉ. योरम लास एक इजरायली चिकित्सक, राजनीतिज्ञ और स्वास्थ्य मंत्रालय के पूर्व महानिदेशक हैं. उन्होंने तेल अवीव विश्वविद्यालय मेडिकल स्कूल के एसोसिएट डीन के रूप में भी काम किया और 1980 के दशक के दौरान विज्ञान आधारित टेलीविजन शो टाटज़पिट प्रस्तुत किया है. वह क्या कहते हैं –

इटली किसी भी अन्य यूरोपीय देश की तुलना में तीन गुना से अधिक सांस की समस्याओं से मृत्यु के लिए जाना जाता है. अमेरिका में नियमित फ्लू के मौसम में लगभग 40,000 लोगों की मौत हो जाती है और अब तक कोरोना वायरस के कारण 40-50 लोगों की मौत हो चुकी है, उनमें से ज्यादातर लोग वाशिंगटन के किर्कलैंड के एक नर्सिंग होम में मरे हैं.

हर देश में, कोरोनोवायरस से मरने वालों की संख्या की तुलना में नियमित फ्लू से मरने वालों की संख्या अधिक होती है.

इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है, जिसे हम सभी भूल जाते हैं : वह है 2009 में फैला स्वाइन फ्लू. यह मैक्सिको से पूरी दुनिया में फैलने वाला एक वायरस था और आज तक इसे रोकने के लिए कोई टीकाकरण नहीं हुआ है. पर क्या ? उस समय फेसबुक नहीं था या शायद था, लेकिन यह उस समय अपनी प्रारंभिक अवस्था में था. कोरोना वायरस, इसके विपरीत, जनसंपर्क से फैलने वाला वायरस है.

अगर कोई भी सोचता है कि सरकारें वायरस खत्म करती हैं तो वह गलत सोचता है. (ग्लोब्स में साक्षात्कार, 22 मार्च 2020)

डॉ. पिएत्रो वर्नाज़ा एक स्विस चिकित्सक हैं जो कैंटोनल अस्पताल सेंट गैलन में संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ और स्वास्थ्य नीति के प्रोफेसर हैं. वह क्या कहते हैं :

हमारे पास इटली के विश्वसनीय आंकड़े और महामारी विज्ञानियों द्वारा किया गया काम है, जो प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका (साइंस) में प्रकाशित है, जिसने चीन में प्रसार की जांच की है. इससे यह स्पष्ट होता है कि सभी संक्रमणों में से लगभग 85 प्रतिशत संक्रमण किसी को पता चले बिना ही रहे हैं. मृतक रोगियों में से 90 प्रतिशत 70 वर्ष से अधिक उम्र के, और 50 प्रतिशत 80 वर्ष से अधिक उम्र के होते हैं.

विज्ञान प्रकाशन के निष्कर्षों के अनुसार इटली में, डायग्नोस हुए हर दस में से एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, जो सांख्यिकीय रूप से संक्रमित हर 1,000 लोगों में से एक होता है. प्रत्येक मामला दुखद है, लेकिन अक्सर – फ्लू के मौसम के समान – यह उन लोगों को प्रभावित करता है जो अपने जीवन के अंतिम काल में होते हैं.

यदि हम स्कूलों को बंद कर देते हैं, तो हम बच्चों में जल्दी से प्रतिरक्षा विकसित होने को रोक देंगे. हमें वैज्ञानिक तथ्यों को बेहतर तरीके से राजनीतिक निर्णयों में एकीकृत करना चाहिए. (सेंट गैलर टैगब्लट में साक्षात्कार, 22 मार्च 2020)

फ्रैंक उलरिक मोंटगोमरी जर्मन रेडियोलॉजिस्ट, जर्मन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के उपाध्यक्ष हैं. वह क्या कहते हैं –

मैं लॉकडाउन का प्रशंसक नहीं हूं. जो भी व्यक्ति कुछ ऐसा लागू करता है, उसे यह भी बताना चाहिए कि उसे कब और कैसे इसे दुबारा चुनना है. चूंकि हमें यह मानना होगा कि वायरस हमारे साथ लंबे समय तक रहेगा, मुझे आश्चर्य है कि हम सामान्य स्थिति में कब लौटेंगे ? आप स्कूलों और डेकेयर केंद्रों को वर्ष के अंत तक बंद नहीं रख सकते क्योंकि हमें इसे कम से कम वायरस का टीका बनने तक जारी रखना पड़ेगा. इटली ने लॉकडाउन लगाया और इसका विपरीत प्रभाव हुआ है. वे जल्दी ही अपनी क्षमता की अंतिम सीमा तक पहुंच गए, लेकिन लॉकडाउन के भीतर भी वायरस का फैलना धीमा नहीं हुआ. (जनरल अन्जिगर में साक्षात्कार, 18 मार्च 2020)

प्रो. हेंड्रिक स्ट्रीक एक जर्मन एचआईवी शोधकर्ता, महामारी विशेषज्ञ और नैदानिक परीक्षणकर्ता है. वे वायरोलॉजी के प्रोफेसर और बॉन यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी एंड एचआईवी रिसर्च के निदेशक हैं. वह क्या कहते हैं –

यह नया रोगज़नक़ वायरस उतना खतरनाक नहीं है, यह सार्स-1 से भी कम खतरनाक है. खास बात यह है कि सार्स-CoV-2 गले के उपरी क्षेत्र में अपनी प्रतिकृति बनाता है और इसलिए यह बहुत अधिक संक्रामक है क्योंकि वायरस बोलने के दौरान भी एक के गले से दूसरे के गले तक कूद जाता है लेकिन इससे भी एक फायदा है : क्योंकि सार्स-1 अपनी प्रतिकृति फेफड़ों की गहराई में बनाता है, यह उतना संक्रामक नहीं होता है, लेकिन यह निश्चित रूप से फेफड़ों में पहुंच जाता है, जो इसे और अधिक खतरनाक बनाता है.

आपको यह भी ध्यान रखना होगा कि जर्मनी में सार्स-CoV-2 से होने वाली मौतों के शिकार विशेष रूप से बूढ़े लोग हुए थे. उदाहरण के लिए, हेन्सबर्ग में, एक 78 वर्षीय व्यक्ति की मृत्यु जो पहले ही अन्य बीमारियों से ग्रसित था, हृदय गति रुकने से हो गई और वह भी फेफड़े के सार्स-2 से प्रभावित हुए बिना ही. चूंकि वह संक्रमित था, स्वाभाविक रूप से उसे कोविड 19 के आंकड़ों में दिखाया गया है लेकिन सवाल यह है कि क्या अगर उन्हें सार्स-2 का संक्रमण नहीं हुआ होता तो उनकी मौत नहीं हुई होती ? (फ्रैंकफर्टर ऑलगेमाइन में साक्षात्कार, 16 मार्च 2020)

डॉ. यानिस रौसेल एट. अल. – इंस्टीट्यूट हॉस्पिटालो-युनिवर्सिटेयर मेडिटेरानी इंफेक्शन, मार्सिले और इंस्टीट्यूट डी रिचेरचे पोउर ले डिवेलपमेंट, असिस्टेंस पब्लिक-हॉपिटक्स डी मार्सिले के शोधकर्ताओं की एक टीम, जो फ्रांस की सरकार के लिए ‘भविष्य के लिए निवेश’ कार्यक्रम के तहत कोरोना वायरस की मृत्यु दर पर एक सहकर्मी समीक्षा अध्ययन का आयोजन कर रही है. वे क्या कहते हैं –

सार्स-CoV-2 की समस्या को शायद ज्यादा आंका जा रहा है, क्योंकि यह लिखने के समय सार्स-CoV-2 से हुई मौतों की संख्या 4000 से कम है जबकि इसकी तुलना में हर साल 2.6 मिलियन लोग श्वसन संक्रमण से मर जाते हैं.

इस अध्ययन में 1 जनवरी 2013 से 2 मार्च 2020 तक एपी-एचएम रोगियों में पहचाने जाने वाले सामान्य कोरोना वायरस से मृत्यु दर (0.8%) के साथ ओईसीडी देशों में सार्स-CoV-2 से होने वाली मृत्यु दर (1.3%) की तुलना की गई है. इसके लिए चाई-स्क्वार्ड परीक्षण किया गया था, और पी-मान 0.11 था (यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है).

… यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि अन्य कोरोना वायरसों के लिए (लेकिन अभी तक सार्स-CoV-2 के लिए नहीं) व्यवस्थित अध्ययनों में पाया गया है कि लक्षणों से रहित वाहकों का प्रतिशत लक्षण सहित रोगियों के प्रतिशत के बराबर या उससे अधिक है. सार्स-CoV-2 के लिए भी यही डेटा शायद जल्द ही उपलब्ध हो सकता है, जो इस विशिष्ट विकृति से जुड़े सापेक्ष जोखिम को और कम करेगा. (‘सार्स-CoV-2: डर बनाम डेटा’, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ एंटीमाइक्रोबियल एजेंट्स, 19 मार्च 2020)

डॉ. डेविड काट्ज एक अमेरिकी चिकित्सक और येले विश्वविद्यालय के रोकथाम अनुसंधान केंद्र के संस्थापक निदेशक हैं. वह क्या कहते हैं –

मुझे इस बात की गहरी चिंता है कि सामान्य जीवन के इस लगभग सम्पूर्ण लॉकडाऊन का सामाजिक, आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर परिणाम – स्कूल और व्यवसाय बंद, एकत्रित होने पर प्रतिबंध – लंबे समय तक चलेंगे और संभवतः प्रत्यक्ष रूप से वायरस द्वारा उत्पन्न विपत्ति की तुलना में कहीं अधिक विपत्तिजनक होंगे. शेयर बाजार में समय के साथ वापस उछाल आ जाएगा, लेकिन कई व्यवसाय कभी नहीं उबर पाएंगे. इसके परिणामस्वरुप जो बेरोजगारी, गरीबी और निराशा उत्पन्न होगी, उसके कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य सबसे पहले संकटग्रस्त होगा. (‘क्या कोरोना वायरस से हमारी लड़ाई रोग के मुकाबले बदतर है ?’, न्यूयॉर्क टाइम्स 20 मार्च 2020)

माइकल टी. ओस्टरहोल्म रीजेण्ट प्रोफेसर और मिनेसोटा विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर इंफेक्शियस डिजीज रिसर्च एंड पॉलिसी के निदेशक हैं. वह क्या कहते हैं –

कार्यालयों, स्कूलों, परिवहन प्रणालियों, रेस्तरां, होटल, स्टोर, थिएटर, कॉन्सर्ट हॉल, खेल आयोजनों और अन्य गतिविधियों को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने और उनके सभी श्रमिकों को बेरोजगारी की स्थिति में और सार्वजनिक खैरात पर निर्भर छोड़ देने के प्रभाव पर विचार करें. इसका कोई टीका तैयार होने या प्राकृतिक रूप से प्रतिरक्षा विकसित होने से बहुत समय पहले ही, इसका संभावित परिणाम सिर्फ अवसाद भर नहीं होगा, बल्कि अनगिनत स्थायी रूप से नष्ट हो चुकी नौकरियों के साथ, एक पूर्ण आर्थिक विघटन होगा.

गंभीर बीमारी के कम जोखिम वाले लोगों को काम करना जारी रखने, व्यवसाय और विनिर्माण का संचालन करने की अनुमति देना और समाज को चलते रहने देना, जबकि उसी समय उच्च-जोखिम वाले व्यक्तियों को फिजिकल डिसटेन्सिंग (शारीरिक दूरी) के माध्यम से खुद को सुरक्षित करने की सलाह देना और जितना संभव हो उतने आक्रामक रूप में स्वास्थ्य देखभाल क्षमता को एकजुट करना संभवतः सबसे अच्छा विकल्प होगा. इस युद्ध योजना के साथ, हम उस वित्तीय संरचना को नष्ट किए बिना धीरे-धीरे प्रतिरक्षा का निर्माण कर सकते हैं, जिस पर हमारा जीवन आधारित है. (‘कोविड-19 की वास्तविकता का सामना करना : एक राष्ट्रीय लॉकडाउन (तालाबंदी) कोई इलाज नहीं है’, वाशिंगटन पोस्ट 21 मार्च 2020)

डॉ. पीटर गोएत्शे कोपेनहेगन विश्वविद्यालय में क्लिनिकल रिसर्च डिज़ाइन एंड एनालिसिस के प्रोफेसर और कोचरेन मेडिकल कोलाबरेशन के संस्थापक हैं. उन्होंने दवा व्यवसाय के क्षेत्र में भ्रष्टाचार और बड़ी दवा कंपनियों की ताकत पर कई किताबें लिखी हैं. वह क्या कहते हैं –

हमारी मुख्य समस्या यह है कि कोई भी बहुत ही कठोर उपायों को लागू करने की परेशानी में कभी भी नहीं पड़ेगा. यदि वे बहुत कम करते हैं तो वे केवल मुसीबत में पड़ेंगे. इसलिए, हमारे राजनेता और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में काम करने वाले लोग अपनी जिम्मेदारियों और क्षमता से कहीं अधिक काम करते हैं.

2009 की इन्फ्लूएंजा महामारी के दौरान इस तरह के कोई कठोर उपाय लागू नहीं किए गए थे, और स्पष्ट रूप से हर सर्दियों में उन्हें लागू भी नहीं किया जा सकता है, जो पूरे वर्ष जारी रहने वाली प्रक्रिया है, क्योंकि सर्दी हमेशा कहीं न कहीं रहती ही है. हम पूरी दुनिया को स्थायी रूप से बंद नहीं कर सकते.

क्या ऐसा हो सकता है कि महामारी बहुत पहले ख़त्म हो जाए, तो इसका श्रेय लेने के इच्छुक लोगों की एक लम्बी कतार लगी होगी और हम अगली बार फिर से इन कठोर उपायों को लागू करने के लिए निश्चित रूप से शापित हो सकते हैं. लेकिन बाघों के बारे में जोक याद रखें ‘तुमने भोपू क्यों बजाया ?’ ‘बाघों को दूर रखने के लिए.’ ‘लेकिन यहांं तो बाघ नहीं हैं.’ ‘आप वहांं देखें !’ (‘कोरोना : बड़े पैमाने पर आतंक फ़ैलाने वाली एक महामारी’, घातक दवाओं पर ब्लॉग पोस्ट 21 मार्च 2020)

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