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कार्ल मार्क्स का जन्मदिन – कार्ल मार्क्स की लोकप्रियता का रहस्य

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 6, 2022
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मार्क्स ने लिखा है –

‘आधुनिक समाज में वर्गों के अस्तित्व की खोज करने का श्रेय का मैं अधिकारी नहीं हूं. न ही उनके संघर्ष की खोज करने का श्रेय मुझे मिलना चाहिए. मुझसे बहुत पहले ही बुर्जुआ इतिहासकार वर्गों के इस संघर्ष के ऐतिहासिक विकास का और बुर्जुआ अर्थशास्त्री वर्गों की बुनावट का वर्णन कर चुके थे. मैंने जो नयी चीज की, वह यह सिद्ध करना था कि –

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‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

  1. वर्गों का अस्तित्व उत्पादन के विकास के खास दौरों के साथ जुड़ा हुआ है,
  2.  वर्गसंघर्ष लाजिमी तौर पर सर्वहारा के अधिनायकत्व की दिशा में ले जाता है,
  3. यह अधिनायकत्व स्वयं सभी वर्गों का उन्मूलन तथा वर्गहीन समाज की ओर संक्रमण मात्र है.’

कार्ल मार्क्स ने लिखा है –

‘हेगेल पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वतंत्रता और आवश्यकता के सम्बंध की सही व्याख्या की थी. उनकी दृष्टि में स्वतंत्रता आवश्यकता की अनुभूति है. ‘आवश्यकता केवल उसी हद तक अंधी होती है जिस हद तक वह समझी नहीं जाती.’ स्वतंत्रता प्राकृतिक नियमों से स्वाधीन हो जाने के स्वप्न में निहित नहीं है, बल्कि वह इन नियमों के ज्ञान में तथा इस ज्ञान की सहायता से इन नियमों से निश्चित उद्देश्यों के लिए सुनियोजित ढ़ंग से कार्य कराने के लिए उत्पन्न होनेवाली संभावना में निहित है.’

मार्क्स ने लिखा है –

‘पुराने भौतिकवाद का दृष्टिबिन्दु ‘नागरिक समाज’ है; नए भौतिकवाद का दृष्टि बिन्दु मानव समाज या समाजीकृत मानवजाति है.’

मार्क्स ने लिखा है –

‘यह भौतिकवादी सिद्धान्त कि मनुष्य परिस्थितियों एवं शिक्षा-दीक्षा की उपज है, और इसलिए परिवर्तित मनुष्य भिन्न परिस्थितियों एवं बदल दी गयी शिक्षा-दीक्षा की की उपज है,इस बात को भुला देता है कि परिस्थितियों को मनुष्य ही बदलते हैं और शिक्षक को स्वयं शिक्षा की आवश्यकता होती है.’

कार्ल मार्क्स का जन्मदिन - कार्ल मार्क्स की लोकप्रियता का रहस्य ( 5 मई 1818-14 मार्च 1883)
कार्ल मार्क्स का जन्मदिन – कार्ल मार्क्स की लोकप्रियता का रहस्य ( 5 मई 1818-14 मार्च 1883)
जगदीश्वर चतुर्वेदी

कार्ल मार्क्स का आज जन्मदिन है. यह ऐसे मनीषी का जन्मदिन है, जो आज भी दुनिया के वंचितों का कण्ठहार बना हुआ है. आज भी मार्क्स की लिखी ‘पूंजी’ दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब है. आज भी पूंजीवाद और शोषण का कोई भी विमर्श मार्क्स के नजरिए की उपेक्षा नहीं कर सकता. मार्क्स नहीं हैं लेकिन उनके विचार और विश्वदृष्टि समूची मानवता को आलोकित किए हुए है.

मार्क्स के पक्ष में जितना लिखा गया है उससे कहीं ज्यादा विपक्ष में लिखा गया है. कैपीटलिज्म के किसी भी पहलू पर विचार करें और आप किसी भी स्कूल के अनुयायी हों, आपको मार्क्स से संवाद करना होगा. मानवता को शोषण से मुक्त करने का रास्ता या नजरिया मार्क्स की अवहेलना करके बनाना संभव नहीं है. शोषण से मुक्त होना चाहते हैं तो मार्क्स के पास जाना होगा.

मार्क्स की विश्वव्यापी प्रासंगिकता का कारण क्या है ? मार्क्स के बारे में हम जितना सच जानते हैं उससे ज्यादा असत्य जानते हैं. मार्क्स के नाम पर मिथमेकिंग और विभ्रमों का व्यापक प्रचार किया गया है. इसमें उनकी ज्यादा भूमिका है जो मार्क्स और मार्क्सवाद को फूटी आंख देखना नहीं चाहते.

मार्क्स के बारे में कोई भी चर्चा फ्रेडरिक एंगेल्स के बिना अधूरी है. मार्क्स-एंगेल्स आधुनिक युग के आदर्श दोस्त और कॉमरेड थे. काश सबको एंगेल्स जैसा दोस्त मिले. मार्क्स बेहद संवेदनशील पारिवारिक प्राणी थे और गृहस्थ थे. इससे यह मिथ टूटता है कि कम्युनिस्टों के परिवार नहीं होता, वे संवेदनशील नहीं होते.

मार्क्स अपने बच्चों के साथ घंटों समय गुजारा करते थे और तरह-तरह की साहित्यिक कृतियां उन्हें कंठस्थ थीं जिन्हें अपने बच्चों को सुनाया करते थे. खाली समय निकालकर नियमित बच्चों पर खर्च करते थे. इससे यह भी मिथ टूटता है कि मार्क्सवादी बच्चों का ख्याल नहीं रखते.

मार्क्स अपनी पत्नी को बेहद प्यार करते थे और उनकी पत्नी उनके समस्त मार्क्सवादी क्रियाकलापों की सक्रिय सहभागी थी, वह मार्क्स के काम की महत्ता से वाकिफ थी और स्वयं बेहतरीन बुद्धिजीवी थी. मार्क्स की जीवनशैली सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत से परिचालित थी.

भारत में ऐसे लोग हैं जो आए दिन अज्ञानता के कारण यह कहते हैं कि मार्क्स तो जनतंत्र के पक्षधर नहीं थे. वे तो तानाशाही के पक्षधर थे. यह बात एक सिरे से गलत और तथ्यहीन है. यह भी प्रचार किया जाता है कि मार्क्स की जनवाद में आस्था नहीं थी. नागरिक समाज में आस्था नहीं थी. आइए देखें तथ्य क्या कहते हैं.

कार्ल मार्क्स ने मजदूर वर्ग के नजरिए से लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर विचार किया है. मार्क्स ने ‘ऑन दि जुईस क्वेश्चन’ (1843) पर विचार करते हुए नागरिक समाज पर लिखा है कि नागरिक अधिकार ऐसे व्यक्ति के अधिकार हैं जो ‘अहंकारी मनुष्य है ,जो अन्य व्यक्ति से कटा हुआ व्यक्ति है, समाज से कटा हुआ व्यक्ति है.’ यह ऐसा व्यक्ति है जो ‘निजी आकांक्षाओं’ से घिरा है. यह आत्मकेन्द्रित व्यक्ति है. यह आत्मनिर्भर एवं अलग-थलग पड़ा हुआ व्यक्ति है.

मार्क्स ने व्यक्ति के अधिकारों और नागरिक अधिकारों की व्याख्या करते हुए लिखा नागरिक अधिकार राजनीतिक अधिकार हैं, जबकि व्यक्ति के अधिकार गैर राजनीतिक अधिकार हैं. राजनीतिक अधिकारों का उपयोग सामूहिक तौर पर होता है, इसकी अंतर्वस्तु राजनीतिक समुदाय और राज्य की हिस्सेदारी से बनती है,

राजनीतिक अधिकारों में सबसे बड़ा अधिकार है ‘संपत्ति का अधिकार.’ दूसरा अधिकार है आनंद प्राप्ति का अधिकार. मार्क्स ने यह भी लिखा कि निजी हितों का विस्तार करने वाले अधिकार ही हैं जो नागरिक समाज की आधारशिला रखते हैं. मार्क्स का मानना था कि अधिकार स्वयं चलकर नहीं आते बल्कि उन्हें अर्जित करना होता है. अधिकार जन्मना नहीं होते उन्हें संघर्ष करके पाना होता है.

कार्ल मार्क्स ने ‘हीगेल के न्याय दर्शन की आलोचना में योगदान’ (1843) कृति में आधुनिक राज्य, कानून, नागरिक समाज आदि विषयों पर हीगेल के नजरिए की आलोचना करते हुए फायरबाख के नजरिए का व्यापक इस्तेमाल करते हुए लिखा – ‘हीगेल का दर्शन आध्यात्मवाद का अंतिम शरणस्थल है. हमें लक्षण के स्थान पर विषय को लेना चाहिए और विषय के स्थान पर पदार्थ और सिद्धांत को लेना चाहिए; कहने का तात्पर्य यह है कि सपाट, नग्न और बिना मिलावट का सत्य प्राप्त करने के लिए हमें अटकलबाजी के दर्शन को पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए.’

कार्ल मार्क्स और लोकतंत्र

कार्ल मार्क्स के बारे में मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक अनेक मिथ प्रचलित हैं. इन मिथों में एक मिथ है कि मार्क्स का लोकतंत्र से कोई सम्बन्ध नहीं है, मार्क्स लोकतंत्र विरोधी हैं. फलश्रुति यह कि जो मार्क्स को मानते हैं वे लोकतंत्र विरोधी होते हैं. सच्चाई इसके एकदम विपरीत है. मार्क्स ने अपना जीवन रेडीकल या परिवर्तनकामी लोकतांत्रिक नागरिक के रुप में आरंभ किया. कालान्तर में वे इस मार्ग पर चलते हुए क्रांतिकारी बने. अपने व्यापक जीवनानुभवों के आधार पर मार्क्स ने तय किया कि लोकतंत्र को वास्तव लोकतंत्र में रुपान्तरित करना बेहद जरुरी है.

हममें से अधिकांश लोकतंत्र के प्रचलित रुप को मानते और जानते हैं लेकिन जेनुइन लोकतंत्र को हम लोग नहीं जानते अथवा उसे पाने से परहेज करते हैं. कार्ल मार्क्स के समग्र लेखन और कर्म पर विचार करें तो पाएंगे कि वे राजसत्ता की परमसत्ता के विरोधी थे. प्रसिद्ध ब्रिटिश मार्क्सवादी आलोचक टेरी इगिलटन के अनुसार मार्क्स जनता की लोकप्रिय संप्रभुता के पक्षधर थे. इसका एक रुप संसदीय लोकतंत्र है.

वे सिद्धांततः संसद के विरोधी नहीं थे. वे मात्र संसद में ही लोकतंत्र के पक्षधर नहीं थे. उसके आगे जाकर वे वास्तव अर्थों में स्थानीय, लोकप्रिय संप्रभु, स्वायत्त शासन के पक्षधर थे. वे चाहते थे कि लोकतंत्र में सभी संस्थानों को स्वायत्तता प्राप्त हो. नागरिक समाज के सभी संस्थानों को स्वायत्तता मिले. मार्क्स चाहते थे कि इस स्वायत्तता को राजनीतिक से लेकर आर्थिक क्षेत्र तक विस्तार दिया जाय. इस अर्थ में वे आत्मनिर्भर सरकार के पक्षधर थे.

टेरी इगिलटन ने लिखा है कि मार्क्स राजनीतिक अभिजात्यवर्ग तक सीमित मौजूदा लोकतांत्रिक सरकार के विरोधी थे. मार्क्स का मानना था नागरिक की स्वशासन में निर्णायक भूमिका होनी चहिए. वे अल्पमत पर बहुमत के शासन के मौजूदा सिद्धांत के विरोधी थे. वे मानते थे कि नागरिक स्वयं राज्य पर शासन करें न कि राज्य उन पर शासन करे.

मार्क्स का मानना था लोकतंत्र में राज्य का नागरिक समाज से अलगाव हो गया है. इन दोनों के बीच में सीधे अन्तर्विरोध पैदा हो गया है. मसलन, राज्य की नजर में अमूर्त रुप में सभी नागरिक समान हैं जबकि वे दैनंदिन जीवन में असमान हैं. नागरिकों का सामाजिक अस्तित्व अन्तर्विरोधों से ग्रस्त है जबकि राज्य उन सबको समान मानता है. राज्य ऊपर से समाज को निर्मित करने वाले की इमेज संप्रेषित करता है जबकि उसकी यह इमेज तो सामाजिक परिस्थितियों का प्रतिबिम्बन है.

इगिलटन ने लिखा है राज्य पर समाज निर्भर नहीं है बल्कि समाज पर राज्य परजीवी की तरह निर्भर है. लोकतंत्र में सब उलटा–पुलटा हो जाता है. पूंजीवाद ऊपर आ जाता है और लोकतंत्र नीचे चला जाता है. कायदे से लोकतंत्र को ऊपर यानी राजसत्ता का संचालक होना चाहिए लेकिन उलटे पूंजीवाद राज्य का संचालक बन जाता है. इसका अर्थ है कि समस्त संस्थानों को संचालित लोकतंत्र नहीं करता बल्कि पूंजीवाद संचालित करने लगता है.

मार्क्स का लक्ष्य था राजसत्ता और समाज के बीच के अंतराल को कम किया जाय. राजनीति और दैनंदिन जीवन के बीच के अंतराल को कम किया जाय. वे चाहते थे कि लोकतांत्रिक ढ़ंग से राज्य और राजनीति दोनों की भूमिका को स्वशासन के जरिए खत्म किया जाय. मसलन, समाज के पक्ष में राजसत्ता का अंत किया जाय, दैनंदिन जीवन के सुखमय विकास के लिए राजनीति का अंत किया जाय. इसी को मार्क्सीय नजरिए से लोकतंत्र कहते हैं.

दैनंदिन जीवन में स्त्री और पुरुष अपने हकों को प्राप्त करें यही उनकी कामना थी, मौजूदा लोकतंत्र में स्त्री-पुरुष के हकों को राजसत्ता ने हड़प लिया है. टेरी इगिलटन के अनुसार समाजवाद तो लोकतंत्र की पूर्णता है, वह उसका नकार नहीं है. हमें सोचना चाहिए कि मार्क्स के इस नजरिए में आपत्तिजनक क्या है, जिसके लिए उन पर तरह-तरह के हमले किए जाते हैं.

‘मार्क्सवाद’ पदबंध कैसे आया ?

कार्ल मार्क्स का नाम और विचार भारत के लिए नया नहीं है. भारत में लंबे समय से मार्क्सवाद जनप्रिय रहा है लेकिन विगत नव्य-आर्थिक उदारीकरण और समाजवादी सरकारों के पराभव के बाद के विगत 40 सालों में इसकी लोकप्रियता कम हुई है. लेकिन अभी भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण समूह है जो मार्क्सवाद को मानता और जानता है लेकिन नए जनमाध्यमों के रूप में सोशल मीडिया में जो युवावर्ग या अन्य समुदाय के लोग सक्रिय हैं, उनमें बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो मार्क्सवाद को नहीं जानते लेकिन उनके पास मार्क्सवाद विरोधी प्रचार निरंतर पहुंच रहा है. हम विनम्रता के साथ कहना चाहते हैं मार्क्सवाद विरोधी प्रचार वस्तुतः मानवता विरोधी है, मानवाधिकार विरोधी प्रचार है.

मार्क्सवाद का लक्ष्य है मानवता और मानवाधिकारों की रक्षा करना उनका प्रचार-प्रसार करना. हमारे बीच में ऐसे भी संशयवादी लोग हैं जो मानवता की बातें सुनते ही आग बबूला हो जाते हैं और नमूने के तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी शासित सरकारों के मानवताविरोधी कामों का हवाला देकर मार्क्सवाद को खारिज करते रहते हैं, मार्क्सवाद के प्रति घृणा फैलाते रहते हैं. हम साफ कहना चाहते हैं कि कम्युनिस्ट शासित सरकारों का मार्क्स के विज़न के साथ कोई संबंध नहीं है.

मार्क्सवाद पर जब बातें हों तो कार्ल मार्क्स और एंगेल्स के लेखन को केन्द्र में रखकर बातें होनी चाहिए. हमें अखबारी कतरनों, कम्युनिस्ट नेताओं, पूर्व समाजवादी सरकारों आदि के कारनामों की कसौटी पर मार्क्सवाद को परखने से बचना चाहिए. कार्ल मार्क्स पर जब बातें हों तो हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि ‘मार्क्सवाद’ पदबंध से स्वयं मार्क्स अपरिचित थे.

संक्षेप में वाकया यह है कि जब मार्क्स के दामाद पॉल लाफ़ार्ज ने मार्क्स को यह कहा कि आपने जो लिखा है उससे सिद्धांत के तौर पर ‘मार्क्सवाद’ निकलता है. मार्क्स ने तत्काल कहा कि मेरे लेखन से यदि मार्क्सवाद जैसी सैद्धांतिक व्यवस्था निकलती है तो मैं इसे नहीं मानता. कार्ल मार्क्स जिस समय यह सब लिख रहे थे तब तक उनके विश्व दृष्टिकोण का सुंगत ढ़ंग से विकास नहीं हो पाया था लेकिन लाफार्ज पहले विद्वान थे जिन्होने ‘मार्क्सवाद’ पदबंध का प्रयोग किया गया.

इसके बाद जी. प्लेखानोव ने पहली बार द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की व्याख्या के क्रम में ‘मार्क्सवाद समग्र विश्वदृष्टि’ पदबंध का इस्तेमाल किया. मार्क्स के नजरिए का मूल संबंध सर्वहारा के नजरिए से राजनीतिक अर्थशास्त्र की मीमांसा से जुड़ा हुआ है. इसके अलावा इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा के विकास को उन्होंने प्राथमिकता के साथ विश्लेषित किया. इस क्रम में सम-सामयिक और पुरानी भाववादी विचारधाराओं की आलोचना विकसित की. मार्क्स ने राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना के लिए इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा का बुनियादी तौर पर इस्तेमाल किया.

मार्क्सवादी रूढ़ियां

पहली रुढ़ि : सोशल मीडिया पर हिन्दी लेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है. यह पहली रुढ़ि है.

कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए – सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है. खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा. मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष में बांधता है.

नए जमाने की मांग है लोकतंत्र. दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते. प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किल है कि वे शीतयुद्धीय राजनीति के दायरे के बाहर नहीं देख पाते. प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है. मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है.

दूसरी रुढ़ि : दूसरी मार्क्सवादी रूढ़ि है – वे रहते पूंजीवाद में हैं, अधिकार पूंजीवाद के चाहते हैं, पूंजीवादी संरचनाओं के दुरूस्तीकरण के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन चाहते हैं समाजवाद.

हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों-आलोचकों ने कभी गंभीरता के साथ ‘कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य और साहित्’ के अन्तस्संबंध पर विचार नहीं किया. वे पूंजीवाद के सरलीकरणों और अमेरिकी बहानेबाजी के जरिए अपने दायित्व से भागते रहे हैं.

भारतीय समाज के निर्माण में कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की प्रधान भूमिका रही है. इसे सोवियत समाजवादी नजरिए या अमेरिकी नजरिए से नहीं समझा जा सकता. इसे समाजवाद के आग्रह के नजरिए से भी नहीं समझा जा सकता.

समाजवाद का आग्रह लोकतंत्र की शक्ति को समझने में बाधा पैदा करता है। भारत का वर्तमान लोकतंत्र से निर्धारित हो रहा है और भविष्य में भी लोकतंत्र से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं है। समाजवाद यहां के लिए कल्पनाशीलता है। लोकतंत्र को हमें लोकतंत्र के नजरिए से देखना होगा। समाजवाद के नजरिए से लोकतंत्र को देखना मार्क्सवादी कल्पनाशीलता है ।

तीसरी रुढ़ि : मार्क्सवादी रूढ़िवाद की तीसरी रूढ़ि है लोकतंत्र को हिकारत की नजर से देखना. हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों में बड़ा हिस्सा है जो समाजवाद के आख्यान और गुणों को जानता है लेकिन भारत में लोकतंत्र में लेखकीय और नागरिक अधिकारों की चेतना से शून्य है. मसलन, हिन्दी लेखकों में लेखक के अधिकारों को लेकर कोई गुस्सा नहीं है.

लेखक के लिए उसके अधिकारों की चेतना समाजवादी चेतना से ज्यादा महत्वपूर्ण है. लेखक के अधिकारों की चेतना लोकतंत्र के प्रति प्रेम और आस्था पैदा करके ही पैदा की जा सकती है. लोकतंत्र में हिकारत से देखना लोकतंत्र का निषेध है.

चौथी रुढि : लेखकों में मार्क्सवादी दंभ ,चौथी रुढि है. मार्क्सवादी दंभ भाव वाले लेखक बेहतर न लिखकर भी अपने लेखकीय श्रेष्ठत्व का दावा करते हैं.

कवच के तौर पर वे मार्क्सवाद को पहले सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं, बाद में मार्क्सवादियों और फिर अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं. ये लेखक भूल गए हैं कि मार्क्सवाद का जन्म श्रेष्ठता के सिद्धांत और संस्कार के प्रतिवाद में हुआ था.

मार्क्सवाद, मार्क्सवादी और निज को श्रेष्ठ मानने का विचार अवैज्ञानिक है. मार्क्सवाद ने कभी श्रेष्ठता का दावा नहीं किया. स्वयं मार्क्स ने श्रेष्ठ होने का दावा नहीं किया. एक अच्छा मार्क्सवादी दंभी नहीं संवेदनशील होता है, विनयी होता है, अन्य को सम्मान देता है.

दंभी की भाषा हेटभाषा होती है, रूप में भी और अंतर्वस्तु में भी. एक अच्छा मार्क्सवादी वह है जिसके पास अन्य के विचारों और विचारधारा के लिए जगह है. अन्य हैं इसलिए मार्क्सवाद उनसे भिन्न और वैज्ञानिक है.

सोवियत संघ के विघटन पर चुप्पी

मार्क्सवादी लेखकों की इस दौर में सबसे बड़ी असफलता है कि वे शीतयुद्ध में साहित्य के अवमूल्यन को नहीं रोक पाए. साहित्य के जो मानक रचे गए उनमें इजाफा नहीं कर पाए. साहित्य के नए पैराडाइम को पकड़ नहीं पाए. फलतःआज वे हाशिए के बाहर चले गए हैं. लंबे समय से हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचना की कोई किताब बाजार में नजर नहीं आई और हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचकों ने समीक्षा का कोई नया मानक नहीं बनाया.

शीतयुद्ध और उसके बाद के दौर में जातीय विध्वंस का ग्लोबल चक्र चला है. पूर्व समाजवादी समाजों से लेकर कांगो-सोमालिया-इराक अफगानिस्तान आदि तक इसका दायरा फैला हुआ है. एक जमाने में समाजवादी समाज में जातीय समस्या के समाधान का हिन्दी में खूब गुणगान किया गया लेकिन जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो इस जातीय विघटन पर हिन्दी में अधिकांश मार्क्सवादी चुप रहे. यहां तक कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और माओवादी-नक्सल भी चुप रहे. यह चुप्पी अचानक नहीं है बल्कि शीतयुद्धोत्तर यथार्थ को वैज्ञानिक ढ़ंग से न देख पाने का फल है.

शीतयुद्धोत्तर यथार्थ पहले की तुलना में ज्यादा जटिल और संश्लिष्ट है. नए यथार्थ और नई राजनीतिक समस्याओं के खिलाफ मोर्चा लेते हुए आप स्वयंसेवी संगठनों और व्यक्तियों के समूहों को देख सकते हैं लेकिन मार्क्सवादी दलों-संगठनों को कहीं पर भी नहीं देखेंगे.

धर्म और मार्क्स

आधुनिककाल में धर्म का उपभोक्तावाद और पूंजी प्रेम सबसे बड़ा ईंधन है. इन दोनों के बिना धर्म जी नहीं सकता. धर्म वैचारिक और भौतिक दोनों ही स्तरों पर उपभोक्तावाद और पूंजी की मदद करता है, यही वजह है धर्म की जड़ें उन वर्गों में ज्यादा गहरी हैं, जहां उपभोक्तावाद और पूंजी प्रेम खूब फल-फूल रहा है. जिस तरह धर्म जनता के लिए ‘आत्मिक शराब है’ठीक उसी तरह उपभोक्तावाद और पूंजी प्रेम लत है. दोनों में मातहत बनाने की प्रवृत्ति है.

धर्म कोई विचार मात्र नहीं है, उसकी सामाजिक जड़ें हैं, धर्म की सामाजिक जड़ों को सामाजिक संघर्षों में जनता की शिरकत बढ़ाकर ही काट सकते हैं. धर्म के खिलाफ संघर्ष यदि मात्र वैचारिक होगा तो वह भाववादी संघर्ष होगा, धर्म भाववाद नहीं है, वह तो भौतिक शक्ति है. उसे अमूर्त्त विचारधारात्मक उपदेशों के जरिए नष्ट नहीं किया जा सकता.

एक मार्क्सवादी को यह पता होना चाहिए कि धर्म का मुकाबला कैसे करें ॽ इस मामले में उनको बुर्जुआ भौतिकवादियों से अपने को अलगाना चाहिए. बुर्जुआ भौतिकवादियों के लिए ‘धर्म का नाश हो’, ‘अनीश्वरवाद चिरंजीवी हो’, ‘नास्तिकता अमर रहे’ का नारा प्रमुख है. वे आमतौर पर अनीश्वरवाद का ही जमकर प्रचार करते हैं. इस तरह के नजरिए की लेनिन ने तीखी आलोचना की है और उसे ‘छिछला दृष्टिकोण’ कहा है.

लेनिन के शब्दों में यह बुर्जुआ जागृति का ´संकीर्ण नजरिया है. इससे धर्म की जड़ों के बारे में पूरी जानकारी नहीं मिलती. इस तरह की धर्म की व्याख्याएं भाववादी हैं, इनका भौतिकवाद से कोई लेना-देना नहीं है लेनिन ने धर्म के बारे में लिखा है, ‘आधुनिक पूंजीवादी देशों में इसकी जड़ें मुख्यतः सामाजिक हैं. पूंजी की अंधी ताकत का भय.

अंधी इसलिए क्योंकि व्यापक जनसमुदाय इसका पूर्वानुमान नहीं कर सकता – एक ऐसी शक्ति जो सर्वहारा और छोटे मालिकों के जीवन के हर चरण में प्रहार का खतरा पैदा करती तथा ‘औचक’, ‘अनपेक्षित’, ‘आकस्मिक’, तबाही, बर्बादी, गरीबी, वेश्यावृत्ति, भुखमरी का हमला करती है. आधुनिक धर्म की जड़ यहां है. इसे भौतिकवादियों को सर्वप्रथम अपने दिमाग में रखना चाहिए.

जनता के दिमाग से धर्म को मिटाने के लिए जरूरी है. उसे जनसंघर्षों के लिए तैयार किया जाए. जनता खुद धर्म की जड़ें खोदना सीखे, संगठित हो, सचेत रूप में पूंजी के शासन के तमाम रूपों से लड़ना सीखे. जब तक वह ऐसा नहीं करती तब तक जनता के मन से धर्म को मिटाना संभव नहीं है.

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