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महंगाई, मंदी और रुपये की कमज़ोरी जैसे मुद्दे हिन्दू राष्ट्र में नहीं होता !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 4, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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रविश कुमार

देश में महंगाई नहीं है मगर गुजरात में गरबा महंगा हो गया है. इस बार गरबा के पास पर जीएसटी की वसूली होने जा रही है. आज के दिव्य भास्कर में खबर है कि गरबा के पास पर 18% की जीएसटी ली जा रही है. गरबा कराने वाले एक आयोजक ने भास्कर से कहा है कि सरकार की सलाह पर इस बार जीएसटी के साथ डिजिटल पेमेंट ले रहे हैं. भास्कर को एक आयोजक ने बताया है कि 2019 में लड़कों का गरबा का पास 3500 रुपया का था, जो जीएसटी के बाद इस साल 4838 रुपये का होगा. इसी तरह लड़कियों के पास का दाम भी जीएसटी के कारण 900 से बढ़कर 1298 रुपये का हो जाएगा. भास्कर ने हिसाब लगाया है कि इस बार लड़कों को 81 लाख रुपये अपनी जेब से ज़्यादा देनी पड़ेगी और लड़कियों को 45 लाख से ज्यादा. गुजरात कांग्रेस ने इसे लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है.

आम आदमी पार्टी ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख दिया है. यह खबर उन लोगों के लिए ज़रूरी है जो यह मानने को तैयार ही नहीं है कि भारत में महंगाई नहीं है. सारी दुनिया के अखबार महंगाई की खबरों से भरे हैं. किसी देश में 10 प्रतिशत महंगाई है तो कहीं 40 प्रतिशत है. भारत में सरकार कह रही है कि भारत में महंगाई नहीं है. मंदी नहीं है और रुपया भी कमज़ोर नहीं है. बीजेपी के सांसद और पूर्व वित्त मंत्री जयंत सिन्हा साधारण सांसद नहीं हैं. अमरीका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से MBA की पढ़ाई की है और IIT दिल्ली से इंजीनियरिंग हैं. लोग कहते हैं कि पढ़े लिखे लोगों को राजनीति में आना चाहिए, शुक्र है कि जयंत सिंंहा जैसे पढ़े लिखे सांसद हैं, वर्ना आप इस भरम में रहते कि भारत में महंगाई बढ़ गई है. जयंत सिन्हा ने ही सबकी आंखें खोली हैं कि भारत में महंगाई कही नहीं हैं.

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अगर आप मान रहे हैं कि भारत में महंगाई नहीं है तो लगे हाथ इसे भी मान लीजिए जो 1972 में बनी ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी ने किया है. इसके पोलिटिकल साइंस के एक छात्र को 100 में 151 अंक आया है. जिसने भी 100 में 151 अंक दिए केवल वही महान नहीं रहा होगा, इतने नंबर लाने के बाद इस छात्र को फेल करने वाला भी महानतम में गिना जाना चाहिए. इसी यूनिवर्सिटी में एक और छात्र है जिसे अकाउंटेंसी एंड फाइनेंस ऑनर्स के पेपर में 0 आया है लेकिन उसे पास कर दिया है. हम सभी ने जितनी मेहनत से शिक्षा का सत्यानाश किया है, उसका फल आने लगा है. यही हाल रहा तो जल्दी ही शिक्षा को खोजना पड़ेगा और वह भी महंगाई की तरह दिखाई नहीं देगी. हम नहीं जानते कि हार्वर्ड में कापी कौन चेक करता है, कहीं ऐसा तो नहीं कि हार्वर्ड ने ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी को कापी चेक करने का ठेका दे दिया है ?

हम साथीगण बहुत ही ध्यान से यहां बैठकर इनकी बातों को सुन रहे थे. उस तरफ के सभी वक्ताओं की बातों को सुनकर मुझे बहुत दु:ख के साथ कहना पड़ेगा कि बचपन में हमें स्कूल में संत कबीर का दोहा सिखाया जाता था और वह दोहा मुझे इस समय याद आ रहा है, बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय, जब दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोई. ये लोग महंगाई देखने चले थे, लेकिन इन्हें कहीं महंगाई नहीं मिली. यदि ये अपने अंदर देखेंगे तो इन्हें पता चलेगा कि यदि इन्हें महंगाई की चिन्ता करनी है तो इन्हें अपने राज्यों में महंगाई की चिन्ता करनी है. जयंत सिन्हा का कहना है कि महंगाई विपक्ष के राज्यों में है. विपक्ष को अपने राज्यों में ढूंढनी चाहिए. भारत सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय ने इसी 25 जुलाई को अपने जवाब में बताया है कि किस राज्य में महंगाई की दर कितनी है.

इसके अनुसार किसी की भी सरकार हो, महंगाई की दर ज़्यादा है और बहुत ज़्यादा अंतर नहीं है. बीजेपी राज्यों में हरियाणा में महंगाई की दर 8.08 प्रतिशत है, मध्य प्रदेश में 7.7 प्रतिशत है, गुजरात में 7.50 प्रतिशत है, असम में 7.54 प्रतिशत महंगाई है. कर्नाटक में 6.20 प्रतिशत है, यूपी में 6.85 प्रतिशत है और उत्तराखंड में 6.82 प्रतिशत है. गैर बीजेपी राज्यों तेलंगाना में 10.05 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 8.63 प्रतिशत, राजस्थान में 7.79 प्रतिशत, झारखंड में 6.86 प्रतिशत महंगाई है. विपक्षी राज्यों में तमिलनाडु में 5.8% और दिल्ली में 5.06 प्रतिशत महंगाई है. मणिपुर में बीजेपी की सरकार है वहां 0.60 प्रतिशत महंगाई है.

सदन में टमाटर, आलू और प्याज का उदाहरण दिया गया. कहा गया कि आज इनके भाव कम हो गए हैं. ज़रूर कुछ सब्जियों के दाम कम हुए हैं लेकिन क्या वे सस्ते कहे जाएंगे ? लंबे समय तक भाव आसमान छूते रहे, क्या सरकार का यही जवाब है कि जुलाई में महंगाई थी मगर अब कम हो गई है ? तो क्या सरकार यह कह रही है कि जुलाई में विपक्ष का सवाल ठीक था, अब ठीक नहीं है ? हमने उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की साइट पर जाकर चेक किया जहां अखिल भारतीय कीमतों का औसत दिया जाता है. इसके अनुसार आटे के भाव में एक साल में 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. गेहूं का दाम 21 प्रतिशत बढ़ा है. क्या ये कम है ? बेशक सब्जियों में से कुछ के दाम कम हुए हैं लेकिन तमाम सब्जियों में आप प्याज उठा लें और कहें कि दाम कम हो गया तो इसका कोई तुक नहीं.

आप किसी गरीब की थाली देखिए, आप उससे पूछें कि चावल के लिए क्या भाव देना पड़ रहा है, वह आपको बताएगा कि आज चावल मुफ्त मिल रहा है, दाल भी बहुत कम दाम में मिल रही है. मुफ्त में तेल मिल रहा है. आप देखेंगे कि जो सब्जी पहले दस-पंद्रह रुपये में मिला करती थी, आज भी वह आठ साल बाद दस पंद्रह रुपये में मिल रही है. ज्यादा से ज़्यादा पंद्रह बीस रुपये में मिलेगी. आप बताएं कहां सब्जी का दाम बढ़ा है. आप अंडे का दाम देख लें, आप आटा दूध का दाम भी देख लें. हर वस्तु पर हमारी सरकार का अतुल्य कंट्रोल रहा है और अकल्पनीय रहा है. आपके समय बिल्कुल ऐसा नहीं हो पाया था. आज ग़रीब की थाली आंकड़ों से नहीं, आज गरीब की थाली वस्तुओं से भरी है. यह वास्तविकता है जो आपको पसंद नहीं आयी है. आप महंगाई ढूंढ रहे हैं, आपको महंगाई मिल ही नहीं रही है, क्योंकि महंगाई है ही नहीं.

जयंत सिन्हा कह रहे हैं कि आप महंगाई ढूंढ रहे हैं, आपको महंगाई मिल ही नहीं रही है, क्योंकि महंगाई है ही नहीं. महंगाई पर सरकार का अतुल्य और अक्लपनीय कंट्रोल रहा है. जयंत सिन्हा ने कहा है कि अंडा, दूध, आटा सबका दाम देख लें. दूध का दाम एक साल में अगर महंगा नहीं हुआ है तो आप सभी को जयंत सिन्हा से माफी मांगनी चाहिए. जयंत सिन्हा ने तो यह भी कहा कि आठ साल से कई चीज़ों के दाम ही नहीं बढ़े हैं. हमारे पास छ: साल का डेटा है उसी से देखते हैं कि छह साल में चेंज हुआ कि नहीं. इसके लिए हमने 2016-17, 2018 का जवाबों का सहारा लिया जो मोदी सरकार ने लोकसभा में दिए हैं. इस जवाब से हमने 2016 की दरों और 2022 की दरों की तुलना की है. जानने के लिए कि छह साल में आलू टमाटर के दाम कितने बढ़े हैं.

2016 में आलू का भाव था 19 रुपये 28 पैसे किलो, 1 अगस्त 2022 को आलू का भाव है 26 रुपये 94 पैसे. छह साल में 39.72 प्रतिशत दाम बढ़ा है. ये आलू का रेट है. भालू का नहीं. इसी तरह टमाटर का दाम देखिए. 2016 में टमाटर का भाव करीब 26 रुपये किलो है, एक अगस्त 2022 का भाव है 33 रुपये 94 पैसे. छह साल में 30 प्रतिशत दाम बढ़ गया. प्याज इस महीने सस्ता हुआ है लेकिन 2016 की तुलना करेंगे तो तब प्याज करीब 16 रुपये किलो था, इस एक अगस्त को 25 रुपये 45 पैसा किलो है. छह साल में 51 प्रतिशत दाम बढ़ा है.

तो इस तरह छह साल में टमाटर 30 प्रतिशत, आलू करीब 40 प्रतिशत, और प्याज 51 प्रतिशत महंगा हुआ है. आपको याद है न, 4 दिसंबर 2019 को लोकसभा में किसी अन्य विषय पर चर्चा के दौरान प्याज के दाम की बात आ गई तब वित्त मंत्री ने कह दिया कि वे तो प्याज ही नहीं खाती हैं. मार्च 2019 में प्याज 15 रुपया किलो था जो तीन दिसंबर 2019 को 81 रुपया किलो हो गया था. जब जयंत जी को सूट करता है कह देते हैं कि महंगाई नहीं हैं, जब वित्त मंत्री को सूट करता है कह देती हैं कि वे तो प्याज ही नहीं खाती हैं. संसद में बहस के दौरान महंगाई का अपना-अपना संसार बना दिया गया. सत्ता पक्ष ने UPA के समय की महंगाई को याद दिलाना शुरू कर दिया. अपने समय की महंगाई को कम बताने लगे. हबीब ने पटना में अंकित, रोहित, प्रिंस,और प्रवीण से बात की.पूछा कि सरकार कहती है कि महंगाई नहीं है.

अंकित ने कहा, ‘हमको ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता. हम पटना में रहते हैं हर चीज का दाम बढ़ गया है. तेल गैस आटा चावल. तीन साल पहले घर से 4500-5000 आता था, अच्छे से रह लेते थे, अब 7000 आता है कम पड़ जाता है. सब लोग गाली ही देता है ऐसा कुछ नहीं, सरकार कहने का साधन छोड़ ही कहां रही है, जब मन करता है इंटरनेट बंद कर देता है. एक्ट ला दिया.’

प्रिंस ने कहा, ‘दाम तो बहुत बढ़ा हुआ है, खाने पीने का दाम तो बढ़ा हुआ है तेल का दाम बढ़ा हुआ है, पेट्रोल का दाम बढ़ा हुआ है, किसका दाम बोले कि घटा हुआ है, सबका बढ़ा हुआ है.’ राहुल कुमार ने कहा, ‘कोई चीज सस्ता नहीं है. गैस का दाम बढ़ गया. खाने वाला तेल का दाम बढ़ गया, सैलरी जस ता तस है. बच्चे को पढ़ा नहीं सकते, जो सरकारी नौकरी करने वाले उनका डीए 34 परसेंट बढ़ रहा है लेकिन प्राइवेट जॉब वाले को नहीं बढ़ रहा है. कुछ नहीं सस्ता है.’

प्रवीण राज बोले, ‘आप भी अच्छी तरह जानते हैं हम भी जानते हैं, सब जान रहे हैं, कमाई कम हो रही है खर्चा बढ़ रहा है. गरीब आदमी, आम आदमी कुछ नहीं कर पा रहे हैं. और बताइये, सारा चीज़ तो महंगा होता जा रहा है. अच्छे दिन आएंगे, कहां आएगा, अच्छे दिन करते करते आदमी नीचे चला जा रहा है.’

आम आदमी कह रहा है कि कमाई कम हो रही है, महंगाई बढ़ रही है. आम लोगों में से भी प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले लोगों की बातों में एक चीज़ कॉमन है. वे कह रहे हैं कि सैलरी नहीं बढ़ रही है. कम हो रही है और दाम बढ़ते जा रहे हैं. इसके बाद भी अगर जयंत सिन्हा कह सकते हैं कि महंगाई नहीं है, महंगाई दिखाई नहीं दे रहे हैं तो उनके इस जवाब को पूरे ब्रह्मांड में गूंजा देना चाहिए. ‘आप महंगाई ढूंढ रहे हैं, आपको महंगाई मिल ही नहीं रही है, क्योंकि महंगाई है ही नहीं.’

जब राजेश खन्ना ने पहाड़ों के बीच शर्मिला टगौर को पुकारा था, तो उनकी आवाज़ चारों तरफ गूंजने लगी थी. कहीं आप खुद को कोरा कागज़ तो नहीं समझते, जिसने जैसा चाहा, उस पर लिख दिया ? आप कितनी भी मेहनत कर लें, सरकार साबित कर देगी की महंगाई नहीं है. 2016 से लेकर आज तक वनस्पति तेल के दाम में 108 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. यह हम लोकसभा में सरकार के जवाब के आधार पर कह रहे हैं. उपभोक्ता मामलों की साइट पर एक अगस्त 2022 के दिन जो रेट लिखा है, उसी से तुलना की है.

छह साल में आटा 37 प्रतिशत महंगा हो गया. करीब 25 रुपये किलो से बढ़ कर करीब 35 रुपए किलो हो गया. दूध करीब 30 प्रतिशत महंगा हो गया. खुली चाय पत्ती का दाम 42 प्रतिशत बढ़ गया. पूर्व वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने कहा है कि इन चीज़ों के दाम में मामूली बढ़ोत्तरी हुई है. 30, 37, 42 प्रतिशत की वृद्धि क्या मामूली है ? क्या आप सभी की आमदनी में छह साल में इतनी वृद्धि हुई है ? खुद जयंत सिन्हा के संसदीय क्षेत्र हज़ारीबाग के लोग महंगाई महंगाई का जाप कर रहे हैं. मगर उनके सांसद को महंगाई दिखाई नहीं देती है.

अभी कुछ दिन पहले तक जब खाने पीने के तेल के दाम बेतहाशा बढ़ने लगे, तब सरकार मान रही थी कि इनके दाम बढ़ रहे हैं. कहने लगी थी कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं. युद्ध हो रहे हैं इसलिए महंगाई है. लेकिन अब तो सीधे-सीधे महंगाई को ही खारिज कर दिया जा रहा है. कौन नहीं जानता है कि गैस सिलेंडर का दाम 500 से 1000 (1200) रुपया हो गया, क्या ये महंगाई नहीं है ? जयंत सिन्हा कम से कम प्रधानमंत्री के इस पुराने भाषण को ही याद कर लेते जिसमें वे अंतर्राष्ट्रीय कारणों से महंगाई बढ़ने की बात स्वीकार कर रहे हैं, ये और बात है कि नेहरू का सहारा लेकर स्वीकार रहे हैं. यह बयान इसी साल फरवरी का ही है.

पंडित नेहरू जी ने लाल किले पर से कहा था और ये उस जमाने में कहा गया था तब ग्लोबलाइजेशन इतना नहीं था, नाम मात्र का भी नहीं था. उस समय, नेहरू जी लाल किले से देश को सम्‍बोधन करते हुए क्या कह रहे हैं – ‘कभी-कभी कोरिया में लड़ाई भी हमें प्रभावित करती है. इसके चलते वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं.’

ये थे नेहरू जी ! भारत के पहले प्रधानमंत्री ! कभी-कभी कोरिया में लड़ाई भी हमें प्रभावित करती है. इसके चलते वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं और यह हमारे नियंत्रण से भी बाहर हो जाती हैं. देश के सामने, देश का पहला प्रधानमंत्री हाथ ऊपर कर देता है. आगे क्‍या कहते हैं, देखो जी आपके काम की बात है. आगे कहते हैं, पंडित नेहरू जी आगे कहते हैं – ‘अगर अमेरिका में भी कुछ हो जाता है तो इसका असर वस्तुओं की कीमत पर पड़ता है.’

सोचिए, तब महंगाई की समस्या कितनी गंभीर थी कि नेहरू जी को लाल किले से देश के सामने हाथ ऊपर करने पड़े थे. तो क्या अब अंतर्राष्ट्रीय कारणों का हवाला नहीं दिया जा रहा है ? क्या उनका असर बंद हो गया ? इसी आठ जून को भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने कहा था कि – ‘महंगाई बर्दाश्त के बाहर हो चुकी थी. अगर मुद्रा स्फीति नहीं बढ़ रही थी, रुपया नहीं गिर रहा है फिर रिज़र्व बैंक डॉलर क्यों खरीद रहा है ? ब्याज दरें क्यों बढ़ा रहा है ? कागज़ पर ही सही, रिज़र्व बैंक के फैसलों को सरकार का नहीं माना जाता है, उसका अपना होता है. रिज़र्व बैंक का काम है कि वह मुद्रा स्फीति की दरों को 4 से 6 प्रतिशत के बीच रखे लेकिन महंगाई की दरें 7.03 प्रतिशत तक चली गईं. रिज़र्व बैंक के गवर्नर के कई बयान हैं कि अगले छह महीने तक महंगाई से राहत नहीं मिलने वाली है और सरकार स्वीकार करने के बजाए महंगाई को ही रिजेक्ट कर देती है.

क्या दुनिया भर में चल रही मंदी के कारण तमाम एजेंसियों ने भारत के ग्रोथ रेट में कटौती नहीं की है ? अगर ऐसा है तब तो भारत में नौकरी मिलने और सैलरी बढ़ने के आंकड़ों की भरमार हो जानी चाहिए ? भारत की एयरलाइन कंपनियां घाटे में चल रही हैं, अपनी सुरक्षा पर ध्यान नहीं दे पा रही हैं. बीजेपी सांसद राजीव प्रताप रूडी ने इस पर लेख लिखा है – ‘प्रधानमंत्री का बयान है कि बिजली की कंपनियों पर राज्यों का ढाई लाख करोड़ का बकाया है, क्या ये सब किसी सुपर पावर अर्थव्यवस्था की निशानियां हैं ?’ क्या ये संकट के संकेत नहीं हैं ? रिज़र्व बैंक ने वित्त वर्ष 2023 के लिए भारत के विकास दर के अनुमान को 7.8 प्रतिशत से घटाकर 7.2 कर दिया है. वित्त मंत्री कहती हैं कि IMF ने सभी देशों की विकास दरों में कटौती की है, उसके बाद भी भारत तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बना हुआ है.

वित्त मंत्री कहती हैं कि ब्लूमबर्ग ने ऐसा कोई सर्वे किया है. 6 दिन पहले ब्लूमबर्ग बिजनेस न्यूज एजेंसी ने यह सर्वे किया था0जिसे कई अखबारों ने छापा है. इस रिपोर्ट में कुछ नहीं है कि सर्वे कैसे हुआ, उसका आधार क्या है लेकिन उसके आधार पर कह दिया गया कि भारत में मंदी नहीं आएगी ? उसी ब्लूमबर्ग में आर्थिक पत्रकार ऐंडी मुखर्जी ने लिखा है कि ‘ठीक है कि भारत की टेक कंपनियों को अमेरिका से आर्डर मिल रहे हैं लेकिन जब उन देशों में मंदी की आंधी तेज़ होगी तब आर्डर भी कम होंगे और कम पैसे के आर्डर मिलेंगे. इससे भारत की टेक कंपनियां की कमाई पर भी असर पड़ेगा, जो अभी ही दिखाई देने लगा है.’

मगर वित्त मंत्री ने सिरे से ही खारिज कर दिया कि मंदी का चांस शून्य है. क्या आप जानते हैं कि एमेज़ान कंपनी ने अमरीका में एक लाख लोगों को निकाला है. एमेज़न ने अपने इतिहास में इतनी बड़ी छंटनी कभी नहीं की थी. तो क्या इस असर भारत की कंपनियों पर नहीं होगा ? खुद वित्त मंत्री कहती हैं कि चीन में 4000 बैंक दिवालिया हो गए हैं. भारत का चीन से आयात बढ़ता ही जा रहा है. वहां की तबाही का क्या यहां असर बिल्कुल नहीं होगा ?

भारत की वित्त मंत्री ने कहा है कि चीन में 4000 बैंक दिवालिया होने के कगार में है. किसी देश में चार हज़ार बैंक कंगाल हो जाएं तो आप समझ सकते हैं कि वहां किस तरह की तबाही आने वाली है और ऐसा हुआ तो उसका असर केवल चीन तक ही सीमित रहेगा ? आप जानते हैं कि भारत का चीन से कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है. 2021 में 125 अरब डॉलर तक पहुंच गया था. 2022 में भी 100 अरब डॉलर से अधिक रहने की उम्मीद है. चीन के 4000 बैंक डूबने के कगार पर हैं.

जून के महीने में खबर छपी थी चीन के तीन ग्रामीण बैंकों ने लाखों ग्राहकों का पैसा देना बंद कर दिया और ऊपर से बाउंसर बुलाकर उन्हें लात जूतों से पिटवाया भी है. उसी क्रम में खबरें छपी हैं कि चार हज़ार ग्रामीण डूबने के कगार पर हैं. चाहें आप हज़ारीबाग के रहने वाले हों या हार्वर्ड में पढ़ने वाले छात्र हों, ऐसी खबरों को लेकर सतर्क रहा कीजिए. पैसे से पहले इसकी चिन्ता की कीजिए कि आपके नागरिक अधिकार किस हद तक सुरक्षित हैं.

ब्लूमबर्ग की उसी रिपोर्ट में है कि चीन और पाकिस्तान में मंदी आने के चांस 20 प्रतिशत है. जापान में 25 प्रतिशत है. इनका भारत पर कोई असर नहीं होगा ? बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका IMF के पास हाथ फैला कर खड़े हैं कि पैसे दो, पैसे दो. 31 दिसंबर 2014 को एक डालर का भाव 63.33 रुपये था, इन दिनों 78-79 रुपये रहा करता है, 80 रुपये भी हो गया था. 2013 2014 के दौरान आज के प्रधानमंत्री क्या कहा करते थे सब जानते हैं. अब 80 रुपया पहुंच जाने पर भी निर्मला सीतारमण कहती हैं कि रुपया कमज़ोर नहीं हुआ है. दूसरे देशों की तुलना में रुपया कम गिरा है लेकिन यह कहना कि रुपया गिरा नहीं है, ध्वस्त नहीं हुआ है, आत्मविश्वास की पराकाष्ठा है. कमाल का जवाब है और शानदार दौर है.

महंगाई, मंदी और रुपये की कमज़ोरी जैसे मुद्दों पर कांग्रेस ध्वस्त हो गई थी लेकिन मोदी सरकार के मंत्री कितनी आसानी से कह रहे हैं मंदी नहीं है, महंगाई नहीं है, रुपया भी कमज़ोर नहीं है. ऐसा लगता है कि जिस जनता से कह रहे हैं, वह अब जनता ही नहीं है. क्या इस देश की जनता ने विपक्ष से झूठ बोला कि बहुत महंगाई है, कमाई नहीं है, या व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी ने उसे इस हालत में पहुंचा दिया है कि अब उससे कुछ कहा जा सकता है, उससे कुछ भी मनवाया जा सकता है ?

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