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Home कविताएं

अगर तुम युवा हो … !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 17, 2021
in कविताएं
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जब तुम्हें होना है…
हमारे इस ऊर्जस्वी, सम्भावनासम्पन्न,
लेकिन अंधेरे, अभागे देश में,
एक योद्धा शिल्पी की तरह..!
और रोशनी की एक चटाई बुननी है..!
और आग और पानी और फ़ूलों
और पुरातन पत्थरों से
बच्चों का सपनाघर बनाना है..!

तुम सुस्ता रहे हो…
एक बूढ़े बरगद के नीचे..!
अपने सपनों के लिए,
एक गहरी कब्र खोदने के बाद..!
तुम्हारे पिताओं को उनके बचपन में,
नाजिम हिकमत ने भरोसा दिलाया था,
धूप के उजले दिन देखने का..!

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स्वप्न

अपनी तेज-रफ्तार नावें,
चमकीले-नीले-खुले समन्दर में दौड़ाने का..!
और सचमुच हमने देखे कुछ उजले दिन..!
और तेज-रफ्तार नावें लेकर,
समन्दर की सैर पर भी निकले..!
लेकिन वे थोड़े से उजले दिन,
बस एक बानगी थे..!
एक झलक-मात्र थे..!
भविष्य के उन दिनों की,
जो अभी दूर थे और जिन्हें तुम्हें लाना है..!
और सौंपना है अपने बच्चों को..!
हमारे देखे हुए उजले दिन..!
प्रतिक्रिया की काली आंधी में,
गुम हो गये दशकों पहले..!
और अब रात के दलदल में,
पसरा है निचाट सन्नाटा..!
बस जीवन के महावृत्तान्त के समापन की
कामना या घोषणा करतीं,
बौद्धिक तांत्रिकों की आवाजें,
सुनायी दे रही हैं यहां-वहां..!

हम नहीं कहेंगे तुमसे,
सूर्योदय और दूरस्थ सुखों,
और सुनिश्चित विजय,
और बसन्त के उत्तेजक चुम्बनों के बारे में,
कुछ बेहद उम्मीद भरी बातें..!
हम तुम्हें भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं,
बेचैन करना चाहते हैं..!
हम तुम्हें किसी सोये हुए गांव की
तन्द्रिलता की याद नहीं,
बस नायकों की स्मृतियां,
विचारों की विरासत,
और दिल तोड़ देने वाली पराजय का
बोझ सौंपना चाहते हैं..!
ताकि तुम नये प्रयोगों का धीरज संजो सको..!
आने वाली लड़ाइयों के लिए,
नये-नये व्यूह रच सको..!
ताकि तुम जल्दबाज योद्धा की गलतियां न करो..!

बेशक थकान और उदासी भरे दिन आयेंगे,
अपनी पूरी ताकत के साथ..!
तुम पर हल्ला बोलने और
थोड़ा जी लेने की चाहत भी,
थोड़ा और, थोड़ा और जी लेने के लिए लुभायेगी..!
लेकिन तब जरूर याद करना कि किस तरह,
प्यार और संगीत को जलाते रहे,
हथियारबन्द हत्यारों के गिरोह..!
और किस तरह भुखमरी और युद्धों और
पागलपन और आत्महत्याओं के बीच,
नये-नये सिद्धान्त जनमते रहे..!
विवेक को दफ़नाते हुए,
नयी-नयी सनक भरी विलासिताओं के साथ..!

याद रखना फिलिस्तीन और इराक को,
और लातिन अमेरिकी लोगों के
जीवन और जंगलों के महाविनाश को,
याद रखना सबकुछ राख कर देने वाली आग..!
और सबकुछ रातों-रात,
बहा ले जाने वाली बारिश को..!
धरती में दबे खनिजों की शक्ति को..!
गुमसुम उदास अपने देश के पहाड़ों के निःश्वासों को..!
जहर घोल दी गयी नदियों के रुदन को..!
समन्दर किनारे की नमकीन उमस को
और प्रतीक्षारत प्यार को..!

एक गीत अभी ख़त्म हुआ है..!
रो-रोकर थक चुका बच्चा अभी सोया है..!
विचारों को लगातार चलते रहना है..!
और अन्ततः लोगों के अन्तस्तल तक पहुंचकर,
एक अनन्त कोलाहल रचना है..!
और तब तक, तुम्हें स्वयं
अनेकों विरूपताओं और अधूरेपन के साथ,
अपने हिस्से का जीवन जीना है..!
मानवीय चीजों की,
अर्थवत्ता की बहाली के लिए लड़ते हुए..!
और एक नया सौन्दर्यशास्त्र रचना है..!

तुम हो प्यार और सौन्दर्य और
नैसर्गिकता की निष्कपट कामना..!
तुम हो स्मृतियों और स्वप्नों का द्वन्द्व..!
तुम हो वीर शहीदों के जीवन के वे दिन,
जिन्हें वे जी न सके..!
इस अंधेरे, उमस भरे कारागृह में,
तुम हो उजाले की खिड़कियां..!
अगर तुम युवा हो..!

  • शशिप्रकाश

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