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Home कविताएं

अन्ना करेनिना

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 3, 2024
in कविताएं
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फिर समाज में कोई
अन्ना करेनिना बनने की कोशिश न करे
इसी दृढ़ निश्चय के साथ
टॉलस्टॉय लिखने बैठे.

तीस पेज तक आते आते
अन्ना शब्दों से निकलकर
टॉलस्टॉय की मेज पर एक
खूबसूरत छोटी गुड़िया में
अवतरित हो गयी.

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‘टॉलस्टॉय,
तुम मेरे प्रति इतने कठोर क्यों हो ?’
टॉलस्टॉय का सीधा जवाब था
‘तुमने बेवफ़ाई की है’
‘किससे ?’
अपने पति करेनिन से,
समाज से.
तुमने तो अपने प्रेमी ब्रोंस्की के लिए
अपने बच्चे को भी छोड़ दिया
और अब तुम मुझसे नरमी की उम्मीद करती हो ?

अन्ना जब ज़िंदा थी.
तो यह सब सुनने की उसे आदत हो गयी थी !
लिहाजा उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया.

अन्ना ने सीधा सवाल किया
बेवफाई क्या है,
प्रेम क्या है,
समाज क्या है ?
टॉलस्टॉय ने इस पर अपना पूरा
बोझिल दर्शन रख दिया.

अन्ना बिना प्रभावित हुए बोली
एक स्त्री को क्या चाहिए
प्यार और सम्मान
ब्रोंस्की ने मुझे दोनों दिया.

इसलिए मैं पति को छोड़
ब्रोंस्की के पास आ गयी
और मां का दायित्व ?
टॉलस्टॉय को लगा कि
इस सवाल से अन्ना निरुत्तर हो जाएगी
लेकिन अन्ना का जवाब था
‘केरेनिन ने मेरे बच्चे को मुझसे छीना
और मैं सिर्फ मां नहीं थी,
एक स्त्री भी थी
स्वतंत्र स्त्री
प्यार और सम्मान की आकांक्षी’.

‘लेकिन ब्रोंस्की ने भी तो तुम्हें धोखा दिया,
आखिर तुम्हें मिला क्या ?’

यह तो तुम ब्रोंस्की से पूछना
मैंने तो बस प्यार किया था
एक मासूम प्यार !

फिर समाज की नैतिकता का क्या ?

नैतिकता के सवाल पर अन्ना भड़क गई,
‘तुम्हारे समाज की नैतिकता
मकड़ी के उस जाले की तरह है
जहां स्वतंत्र स्त्री का गला घोंटा जाता है
उसके प्यार,
उसके सपनों का गला घोंटा जाता है
जैसे मेरा घोंटा गया
क्या मेरा गला घोंटने से
तुम्हारे समाज की नैतिकता बच गयी ?
सच कहूं तो मैंने तो बस प्यार किया था
बहती नदी सा निश्चल प्यार.’

‘अच्छा छोड़ो टॉलस्टॉय
यह बताओ
अगर तुम मेरी जगह होते तो क्या करते ?’

टॉलस्टॉय ने सिगार सुलगाई
बेचैनी में कमरे का कई चक्कर लगाया
फिर बेहद धीमी मगर गंभीर आवाज़ में कहा
‘वही करता जो तुमने किया’

यह सुनकर अन्ना करेनिना
पुनः शब्दों में विलीन हो गयी…….*

*कहते हैं कि टालस्टाय पहले अन्ना को नेगेटिव रूप में चित्रित करना चाहते थे. लेकिन वे ईमानदार रचनाकार थे. इसलिए जैसे जैसे अन्ना के चरित्र में डूबते गए, उनकी अन्ना के प्रति सहानुभूति बढ़ती गयी और अन्ना अंत मे उपन्यास में सकारात्मक पात्र के रूप में उभर कर आई.

  • मनीष आजाद

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