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भाजपा के पितृपुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 11, 2021
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भाजपा के पितृपुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

kanak tiwariकनक तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़
कांग्रेस और उसके नेताओं ने कई ऐतिहासिक गलतियां की हैं, इसका यह अर्थ नहीं है कि अपयश का ठीकरा उनके माथे पर फोड़ा जाए कि कुछ लोग बिना कुछ किए श्रेय लूट ले जाएं.

पांच राज्यों में हो रहे चुनावों में भाजपा की गैर-संवैधानिक को​शिशें भी हैं कि उसका एकक्षत्र दबदबा कायम होता दिखे. सबसे कठिन चुनाव बंगाल का है. वहां तिकोने संघर्ष में भाजपा के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस और वाम पार्टियों तथा कांग्रेस का संयुक्त गठबंधन ज़्यादा दमदारी के साथ है. चुनावों में ऊंट किस करवट बैठेगा, बताना मुश्किल ही होता है. राजनीतिक प्राणी, तटस्थ मीडिया विश्लेषक और ज्योतिषी भी नहीं बता पाएंगे. भविष्यवाणी करने का एकाधिकार गोदी मीडिया और ईवीएम मशीन के पास होता है. पार्टियों के घोषणा-पत्र बस जारी होने को हैं.

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पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों, विधायकों और सांगठनिक कार्यकर्ताओं को हर कीमत पर खुलेआम खरीदने का अभियान प्रधानमंत्री और गृहमंत्री अमित शाह के संरक्षण में भाजपा धड़ल्ले से कर ही रही है. यही उसका राष्ट्रवाद है कि हम्माम में सब लोग साथ नहाओ. 

भाजपा और संघ के साथ दिक्कत है कि उनके पास जनता को बताने के लिए नामचीन और कालजयी रोलमाॅडल नहीं हैं इसलिए राजनीतिक कारणों से उनके वंशजों से सावधान रहते मुख्यतः जवाहलाल नेहरू को छोड़कर भाजपा ने कांग्रेस के कई नेताओं को अपनी सुविधा के चलते अपनाने की कोशिशें लगातार की हैं. गांधी तो शौचालय के दरवाजे पर चिपका दिए गए. मदनमोहन मालवीय को मरणोपरांत भारत रत्न दे दिया गया क्योंकि वे कांग्रेसी होने के साथ हिन्दू महासभा के अध्यक्ष हो गए थे.

लालबहादुर शास्त्री की तारीफ करने के बावजूद उनके जन्मस्थान मुगलसराय का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर कर दिया गया. नेहरू के खिलाफ सुभाष बोस से संबंधित कुछ फाइलें खोलने प्रधानमंत्री ने हाथ नचा नचाकर व्यंग्य बाण छोड़े थे. फाइलें खुलीं तो उनमें नेहरू-सुभाष की जुगलबंदी ने सभी साजिशों को धराशायी कर दिया.

विवेकानन्द के एक-एक जनवादी कथन की उलटबांसी करते भी संघ ने विवेकानन्द फाउंडेशन बनाया. उसमें विवेकानन्द के केवल नाम का इस्तेमाल कर अपना फाउंडेशन मजबूत करने विवेकानन्द के विचारों को विकृत किया. बंगाल की धरती बौद्धिक तथा अकादेमिक दृष्टि से बहुत उपजाऊ रही है. रवीन्द्रनाथ टैगोर, महर्षि अरविन्द, ईश्वरचंद विद्यासागर, बंकिमचंद्र, चैतन्य महाप्रभु, काज़ी नज़रुल इस्लाम, वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बोस और प्रफुल्लचंद राॅय, विपिनचंद पाॅल, कई क्रांतिकारी और अंततः अमर्त्य सेन जैसे कई लोग भी बंगाल की उपज हैं.

भाजपा-संघ के खाते में बंगाल से अलबत्ता एक ही नाम है. वह उनकी मातृसंस्था भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का है. मुखर्जी उसकी पूर्ववर्ती संस्था हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से क्रियाशील रूप में जुड़े रहे थे. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को कुदरत ने केवल 51 वर्षों का जीवन दिया लेकिन उनकी असाधारण प्रतिभा से इन्कार करना मुश्किल है. वैसे वह प्रतिभा स्वाधीनता आंदोलन के खिलाफ अंगरेजों की तरफदारी करने में सक्रिय रहे और चतुराई से लगातार एक के बाद एक पद हथियाने में भी.

बंगाल के एकीकरण को लेकर गांधी जी सहित कई लोगों ने कोशिशें कीं, तब मुखर्जी उसके उलट बंगाल के विभाजन के पक्ष में माहौल गरमाते रहे. उन्होंने मुस्लिम लीग के मंत्रिमंडल में खुद शामिल होने में गुरेज नहीं किया. इसके बावजूद संविधान सभा में गांधी, नेहरू और पटेल ने अन्य पार्टी के डाॅ. मुखर्जी को कांग्रेस के समर्थन से नामजद करना चाहा, तो पदाकांक्षी मुखर्जी तुरंत तैयार हो गए.

लोकसभा सचिवालय में डॉ. मुखर्जी के जन्मदिवस पर सेंट्रल हाॅल में अठारह पृष्ठों की पुस्तिका जारी हुई थी. सेंट्रल हाॅल वाचालता का दीवाने खास है. वह खुद एक मिनी लोकसभा है. इसके बावजूद इस पुस्तिका पर तत्काल कोई विवाद नहीं उठा, जबकि वह विवाद आमंत्रित करती है. पुस्तिका में आज़ादी के आन्दोलन के सन्दर्भ में कांग्रेस को जी भरकर कोसा गया और विमोचन समारोह में कांग्रेसी सांसद ताली बजाते रहे.

इस पुस्तिका में डॉ. मुखर्जी के लिए चुनिन्दा अतिरंजनाओं का इस्तेमाल किया गया. उनमें कई गुणों को गूंथा गया. उन्हें कई ऐतिहासिक भूमिकाओं से लैस किया गया जिन्हें वे खुद लेने से मुकर गए थे. यह पुस्तिका अब संसदीय लेखन का हिस्सा बन गई है. उस पर संसदीय संस्था और व्यवस्था की मोहर चस्पा हो गई है. नरसिंहराव सरकार के संसदीय कार्य मंत्री ने यदि इस पुस्तिका को पढ़ने की जहमत उठा ली होती तो इस पुस्तिका को संशोधित किया जा सकता था.

पुस्तिका दिलचस्प है. आगे कहती है, ‘1924 में डॉ. मुखर्जी कांग्रेस टिकट पर कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल की विधान परिषद के लिए निर्वाचित हुए. 1937 में वे दुबारा निर्वाचित हुए. (इन्हीं दिनों) मुस्लिम लीग से (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की समझौता नीति) स्पष्ट और जीवन्त राष्ट्रीय हितों की कीमत पर तथा डाॅ. मुखर्जी के स्वाभाविक राष्ट्रवाद के खिलाफ होने से उसने उनके कर्मयोगी को जागृत कर दिया.’

यह कालजयी (?) वाक्य कांग्रेसी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कार्य कर रही लोकसभा के सचिवालय ने तीन बार 1993, 1994 और 1995 में प्रकाशित किया. ऐसा भाजपा-समर्थक चमत्कार स्वातंत्र्योत्तर कांग्रेसी नेतृत्व में हुआ. आज़ादी के पहले गांधी, नेहरू और मौलाना आज़ाद जैसे कांग्रेसी नेताओं ने संघ-परिवार को हाशिये की राजनीति का विशेषज्ञ बना दिया था.

आज़ादी के बाद गांधी, नेहरू, पटेल की त्रयी ने उन्हें भारत की पहली मंत्रिपरिषद में शामिल करने का न्यौता दिया. मुखर्जी उसे मानने के लिए तैयार बैठे थे. संविधान सभा की महत्वपूर्ण सलाहकार समिति में मुखर्जी को नामजद किया गया. उस समिति ने फिर अल्पसंख्यकों के लिए बनाई गई उपसमिति में भी डाॅ. मुखर्जी को नामजद किया. इतिहास यह बात हैरत के साथ दर्ज करेगा कि डाॅ. मुखर्जी धीरे-धीरे राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा स्वतंत्रता आंदोलन से छिटकते गए. अंततः भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में दक्षिण कलकत्ता से पहली बार लोकसभा का चुनाव जीते.

डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अल्पसंख्यक अधिकारों की उपसमिति में 17 अप्रैल, 1947 को सुझावों का एक नोट दिया था. मौजूदा भाजपा नेतृत्व को ये सुझाव चुनौती के साथ पेश किए जाएं तो दुनिया का अपने को सबसे बड़ा कहता कथित दल अपने पितृपुरुष को तर्पण तक नहीं कर पाएगा. डाॅ. मुखर्जी ने मुख्यतः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1931 के प्रस्तावों को समर्थन देते अपनी सिफारिशें लिखी थी. उन्होंने उस देश के संविधान पर भी ज़्यादा भरोसा किया जो भारत में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में हमलावर बनकर घुस आया है. डाॅ. मुखर्जी ने चीन के संविधान सहित सोवियत संविधान और कैनेडा तथा आयरलैंड के संविधानों की कंडिकाओं का भी उद्धरण और समर्थन दिया.

डाॅ. मुखर्जी के लिखित नोट में है कि किसी व्यक्ति को किसी अदालत के आदेश या मुनासिब तौर पर बनाए गए कानून के अभाव में गिरफ्तार, प्रतिबंधित, निरोधित या दंडित नहीं किया जाए और न ही उसकी कोई संपत्ति ऐसे आरोप लगाकर सरकार द्वारा जप्त की जा सके. उत्तरप्रदेश की योगी सरकार इसके ठीक उलट आचरण मूंछों पर ताव देकर कर रही है और डाॅ. मुखर्जी की याद भी उसे नहीं होगी.

नागरिक अधिकारों पर डकैती करते कानून उत्तर प्रदेश में बना है. जो पार्टी भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का शोशा छोड़ती रहती है, क्या उसने पढ़ा है डाॅ. मुखर्जी का लिखा हुआ ? डॉ. मुखर्जी ने लिखा था कि ‘भारत का कोई एक खास (राष्ट्रीय) धर्म नहीं होगा. यह राज्य की जवाबदेही है कि वह सभी धर्मों से बराबरी का बर्ताव करेगी. क्या भाजपा में हिम्मत है कि कहे वह डा. मुखर्जी से असहमत है ? यह भी कहा कि हर नागरिक को सरकार को सम्बोधित याचिका और शिकायत देने का अधिकार होगा और उसके खिलाफ मुकदमा करने का भी. (ब्रिटिश तथा चीनी संविधान से उद्धृत).

यह भी मुखर्जी ने लिखा कि ‘हर नागरिक को अपने पत्र व्यवहार की गोपनीयता बनाए रखने का अधिकार होगा.’ कोई नरेन्द्र मोदी सरकार से पूूछे कि पूरी दुनिया में अपनी फजीहत भी कराते मौजूदा सरकार नागरिकों की आज़ादी की गोपनीयता को किस तरह तार-तार कर रही है. चाहे आधार कार्ड का प्रकरण हो, बैकों से संव्यवहार हो, सोशल मीडिया हो, इंटरनेट हो या अन्य जो भी तकनीकी ज्ञान के अवयव होते हैं, वहां घुसकर मोदी सरकार ने निजता के कानून का क्रूर उल्लंघन कई बार किया है और अब भी उल्लंघन करने पर आमादा है. सुप्रीम कोर्ट तक को इस संबंध में संविधान पीठ बनाकर फैसला करना पड़ा है. सरकार का यह कृत्य तो डाॅ. मुखर्जी के अनुसार चीनी संविधान के अनुच्छेद 12 के खिलाफ है.

दिलचस्प है भाजपा सरकार और पार्टी संगठन को बताना ज़रूरी है कि डाॅ. मुखर्जी ने अपने नोट में लिखा था कि ‘कोई लोकसेवक गैर-कानूनी तरीके से किसी व्यक्ति की आज़ादी या अधिकार में दखल देता है तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही तो हो. इसके अलावा उसे फौजदारी और दीवानी कानून में भी आरोपी बनाया जाए. पीड़ित नागरिक चाहे तो ऐसे कृत्यों के लिए वह संबंधित सरकार से हर्जाने का दावा कर सकता है. (अनुच्छेद 26 चीनी संविधान).

देश में एक तो क्या लाखों प्रकरण हैं जिनमें मौजूदा केन्द्र सरकार की नकेल डाॅ. मुखर्जी के नोट की इमला में कसी जा सकती है, चाहे किसान आंदोलन हो, श्रमिक यूनियनों का खात्मा हो, आदिवासियों का विस्थापन हो, महिलाओं का रसूखदार नेताओं द्वारा बलात्कार हो या कोरोना पीड़ित लाखों गुमनाम देशवासियों की बेबसी और लाचारी के सरकारी कारण हों, मीडिया और नागरिक अधिकारों के कार्यकर्ताओं की जबरिया गिरफ्तारी हो. क्या हो रहा है डा. मुखर्जी ?

हिन्दू-मुसलमान करने वाली भाजपा के पितृपुरुष ने कांग्रेस के प्रस्तावों पर निर्भर होकर कहा था कि ‘अल्पसंख्यकों की संस्कृति, भाषा और लिपि की पूरी रक्षा की जाएगी. उन्हें अपनी शिक्षण और अन्य संस्थाएं चलाने और धर्म का पालन करने की पूरी आज़ादी होगी.’ क्या कहती है भाजपा उर्दू भाषा और मदरसों को लेकर ? अब तो गुरुमुखी पढ़ने वालों को आतंकी और खालिस्तानी भी कहा जा रहा है !

मुखर्जी ने तो यह भी कहा था कि ‘सरकारी नौकरी के 50 प्रतिशत पदों को योग्यता के आधार पर भरा जाए और बाकी पदों को प्रत्येक समुदाय से आबादी के अनुपात में उम्मीदवार लेकर भरा जाए.’ क्या देश की नौकरियों में यह अनुपात भाजपा लाने का वचन दे सकती है ?

यह भी डाॅ. मुखर्जी ने अपने नोट में लिखा था कि ‘विधायिका और अन्य स्वायत्तशासी संस्थाओं में अल्पसंख्यकों का मुनासिब आनुपातिक संख्या में निर्वाचन या मनोनयन किया जाए.’ भाजपा तो कभी-कभी पूरे राज्य में लोकसभा या विधानसभा चुनाव में एक भी टिकट अल्पसंख्यकों को नहीं देती.

14 वर्ष तक बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने के अधिकार की सिफारिश करते उन्होंने लिखा था, ‘प्रदेश, जिला या नगरपालिक संस्थाओं के बजट में हर हालत में शिक्षा पर कुल बजट का 30 प्रतिशत खर्च किया जाए.’ है हिम्मत किसी भी सरकार की जो शिक्षा पर बजट का लगभग तिहाई तो क्या चौथाई खर्च करने की कहे भी ? यह भी कि राज्य किसी को कोई उपाधि नहीं देगा. सावरकर जी का क्या होगा ? राष्ट्रीय राजमार्ग पर धार्मिक भावना या भवन आदि बना रहा हो तो लोगों के यातायात में कोई दिक्कत पैदा नहीं करे. (कांग्रेस प्रस्ताव)

महत्वपूर्ण है उन्होंने यह भी लिखा था कि ‘भारत के हर नागरिक को हथियार रखने का अधिकार उस संबंध में बनाए गए विनियमों और आरक्षण आदि के आधार पर दिया जाएगा.’ सोचिए आज हर नागरिक के हाथ में हथियार होता !

सरकारी अनुदान प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में किसी भी विद्यार्थी को अपना धर्म छोड़कर अन्य धर्म संबंधी शिक्षा या औपचारिकता को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं होगा. भारत में ‘यदि रहना होगा, वन्देमातरम् कहना होगा’ का क्या होगा ? महत्वपूर्ण है उन्होंने कहा था कि अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित स्कूल, काॅलेज, तकनीकी और अन्य संस्थाओं को राज्य से सहायता पाने का बराबर का अधिकार होगा, जितना अन्य उसी तरह की सार्वजनिक संस्थाओं या बहुसंख्यक वर्ग की संस्थाओं के लिए दिया जा सकता है. किसी धार्मिक समुदाय को लेकर कोई विधेयक या प्रस्ताव विधायिका में प्रस्तुत किया जाना है, तो यदि उस प्रभावित धर्म के विधायकों में तीन चौथाई विरोध करें तो उस पर कोई कार्रवाई नहीं होगी.

यह अलग बात है कि उपरोक्त प्रगतिशील लगती तमाम सिफारिशों के नोट पर दस्तखत करने के तत्काल बाद डाॅ. मुखर्जी अपनी हिन्दू महासभाई राजनीति में दत्तचित्त हो गए. केन्द्र के मंत्री रहते हुए भी उन्होंने कई ऐसे राजनीतिक चमत्कार किए जो उनको भारतीय राजनीति के इतिहास में मुनासिब ढंग से चित्रित करेंगे. उसके पहले 13 मई, 1947 को डाॅ. मुखर्जी ने बंगाल के एकीकरण के संबध में गांधी जी से जिरह की.

गांधी जी ने पूछा – ‘वे बंगाल के एकीकरण के खिलाफ क्यों हैं ?’ उत्तर मिला – ‘यह प्रस्ताव सोहरावर्दी का है लेकिन असल में ब्रिटिश हुकूमत की सूझ है.’ गांधी जी ने व्यंग्य किया कि क्या इस थ्योरी के लेखक की वजह से ही डा. मुखर्जी को आपत्ति है ? डा. मुखर्जी ने कहा कि ‘बंगाल का विभाजन तो एक सत्य है और वे उसका समर्थन करते हैं.’

अगस्त 1947 में गांधी जी डा. मुखर्जी को केन्द्र सरकार में शामिल होने का न्यौता देते हैं तो वे कथित ‘राष्ट्रहित‘ में मान भी जाते हैं. राष्ट्र नामक शब्द गाय की तरह इस्तेमाल करने से उसका दूध दुह लिया जाता है. यह भी डा. मुखर्जी ने बंगाल के गवर्नर को लिखा था ‘मुझे आपको उस सम्भावित स्थिति का बयान करने दीजिए, जो प्रदेश में कांग्रेस द्वारा चालू किए गए व्यापक आन्दोलन के कारण उत्पन्न हो सकती है. जो (विश्व) युद्ध के दौरान जनभावनाएं भड़काता है, जिससे कि आंतरिक गड़बड़ी या असुरक्षा उत्पन्न हो, उसका मुकाबला फिलहाल काम कर रही सरकार द्वारा दृढ़तापूर्वक किया जाना चाहिए.’ (डायरी, पृष्ठ 179). बलराज मधोक के अनुसार यह पत्र राष्ट्रवादी भारत की भावनाओं और आकांक्षाओं का सही चित्रण करता है.

गांधी जी डा. मुखर्जी के राष्ट्रवादी नजरिये के बारे में क्या सोचते थे ? 17 दिसम्बर, 1946 को डाॅ. राधाकृष्णन को लिखे पत्र में गांधीजी कहते हैं, ‘काश वे हिन्दू (महा) सभा के कर्ताधर्ता के रूप में उतने ही मर्यादित होते जितने वे योग्य और बुद्धिमान प्रशासक हैं.’

श्यामाप्रसाद मुखर्जी को गांधीजी द्वारा लोकसभा सचिवालय से नरसिंह काल में प्रकाशित एक पुस्तिका के अनुसार उदार और कांग्रेसी दिमाग का बताया गया है. 13 अक्टूबर, 1941 के अपने पत्र में गांधीजी मुसलमानों और ईसाइयों के बारे में शिकायत करने वाले डा. मुखर्जी को स्पष्ट करते हैं ‘छुआछूत की समस्या हिन्दू धर्म में सबसे अधिक विकराल है. बुराई की जड़ धर्म के भ्रष्टाचार में है. यदि तुम्हें यह समझ में नहीं आता तो इस मामले में लगे रहो जब तक कि हम नतीजों को लेकर सहमति नहीं बनाते.’ यह था गांधी का दिया गया प्रमाण-पत्र !

गांधी ने 1 सितम्बर, 1947 को सरदार पटेल को लिखे पत्र में कलकत्ता में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों के पीछे हिन्दू महासभा का हाथ होने का उल्लेख किया. उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार को यह समझाइश भी दी कि शरारती तत्वों को गिरफ्तार करने के पहले श्यामाप्रसाद मुखर्जी और निर्मलचंद्र चटर्जी से बात जरूर की जाए.

2 सितम्बर, 1947 को जब डा. मुखर्जी गांधीजी से मिलने आए तो गांधीजी ने साम्प्रदायिक दंगों की स्थिति पर गहरी चिन्ता व्यक्त की. सुहरावर्दी ने जब गांधीजी से अनशन खत्म करने का अनुरोध किया तो बापू ने दृढ़तापूर्वक कहा, ‘मैं अपना उपवास तभी खत्म करूंगा जब डा. मुखर्जी मुझे रिपोर्ट देंगे कि कलकत्ता शांत हो गया है – उसके पहले हर्गिज नहीं.’ यह थी गांधीजी की श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उदार और पूर्णतः राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के बारे में अकाट्य राय !

लोकसभा सचिवालय की शेध पत्रिका (?) यह भी प्रकाशित करती है, ‘उन (डा. मुखर्जी) के हिन्दू महासभा में शामिल होने का महात्मा गांधी ने स्वागत किया जिन्होंने यह माना कि मालवीय जी के बाद किसी को हिन्दुओं की अगुआई करने की ज़रूरत थी. गांधीजी श्यामाप्रसाद के ‘उदार’ और ‘पूर्णतः राष्ट्रवादी’ दृष्टिकोण से बेहद प्रभावित थे और यह समझा जाता है कि उन्होंने उनसे यह भी कहा था, ‘पटेल हिन्दू दिमाग के कांग्रेसी हैं और तुम कांग्रेसी दिमाग के हिन्दू महासभाई बन जाओ.’ यह गांधी ने 1939 में कहा होगा ? वह संस्मरण-ग्रंथ इसी तर्ज पर है.

बकौल केदारनाथ साहनी डा. मुखर्जी ने गांधीजी, जिन्हें वह इलाहाबाद में मिले थे, के परामर्श पर ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में भाग नहीं लिया था. ‘महात्मा जी चाहते थे कि कुछ नेता देश का नेतृत्व करने के लिए जेल से बाहर रहें.’ के. आर. मल्कानी कहते हैं, ‘1939 में जब श्यामाप्रसाद राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हुए, तो गांधीजी ने उन्हें कांग्रेस में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया पर उन्होंने हिन्दू महासभा में सम्मिलित होना चुना.’

गांधी जी यह सब क्या करते रहते थे ? जो डा. मुखर्जी उनके कहने से कांग्रेस में शामिल नहीं हुए, उन्हें गांधीजी 1942 के आन्दोलन से दूर रहने की सलाह देने की फुरसत में बैठे थे ? जो डा. मुखर्जी गांधीजी के कहने से उनकी पार्टी तक में शामिल नहीं हुए, वे 1942 के आन्दोलन में इसलिए शामिल नहीं हुए कि गांधीजी ने उनको मना कर दिया था !!! इसके बावजूद क्या गांधीजी ने डाॅ. मुखर्जी को यह सलाह भी दी कि वे बंगाल के गवर्नर को ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के खिलाफ लिखें ? डाॅ. मुखर्जी ने विधान परिषद् में बयान क्या गांधीजी से पूछकर दिया था ?

पूरा देश गांधीजी के कहने पर ‘करो या मरो’ कह रहा था. डा. मुखर्जी आन्दोलन में शरीक नहीं हो रहे थे. मंत्रिमंडल में बने हुए थे. मुस्लिम लीग की तर्जे बयां पर हिन्दू महासभा के नेता बयान दे रहे थे. यह भी गांधी के कारण ? गांधी ने कैसे कहा होगा कि डा. मुखर्जी कांग्रेसी दिमाग के हिन्दू हैं. यही गांधी जब श्यामाप्रसाद मुखर्जी को अगस्त 1947 में केन्द्र सरकार में शामिल होने का न्यौता देते हैं तो वे ‘राष्ट्रहित‘ में मान जाते हैं.

(update 11.03.2021)

1997 में हरीशचन्द्र और पद्मिनी लिखित ‘डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी : समकालीन दृष्टि में’ किताब प्रकाशित हुई है. इसमें हीरेन मुखर्जी जैसे अपवादों को छोड़कर संघ परिवार के बुद्धिजीवियों और नेताओं के लेख और संस्मरण हैं. के.आर. मल्कानी के लेख को ‘लोकसभा के रिकाॅर्ड से’ लेना बताया गया है, ‘एक समय यह सुझाव आया कि बंगाल को स्वतंत्र राज्य बना दिया जाए, पर डाॅ. मुखर्जी ने ऐसा नहीं होने दिया. कुछ वर्ष बाद जब नेहरू ने कहा कि मुखर्जी विभाजन के लिए सहमत हो गए थे तो डाॅ. मुखर्जी ने उत्तर दिया, ‘आपने भारत का विभाजन किया है, और मैंने पाकिस्तान को विभाजित कर दिया है.’

संस्मरण ग्रंथ की भूमिका में बलराज मधोक लिखते हैं, ‘डाॅ. मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन करवाया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खंडित भारत के लिए बचा लिया.’ ग्रंथ के प्रेरक केदारनाथ साहनी लिखते हैं, ‘जब देश का विभाजन अनिवार्य जैसा हो गया, तब डाॅ. मुखर्जी ने सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं के हितों की उपेक्षा न हो. उन्होंने बंगाल के विभाजन के लिए जोरदार प्रयास किया, जिससे मुस्लिम लीग का पूरे का पूरा प्रांत हड़पने का मंसूबा सफल नहीं हो सका.’ ‘लोकसभा के रेकाॅर्ड से’ मुहावरे का मलकानी का क्या अर्थ है ? क्या बंगाल के विभाजन की उपरोक्त बात लोकसभा की बहस से ली गई है ?

1942 का ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन आज़ादी के गायन की भैरवी है. इस आन्दोलन ने देश को झकझोर कर रख दिया सिवाय हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग के. दोनों ‘महान संस्थाओं‘ ने 1942 में खलनायक भूमिका अदा की. कांग्रेस का इतिहास’ में डा. पट्टाभि सीतारमैया लिखते हैं –

‘गांधीजी और उनके साथियों की गिरफ्तारी के अवसर पर सावरकर ने हिन्दुओं को सलाह दी कि कांग्रेस के आन्दोलन में किसी प्रकार की मदद नहीं करे. कांग्रेस नेताओं के जेल जाने के बाद मुस्लिम बहुल प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाने में उन्होंने विभिन्न प्रान्तों में अलग-अलग कारणों से हिन्दुओें को भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन इन सभी मामलों में वास्तव में मुस्लिम लीग की नीति का अनुसरण कर रहे थे. लीग की भांति उन्हें भविष्य के बजाय अपने तात्कालिक उद्देश्य की अधिक परवाह थी. भारतीय आज़ादी के बजाय साम्प्रदायिक लाभ का अधिक ध्यान था और ब्रिटेन के विरुद्ध लड़ने के बजाय उसके साथ मिलकर काम करने की नीति अधिक पसन्द थी.

कार्यकारी अध्यक्ष डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी आज़ादी के आन्दोलन से ज़्यादा बंगाल की सरकार चलाने के पक्षधर थे. डाॅ. मुखर्जी डायरी लिखते थे जो आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित हुई है. ऊपर वर्णित संस्मरण-ग्रंथ की प्रस्तावना में बलराज मधोक लिखते हैं, ‘उनके (डाॅ. मुखर्जी) द्वारा 26 जुलाई, 1942 को बंगाल के गवर्नर सर जाॅन हर्बर्ट और 12 अगस्त, 1942 को वायसराय लार्ड लिनलिथगो को लिखे पत्र राष्ट्रवादी भारत की भावनाओं और आकांक्षाओं का सही चित्रण करते हैं.’ ये पत्र डाॅ. मुखर्जी की ‘डायरी‘ में प्रकाशित हैं. ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के कालजयी आह्वान के कुछ पहले, 26 जुलाई को लिखे उसी पत्र में डाॅ. मुखर्जी ने बंगाल के गवर्नर को लिखा था, ‘मुझे आपको उस सम्भावित स्थिति का बयान करने दीजिए जो प्रदेश में कांग्रेस द्वारा चालू किए गए व्यापक आन्दोलन के कारण उत्पन्न हो सकती है. जो (विश्व) युद्ध के दौरान जनभावनाएं भड़काता है जिससे कि आंतरिक गड़बड़ी या असुरक्षा उत्पन्न हो. उसका मुकाबला फिलहाल काम कर रही सरकार द्वारा दृढ़तापूर्वक किया जाना चाहिए.’ यह थी डाॅ. मुखर्जी  की राष्ट्रवादी भावना !

मुस्लिम लीग की 1942 के आन्दोलन को लेकर क्या धारणा थी ? डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने मिदनापुर के हिंसक होते आन्दोलन पर विधान परिषद में यह टिप्पणी भी की थी ‘सरकार को  (जनता द्वारा) जानबूझकर चुनौती दी गई थी.’ जिन्ना ने कहा था, ‘कांग्रेस कार्यसमिति ने 14 जुलाई 1942 को जो नया निर्णय लिया है कि यदि अंग्रेज भारत से नहीं हट जाएंगे, तो देशव्यापी आन्दोलन शुरू किया जाएगा – यह गांधी जी और उनकी हिन्दू कांग्रेस की नीति और कार्यक्रम की पराकाष्ठा है. वह अंग्रेज लोगों पर दबाव डालकर उनसे इस प्रकार का शासन ऐंठ लेना चाहते हैं और उस शासन के लिए ऐसी ताकत हासिल करना चाहते हैं जिससे तुरन्त ही ब्रिटिश संगीनों की छाया में हिन्दू राज्य स्थापित हो जाए और इस प्रकार मुसलमान और दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय कांग्रेस राज की दया के पात्र बन जाएं.’

जिन्ना और हिन्दू महासभा दोनों का मक्सद एक ही स्वर में कांग्रेस की अगुआई में चल रहे जन आन्दोलन को कमज़ोर करना ही था. दोनों के लिए कांग्रेस ही ‘राष्ट्र विरोधी‘ थी और कांग्रेस की हार ही उनका मक्सद रहा है. सीतारमैया ‘कांग्रेस का इतिहास’ में रहस्योद्घाटन करते हैं –

हिन्दू महासभा सिंध में मुस्लिम लीग के साथ साझा सरकार में शामिल थी, हालांकि सिंध विधानसभा ने पाकिस्तान की मांग करते हुए प्रस्ताव पारित किया. हिन्दू महासभा के मंत्रियों ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा नहीं दिया, केवल रिकार्ड पर विरोध भर किया.

यह चरित्र है हिन्दू महासभा का जिसके कार्यकारी अध्यक्ष डाॅ. मुखर्जी थे. 1942 के आन्दोलन से ब्रिटिश शासन की चूलों के हिलने की बात ब्रिटेन के सम्राट किंग जाॅर्ज छठवें की जीवनकथा के लेखक जे. डब्ल्यू. व्हीलर बैनेट ने स्वीकार की है. वे लिखते हैं ‘1942 के उपद्रवों का दमन हो गया था. उससे यह प्रकट हो चुका था कि अंग्रेजों की शक्ति और प्रतिष्ठा अभी ऊंची थी, लेकिन तयशुदा रूप से वे खतरे में पड़ गए थे. घटनाओं से प्रकट हो चुका था कि लोगों को आसानी से उत्तेजित किया जा सकता था और देश के बड़े-बड़े हिस्सों में व्यवस्थित शासन का संचालन असम्भव हो गया था.’ सम्राट ने अपनी डायरी में यह भी लिखा कि अंग्रेजी सत्ता ने महसूस कर लिया था कि ‘भारत में हमारा शासन गलत बात है और यह भारत के लिए कभी भी अच्छा नहीं था.’ यह तस्वीर है हिन्दू महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष रहने की अवधि की.

इतिहास निर्मम हथियार है. वक्त को किसी की गर्दन से परहेज नहीं है. आज़ादी के आन्दोलन में हिन्दू महासभा की भूमिका बहुत निन्दनीय रही है. सम्प्रदायवाद ने भारत का इतिहास का बहुत नुकसान किया है. सरकारी और संसदीय दस्तावेज अलग-अलग बौद्धिक अनुशासन के तहत नहीं लिखे जाते. सच कड़वा होता है, लेकिन सच ही वांछनीय है. कांग्रेस और उसके नेताओं ने कई ऐतिहासिक गलतियां की हैं, इसका यह अर्थ नहीं है कि अपयश का ठीकरा उनके माथे पर फोड़ा जाए कि कुछ लोग बिना कुछ किए श्रेय लूट ले जाएं.

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