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Home गेस्ट ब्लॉग

किसान आंदोलन : सीमाएं एवं संभावनाएं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 8, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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Subrato Chatterjeeसुब्रतो चटर्जी

किसान आंदोलन के एक सौ दिन पूरे होने पर बधाई के साथ-साथ इसके भविष्य की चिंता भी स्वाभाविक है. 100 दिन, 270 मौतें और लाखों सड़क पर ! किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ये एक बदनुमा दाग है, लेकिन जहां टू मच डेमोक्रेसी हो, उस देश के लिए नहीं.

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किसान आंदोलन के शुरुआती दिनों से मैं कहता आ रहा हूं कि जब तक ये आंदोलन ग़ैर-राजनीतिक और अहिंसक रहेगा, तब तक इसका कोई भविष्य नहीं है, और आज भी मैं अपनी बात पर क़ायम हूं.

हर जन आंदोलन के साथ कुछ मिथक जुड़े रहते हैं, जैसे जेपी आंदोलन के साथ छात्र आंदोलन का मिथक या नक्सलबाड़ी या तेलंगाना आंदोलन के साथ कृषक आंदोलन का मिथक. ब्रांडिंग की इस प्रवृत्ति में उन वृहत्तर लक्ष्यों की अनदेखी कर दी जाती है, जिनके लिए ये आंदोलन हुए. व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई को सरकार परिवर्तन में जेपी द्वारा बदल दिया गया और नक्सलबाड़ी और तेलंगाना आंदोलन को किसानों का सूदखोरों और ज़मींदारों के विरुद्ध मानकर भूमि सुधार तक सीमित कर देश के जनमानस में स्थापित कर दिया गया.

कुछ इस तरह की कोशिश किसान आंदोलन के साथ भी हो रही है, जिसके लिये सत्तापक्ष और खुद आंदोलन का नेतृत्व भी समान रूप से ज़िम्मेदार है. सत्ता पक्ष की बात तो समझ में आती है, क्योंकि मौजूदा सरकार दो धंधेबाज़ों की रहमो-करम पर है. असल प्रश्न किसान आंदोलन के नेतृत्व के राजनीतिक चरित्र पर है.

यह बात तो दीगर है कि किसान आंदोलन का वर्ग चरित्र बुर्जुआ है, जो कि मूलतः मौजूदा व्यवस्था में अपना स्पेस छिन जाने पर दु:खी है. नए कृषि क़ानूनों के विरोधस्वरूप पुराने क़ानूनों की पुनर्बहाली, इस दृष्टि से, एक संशोधनवादी लड़ाई है. इस आंदोलन के नेतृत्व के पास भूमि सुधार जैसे मुद्दों पर कोई दृष्टि नहीं है. फलस्वरूप, जो किसान नहीं हैं, उनकी नज़र में ये आंदोलन सिर्फ़ किसानों तक सीमित है. यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी कमज़ोरी है.

निरपेक्ष, निष्काम, निर्लिप्त होना और किसी भी आंदोलन का ग़ैर-राजनीतिक होना संवेदनशील किंतु बुद्धिहीन भारतीयों के मन में एक अजीब-सी झुरझुरी पैदा करती है. हम एक ख़ास तरह की रुमानियत में जीने और सोचने के आदि हैं, जिसमें कर्महीन, प्रयासहीन फल की आशा से हम सराबोर रहते हैं. इसलिए गीता में भक्ति योग है, जो कि हमें कर्म योग से बेहतर लगता है. अजगर करे न चाकरी जैसे बकवास हमारे संपूर्ण सोच को नियंत्रित करते हैं.

हम नहीं सोच पाते कि जब नए कृषि क़ानून एक ख़ास राजनीतिक, आर्थिक सोच का ही प्रतिस्फलन है तो उसके विरुद्ध कोई भी लड़ाई ग़ैर राजनीतिक कैसे हो सकती है.

राज्य प्रायोजित हिंसा और हत्या के दृश्य और अदृश्य दो आयाम होते हैं, जिसे समझने की ज़रूरत है. जब सरकार आंदोलनरत जनता पर कहीं भी बल प्रयोग करती है या गोली चलाती है तो वह राज्य प्रायोजित हिंसा का दृश्य आयाम होता है. यह हमें शारीरिक तौर पर दिखता है, इसलिए विचलित करता है.

दूसरी तरफ़, जब व्यवस्था की चपेट में आकर समाज के सबसे अच्छे लोगों को अकारण जेल में ठूंस दिया जाता है, या जब बीस सालों तक जेल काट कर कुछ निरपराध लोग अंततः छूट जाते हैं, या सरकार और समाज के हर स्तर पर कमज़ोर लोगों का शोषण कर उनकी ज़िंदगियां तबाह की जाती हैं, तो वह भी राज्य प्रायोजित हिंसा का अदृश्य आयाम है, जिसके ख़िलाफ़ हम गोलबंद नहीं होते.

आश्चर्य की बात तो ये है कि यह उस देश व समाज का सच है जो अदृश्य की आराधना में अहिर्निश व्यस्त है. हमारी अनुभूतियां सिलेक्टिव हैं, दूसरे शब्दों में हम बौद्धिक दोगलों की बेशर्म जमात हैं. किसान आंदोलन की सीमाओं को इसका ग़ैर राजनीतिक होने का ढोंग करना तय कर रहा है.

बात अब संभावनाओं की. लोग कह रहे हैं कि जेपी आंदोलन के 45 सालों बाद भारत में इतना बड़ा आंदोलन देख रहा है. मैं भी मानता हूं कि फ़्रांस और स्पेन की ताज़ा घटनाओं के बाद इस आंदोलन के विश्वव्यापी प्रभाव के बारे किंचित् संदेह नहीं है.

सवाल ये है कि फिर भारत में यह सफल होता क्यों नहीं दिखता ? इसके पीछे ऐतिहासिक कारण हैं. यूरोप जिस नाज़ीवाद पर थूकता है, हम उसे अपने सर पर बिठा कर नाच रहे हैं. अंग्रेजों के विरुद्ध किसान आंदोलन इसलिए सफल हुआ था क्योंकि अंग्रेज उपनिवेशकारी थे, लेकिन नाज़ी नहीं थे. जिस समय नक्सलबाड़ी या तेलंगाना आंदोलन हुआ उस समय भाजपा सत्ता में नहीं थी, लेकिन आज जो काम भाजपा कर रही है, वही काम तब कांग्रेस कर रही थी. उस समय नक्सल देशद्रोही कहे जाते थे, आज किसान देशद्रोही और नक्सल दोनों कहे जा रहे हैं, फ़र्क़ कहां है ?

इसी बिंदु पर सवाल उठता है कि क्या वजह है कि नक्सल जैसे राजनीतिक आंदोलन भी देशद्रोही और किसान आंदोलन जैसे तथाकथित ग़ैर राजनीतिक आंदोलन भी देश द्रोही ? क्या हमारे सरकारों की नज़र में देश का अर्थ एक दमनात्मक, शोषण आधारित व्यवस्था को हर क़ीमत पर बचाए रखना भर है ? शायद.

अगर ये सच है तो इस सोच के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई के बग़ैर कोई भी आंदोलन अपना लक्ष्य निर्णायक रूप से पूरा नहीं कर सकता इसलिए, पाखंड छोड़ कर सच्चाई में जीने की आदत डालिए.

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