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आस्थाएं और उनका प्रचार वोट दिलवा सकती हैं, लेकिन महामारी से बचाव के लिये तो वैज्ञानिक सोच ही काम आएगी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 3, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

अखबारों और न्यूज चैनलों की हेडलाइन्स मैनेज करके वे जनमत को भ्रमित कर सकते हैं, आंकड़ों की बाजीगरी दिखा कर विकास और रोजगार की भ्रामक तस्वीरें दीवारों पर चस्पां कर सकते हैं, आईटी सेल को सक्रिय कर माहौल में धुंध पैदा कर सकते हैं लेकिन किसी महामारी से मुकाबले के लिये ऐसे टोटके किसी काम के नहीं, जिनमें उन्हें महारत हासिल है.

यही कारण है कि इसी साल जनवरी-फरवरी में जब वे और उनके चेले देश-दुनिया में यह प्रचारित करने में मगन थे कि ‘उनके कुशल और प्रेरक नेतृत्व’ में कोरोना पर जीत हासिल कर ली गई है, यह वायरस दबे पांव दोबारा सर्वत्र पसरता गया. इस बार पिछली बार से भी अधिक मारक, अधिक रहस्यमय जिसके कहर से क्या बच्चे, क्या नौजवान, क्या धनी, क्या गरीब, क्या शहरी, क्या ग्रामीण कोई नहीं बच पा रहा.

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जब यूरोप-अमेरिका में संक्रमण की दूसरी लहर मौत का तांडव मचा रही थी और विशेषज्ञ भारत में भी इस ‘सेकंड वेभ’ के आने की आशंकाएं जता रहे थे, उनके नेतृत्व में नीति आयोग सार्वजनिक क्षेत्र की उन इकाइयों की पहचान करने में व्यस्त था, जिन्हें बेच कर उनकी सरकार अरबों डॉलर हासिल कर ले. इन डॉलरों की सख्त जरूरत भी है क्योंकि आर्थिक कुप्रबंधन ने देश में बेरोजगारी और मंदी का रिकार्ड कायम कर दिया है.

कोरोना की पहली लहर का मुकाबला भी जिस अफरातफरी के साथ किया गया था वह अब एक इतिहास है. आने वाले समय में किताबें लिखी जाएंगी, डॉक्यूमेंट्रीज बनाई जाएंगी कि किस तरह भारत में सत्तासीन लोगों के अविवेकी फैसलों ने लाखों मजदूरों और उनके बाल-बच्चों को सैकड़ों किलोमीटर पैदल पलायन को विवश कर दिया था, किस तरह आकस्मिक आर्थिक संकट से घिर कर न जाने कितने खाते-पीते परिवार भुखमरी से जूझने लगे थे, किस तरह अचानक से नौकरी छिन जाने से हजारों-लाखों लोग बेरोजगारी और मनोरोग के शिकार हो गए थे.

जब संजीदगी के साथ महामारी की दूसरी लहर से मुकाबले की तैयारी करनी थी, वे उन सब में व्यस्त हो गए जिनमें उन्हें महारत हासिल है. मसलन, चुनावी रैलियां, भाषण, रोड शो आदि-आदि. पता नहीं, कुंभ के आयोजन की अनुमति देने के पहले सरकारों ने विशेषज्ञों से विचार-विमर्श किया था या नहीं. जरूरत भी क्या थी, जब उनके मुख्यमंत्री तक ने जाहिलों की तरह ऐसे वक्तव्य देने में किंचित भी शर्म महसूस नहीं की, ‘गंगाजल कोरोना से रक्षा करेगा.’

आस्थाएं और उनका प्रचार वोट दिलवा सकती हैं, लेकिन महामारी से बचाव के लिये तो वैज्ञानिक सोच ही काम आएगी. शायद, कुंभ के आयोजन से वोटों की राजनीति में कुछ फायदा हुआ हो, लेकिन वैज्ञानिक नजरिये की उपेक्षा कर कुंभ में लाखों लोगों की भागीदारी ने कोरोना संक्रमण को किस खतरनाक तरीके से व्यापक बनाया, यह अब सामने है.

वे चुनाव जीतने में कितने माहिर हैं, यह देश देख चुका है. वाकई इस मायने में शानदार उपलब्धियां हैं उनकी. लेकिन, लोकतंत्र में चुनाव जीतने के बाद लोगों की जिंदगियों का खेवनहार बनना होता है. इस मायने में वे कितने फिसड्डी साबित हुए, यह भी देश देख रहा है.

क्या फर्क पड़ता है कि वे दोबारा जीत गए. दोबारा चुनाव ही तो जीते. बेरोजगारी पर उन्हें जीत हासिल होती, जिसका भरोसा उन्होंने देश को दिया था, तो कोई बात होती. महामारी से वे देश की इतनी दुर्दशा नहीं होने देते, तो कोई बात होती.

आज जितनी मौतें हो रही हैं कोरोना संक्रमितों की, उनमें अधिकतर ढांचागत कमी या लापरवाही के शिकार हो रहे हैं. आप साल भर में बहुत अधिक नहीं कर सकते, लेकिन इतना तो कर ही सकते थे कि आज ऑक्सीजन को लेकर इतना हाहाकार नहीं होता, बेड की इतनी मारामारी नहीं होती.

लेकिन, वे और उनके सिपहसालार लोग इतने मुतमईन थे कि पिछले साल कोरोना संकट में तदर्थ रूप से बहाल किये गए मेडिकल सपोर्ट स्टाफ तक की इसी जनवरी-फरवरी में छुट्टी कर दी उन्होंने. पता नहीं, कोरोना से इतनी निश्चिंतता कैसे हासिल हो गई थी उन्हें ? उनकी निश्चिंतता ने देश के आमजनों में भयानक अनिश्चितता पैदा कर दी है. हर रोज, हर तरफ से लोगों को प्रियजनों की आकस्मिक मौत की मनहूस और डरावनी खबरें आ रही हैं.

वे आज भी हेडलाइन्स मैनेज कर रहे हैं. जाहिर है, इसमें उन्हें महारत हासिल है. मीडिया में भरे पड़े उनके चारणों की उनके प्रति निष्ठाएं अभिभूत करने वाली हैं. वे जब तक सत्ता में हैं, तब तक ये निष्ठाएं कायम रहेंगी, फिर सत्ता बदलेगी तो निष्ठाएं भी बदलेंगी ही. फिलहाल तो वे जैसा चाह रहे, वैसी हेडलाइन बन रही है, ‘ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं, जांच की पूरी सुविधा है, आदि आदि.’

कोरोना तुरन्त मारता है, दो-चार दिनों में आदमी मरने की हालत में पहुंच सकता है. बेरोजगारी जल्दी मारती नहीं, घुट-घुट कर आदमी मरता ह. वे न कोरोना से मुकाबले में खुद को तत्पर शासक साबित कर सके, न बेरोजगारी से मुकाबले में कर सके.

वे बंगाल चुनाव में अपनी महारत जरूर साबित करेंगे. सरकार न भी बना सके तब भी, पिछली बार की तीन सीटों से बहुत बहुत आगे वे जरूर बढ़ेंगे, इसमें वे और उनके सिपहसालार बहुत कुशल हैं.

लेकिन, जीवन से जुड़े सवालों, जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों में उनका फिसड्डी साबित होना इस देश के लिये बहुत भारी पड़ा है. कोरोना तो एक प्रत्यक्ष उदाहरण मात्र है, क्योंकि इसकी त्रासदी सर्वत्र नजर आ रही है. शासन संबंधी उनकी अयोग्यता और उनका अहंकार इस देश के आम लोगों के जीवन पर कितना भारी पड़ा है, इसका आकलन समय करेगा.

मोदी-शाह की हार का पहला और त्वरित निष्कर्ष : बंगाल तो ढलान का संकेत मात्र है

जीत तय होने के बाद ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया थी, ‘बंगाल ने देश को बचा लिया है…’. बावजूद इसके कि अपने 10 वर्षों के शासन में उन्होंने कोई बहुत शानदार उदाहरण प्रस्तुत नहीं किये, उनकी लगातार तीसरी जीत हुई. यह उनकी जीत से अधिक भाजपा के प्रति नकार है.

महत्व इसका नहीं है कि भाजपा 3 से 76 तक पहुंच गई. महत्व इसका है कि ‘बंगाल विजय’ के अभियान में वह औंधे मुंह गिरी, क्योंकि किसी एक राज्य पर कब्जे के लिये इतने जतन का अतीत में कोई उदाहरण नहीं मिलता.

भाजपा अगर बंगाल में जीत जाती तो यह उसकी राजनीतिक सफलता का एक शानदार अध्याय होता और इस बात का संकेत भी कि मोदी-शाह की जोड़ी को अभी और भी नए मुकाम तय करने हैं. लेकिन, हार का पहला और त्वरित निष्कर्ष यह है कि ढलान आ पहुंची है. मोदी-शाह की जोड़ी के अश्वमेध का घोड़ा अब ठिठकने वाला है. वे अपना शिखर देख चुके हैं.

ममता के खिलाफ असन्तोष मामूली नहीं था. अगर कोई सामान्य चुनाव होता तो उनकी पार्टी इतनी बड़ी जीत तो हासिल नहीं ही करती लेकिन, यह ऐसा चुनाव था जिससे कई सैद्धांतिक सवाल जुड़ गए थे. मसलन, क्या बंगाल भी भाजपा छाप ध्रुवीकरण की राजनीतिक राह पकड़ लेगा ? क्या बांग्ला उपराष्ट्रवाद पर मोदी ब्रांड राष्ट्रवाद हावी हो जाएगा ? क्या बंगाल का ‘भद्रलोक’ भी बिहार-यूपी के ‘सम्भ्रांत’ लोगों की तरह विचारहीनता का उत्सव मनाएगा  ? जवाब मिल गए हैं.

पहला जवाब तो यही है कि भाजपा अतीत की कांग्रेस नहीं बन सकती जिसका प्रभाव कभी यूपी से तमिलनाडु और गुजरात से बंगाल तक था. कांग्रेस की ऐसी व्यापकता स्वाधीनता आंदोलन में उसकी देशव्यापी भूमिका की देन थी, बाद में नेहरू और इंदिरा की देशव्यापी स्वीकार्यता की देन थी.
दूसरा जवाब यह है कि मोदी ब्रांड राष्ट्रवाद देशव्यापी नहीं हो सकता, न ही इस देश पर कोई दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ सकता है.

राष्ट्रवाद और संस्कृतिवाद की भाजपा ब्रांड परिभाषाएं इस देश के मिजाज से मेल नहीं खातीं. कभी न कभी इनकी सीमाएं सामने आनी थी, आने लगी हैं.
सघन प्रयासों के बावजूद केरल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में भाजपा कोई उल्लेखनीय भूमिका हासिल नहीं कर सकी. यह उसकी स्वीकार्यता के सीमित होने के स्पष्ट संकेत हैं.

कोई पार्टी यह उम्मीद नहीं कर सकती कि हिन्दी क्षेत्र के राज्य लगातार उसे इतना समर्थन देते रहेंगे. बिहार-यूपी जैसे राज्यों में 90 प्रतिशत लोकसभा सीटें जीत लेना किसी राजनीतिक उबाल का ही परिणाम हो सकता है. ऐसा राजनीतिक उबाल, जो सामूहिक भावनात्मक उबाल में तब्दील हो जाए.
ऐसे उबाल एक दो बार से अधिक नहीं आते. वो मुहावरा है न…’काठ की हांडी वाली.’

कांग्रेस जब उत्तर में डूबने लगी तो आंध्र-कर्नाटक आदि ने उसे सहारा दिया था. उसकी व्यापकता और देशव्यापी स्वीकार्यता ने उसके सिमटने की गति को बेहद मद्धिम बनाए रखा. भाजपा तेजी से सिमटेगी.

यह थोथा और प्रायोजित मिथक कि विकल्प कहां है, किसी बियाबान में औंधा पड़ा मिलेगा क्योंकि बात अब विकल्प की तलाश से अधिक सत्तासीन व्यक्ति को खारिज करने की है. लोकतंत्र कभी विकल्पहीन नहीं होता. इस तरह के विमर्श सदैव प्रायोजित ही होते हैं. कभी कांग्रेसी भी ऐसा कहते इतराते थे.

बंगाल में मुख्य और एकमात्र विपक्ष बन जाना भाजपा की सफलता है, लेकिन जब दांव ऊंचे हों तो ऐसी बौनी सफलताएं उत्साह नहीं जगाती.
ममता बनर्जी इतनी बड़ी जीत से खुद भी अचरज में होंगी. अगर वाम दलों और कांग्रेस के बचे-खुचे प्रतिबद्ध वोटरों ने भी उन्हें वोट किया है तो यह बंगाल के मानस में भाजपा ब्रांड राजनीति के प्रति नकार का उदाहरण है.
हालांकि, बंगाल की धरती पर यह द्वंद्व अभी चलेगा. मुख्य विपक्ष भाजपा है तो उसके अपने आग्रह होंगे, अपनी शैली होगी.

लेकिन, जैसे ही हिन्दी क्षेत्र में इसका सिमटना शुरू होगा, बंगाली भाजपाई खुद ब खुद बेचैन होंगे, क्योंकि उनमें अधिकतर इस राजनीतिक संस्कृति में दीर्घकालीन तौर पर फिट नहीं होंगे. जिस यूपी ने मोदी-शाह की जोड़ी की राजनीतिक विजय-गाथा की भूमिका लिखी है, वही उनके पराभव का उपसंहार भी लिखेगा, बंगाल तो ढलान का संकेत मात्र है.

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