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पिछड़ा और दकियानूसी विचार यानी हिंदुत्व सांप्रदायिक उन्माद

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 25, 2022
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पिछड़ा और दकियानूसी विचार यानी हिंदुत्व सांप्रदायिक उन्माद

प्रियदर्शन,  एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर, NDTV इंडिया

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 312 सीटें मिलीं- किसी भी चुनाव सर्वेक्षण और एग्ज़िट पोल से ज़्यादा. ऐसी बंपर कामयाबी की उम्मीद किसी ने नहीं की थी. लेकिन बीजेपी इन 312 विधायकों में किसी को मुख्यमंत्री नहीं बना सकी. मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ, जो तब सांसद थे और जिनको पूर्वांचल का मोदी कहा जाता था.

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याद करने लायक तथ्य यह भी है कि बाद में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल बनाए गए मनोज सिन्हा यूपी के मुख्यमंत्री पद की दौड़ में आगे ही नहीं थे, बल्कि उनके घर मिठाइयां बंटनी शुरू हो गई थीं. लेकिन बीजेपी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने लगभग अंगद की तरह पांव अड़ा कर दूसरों का रास्ता रोक दिया और खुद मुख्यमंत्री बन गए. दावा यह था कि यूपी की विराट जीत में उनका योगदान सबसे बड़ा है.

लेकिन 2017 अगर एक अवसर था तो 2022 एक चुनौती है. इस चुनौती की एक बड़ी विडंबना ये है कि जिस कार्यकाल में राम मंदिर के निर्माण का आंदोलन एक निर्णायक परिणति तक पहुंचा, जिस कार्यकाल में लव जेहाद, गोवध जैसे मुद्दे छाए रहे, जिस कार्यकाल में काशी विश्वनाथ के पुनरुद्धार का कारोबार चला, उसमें भी न योगी आदित्यनाथ ख़ुद को निष्कंटक पा रहे हैं और न प्रधानमंत्री मोदी.

यही नहीं, जो लोग यूपी में बीजेपी के आगमन की संभावना देखते हुए 2017 में धड़ाधड़ बीजेपी में शामिल हो रहे थे, वे अब हवा उल्टी बहती देखकर दूसरी तरफ़ खिसक रहे हैं. ये अवसरवादी हो सकते हैं, महत्वाकांक्षी हो सकते हैं, लेकिन ये हवाओं को सूंघने वाले लोग हैं और इन्हें पता है कि इस बार राष्ट्रवाद का फूल खिलने की संभावना कितनी है और समाजवाद की साइकिल कितनी दूर तक जा सकती है.

दूसरी बात यह कि इस दौर में बीजेपी का साथ वे नेता छोड़ रहे हैं जिनके साथ बीजेपी के खेमे में गैरयादव पिछड़ी जातियों का वोट आया था. इनकी एकमुश्त ‘घर वापसी’ यह संदेश दे सकती है कि बीजेपी पिछड़े समुदायों के साथ राजनीतिक न्याय नहीं कर रही. आख़िर बीते कुछ दिन में योगी सरकार के तीन मंत्री इस्तीफ़ा दे चुके हैं और आधा दर्जन से ज़्यादा विधायक- और सबने एक ही वजह बताई कि बीजेपी सरकार दलितों, पिछड़ों, कमज़ोर तबकों की अनदेखी कर रही है.

लेकिन यह हवा बनी कैसे ? नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की डबल इंजन सरकार वह ऊर्जा क्यों नहीं पैदा कर सकी जिससे उनकी ट्रेन बिल्कुल आश्वस्त ढंग से 2022 का स्टेशन पार कर पाए ? निश्चय ही इसकी एक वजह वह किसान आंदोलन है जिससे निबटने में केंद्र सरकार बुरी तरह नाकाम रही. रही-सही कसर बीजेपी के अहंकारी रवैये ने पूरी कर दी.

दूसरी बात यह कि किसान आंदोलन के दौरान हासिल लोकतांत्रिक समझ ने यूपी के किसानों को बहुत दूर तक जोड़ दिया है. वहां जाति और धर्म के कठघरे नहीं बचे हैं, ये कहना तो नादानी होगी, लेकिन ऐसा लग रहा है कि इन कठघरों के नाम पर किसान सबकुछ दांव पर लगाने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने देखा है कि उनके ही वोट से बनी सरकार उनके प्रति कितनी ग़ैरजवाबदेह हो सकती है.

ऐसे में बीजेपी फिर अपने उसी रामबाण तक लौट रही है जिसके सहारे उसने अब तक दुश्मनों को बेसुध किया है. वह तरह-तरह से नफरत की राजनीति कर रही है. धर्म संसद में पूरी तरह सांप्रदायिक, असंवैधानिक और अमानवीय वक्तव्य देने वाले तथाकथित संतों का संरक्षण इसी राजनीति का हिस्सा है. इसका संदेश साफ़ है- घृणा से जुड़ी बयानबाज़ी दूसरों के लिए निषिद्ध है बीजेपी और संघ के समर्थकों के लिए नहीं.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तक के दख़ल के बावजूद बस दो लोगों को गिरफ़्तार किया गया. इनमें से एक वह वसीम रिज़वी हैं जिन्होंने हाल में धर्म परिवर्तन कराया है और दूसरे वे यति नरसिंहानंद हैं जिन पर महिलाओं को लेकर अभद्र भाषा के इस्तेमाल का भी आरोप है. उन्हें दरअसल गिरफ़्तार इसी आरोप में किया गया था, बाद में हरिद्वार के नफ़रती भाषण का मामला इसमें जोड़ा गया. लेकिन इसी सम्मेलन में जिन तथाकथित संतों के ज़हरीले भाषणों के वीडियो घूम रहे हैं, वे अब भी सीना तान कर घूम रहे हैं कि सरकार में हिम्मत है तो उन्हें गिरफ़्तार करे.

ऐसा नहीं कि सरकार के पास हिम्मत नहीं है, लेकिन दरअसल उसकी नीयत ही नहीं है. उसे पता है कि ये मामले जितना ज़ोर पकड़ेंगे, इसकी प्रतिक्रिया में जो जोशीले भाषण होंगे, उनका राजनीतिक लाभ बीजेपी को ही मिलेगा. अगर ऐसे जोशीले भाषण न भी सुनने को मिलें तो भी लाभ बीजेपी को ही होगा, क्योंकि इससे यह संदेश जाएगा कि बीजेपी सरकार ने अल्पसंख्यकों को डरा कर रख दिया है. लोनी के विधायक नरेश गुर्जर भी जो भाषा बोल रहे हैं, वह चुनाव की आचार संहिता का नहीं, भारतीयता की आचार संहिता का उल्लंघन है. लेकिन बीजेपी ऐसे लोगों को सम्मानित या संरक्षित करती रही है, इसके उदाहरण अतीत में कई हैं.

धार्मिक घृणा की राजनीति का दूसरा पहलू बीजेपी का यह आरोप है कि सपा और कांग्रेस हिंदूविरोधी राजनीति कर रहे हैं. उनकी ओर से पेश किया जा रहा इस आरोप का प्रमाण यह है कि सपा ने नाहिद हसन जैसे दागी नेताओं को टिकट दिया है और कांग्रेस को तौक़ीर रज़ा जैसे विवादास्पद बयान देने वाले नेता के साथ दिखने में परहेज नहीं है.

बेशक, राजनीतिक टकराव की ज़हरीली भाषा में प्रतियोगिता करने की कोशिश में इन नेताओं के अपने अतिरेकी रुख रहे हैं, लेकिन बीजेपी यहां दोहरा खेल खेलती है. वह अपने साधु-संतों की बात को-जो खुलकर अल्पसंख्यकों के संहार की बात कर रहे हैं और इसके लिए आधुनिक हथियार जुटाने तक की ज़रूरत समझा रहे हैं- उचित ही व्यापक हिंदू समाज की बात नहीं मानती, लेकिन दूसरी तरफ़ वह दूसरे बड़बोले बयान देने वालों को उनके धर्म से जोड़ कर देखती है.

यही सच राजनीति के अपराधीकरण के उसके आरोप का है. उसे अपने दाग़ी दिखाई नहीं पड़ते, सपा-बसपा के दिखते हैं. बल्कि उसे राजनीति के अपराधीकरण में अपना वह हिस्सा भी नहीं दिखता जो अटल-आडवाणी के धवल माने जाने वाले व्यक्तित्वों की छाया में रहते हुए था. यह 1998 का साल था, जब कल्याण सिंह सरकार में पहली बार एक साथ कई दाग़ी नेताओं को- दुर्दांत अपराधियों को भी- मंत्री बनाया गया. उसके बाद से ये सिलसिला लगातार बड़ा होता चला गया.

बहरहाल, इस तर्क से सपा या कांग्रेस का बचाव नहीं किया जा सकता. अगर यूपी को वैकल्पिक राजनीति देनी है तो उसे सांप्रदायिकता से भी मुक्त करना होगा और अपराधीकरण से भी. जिस तीसरी बीमारी की चर्चा कोई नहीं करता, वह चुनावी राजनीति में पैसे का बढ़ता प्रभुत्व है. इन तीनों बीमारियों से मुक्त हुए बिना नेता पार्टियां बदलते रहेंगे, राजनीति के गठजोड़ नई शक्ल हासिल करते रहेंगे और कभी सरकार भी बदल गई तो हालात नहीं बदलेंगे. आख़िर मायावती और अखिलेश यादव के लगातार दो पूरे कार्यकालों के बावजूद सांप्रदायिकता की राजनीति यूपी में बची ही नहीं रही, उसने बिल्कुल ऐसी विस्फोटक वापसी की कि अब बिल्कुल दुर्निवार नज़र आती है.

निस्संदेह इस लिहाज से यूपी में कांग्रेस की पहल फिर भी स्वागतयोग्य लगती है. अकेले चुनाव लड़ने का उसका फ़ैसला तात्कालिक फ़ायदे के लिहाज से भले कुछ अव्यावहारिक लगे, लेकिन अगर उसे वापसी करनी है तो कुछ समय अकेले चलना होगा. यही नहीं, प्रियंका गांधी ने 40 फ़ीसदी टिकट महिलाओं को देने का फ़ैसला कर जो बड़ी लकीर खींची है, वह पूरी राजनीति को बदलने का काम कर सकती है.

यह हिसाब लगाना फिज़ूल है कि इस फ़ैसले से कांग्रेस को लाभ होगा या नुक़सान या कांग्रेस को फ़ायदा होगा तो वोट बीजेपी के कटेंगे या सपा के- क्योंकि अंततः बहुत तात्कालिक लक्ष्यों को लेकर बड़ी राजनीति नहीं की जा सकती. बेशक, अभी यह नई शुरुआत है जिसमें बहुत सारा कुछ जोड़ने की भी चुनौती है और इस चुनौती की राह में उनके अपने भी लोग बाधक होंगे, लेकिन नई कांग्रेस अगर बनेगी तो पुरानी कांग्रेस की जर्जर हो चुकी इमारत को लगभग तोड़कर ही.

बहरहाल, यह सावधान रहने की घड़ी है. जातिगत समीकरण की काट में धार्मिक उन्माद को लगातार दी जा रही हवा फिर से माहौल प्रदूषित कर सकती है. जबकि इन चुनावों में एक सकारात्मक चुनाव का सवाल फिलहाल काफ़ी चुनौती भरा है-यूपी के लिए भी और बाक़ी राजनीति के लिए भी. इससे बड़ी चुनौती इस देश के उस साझा पर्यावरण को बनाए रखने की है जो तरह-तरह की सांस्कृतिक-धार्मिक हवाओं से मिल कर बना है और जिस पर हम अब तक नाज़ करते रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिल्कुल सही कहा कि अतीत की भूलों को सुधारना चाहिए. लेकिन अतीत की भूलों को सुधारने का क्या मतलब होता है ? क्या किसी नेता की मूर्ति को कहीं लगा देना ही अतीत की भूलों का सुधार है ? क्या सुभाष चंद्र बोस इतिहास के ऐसे उपेक्षित चरित्र हैं जिन्हें अब बीजेपी सामने लाने की कृपा कर रही है ?

आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के अलावा जिन बड़े नेताओं का एक सांस में ज़िक्र होता है, उनमें सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद सबसे ऊपर आते हैं. इस लिहाज से बोस को बीजेपी की कृपा की कोई ज़रूरत नहीं है. यह देश कभी इतना कृतघ्न नहीं रहा कि वह बीजेपी के सत्ता में आए बिना बोस को याद नहीं करता. इस देश में बोस की प्रतिष्ठा इंडिया गेट पर किसी छतरी के नीचे खड़ी मूर्ति की मोहताज नहीं है. उसे इस तरह पेश करना दरअसल सुभाष चंद्र बोस का भी अपमान है और इस देश की साझा स्मृति का भी.

सुभाष चंद्र बोस इस देश में आज़ादी के बाद के सबसे बड़े किंवदंती पुरुष रहे. बरसों तक इस देश के लाखों लोग प्रतीक्षा करते रहे कि बोस एक दिन प्रगट होंगे और देश का नव-निर्माण करेंगे. उनकी मृत्यु के रहस्य को लेकर कई कमेटियों और आयोगों का गठन किया गया. जाहिर है, बोस इस देश की स्मृति में किसी लौह-पत्थर की तरह खुदे हुए हैं.

बीजेपी को न यह बात समझ में आती है और न बोस समझ में आते हैं. वह चंद्रशेखर, बोस जैसे भीष्म व्यक्तित्व के पीछे छुप कर शिखंडी की तरह कांग्रेस पर वार करना चाहती है. लेकिन जब-जब बोस का कोई रहस्य खुलता है तो बीजेपी की कलई खुलती है.

कुछ साल पहले जब सुभाषचंद्र बोस के गोपनीय दस्तावेज़ सामने आए तो यह हल्ला उड़ा कि अब नेहरू की पोल खुलेगी. उनके नाम से एक जाली चिट्ठी भी चला दी गई कि नेहरू ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को लिखा था कि बोस युद्ध अपराधी हैं. एक जाने-माने अंग्रेज़ी अख़बार ने यह चिट्ठी छाप भी दी- बिना यह देखे कि इसमें भाषा की वैसी भूलें हैं जैसी नेहरू किसी हाल में नहीं करते. उल्टे यह बात सामने आई कि सुभाष चंद्र बोस की पत्नी के लिए नेहरू ने मासिक पेंशन की व्यवस्था करवाई थी.

इसमें शक नहीं कि स्वाधीनता संग्राम के दौरान गांधी और नेहरू से सुभाषचंद्र बोस की असहमतियां रहीं और वे तीखे मोड़ तक भी गईं. लेकिन उस दौर के बड़े नेताओं में ऐसी असहमतियां आम थी. वे गांधी और नेहरू के बीच भी थीं, गांधी और अंबेडकर के बीच कहीं ज़्यादा तीखी थीं और नेहरू और पटेल के बीच भी थी. खासकर बोस के जर्मनी जाकर हिटलर से मदद मांगने का ख़याल किसी को रास नहीं आ रहा था. लेकिन ये सब नेता एक-दूसरे का सम्मान भी करते थे और सुभाष चंद्र बोस इसके अपवाद नहीं थे. मगर जब ये नेता आपस में टकरा रहे थे या एक साथ काम कर रहे थे तो बीजेपी और संघ परिवार के पुरखे क्या कर रहे थे ? उनके बारे में सुभाष चंद्र बोस और अंबेडकर की, गांधी और नेहरू की, भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद की क्या राय थी ?

इस मोड़ पर अतीत की भूलों को सुधारने में लगी बीजेपी से पूछने की तबीयत होती है-क्या उसे मालूम है कि बोस की हिंदूवादी विचारधारा के बारे में क्या राय थी ? या अंबेडकर हिंदू धर्म के बारे में क्या सोचते थे ? या भगत सिंह सांप्रदायिक राजनीति के बारे में क्या राय रखते थे ? सोशल मीडिया पर रजनीश तिवारी ने सुभाष चंद्र बोस के कलेक्टेड वर्क्स के तीसरे खंड का एक हिस्सा उद्धृत किया है. बोस लिखते हैं –

‘सांप्रदायिकता ने पूरे नंगेपन के साथ अपना कुरूप चेहरा दिखा दिया है. यहां तक कि दलित, ग़रीब और अज्ञानी लोग भी स्वंतंत्रता के लिए बेचैन हैं. हम भारत में बहुसंख्यक हिंदू आबादी का हवाला देते हुए हिंदू राज की आवाज़ें सुन रहे हैं. ये बेकार के विचार हैं. क्या सांप्रदायिक संगठन कामगार वर्ग द्वारा झेली जा रही किसी समस्या का हल देते हैं? क्या किसी भी ऐसे संगठन के पास बेरोज़गारी और गरीबी को लेकर कोई जवाब है?…. हिंदू महासभा और सावरकर की सूझ का मतलब व्यवहार में अंग्रेज़ों से सांठगांठ है.’

क्या ऐसा नहीं लगता कि सुभाष चंद्र बोस चालीस के दशक की नहीं, मौजूदा राजनीति की बात कर रहे हैं ? अगर आज कोई भक्त इसे पढ़ ले और उसे पता न हो कि यह बोस ने लिखा है तो वह इसके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कराने चला जाए और प्रधानमंत्री-गृहमंत्री भी इसे सरकार को बदनाम करने की साज़िश मान लें. इसके पहले सुभाषचंद्र बोस फॉरवर्ड ब्लॉक की पत्रिका में लिख चुके थे कि उन्होंने हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे सांप्रदायिक संगठनों के लोगों के कांग्रेस की सदस्यता लेने पर पाबंदी लगा दी है.

क्या बीजेपी बोस की मूर्ति ही पूजेगी या उनके विचारों से शर्मिंदा होकर खुद को भी बदलेगी ? बोस को छोड़ें, अंबेडकर को देखें. अंबेडकर का तो विपुल साहित्य पूरे हिंदू धर्म को प्रश्नांकित करता है और कहता है कि इसको नष्ट हो जाना चाहिए. ‘द ऐनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ में भी बाबा साहेब अंबेडकर विस्तार से यह चर्चा करते हैं कि किस तरह हिंदू धर्म दरअसल मुसलमानों के ख़िलाफ़ एकजुट होने भर का नाम है, कि जातिविहीन किसी हिंदू धर्म की कल्पना नहीं की जा सकती, कि अगर जाति को नष्ट करना है तो हिंदुत्व को नष्ट करना होगा.

क्या बीजेपी को ऐसे सुभाष चंद्र बोस और बाबा साहेब अंबेडकर मंज़ूर हैं ? क्या उसे ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ जैसा लेख लिखने वाले भगत सिंह स्वीकार्य हैं ? या यह उसका पाखंड है ? उसे लगता है कि उसके जिस विचार को भारतीय जनता व्यापक तौर पर स्वीकृति नहीं देती, उसे वह इन व्यक्तित्वों की आड़ में थोपने की कोशिश करे तो उसकी बात बन जाएगी. बेशक, वह बात बनती भी दिख रही है.

लोगों को मूर्तियां और उनकी भव्यता याद है, वे ज़रूरी विचार भुला दिए गए हैं जिन्होंने इस देश को बनाया, इस देश का विचार बनाया. बीजेपी को पता है कि महात्मा गांधी पर हमला आसान नहीं है, इसलिए वह उनके आगे सिर झुकाती है, लेकिन नाथूराम गोडसे की फौज भी धीरे-धीरे तैयार करती चलती है जो ऐसे संभावित गांधियों को बनने के पहले ही वैचारिक तौर पर नष्ट करने की कोशिश करें.

इस सत्योत्तर दौर में उसकी सोशल मीडिया आर्मी पूरी ताकत से इस काम में लगी हुई है. वह पटेल को पटेल नहीं रहने दे रही, बोस को बोस नहीं रहने दे रही, अंबेडकर को अंबेडकर नहीं रहने दे रही, राम को भी राम नहीं रहने दे रही है और हिंदुस्तान को हिंदुस्तान नहीं रहने दे रही. क्योंकि यह सब रहेंगे तो वह पिछड़ा और दकियानूसी विचार नहीं रहेगा, जिसका नाम हिंदुत्व है और जिसे भव्य मंदिरों और मूर्तियों में ही सभ्यता और संस्कृति दिखाई पड़ती है. सुभाष चंद्र बोस इस देश के एक तेजस्वी नेता का नाम है, किसी जड़ मूर्ति का नहीं. बीजेपी और सरकार का यह खेल जनता को जल्द समझना होगा.

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