Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

बहसबाजी के अड्डेवाली व्यवस्था को धता बताकर जनता के द्वारा स्थापित विकल्प की ओर क्यों न बढ़ें ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 18, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

बहसबाजी के अड्डेवाली व्यवस्था को धता बताकर जनता के द्वारा स्थापित विकल्प की ओर क्यों न बढ़ें ?

संजय श्याम

साम्राज्यवादी डाकुओं की बढ़ती लूट, देशी सरमायेदारों की फूलती थैलियां, मेहनतकशों की बढ़ती तबाही, बेरोजगारी, आसमान छूती मंहगाई, छंटनी-तालाबन्दी, तबाही-बर्बादी, काले कानून, लाठी, गोली का प्रजातंत्र, बिकता न्याय, अराजकता, लूटपाट, गुण्डागर्दी, दलाली, कमीशनखोरी, भ्रष्टाचार, मंडल-कमंडल, दंगे-फसाद, भ्रष्ट सरकार, झूठी संसद, नपुंसक विरोध् के बीच शुरू हुआ है बिहार विधानसभा, 2020 का चुनाव.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

दरअसल तमाम संसदीय चुनाव देशी-पूंजीपतियों, इजारेदारों और बड़े-बड़े व्यापारियों के बीच की स्पर्धा है, पूंजीवादी लूट-छूट-भोग और शोषण-शासन की मजबूती एवं उसकी निरंतरता को कायम रखने की एक राजनीतिक तिकड़म का नाम ससंदीय चुनाव है, जिसके द्वारा दलाल नौकरशाह और पूंजीपति वर्ग समूह के बीच एक होड़ होती है कि अपने व्यवसाय को चमकाने के लिए कौन पूंजीपति कितनी पार्टियों को खरीदकर उसके साथ अपना आर्थिक तालमेल बैठा सकता है ? ताकि संसदीय सरकार में उसका गहरा राजनैतिक पैठ कायम हो सके जबकि दशकों से चुनावी जाल में फंसकर आम जनता निरतंर भय, भूख, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, कुशिक्षा, कर्ज, राहत, अनुदान और भ्रष्टाचार की ज्वाला में झुलसकर मरने के लिए अभिशप्त है.

जरा गौर कीजिए, आज के नेताओं, सांसदों, विधायकों और नौकरशाहों के ठाठ-बाट पर. इनके बंगले, कोठियां, ध्न-सम्पत्ति, भोग का सारा सामान, बंदूकें, गाड़ियां, अर्दली, चपरासी, अंगरक्षक, नौकर-नौकरानी और अनेक तरह की सरकारी सुविधएं क्या ये सब इनकी मेहनत-मशक्कत की कमाई है ? नहीं, ये सब जनता का गाढ़ी कमाई, रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी और दलाली का हिस्सा है. आम जनता का जीवन गुलाम से भी बदतर है. उसके जीवन के हर मोड़ पर शोषण, अत्याचार, कंगाली, बीमारी और मौत खड़ी है.

देखिए और सोचिए, चुनाव को महापर्व बतानेवाला यह तथाकथित लोकतंत्र कितना महान है ? जनता कंगाल और नेता मालामाल. वर्तमान चुनाव में खर्च का सरकारी आंकड़ा 625 करोड़ का है. चुनाव आयोग के अनुसार एक प्रत्याशी अपने चुनाव अभियान में अध्कितम 28 लाख रूपया खर्च कर सकेगा लेकिन जमीनी सच्चाई क्या है ? करोड़ों में टिकटों की खरीदारी से लेकर पूरे चुनाव प्रचार में पैसे का जो नंगा नाच होता है, क्या वह शर्मसार करनेवाला दृश्य नहीं है ? चुनावी पहरेदारी के लिए सबसे अध्कि खर्च सेना-पुलिस की तैनाती पर होगा. जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई की इतनी बड़ी रकम पानी की तरह खर्च करके राज्य और देश को कर्ज में डुबोनेवाला कोई भी क्या कभी भी जनहितैषी या सच्चा जनप्रतिनिध् िबन सकता है ?

साफ है कि यह विधान सभा चुनाव भी अन्य संसदीय चुनावों की तरह धनवानों का एक राजनीतिक व्यापार ही है जो जनता को अहसास कराता है कि वे मतदान के लिए स्वतंत्र हैं और यह उनका अपना लोकतंत्र है परन्तु, दो और दो चार की तरह साफ हो चुका है कि चुनाव द्वारा चुने गये उम्मीदवार किसी भी प्रकार से आम जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते बल्कि पूंजीपतियों, सामन्तों और साम्राज्यवादियों का सेवा दास बनकर उनके विशेषाधिकरों की रक्षा में लिप्त रहते हैं. सत्ता के डंडे से ‘लोक’ को हांकना, लोकतंत्र नहीं हो सकता. आज लोकतंत्र से ‘लोक’ गायब है, सिर्फ तंत्र रह गया है. भ्रष्टों का तंत्र – भ्रष्टतंत्र.

वास्तविकता तो यह कि लोकतंत्र एवं जनवादी भावना का इस चुनावी राजनीति से कोई संबंध नहीं है. यह जनता में अलगाव और विभेद पैदा करता है. तमाम चुनावी पार्टियां समाज में फूट डालने और अपना वोट बैंक बनाने में लिप्त हैं. एक जाति को दूसरी जाति के खिलाफ तथा एक धर्म को दूसरे धर्म के खिलाफ भड़काकर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है. अगड़े-पिछड़े का भेद चरम पर है. लोकतंत्र की भावना खण्ड-खण्ड हो रही है. अद्धर्सामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक, दलाल पूंजीवादी ढांचे पर खड़ा वर्तमान संसदीय तंत्र, धेखातंत्र के अलावा और क्या है ? सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए अन्यायपूर्ण व्यवस्था को जड़-मूल समेत ध्वस्त कर वर्ग हित की स्थापना के लिए वर्ग-संघर्ष आवश्यक है.

देश की जनता एक नये वैकल्पिक समाज व्यवस्था के लिए लालायित है जो हर मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देने में सहायक हो. वह नया समाज ऊंच-नीच और धनिक-गरीबों में बंटा वर्ग समाज के आंतरिक विरोधों एवं प्रतिस्पर्धाओं पर आधरित न होकर सामाजिक सहयोग पर आधारित हो. आज की संसदीय व्यवस्था सामाजिक उत्पादन, देश की श्रमशक्ति, हमारी समझ, सामाजिक विचारों और समाज के हर चीज को खरीद-पफरोख्त का केन्द्र बिन्दु बना रही है. देश की अर्थव्यवस्था को विनाश की ओर धकेलनेवाली भूमण्डलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की नीतियों से बचने के लिए वर्तमान आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन ही विकल्प है ताकि आर्थिक संसाधनों, उत्पादन और वितरण पर बहुसंख्यक जनता के हित, आवश्यकता एवं संरक्षा को ध्यान में रखकर किया जाए.

ऐसी व्यवस्था कायम हो जिसमें सत्ता एवं समाज के संचालकों तथा प्रबंध कार्यकर्ताओं को आम जनता के नियंत्रण में रहकर काम करने की पद्धति हो. सामाजिक अन्तरविरोधों और झगड़ों को निपटाने के लिए जन-अदालतों का निर्माण हो, जिसमें अदालतों, वकीलों और जजों के मंहगे और नौकरशाही के धौंस से छुटकारा मिल सके. देश के कई भागों में जहां संगठित रूप से क्रांतिकारी आन्दोलन जारी है, वहां की जनता ने वैकल्पिक व्यवस्था कायम कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है. उन इलाकों में जनता सत्ता के द्वारा गांवों के विकास कार्य, खेती-बाड़ी का विकास, शिक्षा एवं स्वास्थ्य केन्द्रों का विकास, बीज बैंक बनाने, सिंचाई व्यवस्था विकसित करने, परस्पर आर्थिक सहयोग करने, तालाबों का निर्माण करने, वनों की रक्षा करने, यातायात साधनों को विकसित करने, सहकारी संस्थाओं का निर्माण करने, क्षेत्र की सुरक्षा करने, न्याय की उन्नत व्यवस्था आदि का काम अलग-अलग कमिटियों को जिम्मेवारियां बांटकर किया जाता है.

तो फिर हम बहसबाजी के अड्डेवाली व्यवस्था को धता बताकर जनता के द्वारा स्थापित विकल्प की ओर क्यों न बढ़ें ?

Read Also –

लोगों की चीत्कारों पर मोदी का जश्न ‘अभूतपूर्व मिसाल’ है
प्रतिवाद की जनतांत्रिक आवाजों पर दमन ‘सब याद रखा जाएगा…’
48 हजार झुग्गियों को उजाड़ने का आदेश देने वाला कलंकित सुप्रीम कोर्ट जज अरूण मिश्रा
मजदूरों की पहचान ‘माईग्रेंट’ के रूप में … ताकि व्यवस्था पर कोई सवाल ना हो
जिन ताकतों की मजबूती बन हम खड़े हैं, वे हमारे बच्चों को बंधुआ बनाने को तत्पर है
किताबों से थर्राती सरकार और न्यायपालिका

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

क्या ओडिशा सरकार ने वेदांता के प्रोजेक्ट विस्तार के लिए जनसुनवाईयों को जल्दबाज़ी में निपटाया ?

Next Post

नवदेवियांं या नवअप्सराएंं ..?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

नवदेवियांं या नवअप्सराएंं ..?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

किसी भी स्तर की सैन्य कार्रवाई से नहीं खत्म हो सकते माओवादी

April 7, 2021

ठोस सबूत, भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र !

October 26, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.