अब सीआईडी जांच ने भी पुष्टि कर दी है चुनाव आयोग के फर्जीबाड़े की
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राजनीति विज्ञानी डॉ लारेंस ब्रिट ने कुछ वर्ष पहले फासिज़्म के बारे में एक लेख लिखा था. (“Fascism Anyone?,” Free Inquiry, Spring 2003, page 20). हिटलर (जर्मनी) , मुसोलिनी (इटली), फ्रैंको (स्पेन) , सुहार्तो (इंडोनेशिया) , और पिनोशे (चिली) के फासिस्ट सरकारों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उन्होंने पाया कि इन सभी राज्य व्यवस्थाओं में चौदह समान लक्षण थे. वह इन्हें फासिज़्म की पहचान के बुनियादी लक्षण कहते हैं. इन चौदह बुनियादी लक्षण में चौदहवां लक्षण छलपूर्ण चुनाव है.
इस छलपूर्ण चुनाव पर डॉ. लारेंस ब्रिट लिखते हैं कि ‘फासीवादी राष्ट्रों में कई बार चुनाव पूर्णतः ढकोसला होते हैं. बाकी समय पर चुनावों का मैनिपुलेशन प्रतिपक्षी सदस्यों के चरित्र हनन, या यहां तक कि हत्या करा मतदान संख्या को या चुनाव क्षेत्र परिसीमन से और मीडिया के मैनिपुलेशन, कानून के सहारे नियंत्रित कर किया जाता है. फासीवादी राष्ट्र चुनावों को तोड़ने-मरोड़ने या नियंत्रित करने के लिए खास तौर पर न्यायपालिका का इस्तेमाल किया जाता है.’
मौजूदा हालात में भारत की मोदी सरकार पर यह तमाम लक्षण पूरी तरह लागू होता है. ख़ासतौर पर छलपूर्ण चुनाव, जिसपर भारत का शैडो प्रधानमंत्री (नेता विपक्ष) राहुल गांधी ने पिछले दिनों पूरी तरह पर्दाफ़ाश करते हुए कहा था कि मोदी सरकार पांच तरीक़े से छलपूर्ण चुनाव कराती है, जो इस प्रकार है -
- डुप्लीकेट मतदाता
- फ़र्ज़ी पते
- फार्म 6 का दुरुपयोग
- एक ही पते पर थोक में मतदाता
- अमान्य तस्वीर
काम करने का ढंग
आलंद तालुका के सारसम्बा गांव में दोपहिया वाहन मैकेनिक, 42 वर्षीय श्रीशैल बरबायी ने बताया कि कैसे उन्हें यह जानकर झटका लगा कि मतदाता सूची से उनका नाम हटाने के लिए एक आवेदन आया था, जिसमें कहा गया था कि वे ‘स्थानांतरित’ हो गए हैं. उनका नाम भाग संख्या 71 (क्रमांक 775) में दर्ज है. उन्होंने कहा, ‘मैं हमेशा से इसी गांव में रहा हूं. मुझे तब पता चला जब बीएलओ जांच करने आया. मुझे समझ नहीं आ रहा कि कोई और मेरा वोट हटाने के लिए आवेदन कैसे कर सकता है.’ सारसम्बा गांव के किसान, 48 वर्षीय काशिम अली की भी यही कहानी है, जिनका नाम भी भाग संख्या 71 (क्रमांक 563) में दर्ज है. उन्होंने बताया कि जब बीएलओ ने 2023 में उनके वोट को हटाने के आवेदन के बारे में पूछा, तो उन्होंने मान लिया कि उनका वोट हटा दिया गया है और उन्होंने 2023 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में वोट नहीं डाला. हालांकि, बीएलओ की रिपोर्ट के आधार पर कि वे उसी पते पर रह रहे हैं, जाली आवेदन खारिज कर दिया गया. दोनों के नाम हटाने के लिए फॉर्म 7 के आवेदन 67 वर्षीय सूर्यकांत गोविंद के नाम से किए गए थे. एक निजी कॉलेज के सेवानिवृत्त प्राचार्य अब सारसम्बा गांव में एक दवा की दुकान चलाते हैं और उसी भाग संख्या 71 (क्रमांक 1) के मतदाता हैं. उन्होंने द हिंदू को बताया, ‘भाग संख्या 71, जहां मैं भी मतदाता हूं, से मतदाता सूची हटाने के लिए मेरे नाम पर नौ आवेदन किए गए थे. मुझे नहीं पता कि बदमाशों ने यह कैसे किया. इन सभी आवेदनों में, जबकि मेरे अन्य प्रमाण, जैसे कि ईपीआईसी नंबर और फोटो, सही हैं, प्रत्येक आवेदन में फ़ोन नंबर अलग-अलग हैं. इनमें से कोई भी मेरा नहीं है.’भारत की चुनावी संरचना में खामियां स्पष्ट दिखाई दे रही हैं
द हिंदू ने अलंद के कई मतदाताओं से बात की, जिनके वोट हटाने की कोशिश की गई या उनके नाम पर जाली आवेदन किए गए. कई मामलों में, पूरे परिवार के वोट हटाने के लिए आवेदन किए गए. उदाहरण के लिए, सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी वीरन्ना होनाशेट्टी ने बताया कि उनके परिवार के आठ वोट हटाने के लिए आवेदन किए गए थे, जिनमें उनकी पत्नी रेवम्मा का वोट भी शामिल है, जो कांग्रेस की सदस्य हैं और जिन्होंने जिला पंचायत का चुनाव लड़ा था. एक पैटर्न यह देखा गया कि वोट हटाने के लिए आवेदक आमतौर पर उस भाग संख्या में पहला मतदाता होता था और दुर्लभ मामलों में, सूची में दूसरा.सुनियोजित ऑपरेशन
यह मामला कर्नाटक पुलिस के आपराधिक जांच विभाग (सीआईडी) को सौंप दिया गया, जहां ढाई साल तक चली जांच के बाद भी मामला ठंडे बस्ते में चला गया. अब तक की जांच में एक जटिल और जटिल जाल का पर्दाफ़ाश हुआ है. फॉर्म 7 के आवेदन राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल (एनवीएसपी), मतदाता हेल्पलाइन ऐप (वीएचए) और चुनाव आयोग के गरुड़ ऐप के ज़रिए किए गए थे. सीआईडी और कर्नाटक के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) के बीच हुए पत्राचार से पता चला है कि सीआईडी ने उन मशीनों और सत्रों के ‘आईपी लॉग (इंटरनेट प्रोटोकॉल लॉग), दिनांक, समय, गंतव्य आईपी और गंतव्य पोर्ट’ मांगे थे जिनके ज़रिए ये जाली आवेदन किए गए थे. जनवरी से अप्रैल 2025 तक सीईओ को लिखे गए सात पत्रों और उससे पहले लिखे गए पाँच पत्रों में, सीआईडी अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने गंतव्य आईपी और गंतव्य बंदरगाहों के लिए एक ही अनुरोध दोहराया था। ‘जांच के दौरान, आईपी लॉग उपलब्ध कराए गए. अवलोकन करने पर गंतव्य आईपी और गंतव्य बंदरगाह गायब पाए गए. इसलिए, संबंधितों को इसे उपलब्ध कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया जाता है,’ द हिंदू द्वारा प्राप्त चार पत्रों में लिखा है. हालांकि, सूत्रों ने बताया कि इस विशिष्ट प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला. गंतव्य आईपी और गंतव्य बंदरगाहों के बिना जांच ठप हो गई. सीआईडी के सूत्रों ने बताया कि सितंबर 2023 में, चुनाव आयोग ने 5,700 से ज़्यादा जाली फ़ॉर्म 7 का डेटा साझा किया. हालांकि 4,400 से ज़्यादा आवेदनों के संबंध में पर्याप्त डेटा मौजूद था, लेकिन बाकी के बारे में अधूरा डेटा था. चुनाव आयोग ने आईपी लॉग के अलावा, चुनाव आयोग के तीन ऐप्स पर लॉगिन आईडी और पासवर्ड बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर भी उपलब्ध कराए, जिनके ज़रिए सभी जाली फ़ॉर्म 7 जमा किए गए थे. एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘हमने दिए गए लॉट में से नौ मोबाइल नंबरों का पता लगा लिया है. ये ज़्यादातर महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के हैं. इन नंबरों के मालिकों का दावा है कि उन्होंने चुनाव आयोग के किसी भी ऐप पर ये अकाउंट नहीं बनाए. इनमें से कई डिजिटल रूप से अनपढ़ हैं.’ सीआईडी ने कथित तौर पर दूरसंचार सेवा प्रदाताओं (टीएसपी) को पत्र लिखकर सार्वजनिक इंटरनेट प्रोटोकॉल डिटेल रिकॉर्ड (आईपीडीआर) प्राप्त किया, जिसमें आईपीवी4 प्रारूप के आईपी पते थे, और प्रत्येक आईपी पते से डायनामिक आईपी पते के रूप में 200 से ज़्यादा उपयोगकर्ता जुड़े हुए थे. सूत्रों के अनुसार, इसका मतलब है कि आठ लाख से ज़्यादा उपकरणों का सत्यापन और जांच की जानी है. आईपी एड्रेस इंटरनेट पर किसी मशीन का एक डिजिटल एड्रेस होता है. इसका इस्तेमाल उस मशीन को ट्रैक करने के लिए किया जा सकता है जिससे कोई खास लेनदेन किया गया था. हालांकि, आईपी हमेशा स्थिर नहीं होते. डायनेमिक आईपी एक अस्थायी एड्रेस होता है जो सर्वर द्वारा किसी मशीन को दिया जाता है. खोज को सीमित करने के लिए, सीआईडी, ईसीआई से गंतव्य आईपी और गंतव्य पोर्ट साझा करने का अनुरोध कर रहा है. गंतव्य आईपी एक विशिष्ट पता होता है जो नेटवर्क के भीतर इच्छित प्राप्तकर्ता को निर्दिष्ट करता है और गंतव्य पोर्ट किसी भी नेटवर्क संचार के लिए एक अंतिम बिंदु होता है, जो अद्वितीय भी होता है. सूत्रों के अनुसार, चूंकि डायनेमिक आईपी के साथ किसी मशीन की जियोलोकेशन करना चुनौतीपूर्ण होता है, इसलिए डेस्टिनेशन आईपी और डेस्टिनेशन पोर्ट्स जासूसों को अपनी खोज को काफ़ी हद तक सीमित करने और इन जाली ऐप्लिकेशन बनाने में इस्तेमाल किए गए उपकरणों का पता लगाने में मदद करेंगे. इससे इस घोटाले के पीछे के दोषियों की पहचान करने में जांच को और आगे बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है. हालांकि, चुनाव आयोग ने अब तक यह डेटा साझा नहीं किया है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘यह एक बेहद जटिल ऑपरेशन है जहां अपराधी तीन स्तरों की अस्पष्टता के पीछे छिपे हैं. तीन ईसीआई ऐप्स में से एक पर लॉगिन आईडी और पासवर्ड बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों के मालिकों को इसकी जानकारी नहीं है. इन लॉगिन आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल करके बनाए गए हज़ारों जाली फ़ॉर्म 7 आवेदनों में डायनेमिक आईपी का इस्तेमाल होता है और हर आवेदन दूसरे मतदाताओं के क्रेडेंशियल्स का दुरुपयोग करता है, जबकि सिर्फ़ मोबाइल नंबर अलग-अलग होते हैं.’ओटीपी सत्यापन पर प्रश्न
कार्यप्रणाली के विश्लेषण से तीनों ईसीआई ऐप्स की सुरक्षा और प्रमाणीकरण पर सवाल उठते हैं. कर्नाटक के सीईओ को लिखे अपने पत्रों में, सीआईडी ने ‘मतदाता/जनता के दृष्टिकोण से एनवीएसपी, वीएचए और गरुड़ ऐप्स के चरण-दर-चरण उपयोग की प्रस्तुति’ मांगी और तीन प्रश्न पूछे -- ‘क्या एनवीएसपी और वीएचए ऐप्स, प्लेटफ़ॉर्म में ओटीपी/मल्टीफ़ैक्टर प्रमाणीकरण सुविधा अपनाई गई है ?
- क्या आवेदन अपलोड करने के लिए भी यही सुविधा उपलब्ध है ?
- क्या ओटीपी जैसा प्रमाणीकरण मौजूद है, और क्या ओटीपी लॉगिन के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर पर भेजा जाता है या आवेदक द्वारा फॉर्म में दिए गए मोबाइल नंबर पर, या दोनों पर ?’
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