रोज़ गाय काटकर खाने वाला शैतान इजराइल दुनिया के पेट पर लात मारा है !
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रोज़ गाय काटकर खाने वाला शैतान इजराइल दुनिया के पेट पर लात मारा है !
इज़राइल में मौजूद विक्षिप्त शैतानी मनोरोगी, न केवल मानवता की परवाह नहीं करते बल्कि दुनिया की 90% आबादी खत्म करना चाहता है. ये शैतानी मनोरोगी दुकान को खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है. अगर इसके खिलाफ आज आवाज नहीं उठाया जाये तो संभव मानव जाति का ही विनाश हो जाये.
मानवता के ये शत्रु पहले युक्रेनी जलेंस्की के रुप में उभरा था और अब इजरायली नेतन्याहू के शक्ल में. ये शैतान अपनी सनक की पूर्ति के लिए जिस तरह दुनियाभर में आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय संकट को पैदा कर दिया है, वह भयावह है. दिलीप खान और इलियास मकदूम का का ये दो लेख यहां प्रस्तुत है.
दिलीप खान लिखते हैं - युद्ध अब ईरान-इज़रायल के बीच नहीं रह गया है. अब यह सीधी अमेरिका-ईरान की लड़ाई बन गई है. इज़रायल अब बैक बेंच पर है. ऐसा कहने के पीछे दो-तीन वजहें हैं.
पहली, आर्थिक मोर्चे पर जो-कुछ भी घट रहा है उसका सबसे ज़्यादा असर अमेरिका के ऊपर पड़ रहा है. मैं इसमें न्यूट्रल और एशियाई देशों को शामिल नहीं कर रहा हूं. इस जंग में जो शरीक पार्टी हैं उनमें अमेरिका के लिए यह बहुत बड़ा मसला है.
ईरान होर्मुज को लेकर अड़ा हुआ है और अमेरिका भी. उसने 2500 सेना की एक और टुकड़ी उधर भेज दी है. आकलन के मुताबिक़ कुल 6000 अमेरिकी सैनिक अब इस इलाक़े में तैनात होंगे. यह सुसाइडल होगा और हो सकता है कि निर्णायक भी.
दूसरी, सैन्य अड्डों और रिफ़्यूलिंग विमानों के निशाना बनने के बाद अब अमेरिका के लिए खाड़ी से ऑपरेट करना मुश्किल हो रहा है.
इराक़ से भी आज सभी नाटो देशों ने अपने-अपने सैनिक वापस बुला लिए हैं. बेस बंद हैं.
अमेरिका डिएगो गार्सिया जैसे द्वीपों पर अपने लाव-लश्कर डाले हुए है. वहां से ऑपरेट करना ख़र्चीला है. ऊपर से ईरान ने डिएगो गार्सिया तक मिसाइल दाग़कर अमेरिका को बहुत बड़ी चेतावनी दी है. इससे पहले, ईरान ने इतिहास में पहली बार F-35 लड़ाकू विमान को भेदने काम किया.
इन दो घटनाओं से अमेरिका हिल गया है और बदले में उसने अब सीधे ईरान की न्यूक्लियर फ़ैसिलिटी को निशाना बनाया है.
तीसरी, अमेरिका परोक्ष रूप से झुकने का संकेत दे रहा है, लेकिन खुलकर नहीं. ईरान ने उसके सामने जो शर्तें रखी हैं, वे अमेरिका के लिए अपमानजनक हैं. अमेरिका सस्ता रास्ता ढूंढ रहा है. मसलन, उसने आज ईरानी तेल से प्रतिबंध हटा दिया, लेकिन ईरान ने कहा कि वह बेचेगा ही नहीं.
कूटनीतिक समाधान अभी बहुत मुश्किल दिख रहा है. इसके लिए किसी बड़ी ताक़त को बीच में आना पड़ेगा. मसलन, चीन. चीन इसलिए, क्योंकि रूस से बातचीत करके ट्रंप ने देख लिया है. चीन का नाम उसने अब तक आधिकारिक तौर पर यह कहते हुए नहीं लिया है कि वह ईरान की मदद कर रहा है.
अलबत्ता होर्मुज खुलवाने के नाम पर जो ट्रंप ने अपील की थी, उसमें अपने साथियों के अलावा चीन को भी संबोधित किया. तो, चीन के रास्ते ही कुछ मुमकिन है.
ट्रंप के डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी ने भी तीन दिन पहले यह कहा था कि युद्ध 4-6 हफ़्ते चल सकता है. यानी अमेरिका इस टाइमलाइन के लिए तैयार है. मामला इसके पार पहुंचने पर अलग शेप लेगा. ट्रंप ने अपना चीन दौरा भी आगे बढ़ा दिया है.
उसने 200 अरब डॉलर का अतिरिक्त बजट भी मांगा है. अमेरिका अभी ‘संक कॉस्ट फ़ैलेसी’ में उलझा है, जैसे कोई जुएबाज़ जुआ खेलते हुए हारता जाता है और हर बाज़ी में इस उम्मीद में ज़्यादा पैसे लगाता जाता है कि एक ही बार में वह भरपाई कर लेगा.
जहां तक बात है इज़रायल की, तो वह इस कोशिश में है कि अमेरिका इसमें उलझा रहे. उसके लिए यह बहुत ज़रूरी है. ज़ायनिस्ट लॉबी ट्रंप को लगातार क़ाबू में किए हुए है. अगर अमेरिका चला जाएगा, तो जिस गति से चीज़ें घट रही हैं उसमें ईरान कुछ ही दिनों में इज़रायल की हालत ख़राब कर देगा. इज़रायल बार-बार इस कोशिश में भी है कि खाड़ी के देश ईरान के ख़िलाफ़ हो जाए.
हालांकि, अब तक न तो इज़रायल को क़ामयाबी मिली है और न ही अमेरिका को, जिसने दुनिया भर के देशों से मदद मांगकर देख ली.
मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि ईरान-इज़रायल के बीच हमलों का सिलसिला कम होगा या रुक जाएगा. वह ऑटो-पायलट मोड पर है. वह चलता ही रहेगा. व्यापक परिदृश्य में अब यह अमेरिका-ईरान की लड़ाई बन गई है.
दिलीप खान
मिडिल ईस्ट में सिर्फ एक हमले ने पूरी टेक इंडस्ट्री को लाइफ सपोर्ट पर डाल दिया. ईरान ने क़तर के हीलियम प्लांट पर बम गिराया. दुनिया की 33% सप्लाई खत्म हो गई. ये हैं वो देश जो अभी नुकसान झेल रहे हैं -
मानवता के ये शत्रु पहले युक्रेनी जलेंस्की के रुप में उभरा था और अब इजरायली नेतन्याहू के शक्ल में. ये शैतान अपनी सनक की पूर्ति के लिए जिस तरह दुनियाभर में आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय संकट को पैदा कर दिया है, वह भयावह है. दिलीप खान और इलियास मकदूम का का ये दो लेख यहां प्रस्तुत है.
दिलीप खान लिखते हैं - युद्ध अब ईरान-इज़रायल के बीच नहीं रह गया है. अब यह सीधी अमेरिका-ईरान की लड़ाई बन गई है. इज़रायल अब बैक बेंच पर है. ऐसा कहने के पीछे दो-तीन वजहें हैं.
पहली, आर्थिक मोर्चे पर जो-कुछ भी घट रहा है उसका सबसे ज़्यादा असर अमेरिका के ऊपर पड़ रहा है. मैं इसमें न्यूट्रल और एशियाई देशों को शामिल नहीं कर रहा हूं. इस जंग में जो शरीक पार्टी हैं उनमें अमेरिका के लिए यह बहुत बड़ा मसला है.
ईरान होर्मुज को लेकर अड़ा हुआ है और अमेरिका भी. उसने 2500 सेना की एक और टुकड़ी उधर भेज दी है. आकलन के मुताबिक़ कुल 6000 अमेरिकी सैनिक अब इस इलाक़े में तैनात होंगे. यह सुसाइडल होगा और हो सकता है कि निर्णायक भी.
दूसरी, सैन्य अड्डों और रिफ़्यूलिंग विमानों के निशाना बनने के बाद अब अमेरिका के लिए खाड़ी से ऑपरेट करना मुश्किल हो रहा है.
इराक़ से भी आज सभी नाटो देशों ने अपने-अपने सैनिक वापस बुला लिए हैं. बेस बंद हैं.
अमेरिका डिएगो गार्सिया जैसे द्वीपों पर अपने लाव-लश्कर डाले हुए है. वहां से ऑपरेट करना ख़र्चीला है. ऊपर से ईरान ने डिएगो गार्सिया तक मिसाइल दाग़कर अमेरिका को बहुत बड़ी चेतावनी दी है. इससे पहले, ईरान ने इतिहास में पहली बार F-35 लड़ाकू विमान को भेदने काम किया.
इन दो घटनाओं से अमेरिका हिल गया है और बदले में उसने अब सीधे ईरान की न्यूक्लियर फ़ैसिलिटी को निशाना बनाया है.
तीसरी, अमेरिका परोक्ष रूप से झुकने का संकेत दे रहा है, लेकिन खुलकर नहीं. ईरान ने उसके सामने जो शर्तें रखी हैं, वे अमेरिका के लिए अपमानजनक हैं. अमेरिका सस्ता रास्ता ढूंढ रहा है. मसलन, उसने आज ईरानी तेल से प्रतिबंध हटा दिया, लेकिन ईरान ने कहा कि वह बेचेगा ही नहीं.
कूटनीतिक समाधान अभी बहुत मुश्किल दिख रहा है. इसके लिए किसी बड़ी ताक़त को बीच में आना पड़ेगा. मसलन, चीन. चीन इसलिए, क्योंकि रूस से बातचीत करके ट्रंप ने देख लिया है. चीन का नाम उसने अब तक आधिकारिक तौर पर यह कहते हुए नहीं लिया है कि वह ईरान की मदद कर रहा है.
अलबत्ता होर्मुज खुलवाने के नाम पर जो ट्रंप ने अपील की थी, उसमें अपने साथियों के अलावा चीन को भी संबोधित किया. तो, चीन के रास्ते ही कुछ मुमकिन है.
ट्रंप के डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी ने भी तीन दिन पहले यह कहा था कि युद्ध 4-6 हफ़्ते चल सकता है. यानी अमेरिका इस टाइमलाइन के लिए तैयार है. मामला इसके पार पहुंचने पर अलग शेप लेगा. ट्रंप ने अपना चीन दौरा भी आगे बढ़ा दिया है.
उसने 200 अरब डॉलर का अतिरिक्त बजट भी मांगा है. अमेरिका अभी ‘संक कॉस्ट फ़ैलेसी’ में उलझा है, जैसे कोई जुएबाज़ जुआ खेलते हुए हारता जाता है और हर बाज़ी में इस उम्मीद में ज़्यादा पैसे लगाता जाता है कि एक ही बार में वह भरपाई कर लेगा.
जहां तक बात है इज़रायल की, तो वह इस कोशिश में है कि अमेरिका इसमें उलझा रहे. उसके लिए यह बहुत ज़रूरी है. ज़ायनिस्ट लॉबी ट्रंप को लगातार क़ाबू में किए हुए है. अगर अमेरिका चला जाएगा, तो जिस गति से चीज़ें घट रही हैं उसमें ईरान कुछ ही दिनों में इज़रायल की हालत ख़राब कर देगा. इज़रायल बार-बार इस कोशिश में भी है कि खाड़ी के देश ईरान के ख़िलाफ़ हो जाए.
हालांकि, अब तक न तो इज़रायल को क़ामयाबी मिली है और न ही अमेरिका को, जिसने दुनिया भर के देशों से मदद मांगकर देख ली.
मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि ईरान-इज़रायल के बीच हमलों का सिलसिला कम होगा या रुक जाएगा. वह ऑटो-पायलट मोड पर है. वह चलता ही रहेगा. व्यापक परिदृश्य में अब यह अमेरिका-ईरान की लड़ाई बन गई है.
दिलीप खान
मिडिल ईस्ट में सिर्फ एक हमले ने पूरी टेक इंडस्ट्री को लाइफ सपोर्ट पर डाल दिया. ईरान ने क़तर के हीलियम प्लांट पर बम गिराया. दुनिया की 33% सप्लाई खत्म हो गई. ये हैं वो देश जो अभी नुकसान झेल रहे हैं -
- साउथ कोरिया — क़तर से 64.7% हीलियम इम्पोर्ट करता है सैमसंग और SK हाइनिक्स के फैब्स पर काउंटडाउन शुरू. (आईटी हार्डवेयर कम्पनियां)
- ताइवान — TSMC का घर, दुनिया के 18% चिप्स बनाता है. बोला 'सिचुएशन मॉनिटर कर रहे हैं.' मतलब अंदर ही अंदर घबराहट है.
- जापान — बड़ा चिप फैब और MRI मैन्युफैक्चरिंग हब अगर क़तर का आउटेज 60 दिन से ज्यादा चला, तो सबसे पहले स्टॉक खत्म होगा.
- सिंगापुर — रीजनल सेमीकंडक्टर हब. क़तर के हीलियम पर भारी निर्भरता (Scientific American के अनुसार).
- भारत — हज़ारों हॉस्पिटल MRI मशीनों के लिए क़तर से हीलियम इम्पोर्ट करता है. MRI की कीमतें बढ़ने लगीं, स्कैन में देरी शुरू.
- जर्मनी — बड़े इंडस्ट्रियल गैस डिस्ट्रीब्यूटर्स (Linde HQ) का घर. हीलियम की कीमतें 100% बढ़ीं — Linde और Air Liquide सप्लाई को लिमिट कर रहे हैं.
- अमेरिका — फेडरल हीलियम रिज़र्व सालों से कम हो रहा है. US चिप फैब्स अभी भी रिस्क में. HP, Dell, Lenovo ने एंटरप्राइज खरीदारों को चेतावनी दी - 15–20% कीमत बढ़ेगी.
- यूनाइटेड किंगडम — NHS हॉस्पिटल्स में MRI मशीनों के लिए सप्लाई टाइट. खुद का हीलियम प्रोडक्शन नहीं.
- फ्रांस — Air Liquide का हेडक्वार्टर यहां है, लेकिन नया हीलियम प्रोड्यूस नहीं कर सकता. सिर्फ डिस्ट्रीब्यूशन देश.
- चीन — चिप फैब्स और MRI के लिए हीलियम इम्पोर्ट करता है. अब साइबेरिया रीजन में अपनी हीलियम खोज तेज कर सकता है.
- ऑस्ट्रेलिया — एक्सपोर्टर है, कुछ गिने-चुने विकल्पों में से एक. Amadeus Basin से प्रोडक्शन होता है, लेकिन क़तर की कमी पूरी करने के लिए काफी नहीं.
- क़तर — दुनिया की 33% सप्लाई का सोर्स. 2 मार्च से ऑफलाइन. CEO के अनुसार 14% क्षमता 5 साल तक के लिए हमेशा के लिए डैमेज.
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