आतंकवादी देश इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीनी जनता का शानदार प्रतिरोध

फिलिस्तीन की छाती पर बैठा इजराइल
29 नवंबर, 1947 को अमेरिकी साम्राज्यवाद ने प्रस्ताव 181 (जिसे विभाजन प्रस्ताव के रूप में भी जाना जाता है) के तहत ब्रिटिश शासन के अधीन फिलिस्तीन को यहूदी और अरब दो राज्यों में विभाजित करने का फैसला किया गया. इस प्रस्ताव के तहत, यरूशलेम को संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण के अधीन रखने का फैसला किया. इसके अगले ही साल 14 मई, 1948 को यहूदी एजेंसी के प्रमुख डेविड बेन-गुरियन ने इजरायल राज्य की स्थापना की घोषणा की और अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने उसी दिन इस नए राष्ट्र को मान्यता दे दी. इजरायल ने जैसे ही अपनी आजादी का ऐलान किया, इसके महज 24 घंटे के अंदर ही अरब देशों की संयुक्त सेनाओं ने उस पर हमला कर दिया. करीब एक साल तक चली इस लड़ाई में अरब देशों की सेनाओं की हार हुई. अंत में ब्रिटिश राज वाला ये पूरा हिस्सा तीन भागों में बंट गया. जिसे इजरायल, वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी का नाम दिया गया. 7 सितम्बर को इसी गाजा पट्टी वाले छोटे से इलाके से फिलिस्तीनी जनता का मुक्ति संगठन 'हमास' ने इजरायल पर हमला किया है. मुकेश असीम बताते हैं - 'यहूदी इस जगह के मूल निवासी थे जिनसे यह भूमि छीन ली गई थी अतः उन्हें इजरायल में बसाया गया', यह भी एकदम फर्जी दुष्प्रचार है. इजरायल बनाने वाले ये यहूदी वो काले भूरे गेहुआं रंग वाले नहीं हैं जो इस क्षेत्र के पुराने निवासी थे. उनकी और फिलिस्तिनियों की आपस में लडाई नहीं थी. वे इजरायल बनने के पहले भी फिलिस्तीन में ही रहते थे. इजरायल बनाने के लिए ये गोरे यूरोपीय मूल के अश्केनाजी यहूदी भेजे गए थे. अभी इजरायल पर इन यूरोपीय मूल के यहूदियों का प्रभुत्व है और एशियाई या अफ्रीकी मूल के यहूदी इजरायल में भी गरीब व दोयम दर्जे की स्थिति में ही हैं. उनमें से अधिकांश आज वहां मजदूर वर्ग में शामिल हैं. इजरायल में पिछले सालों में जो अंतर्विरोध तीखा हो रहा है, उसकी वजह एक यह भी है. यह बात सही है कि यूरोप में यहूदी कई सौ साल तक नस्ली नफरत व जुल्म का शिकार रहे, जिसका चरम नाजियों द्वारा कत्लेआम था. पर न्यायसंगत बात होती कि इन्हें इनके यूरोपीय आवास की जगहों पर ही जनवादी अधिकार व सुरक्षा हासिल होती. इसके बजाय पहले ब्रिटिश, बाद में अमरीकी साम्राज्यवाद ने इन्हें मदद व सुरक्षा का लोभ देकर पश्चिम एशिया में अपना भाडे का फौजी बनाकर बिठा दिया. इस काम में यहूदी कट्टरपंथी और पूंजीपतियों ने साम्राज्यवादियों की मदद की. इजरायल और सऊदी अरब, ये दोनों देश ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने लगभग एक ही समय हथियार, फौज और पैसा देकर बनाए और दोनों के ही शासकों ने इस क्षेत्र में आज तक पश्चिमी साम्राज्यवाद के एजेंट के तौर पर प्रतिक्रियावाद को मजबूत करने व अरब जनता की जनतांत्रिक आकांक्षाओं को कुचलने का ही काम किया है.नृशंस क्रूरता का प्रतीक इजराइल
नाजी हिटलर की नृशंस क्रूरता का सर्वाधिक शिकार इन यहूदियों को बचाने के लिए तत्कालीन सोवियत संघ ने अपने लाल सेना के लाखों फौज की कुर्बानी दी और हिटलर को खदेड़कर उसके मांद में मार डाला. द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद बने यहूदियों का एकमात्र देश इजराइल अब उन्ही क्रूरताओं को फिलिस्तीन की जनता पर ढ़ाने लगा और हर दिन उनकी जमीनों को छीनकर उन्हें बेदखल करने लगा. अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, फिलिस्तीन पर ब्रिटिश शासन से पहले, यहूदी कुल जनसंख्या का लगभग 6 प्रतिशत थे. 1947 से 1950 तक, नकबा या 'कैटास्ट्रोफ' के दौरान, यहूदी सैन्य बलों ने कम से कम 7,50,000 फिलिस्तीनियों को निष्कासित कर दिया और ऐतिहासिक फिलिस्तीन के 78 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर लिया. शेष 22 प्रतिशत को वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में विभाजित कर दिया.
हरे रंग में सिकुड़ता फिलिस्तीन, सफेद रंग में फैलता इजराइल
1967 के युद्ध के दौरान, इजरायली सेना ने पूरे ऐतिहासिक फिलिस्तीन पर कब्जा कर लिया और 3,00,000 से अधिक फिलिस्तीनियों को उनके घरों से निकाल दिया. 2008 और 2021 के बीच, कम से कम 5,739 फिलिस्तीनी और 251 इजरायली मारे गए.
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, इजरायल में एक मौत के मुकाबले फिलिस्तीन में 23 लोगों की मौतें हुई हैं. इस दौरान कम से कम 1,21,438 फिलिस्तीनी और 5,682 इजरायली घायल हुए हैं.
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, फिलिस्तीनी गुट से मारे गए लोगों में से कम से कम 1,255 (22 प्रतिशत) बच्चे थे और 565 (10 प्रतिशत) महिलाएं थीं. इजरायल की ओर से मारे गए लोगों में से 121 (48 प्रतिशत) सुरक्षा बल थे.
फिलीस्तीन और इजराइल के इस युद्ध में अब तक हुई हत्या व घायल लोगों के आंकड़े है, जो UN के पास मौजूद है, इस प्रकार है -
वर्ष कुल हाताहत की संख्या
2008 फिलीस्तीन - 3,202 इजराइल - 853 2009 फिलीस्तीन - 7,460 इजराइल - 123 2010 फिलीस्तीन - 1,659 इजराइल - 185 2011 फिलीस्तीन - 2,260 इजराइल - 136 2012 फिलीस्तीन - 4,936 इजराइल - 578 2013 फिलीस्तीन - 4,031 इजराइल - 157 2014 फिलीस्तीन - 19,860 इजराइल - 2,796 2015 फिलीस्तीन - 14,813 इजराइल - 339 2016 फिलीस्तीन - 3,572 इजराइल - 222 2017 फिलीस्तीन - 8,526 इजराइल - 174 2018 फिलीस्तीन - 31,558 इजराइल - 130 2019 फिलीस्तीन - 15,628 इजराइल - 133 2020 फिलीस्तीन - 2,781 इजराइल - 61
वर्ष - 13 फिलिस्तीन-1,20,286; इजराइल-5,887
यहूदियों ने नाजियों से हाथ मिला लिया
जैसे-जैसे यहूदी फिलिस्तीन की छाती पर इजराइल नामक देश के रुप में मजबूत होता गया, वैसे-वैसे ही वह अमेरिकी पिट्ठू बनकर न केवल सोवियत संघ के खिलाफ होता गया और सोवियत संघ को खत्म करने के अभियान में भी शामिल हो गया बल्कि आज यूक्रेनी यहूदी जेलेंसकी रुस को ही मिटाने पर तुल गया है. इसके लिए वह 20 महीनों से लगातार अमेरिका और उसके गुंडों के इशारे पर रुस के खिलाफ युद्ध लड़ रहा है. इतना ही नहीं, ये यहूदी इतने एहसान फरामोश निकले कि हालिया दिनों में जब कनाडा के संसद में 98 वर्षीय एक नाजी को सम्मानित किया जा रहा था, तब यह यहूदी जेलेंसकी तालियां बजा रहा था. इन्हें इस पर भी लज्जा तक नहीं आई कि उनके ही पूर्वजों पर यह नाजी कितनी क्रूरता ढ़ाते थे.क्या है फिलिस्तीन मुक्ति युद्ध में जीत की संभावना
7 अक्टूबर को आतंकवादी देश इजराइल पर हुए हमले से अकबकाये इजराइल और अमेरिका मदहोशी में एक से बढ़कर एक दावे कर रहे हैं. मसलन, शाम तक हमास को मसल देंगे, आर पार की लड़ाई होगी, बड़े अंजाम भुगतने होंगे आदि-इत्यादि. लेकिन यह आतताई इस बात को भूल जाते हैं कि 7 अक्टूबर को शुरु हुई फिलिस्तीनी जनता की यह मुक्ति युद्ध पहले की तमाम लड़ाई से बुनियादी तौर पर भिन्न है. इसे इस तरह समझते हैं -
- जितनी सुनियोजित और गोपनीयता और तेज गति से तीनों सेनाओं (जल, थल, आकाश) द्वारा एक साथ हमला किया गया है, वह सख्त ट्रेनिंग और बेहद ही विकसित सैन्य कमांड में ही संभव है. यानी इस फिलिस्तीन मुक्ति युद्ध को उच्चकोटि का सैन्य कमांड ने संचालित किया है. ईरान का नाम तो पहले ही दिन से सामने आ गया था.
- इस युद्ध में फिलिस्तीन की जनता की सेनाओं ने अपने तमाम संसाधनों का बेजोड़ इस्तेमाल किया. यहां तक कि बुलडोजर जैसे असैन्य मशीन का भी सैन्य इस्तेमाल किया.
- तीन दिन तक लगातार चल रहे इस युद्ध के बाद भी लगातार आतंकवादी इजरायली 'सेना' पर हमले हो रहे हैं. इजराइल के अंदर जाकर इजरायली सैन्य बेस पर फिलिस्तीनी हमास का कब्जा बरकरार है. जो उच्चतम सैन्य कमांड के तहत प्रशिक्षण को दर्शाता है. साथ ही यह सैन्य अभियान दीर्घकालीन गुरिल्ला युद्ध की ओर इशारा कर रहा है.
- बौखलाया अमेरिका संयुक्त राष्ट्र संघ की आपात बैठक में फिलिस्तीन के खिलाफ कोई संयुक्त बयान तक जारी नहीं कर पाया है. चीन, रुह ने सीधे सवाल उठा दिया है और साफ कहा है कि अगर इस हमले का विरोध किया जाता है तो रुस के खिलाफ चल रहे युद्ध पर भी बयान जारी करना होगा.
- फिलिस्तीन की 23 लाख की आबादी का नरसंहार एकबारगी आतंकवादी इजराइल चाहकर भी नहीं कर सकता. परमाणु बम का इस्तेमाल भी यहूदी इजराइल नहीं कर सकता.
- इजराइल के खिलाफ लेबनान समेत अन्य खाड़ी देशों की ओर से भी हमला कर दिया गया है और हजारों लड़ाके योद्धा गाजा पट्टी पहुंच चुके हैं और युद्ध में उतर गए हैं. हजारों प्रदर्शनकारियों ने इजराइल के खिलाफ सड़कों पर नारें लगा रहे हैं.
- किंकर्तव्यविमूढ़ अमेरिका एक साथ दो खुल चुके मोर्चे (युक्रेन और इजराइल) में एक साथ लड़ना उसके बूते से बाहर की चीज बन गई है. अभी तो उसने बकायदा घोषणा भी कर दिया है कि इजराइल में अमेरिकी सेना नहीं आयेगी.
- हमास ने सैकडों इजरायली को बंधक बना रखा है, जिससे वह मोलभाव की स्थिति में है.
- और सबसे बढ़कर फिलिस्तीन के पीछे दुनिया का सबसे मजबूत चट्टान रुस का मौजूद होना, यह रेखांकित करता है कि फिलिस्तीन की यह मुक्ति युद्ध जीत हासिल जरूर करेगा.
अमेरिका का खून निचोड़ लेगा फिलिस्तीन मुक्ति युद्ध
अमेरिका का मनपसंद खेल युद्ध है और उसकी अर्थव्यवस्था का भी बड़ा आधार. अब यही युद्ध उसका सारा खून निचोड़ लेगा. अमेरिका का इतिहास है कि वह आज तक दुनिया के किसी भी देश के साथ युद्ध में मूंह की खाई है. चाहे कुख्यात कोरियन युद्ध हो या वियतनाम, लाओस, कम्बोडिया, अफगानिस्तान का युद्ध हो, सदैव भारी मौतों के बाद भाग खड़ा हुआ है. इसमें इराक युद्ध को अपवाद माना जा सकता है. अपनी इसी कोशिश में उसने यूक्रेन को उकसाकर रुस के खिलाफ लड़वा दिया, जो आज 20 महीनों से जारी है. इस युद्ध में अमेरिका ने 20 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च कर दिया है, जो अभी जारी है. विदित हो कि यह भारी रकम भारत के एक साल के बजट के आधे से ज्यादा है. बेशक इस युद्ध में अमेरिका सामने नहीं है, लेकिन सारा सैन्य संचालन, हथियारों की आपूर्ति अमेरिका और नाटो कर रहा है. ऐसे में अब जब फिलिस्तीन मुक्ति युद्ध का एक और फ्रंट खुल गया है तब अब रुस को भी यह नैतिक अधिकार ही नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी है कि वह इस फिलिस्तीन मुक्ति युद्ध को हर संभव सहायता दें. हलांकि रुस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदेयेव भी स्पष्ट कहा भी है कि -'अमेरिका और उसके सहयोगियों को जहां ध्यान देना चाहिए, वहां उसने ऐसा किया नहीं. इजरायल और फिलिस्तीन के बीच टकराव दशकों से चल रहा है और अमेरिका की इसमें एक बड़ी भूमिका है. लेकिन फिलिस्तीन-इजरायल विवाद को सुलझाने के बजाय उन बेवकूफों ने हमारे साथ हस्तक्षेप किया और नियो-नाजियों को पूरी सहायता दे रहा है. अमेरिका ने दो बेहद ही करीबी लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया है. पूरी दुनिया में उन्माद भड़काने के अमेरिकी जूनून को क्या कोई रोक सकता है. ऐसा लगता है कि यह अमेरिका में गृहयुद्व से कुछ कम नहीं है.'
अमेरिका ने नाजियों का जिस तरह पक्षपोषण पहले किया था, आज वह यह गलती फिर दुहरा रहा है. अमेरिका को इससे बाज आना चाहिए.भारत की स्थिति
भारत का सत्तारुढ़ वर्तमान शासक नरेन्द्र मोदी पागल हो गया है. इस बेवकूफ संघी नरेन्द्र मोदी ने भारत की फिलिस्तीन समर्थक विदेश नीति को अमेरिका के इशारे पर इजराइल समर्थक विदेश नीति अपना लिया है. भारत सदैव उत्पीड़ित राष्ट्रीयता के समर्थन में रहा है लेकिन मोदी ने भारत की विदेश नीति को 180 डिग्री पर मोड़ कर उत्पीड़क राष्ट्रीयता का समर्थक बना दिया है. ऐसे में मोदी का इजराइल के समर्थन में बयान देना न केवल घृणास्पद है बल्कि दुनिया से अलग-थलग कर देने वाला भी है. संघ के ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1977 के अपने एक भाषण में फिलिस्तीन का पक्ष लेते हुए साफ तौर पर कहा था कि 'अरबों की जिस जमीन पर इजराइल कब्जा करके बैठा है, वो जमीन उसको खाली करना होगी.' वे आगे कहते हैं - 'आक्रमणकारी, आक्रमण के फलों का उपभोग करे, ये हमें अपने संबंध में स्वीकार नहीं है. तो जो नियम हम पर लागू है, वो औरों पर भी लागू होगा. अरबों की जमीन खाली होना चाहिए. जो फिलिस्तीन है और जो फिलिस्तीनी हैं, उनके उचित अधिकारों की प्रस्थापना होना चाहिए. इजरायल के अस्तित्व को सोवियत रूस, अमेरिका ने भी स्वीकार किया है. हम भी स्वीकार कर चुके हैं.' ऐसे में कांग्रेस ने भारत की ऐतिहासिक जिम्मेदारी को निभाते हुए फिलिस्तीन की मुक्ति युद्ध के समर्थन में खड़े हुए हैं, जो भारत की गरिमा के अनुकूल भी है. कांग्रेस ने फिलिस्तीन का समर्थन करते हुए कहा है कि वह बीते लंबे समय से फिलिस्तीनी लोगों के लिए उनकी जमीन और अधिकारों की पक्षधर है और सभी को गर्व से जीने का अधिकार है. इसलिए कांग्रेस ने अविलम्ब इजरायल की सेना और हमास के बीच सीजफायर की मांग की है. सामाजिक कार्यकर्ता विजय सिंह फिलिस्तीन का समर्थन करते हुए लिखते हैं - 'ये युद्ध सिर्फ और सिर्फ फिलिस्तीन की आजादी के साथ ही खत्म होगा. नहीं तो कुछ दिनों के बाद, कुछ महीनों या सालों के बाद फिर ये तूफान उठेगा, चाहे हमास रहे ना रहे इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता. फ़िलीस्तीन की आजादी के लिए फ़िलीस्तीन की जनता पहले भी संघर्ष करती आयी है आगे भी उठ खड़ी होती रहेगी.' लेकिन इस बात की संभावना है कि फिलिस्तीन का यह मुक्ति युद्ध अवश्य विजयी होगा.हमें सहयोग करें
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1 टिप्पणियां
आपने हमास को एक क्रांतिकारी संगठन माना है । यह सच नहीं है ' हमास मूलतः एक कट्टर धार्मिक आतंकवादी संगठन है ।
एक राष्ट्र के रूप में इजराइल का गठन संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्देशन में हुआ ।अपने गठन के बाद से ही पश्चिमी साम्राज्यवाद की शह और समर्थन से वह लगातार फिलिस्तीन इलाकों पर कब्जा करता रहा है । इस कब्जे के दौरान उसने तमाम अमानवीय कृत्यों और कत्लेआम की घटनाओं को अंजाम दिया ।इजरायल के ।इस कब्जे और अन्याय के खिलाफ फिलिस्तीन में एक मजबूत राष्ट्र मुक्ति आंदोलन हुआ था जिसे दुनिया भर के इंसाफ पसंद नागरिकों का समर्थन मिलता रहा था ।यह आंदोलन इसराइल समेत साम्राज्यवादियों के दमन का शिकार हुआ ।
राष्ट्र मुक्ति आंदोलन के कमजोर होने के बाद हमास जैसे कट्टर धार्मिक आतंकवादी संगठन का जन्म हुआ जो इजरायल की कब्जे की नीति का विरोध करता था । सच तो यह है कि एक समय यासर आराफात के नेतृत्व में व्यापक जन समर्थन से राष्ट्र मुक्ति की लड़ाई लड़ी गई थी जिसे एक सशक्त आंदोलन के तौर पर प्रसिद्धि मिली थी । इस जन आंदोलन को कमजोर करने और फिलिस्तीन की लड़ाई को आतंकवाद के रास्ते पर ले जाकर भटकाने के लिए इजराइल और अमेरिका ने हमास जैसे संगठन को एक मामले में प्रश्रय दिया , उसकी ट्रेनिंग करवाई ।अपने चरित्र के अनुसार हमास इस हमले को धार्मिक रंग दे रहा है ।
बावजूद इसके हम सबों को फिलीस्तीन की राष्ट्र मुक्ति आन्दोलन के साथ खड़ा होना चाहिए और इजरायल तथा अमेरिकी साम्राज्यवाद से डटकर मुकाबला करना चाहिए । भारत की डरपोक और दोगले नीति की आलोचना करनी चाहिए ।
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