हर रोज़ समंदर की तरफ़ खुलती है एक हत्यारी खिड़की और वो लड़की अपनी तर्जनी के पोर में समेटकर एक...
Read moreDetailsदोस्त कहते हैं - प्रेम पर कविता क्यों नहीं लिखते ? मैं दिखाता हूं उन्हें कई डायरियां, कुछ भरी, कुछ...
Read moreDetailsमेरे पिताजी का चश्मा... बिस्तर कपड़े जूते चप्पल छाता लाठी सबकुछ दान में जाने के बाद बारी आई चश्मे की...
Read moreDetailsमैं ईश्वर नहीं बनना चाहता मैं ईश्वर का अवतार भी नहीं बनना चाहता क्यों कि ईश्वर और उनका अवतार बनने...
Read moreDetailsआपके हिंदू राष्ट्र में चमार कहां रहेंगे ? हमारी जूती के नीचे, मरी गायों के पीछे, अकेला में रहेंगे !...
Read moreDetailsग्रीन रूम में मसखरा उतार रहा है चेहरे का रंग रोगन लाल लाल होंठों और नाक के नीचे से उभर...
Read moreDetailsनदियों की लपलपाती जीभ सूखे चट्टानों के तालु में सट गई है आग ढोती हवाओं में मनुष्य की घृणा का...
Read moreDetailsऔर इस तरह धीरे धीरे उन्होंने धकेल दिया मुझे हाशिये पर फुटपाथ की ज़िंदगी पर छपे रिसालों में छपी हुई...
Read moreDetailsपृथ्वी के एक निर्जन एकांत में अंजुरी भर जल था और जल में उतरता दिन शेष की माया थी यहां...
Read moreDetailsचलूंगी न आपके साथ वहां जहां आसमान झुकता है ज़मीन पर और हरेक मौसम रहता है सूखे से महफ़ूज़ जहां...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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