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ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 7, 2026
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जब भी किसी देश की इंकलाबी महिलाओं को यूरोप और अमेरिका के समर्थन से अपने देश की रेजीम चेंज करने की वक़ालत करते सुनता हूँ तो मेरा रूह काँप जाता है।

मैंने अपनी Mphil और Phd की थीसिस Human Security and Human Trafficking की टॉपिक पर लिखा है। इसलिए पश्चिमी देशों की अमानवीय कृत्यों को बहुत गहराई से अध्ययन किया है। विशेषरूप से थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज की महिलाओं के साथ जो इन्होंने कुकर्म किया है वह पढ़कर रूह काँप जाता है।

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यूरोप और अमेरिका ने पूरी दुनिया में जहाँ भी अपनी कॉलोनी बसायी या मिलिट्री बेस स्थापित किया उस क्षेत्र को अपने कुकर्मों से नापाक कर दिया। आप दुनिया के किसी भी बड़े वैश्यालय का अध्ययन कीजिये उसके आसपास यूरोप या अमेरिका की मिल्ट्री बेस रही है। जहाँ सेक्स ट्रेडिंग और प्रॉस्टिट्यूशन बहुत कॉमन है आप उस जगह का अध्ययन कीजिये तो आप पायेंगे की उस क्षेत्र में यूरोप/अमेरिका की कॉलोनी या मिलिट्री बेस रही है। इस विषय पर सैकड़ों रिसर्च पेपर मिल जायेंगे और जब पढ़ेंगे तो रूह काँप जायेगा।

फिलीपींस, साउथ कोरिया, जापान, थाईलैंड, ब्राज़ील, मेक्सिको, कनाडा, सेनेगल, साउथ अफ़्रीका या अन्य अफ्रीकी देशों में जहाँ अमेरिका या यूरोप की कॉलोनी या मिलिट्री बेस है/थी, उसका अध्ययन कीजिये तो पश्चिमी के सभ्य लोगों की नंगई खुलकर सामने आती है। आज भी दुनिया में महिलाओं की ट्रेडिंग और ट्रैफ़िकिंग सबसे अधिक इन्हीं जगहों से होती है।

अगर हम भारत में ही मुंबई के कमाठीपुरा, दिल्ली के GB(Garstin Bastion Road) और कोलकाता के सोनागाछी जैसे रेडलाईट एरिया का इतिहास खंगालते है तो इन सभी जगहों को विकसित ब्रिटिश लोगों ने किया था।

आज जो दुनिया में रशियन लड़कियों की डिमांड है वह भी एक औपनिवेशिक सोच का परिणाम है। जब 1991 में सोवियत रूस का विखंडन हुआ तब अमेरिका ने लगभग दस लाख महिलाओं को वेश्यावृत्ति करने के लिए मजबूर किया था और आजतक वह सिलसिला जारी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की हार के बाद भी यही हुआ था।

दुनिया थाईलैंड को पर्यटन के लिए जानती है। लेकिन इस थाईलैंड के बनने के पीछे बहुत घिनौनी कहानी छुपी हुई है। थाईलैंड की महिलाएँ अपनी आज़ादी के लिए क्रांति की और अमेरिका ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग किया। लेकिन जब वियतनाम युद्ध के समय थाईलैंड ने अमेरिका का सहयोग किया और अमेरिका ने कई Naval और एयर बेस बनाया तब जो महिलायें अमेरिका के सहयोग से क्रांति का हिस्सा बनी थी उनकी ही बेटियाँ और पोतियाँ अमेरिकी सैनिकों के सामने परोसी गयी। आज सेक्स ट्रेडिंग और प्रॉस्टिट्यूशन का केंद्र बना हुआ है।

यानी कुल मिलाकर यूरोप और अमेरिका के लोग थर्ड वर्ल्ड के लोगों को नीच, लीचड़ और ग़ुलाम मानते है। उनके लिए यह पराजित क़ौम है जिसका शोषण करना अपना हक़ समझता है। वह किसी भी समाज को कंट्रोल करने के लिए बच्चियों और महिलाओं का शोषण करना मनोवैज्ञानिक बढ़त मानता है।

हम तो ईरान की उन महिलाओं के लिए चिंतित है जो आजादी के लिए अमेरिका और यूरोप के लोगों पर आश्रित है। यह एपस्टीन क्लब वाले लीचड़ों को बिल्कुल फ़र्क़ नहीं पड़ेगा की ईरान में कौन अमेरिका के साथ था और कौन उसके विरोध में था। बल्कि थाईलैंड को रिपीट कर दिया जायेगा। अगर बदलाव लाना है तो अपने दम पर लाये।

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