सदियों बीत गये यहां तक आते आते, हज़ारों वर्ष लाखों दिन अनवरत चलते चलते, क़बीले, गांव और शहर आते आते...
Read moreDetailsफर्क साफ है इतिहास बदल रहा है फर्क साफ है क्लीनचिट का तमग़ा यूं ही नहीं मिलता जतन करना पड़ता...
Read moreDetailsदादी के उम्मीद की औरतें 'औरत का नहाना और खाना किसी को नही पता चलना चाहिए' हमारे बचपन में दादी...
Read moreDetailsपेंटिंग्स : अवधेश वाजपेयी औरतें नहीं चाहती हैं, ईश्वर विलुप्त हो जाए औरतें, अपना सहारा कैसे छोड़ दे, इस संसार...
Read moreDetailsघर चला गया है, एक मकान रह गया है शाम की दहलीज़ पर एक बुझा चिराग़ रह गया है लुटी...
Read moreDetailsएक अरसे के बाद उस बच्ची ने अपने से दस गुना बड़े बाँस के सहारे ज़मीन से बीस फुट उपर...
Read moreDetailsफूल के खिलने का डर है सो पहले फूल का खिलना बरखास्त फिर फूल बरखास्त हवा के चलने का डर...
Read moreDetailsवह पोस्टर से डरता है कार्टून से डरता है धरना प्रदर्शन से डरता है डर का हौवा कुछ इस क़दर...
Read moreDetailsअमेरिका अमेरिका से जापान जापान से परेशान है और एक हम हैं वहीं जाने पर तुले हैं आत्महत्या करने के...
Read moreDetailsस्क्रीन पर एक तस्वीर उभरती है धीरे-धीरे समझ आता है यह कोई एंकर नहीं;सौदागर है, जब वह अपने खाली झोले...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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