अब इस शहर में कोई भूखा नहीं सोएगा सबको मिलेगी दो वक्त की रोटी सिर पर छत हाथों को रोजगार...
Read moreDetailsहटो हटो पीछे निज़ाम तुम किसान बढ़ रहे आगे नहीं लड़ाई रुकेगी अब ये लोग जा रहे जागे तेरी तानाशाही...
Read moreDetailsमैं समझा नहीं पाया मेरे द्वारा लाये गए क़ानून जनहित में हैं जनता नहीं मानी भड़का दिया विरोधियों ने जनता...
Read moreDetails'जय भीम' देखकर क्या समझोगे साहब ? हम मुसलमान हैं ! हम अल्ताफ हैं ! हम रोज़ झेलते हैं !...
Read moreDetailsकठफोड़वा की चोंच का एक प्रहार और अनार की छाती से बहता रक्त पूरब में फैलता मां के कलछुल से...
Read moreDetailsकविता के लिए यह कठिन समय है जो समय आदमी के लिए जितना कठिन होगा वह समय कविता के लिए...
Read moreDetailsछू लेंगे तुम्हारे कुओं को तुम्हारे नलों को तुम्हारी बाल्टियों को हम छू देंगे, भयहीन और बेपरवाह. चूंकि हमारा सच...
Read moreDetailsठाकुर इस बात से नाराज़ है कि दलित आते-जाते उससे 'राम-राम' क्यों नहीं करता ? पंडित इस बात से नाराज़...
Read moreDetailsपीठ में बहुत दर्द था डाॅक्टर ने कहा अब और मत झुकना अब और अधिक झुकने की गुंजाइश नहीं रही...
Read moreDetailsहम पर न दया करो, न तरस खाओ हमारा हक़ छीना जा रहा है, हमारे साथ आओ! खाद-बीज-बिजली-डीज़ल-कीटनाशक सब पर...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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