1. अभिधा काव्य के तत्व मत तलाशिये शिल्प के सौंदर्य में ज्यादा मत झांंकिये कथ्य को कर दरकिनार यह अभिधा...
Read moreDetailsएक वक्त आता है जब कुछ भी काम नहीं आता न कोई बहाना न कोई चालाकी न तर्क न कुतर्क...
Read moreDetailsइस भीड़ भरी सड़क पर प्रिये कैसे करुं तुम्हारा आलिंगन तुम्हें शिकायत न सही इंतज़ार तो है क्यों सालों बीत...
Read moreDetailsअभी दिवाली कहां है यारों, अभी दिवाली नहीं है आई. अभी तो देखो यारों कितने घरों का बुझा है चूल्हा...
Read moreDetailsअनीता गौतम मैं उन नमक हरामों से पूछना चाहती हूं जो कावड़ उठा कर पत्थर के लिंग और योनि को...
Read moreDetailsबंजर नहीं है हमारी मनोभूमि उसमें भी लहलहाती हैं फसलें, सपनों की... हमारी दृष्टिपटल पर भी बिंबित होते हैं स्कूल,...
Read moreDetailsयदि देश की सुरक्षा यही होती है कि बिना ज़मीर होना ज़िंदगी के लिए शर्त बन जाए आंख की पुतली...
Read moreDetailsरेत में लहराती है समुद्र की अथाह संभावना सूखे भोजपत्र पर क्या लिखूं मौसम के नाम अंधेरे की छाती से...
Read moreDetailsखाद के लिए भीखमंगों की तरह लाइन मे लगा दिया किसानों को ये इनकी कुन्ठा है इससे ये खुश होते...
Read moreDetailsमूर्तियों को पूजने के बजाय मानवता को पूजता हूं मैं ! काल्पनिक देवताओं को न मानकर, शफुले साहू अम्बेडकर को...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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