आज मेरी कविता पढ़ लो यह बहुत अल्पजीवी है कल इस पर मूंगफली और चटनी के साथ समोसे बिकेंगे मैं...
Read moreDetailsएक मौत ही तो है जो अकेली सब की खबर रखती है कल वह मेरे फ्लैट आई थी उसने फोन...
Read moreDetailsमेरे हिस्से की धूप चुरा ली गई च्वाइस के रंग चुनने का विकल्प नहीं है माल और मसाला वही है...
Read moreDetailsसर्दियां सैनिक की विधवा की सूनी मांग-सी सफेद हैं हजारों सालों से करोड़ों अहेतुक युद्ध में मारे गए श्वेत आत्माओं...
Read moreDetailsतय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो...
Read moreDetailsबहुत दिनों से आकांक्षा रही है बादलों को छूने की और आज फिर से चढ़ रहा हूं चिङकाङशान पर. फिर...
Read moreDetailsदेश में देशभक्तों की बहुत कमी है कमल छाप छोड़ अब कौन है जो देश में देशभक्त है देशभक्ति के...
Read moreDetailsसभी कालखण्डों को रौंदता बनाता, बिगाड़ता, फिर बनाता इतिहास को, सभ्यता को दृश्यमान अखिल जगत को दौड़ता जाता महाकाल रथ...
Read moreDetailsजब देश और दुनिया की समूची प्रबुद्ध मनीषा गुजर रही हो मेनोपाॅज के दौर से जब बोझ व बंध्या हो...
Read moreDetailsहमारे लहू को आदत है मौसम नहीं देखता, महफ़िल नहीं देखता ज़िन्दगी के जश्न शुरू कर लेता है सूली के...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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