बसन्त कभी अलग होकर नहीं आता ग्रीष्म से मिलकर आता है, झरे हुए फूलों की याद शेष रही कोंपलों के...
Read moreDetailsभारत में लोकतंत्र बहुत है ! कुपोषण से यहां बच्चे मरते बहुत हैं ! बिना दवा-दारू के अकाल मौतें बहुत...
Read moreDetailsरक्तपात – कहीं नहीं होगा सिर्फ़, एक पत्ती टूटेगी ! एक कन्धा झुक जायेगा ! फड़कती भुजाओं और सिसकती हुई...
Read moreDetailsतुम किसानों को सड़कों पे ले आए हो अब ये सैलाब हैं और तिनकों से रूकते नहीं ये जो सड़कों...
Read moreDetailsतलवार मुसलमानों पर ही नहीं है तलवार दलितों पर ही नहीं है तलवार बस्तर के जंगल पर ही नहीं है...
Read moreDetailsयह मेरा देश है… हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैला हुआ जली हुई मिट्टी का ढेर है जहांं हर...
Read moreDetailsरफीक आजाद बांग्लादेश के कवि 'रफ़ीक़ आज़ाद' की मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखी 'भात दे हरामी.' यह कविता...
Read moreDetailsकच्चा घड़ा काम का घड़ा नहीं होता घड़ा देखने में बस घड़ा होता है दरका हुआ पक्का घड़ा काम का...
Read moreDetailsकल मुठभेड़ में मरने की उसकी बारी थी आज मेरी है कल तुम्हारी फिर परसों किसी और की होगी कृपया...
Read moreDetailsदिल्ली दूर है तुम खून बहाओ या पसीने दिल्ली दूर है तुम्हारे लिए उसे न खून की जरूरत है न...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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