Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

आरएसएस का पर्दाफाश : इतिहास के सबसे बड़े दक्षिणपंथी संगठन की संरचना का ख़ुलासा, भाग – 3

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 5, 2026
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
आरएसएस का पर्दाफाश : इतिहास के सबसे बड़े दक्षिणपंथी संगठन की संरचना का ख़ुलासा, भाग – 3
आरएसएस का पर्दाफाश : इतिहास के सबसे बड़े दक्षिणपंथी संगठन की संरचना का ख़ुलासा, भाग – 3

वास्तव में, जब संघ अपने स्वयंसेवकों या संबंधित वर्गों से संवाद करता है, तो वह बार-बार अपने आंतरिक संगठनों के बीच कोई स्पष्ट भेद नहीं करता. उदाहरण के लिए, ऑर्गनाइज़र पत्रिका में ऐसे लेख मिलते हैं जहां ‘विद्या भारती पंजाब’ और उसकी पंजाबी इकाई ‘सर्वहितकारी शिक्षा समिति’ को एक-दूसरे के स्थान पर इस्तेमाल किया जाता है; या ब्रिटेन के हिंदू स्वयंसेवक संघ की 50वीं वर्षगांठ पर प्रकाशित स्मारिका में सदस्य अपने संघ अनुभव को ‘नेशनल हिंदू स्टूडेंट्स फोरम’ में किए गए कार्य से जोड़कर बताते हैं या जब वरिष्ठ आरएसएस विचारक राकेश सिन्हा यह दावा करते हैं कि ‘’विद्या भारती’ द्वारा संचालित भारत का सबसे बड़ा स्कूल नेटवर्क आरएसएस का ही हिस्सा है’. अथवा जब ‘सेवा साधना’ में संघ की सेवा परियोजनाओं की सूची में सक्षम, वीएचपी, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, भारत विकास परिषद, राष्ट्र सेविका समिति, एबीवीपी और दीनदयाल रिसर्च इंस्टीट्यूट जैसे संगठनों के नाम ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: सेवा विभाग’ शीर्षक के अंतर्गत एक साथ रखे जाते हैं.

जब पूरे संघ नेटवर्क को एक ही संगठन के रूप में देखा जाता है, तो उसे समझने के नए तरीके सामने आते हैं.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

इस शोध में हमारी टीम ने वह परिभाषा अपनाई जो मैंने 2022 में कंटैम्पररी साउथ एशिया नाम की पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में दी थी. इस परिभाषा के अनुसार :

‘संघ उन संगठनों का समूह है जिनके ज़रिए उसका केंद्रीय नेतृत्व अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है, पहला, अपने नियमित संवाद और संपर्क के माध्यमों से और दूसरा, बिना किसी दबाव या ज़बरदस्ती के.’

इस दृष्टिकोण में हमने उन संगठनों की सूची बनाने की कोशिश नहीं की जो केवल हिंदुत्व विचारधारा से सहमत हैं, बल्कि हमने उस असली संगठनात्मक ढांचे का नक्शा तैयार किया जिससे पूरा संघ नेटवर्क जुड़ा हुआ है.

जैसा कि पहले बताया गया, किसी संगठन की दक्षिणपंथी सोच या विचारधारा को देखना यह समझने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वह संघ के ढांचे का हिस्सा है या नहीं. उदाहरण के लिए, वेद मंदिर परिसर के कई संगठन शायद खुलकर कट्टर विचार नहीं दिखाते, लेकिन फिर भी वे सब आरएसएस के नेतृत्व के अधीन हैं, अपनी इच्छा से और एक तय प्रशासनिक व्यवस्था के ज़रिए.

इसलिए, केवल विचारधारा पर ध्यान देने के बजाए हमने संघ के ठोस रिश्तों को समझने पर ज़ोर दिया यानी उसके लोग, संपत्तियां, धन का प्रवाह और उसका प्रबंधन ढांचा. इसके लिए हमने संघ के अपने दस्तावेज़ों और रिपोर्टों से बहुत सारा डेटा लिया.

आरएसएस जिन लगभग तीन दर्जन संगठनों को आधिकारिक रूप से मान्यता देता है, वहां से शुरुआत करते हुए हमारी टीम ने इन संगठनों द्वारा प्रकाशित और उपलब्ध कराए गए विशाल रिकॉर्ड का अध्ययन किया जैसे उनके संगठनात्मक दस्तावेज़, आत्मकथाएं, ब्लॉग और सोशल मीडिया पोस्ट ताकि अन्य जुड़े हुए संगठनों की पहचान की जा सके.

यह काम आसान नहीं था. हमें पक्षपाती लेखों, उबाऊ संगठनात्मक आत्मकथाओं और कई बार पूरी तरह झूठी जानकारियों के बीच से होकर गुज़रना पड़ा, ताकि कहीं-कहीं से काम की जानकारी के टुकड़े मिल सकें. इस तरह हमने कुछ द्वितीयक संगठनों की सूची तैयार की ऐसे संगठन जो संघ से जुड़े हो सकते थे, लेकिन जिनकी पुष्टि कई स्रोतों से जांच कर की जानी थी. इसका मतलब यह था कि संघ के स्रोतों में मिली जानकारी को अकादमिक लेखन, वित्तीय रिकॉर्ड, सरकारी दस्तावेज़ों और अन्य संघ-संबंधित स्रोतों से मिलान करके सत्यापित किया गया. (हमारे शोधकर्ताओं द्वारा एकत्र की गई हर जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों से ली गई थी, लेकिन विश्लेषण का केंद्र संघ के अपने दस्तावेज़ों को ही रखा गया.)

संभावित रूप से संघ से जुड़े संगठनों से पुष्ट संगठनों तक पहुंचने के लिए हमने एक मानक पद्धति तैयार की. इसका उद्देश्य किसी संगठन को अकेले में जांचना नहीं था, बल्कि यह समझना था कि वह किस तरह और कितनी गहराई से संघ के नेटवर्क से जुड़ा है. हमने संगठनात्मक घोषणाओं और गतिविधियों पर कम ध्यान दिया और इसके बजाए साझा कर्मियों, साझा कार्यालयों, सह-आयोजित कार्यक्रमों और वित्तीय प्रवाह यानी वे अनकहे संबंध जो संघ नेटवर्क के अंतर-संगठनीय संबंधों का मूल बनाते हैं, इस पर अधिक ध्यान केंद्रित किया.

उदाहरण के तौर पर, जब एक शोधकर्ता ने फरीदाबाद के ‘दोनी पोलो छात्रावास’ की जांच की, तो उसने पाया कि वहां बालासाहब देशपांडे, गोलवलकर और हेडगेवार की तस्वीरें लगी हैं, हॉस्टल के कमरों के नाम संघ के प्रमुख व्यक्तित्वों पर रखे गए हैं और परिसर में शाखाएं लगाई जाती हैं. संस्था ख़ुद को वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा संचालित बताती है, उसी के हरियाणा कार्यालय से काम करती है और वहां आरएसएस के प्रांत प्रचारक और कई वीकेए नेताओं का आना-जाना रहा है. यह सब इसके संघ नेटवर्क में गहराई से जुड़े होने के ठोस संकेत थे.

इसी तरह, हमारे एक शोधकर्ता मलेशिया के एक सामान्य से लगने वाले संगठन ‘हिंदू सेवई संगम’ को संघ से तभी जोड़ पाए जब उन्होंने उनकी पत्रिकाओं में कार्यवाह और स्वयंसेवक जैसे शब्द देखे, जो एक तमिल बहुल समुदाय में असामान्य थे. आगे खोजने पर उन्हें गोलवलकर के उद्धरण और सोशल मीडिया पर शाखाओं की आरएसएस जैसी तस्वीरें मिली. अंततः हमने निष्कर्ष निकाला कि ‘हिंदू सेवई संगम’ वास्तव में हिंदू स्वयंसेवक संघ का ही मलेशियाई रूप था यानी आरएसएस का अंतरराष्ट्रीय विस्तार.

‘डॉ. आवाजी ठत्ते सेवा और अनुसंधान संस्था’ नाम का एक संगठन हमारा ध्यान तब खींचता है जब हमने देखा कि इसका नाम गोलवलकर के निजी सहायक के नाम पर रखा गया है. आगे जांच करने पर पता चला कि इसके पूर्व सचिव शैलेश जोगलेशकर आरएसएस के स्वयंसेवक हैं, जो विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हैं और भोंसला मिलिट्री स्कूल (जो आरएसएस के नियंत्रण में है) के सचिव भी हैं. इसके अलावा, जब यह देखा गया कि केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस दोनों संघ पृष्ठभूमि से हैं, तो इस बात की पुष्टि और मज़बूत हुई कि यह संस्था पूरी तरह से संघ नेटवर्क का हिस्सा है.

संघ के प्रकाशित दस्तावेज़ों और रिपोर्टों के इस गहन अध्ययन के आधार पर हमारी टीम ने उन सामान्य पैटर्नों (रूपों) की एक सूची तैयार की, जिनसे यह पहचाना जा सकता था कि कोई संगठन संघ नेटवर्क का सदस्य है या नहीं. इस सूची को और सटीक बनाने के लिए हमने दो वर्षों तक भारत के शिक्षाविदों, पत्रकारों और ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं से सलाह-मशवरा किया. उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर वे संकेत बताए, जिनसे किसी संगठन का संघ से जुड़ाव समझा जा सकता है.

इस प्रक्रिया से हमें एक विस्तृत और संतुलित मूल्यांकन तालिका मिली, यानी ऐसी चेक-लिस्ट जिसमें 34 अलग-अलग बिंदु थे जो यह दर्शाते थे कि किसी संगठन का संघ से संबंध कितना मज़बूत या कमज़ोर है. संघ के संगठन निर्माण का तरीका अपनी विशिष्ट शैली, नौकरशाही भाषा और पहचानने योग्य संकेतों से भरा हुआ है. इन्हीं विशेषताओं को एक-एक करके जोड़ कर हमने एक ऐसी पुनरावृत्त करने योग्य प्रक्रिया बनाई जिससे किसी संगठन का संघ से संबंध वस्तुनिष्ठ रूप से आंका जा सके. उदाहरण के तौर पर, अगर कोई संगठन ख़ुद बताता है कि उसे किसी आरएसएस प्रचारक ने स्थापित किया है, तो उसे 1.0 अंक दिया जाता है. अगर किसी संगठन के दफ़्तर में आरएसएस संस्थापकों की माला चढ़ाई हुई तस्वीरें लगी हों, तो उसे 0.5 अंक मिलता है. अगर कोई संगठन किसी संघ के नज़दीकी संगठन के साथ जुड़ा हुआ बताया गया है, तो उसे 0.25 अंक दिया जाता है. किसी संगठन का कुल स्कोर (1.0 तक सीमित) यह दर्शाता है कि उसका संघ से संबंध कितना गहरा है. 1.0 का स्कोर मतलब वह संगठन स्पष्ट रूप से संघ का हिस्सा है, 0.25 का स्कोर मतलब वह संघ से केवल कमज़ोर या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है.

इस पूरी शोध-पद्धति का विस्तृत विवरण मेरे द्वारा लिखे गए 2024 में ‘पॉलिटिक्स एंड सोसाइटी’ पत्रिका में प्रकाशित लेख और वेबसाइट पर दिए गए लिंक में मौजूद है.

अब तक हमारी जांच में 2,500 से अधिक संगठन ऐसे मिले हैं जो संघ नेटवर्क से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं. संघ की संरचना केंद्र से किनारे तक फैले एक मॉडल के रूप में काम करती है जिसमें एक सघन मुख्य केंद्र और उसके चारों ओर अपेक्षाकृत ढीले संबंधों वाला बाहरी घेरा होता है.

स्वाभाविक रूप से, संघ के इस केंद्रीय हिस्से में प्रमुख संगठन शामिल हैं जैसे विश्व हिंदू परिषद, भारतीय जनता पार्टी, वनवासी कल्याण आश्रम, और सेवा भारती. नेटवर्क विश्लेषण के दृष्टिकोण से, इसके केंद्र में कुछ बड़े विदेशी फ़ंड जुटाने वाले संगठन भी हैं जैसे इंडिया डिवैलपमंट एंड रिलीफ फंड और सपोर्ट अ चाइल्ड, यूएसए जो एक साथ सैकड़ों संगठनों को वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं.

संघ की कार्यकारी व्यवस्था में आरएसएस के नेता और कुछ ग़ैर-आरएसएस संगठन दोनों शामिल होते हैं. इस ‘मैनेजेरियल आरएसएस’ के केंद्र में प्रचारक होता है, जिसकी भूमिका संघ नेटवर्क को चलाने में बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. प्रचारकों को आरएसएस के मुख्य मिशन की ट्रेनिंग दी जाती है और उसके बाद उन्हें संघ परिवार के अलग-अलग संगठनों में भेजा जाता है, जहां वे नेटवर्क पर नियंत्रण बनाए रखते हैं. वे अक्सर संगठन मंत्री के रूप में काम करते हैं. इन अधिकारियों के पास इतनी ट्रेनिंग, वैचारिक प्रतिबद्धता और अधिकार होता है कि वे जिन संगठनों में भेजे जाते हैं, वहां आरएसएस की ओर से बड़े निर्णय ले सकते हैं. सबसे ज़रूरी बात, वे नए संगठन और नयी शाखाएं भी बना सकते हैं. हमारी खोज में ऐसे सैकड़ों संगठन मिले जो इसी तरह प्रचारकों द्वारा स्थापित किए गए थे.

हालांकि, संघ के केंद्रीय ढांचे से बाहर की परतें और भी दिलचस्प हैं. आरएसएस की मुख्य शाखाओं और बीजेपी जैसी राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता संघ के सबसे प्रभावशाली और पहचाने जाने वाले चेहरे हैं, लेकिन शासन ही संघ का एकमात्र या मुख्य उद्देश्य नहीं है. हज़ारों छोटे, अपेक्षाकृत अनजान संगठनों की मौजूदगी यह दिखाती है कि संघ का असली लक्ष्य सिर्फ़ प्रशासनिक नियंत्रण नहीं बल्कि भारतीय समाज में व्यापक स्तर पर बदलाव लाना है. ये छोटे संगठन, अपनी सादगी और अप्रत्यक्षता की वजह से, संघ को समाज के अनेक हिस्सों तक पहुंचाने में मदद करते हैं. वे एक ही समय में कई तरह के समूहों से संवाद करते हैं, कभी-कभी एक-दूसरे के विपरीत विचारों के साथ भी. हमारे शोध ने संघ के इन संगठनों को उनके काम और संरचना के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा.

संघ के सदस्य-आधारित संगठनों को हमने ‘कैडर संगठन’ कहा. इन संगठनों में बड़ी संख्या में लोगों को संगठित करने और रज़ामंद करने की क्षमता होती है. इन कैडर संगठनों में पारंपरिक संगठनों की सारी प्रमुख विशेषताएं होती हैं : शाखा-आधारित ढांचा, औपचारिक प्रशासनिक अनुक्रम, कार्यकर्ताओं की वैचारिक प्रतिबद्धता, प्रशिक्षण प्रक्रिया और सीमित सदस्यता. संघ के अन्य संगठनों के पास कर्मचारी या लाभार्थी हो सकते हैं, लेकिन कैडर संगठन वे हैं जिनके सदस्य सक्रिय रूप से किसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए जुटते हैं. उदाहरण के लिए :

स्वयं आरएसएस, जिसकी शाखाएं और परेड उसकी पहचान बन चुकी हैं

एबीवीपी, जो छात्रों को रैलियों और अभियानों में जुटाती है

बीजेपी, जो चुनावों के दौरान जनसमर्थन जुटाती है

वनवासी कल्याण आश्रम, जो आदिवासी क्षेत्रों में ‘संघी’ पहचान फैलाने के लिए कार्यकर्ताओं को भेजता है

या बजरंग दल, जो युवाओं को आक्रामक अभियानों में संगठित करता है

कैडर संगठन आमतौर पर सीधे आरएसएस से निकले होते हैं, इनके बीच कोई मध्यस्थ संगठन नहीं होता. इन पर प्रचारकों का सशक्त नियंत्रण होता है और अधिकांश का गठन संघ के शुरुआती विस्तार काल में हुआ था. कैडर संगठन स्वयं को संघ का मुख्य भाग मानते हैं और आम जनता भी इन्हें संघ की पहचान से जोड़ कर देखती है. ये संगठन संघ की राजनीति को जनता के बीच व्यापक समर्थन के रूप में दृश्यमान बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं.

‘समन्वयक संगठन’, मुख्य संघ नेटवर्क संगठनों और उसके बाहरी छोरों के बीच सूचना और धन के प्रवाह को एक नौकरशाही ढांचे के माध्यम से संचालित करते हैं. इन संगठनों में आम तौर पर बहुत बड़ी सदस्य संख्या नहीं होती, बल्कि ‘वेद मंदिर कमिटी’ जैसे संस्थानों की तुलना में कम पेशेवर कर्मचारी कार्यरत रहते हैं. इन समन्वयक संस्थाओं का अधिकांश ‘वास्तविक कार्य’ उनके अधीनस्थ संगठनों के माध्यम से संपन्न होता है. उदाहरण के लिए, ‘विद्या भारती’ देशभर में लगभग 12,000 विद्यालयों के व्यापक शैक्षिक नेटवर्क का दावा करती है. (हमने इन विद्यालयों का नक्शा भी तैयार किया है, परंतु उन्हें इस आंकड़े-संग्रह से इसलिए अलग रखा गया ताकि अन्य संगठनों की दृश्यता कम न हो.) हालांकि, इन शैक्षिक सेवाओं का वास्तविक संचालन प्रायः राज्य-स्तरीय संस्थाओं जैसे सरस्वती शिक्षा समिति (मध्य प्रदेश), भारतीय शिक्षा समिति (जम्मू) या भारतीय श्री विद्या परिषद (उत्तर प्रदेश) के माध्यम से किया जाता है.

क्योंकि बड़ी संख्या में अधीनस्थ संस्थानों की स्थापना या संचालन के लिए उच्च स्तर की संस्थागत संरचना की आवश्यकता होती है, इसलिए समन्वयक संगठन प्रायः संघ के भीतर अपेक्षाकृत पुराने और प्रतिष्ठित संगठन होते हैं. उनकी यह प्रतिष्ठा, तथा संघ के केंद्र और परिधि के बीच सेतु का कार्य करने की उनकी प्रमुख भूमिका, इस बात की ओर संकेत करती है कि इनमें केंद्रीय संघ कार्यकारी की उपस्थिति अन्य संगठनों की तुलना में अधिक सशक्त होती है. वास्तव में, ये संगठन वे केंद्र हैं जिनके माध्यम से संघ के कोर और परिधि के बीच सभी संचार और संसाधन प्रवाहित होते हैं. हमारे अध्ययन में पाया गया कि औसतन, किसी भी संगठन और आरएसएस के बीच कम से कम एक मध्यवर्ती संगठन अवश्य होता है और जब यह तथ्य जोड़ा जाए कि लगभग आधे संघ संगठन केवल एक ही संपर्क-बंधन से जुड़े हैं, तो इन समन्वयक संगठनों का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है. यदि ‘सेवा भारती’, ‘आईडीआरएफ़’, ‘विश्व हिंदू परिषद’ या ‘हिंदू सेवा प्रतिष्ठान’ जैसे मध्यवर्ती संगठन अस्तित्व में न हों, तो संघ के आधे से अधिक संगठन नेटवर्क से पूरी तरह कट जाएंगे.

इसी के साथ, ये संगठन संघ के केंद्र और परिधि के बीच सार्वजनिक रूप से स्वीकार या अस्वीकार किए जाने वाले संबंधों की प्रकृति की भी मध्यस्थता करते हैं. इन संगठनों द्वारा किया गया समन्वय संघ के लिए वह ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ उत्पन्न करता है, जिससे वह आवश्यकतानुसार किसी संबंध को स्वीकार या नकार सके.

इस प्रकार के अन्य संगठनों में ‘भारतमाता गुरुकुल आश्रम ट्रस्ट’ (बेंगलुरु), ‘पद्म केशव ट्रस्ट’ (मध्य प्रदेश) और ‘डॉ. मुखर्जी स्मृति न्यास’ (नई दिल्ली) शामिल हैं.

‘कैंपेन ऑर्गेनाइज़ेशंस’ अधिकतर किसी विशेष उद्देश्य, जन-आंदोलन, नीति-परिवर्तन या मुद्दे के लिए अस्थायी रूप से गठित किए जाते हैं और अपने लक्ष्य की पूर्ति के बाद निष्क्रिय हो जाते हैं. उदाहरण के तौर पर, ‘पंजाब राहत समिति’ और ‘बस्तुहारा सहायता समिति’ का गठन विभाजन के समय शरणार्थियों की सहायता के लिए हुआ था; ‘मोरवी राहत समिति’ जैसे संगठन प्राकृतिक आपदाओं के समय सक्रिय रहे; ‘रामजन्मभूमि न्यास’ जैसे मंदिर आंदोलनों तथा ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ जैसे ईसाई-विरोधी आदिवासी अभियानों में भी यही ढांचा दिखाई देता है. हाल ही में अमेरिकी संघ ने ‘आंबेडकर-फुले नेटवर्क ऑफ़ अमेरिकन दलित्स एंड बहुजन्स’ नामक संगठन का गठन केवल इस उद्देश्य से किया कि कैलिफ़ोर्निया राज्य में जाति-आधारित संरक्षण कानूनों का विरोध किया जा सके और वह भी दलित एवं बहुजन समूहों के नाम पर.

उसी समय, ये संगठन संघ के भीतर ‘संघर्ष की मिथक-गाथा’ के निर्माण में भी अत्यंत आवश्यक भूमिका निभाते हैं. हालांकि संघ आज ऐसी सरकार पर नियंत्रण रखता है जो विश्व की जनसंख्या के पांचवें हिस्से पर शासन करती है, फिर भी वह अपनी वैचारिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा हिंदू उत्पीड़न और सरकारी दमन की कथाओं से ग्रहण करता है. इस संदर्भ में, ‘न्यायपूर्ण आंदोलन’ की छवियां या ‘सेवा कार्य’ के वे प्रसंग, जब कोई और आगे नहीं आया, संघ के लिए नैतिक पूंजी का कार्य करते हैं.

‘फ्रंट संगठन’ शब्द का प्रयोग हमने इसके सामान्य अर्थ से कहीं अधिक सटीक अर्थ में किया है. हमारे अनुसार, ऐसे संगठन वे होते हैं जो अपने मूल संगठन से भौतिक रूप से लगभग अस्पष्ट होते हैं अर्थात् उनकी वित्तीय व्यवस्था, गतिविधियां, संगठनात्मक संरचना और अधिकार प्रवाह सब समान होते हैं, लेकिन वे एक अलग नाम के तहत संचालित किए जाते हैं, ताकि संगठनात्मक दोहराव और अस्पष्टता की रणनीति को बनाए रखा जा सके. यह परिभाषा संघ के सिर्फ़ कुछ ही संगठनों पर लागू होती है.

उदाहरण के लिए, ‘सेवा भारती’ पूरे भारत में कार्यरत है, किंतु उसके राज्य-स्तरीय विभाग अक्सर अलग नाम और कानूनी पहचान के तहत कार्य करते हैं. जैसे, ओडिशा में उत्कल विपन्न सहायता समिति, महाराष्ट्र में जनकल्याण समिति, त्रिपुरा में विवेकानंद सेवा न्यास और उत्तराखंड में उत्तरांचल उत्थान परिषद के नाम से सक्रिय है. इसी प्रकार, विद्या भारती राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करती है, लेकिन, झारखंड में इसे वनांचल शिक्षा समिति, तमिलनाडु में तमिल कल्वी कझगम, दिल्ली में समर्थ शिक्षा समिति और पंजाब में सर्वहितकारी शिक्षा समिति के नाम से जाना जाता है.

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि संघ के आंतरिक प्रकाशनों और संवादों में इन मूल और फ्रंट संगठनों के बीच का यह भेद लगभग समाप्त हो जाता है.

इसके अतिरिक्त, हमने कई ऐसे संगठनों की भी पहचान की जिन्हें हमने ‘गुप्त संगठन’ की संज्ञा दी है. यही वे संगठन हैं जिनका नाम आते ही सामान्य जनमानस में संघ के साथ जुड़ी हिंसा की छवि उभरती है. ये गुप्त संगठन केवल संघ के साथ अपने संबंधों को ही नहीं छिपाते, बल्कि स्वयं संगठन या उसकी गतिविधियों को भी पर्दे में रखते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि ये प्रायः ऐसे कार्यों में लिप्त होते हैं जो या तो अवैध होते हैं या संघ की प्रतिष्ठा के लिए हानिकारक हो सकते हैं.

संघ का एक उद्देश्य यह भी है कि वह एक मज़बूत, पुरुषत्व से भरपूर और आक्रामक समुदाय की छवि बनाए, ताकि वह हिंदू राष्ट्र के अपने वादे को पूरा कर सके. चुनावों के समय हिंसा मतदाताओं को एकजुट करने के लिए एक उपयोगी रणनीति बन सकती है, लेकिन इसके साथ एक छवि को नुकसान पहुंचाने का बड़ा ख़तरा भी जुड़ा होता है.

इसी बीच, संघ ने अपनी छवि सुधारने और समाज के लिए अपनी सोच को और अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए एक तरह की रणनीतिक छवि-निर्माण की कोशिशें की हैं. 1970 के दशक के अंत के बाद जब संघ की ताकत बढ़ने लगी, तो उसे समाज के कुछ वर्गों को बाहर रखने को लेकर होने वाली बढ़ती सार्वजनिक आलोचना का सामना करना पड़ा. इसका असर यह हुआ कि संघ ने एक नए प्रकार के संगठन बनाने शुरू किए जिन्हें प्रदर्शन के लिए बनाए गए संगठन या ‘शोपीस संगठन’ कहा जा सकता है.

इन संगठनों का प्रमुख उद्देश्य अपनी उपस्थिति के माध्यम से संघ के बारे में एक संदेश देना होता है. ये आम तौर पर बहुत प्रचारित होते हैं, परंतु संगठनात्मक रूप से सतही और सीमित होते हैं. इनका कार्य है संघ पर लगने वाले जातिवाद, सांप्रदायिकता और हिंदू सर्वोच्चता के आरोपों को निष्प्रभावी करना और अधिक लोगों को संघ के प्रभाव क्षेत्र में लाना.

उदाहरण के लिए, ‘सामाजिक समरसता मंच’ की स्थापना 1983 में उस समय हुई, जब 1981 में मीनाक्षीपुरम के दलितों ने सामूहिक रूप से इस्लाम धर्म अपनाया था.

‘राष्ट्रीय सिख संगत’ की स्थापना 1986 में सिख विरोधी हिंसा के बाद इस उद्देश्य से की गई कि यह प्रदर्शित किया जा सके कि सिख धर्म और हिंदू राष्ट्रवाद के बीच कथित रूप से कोई विरोधाभास नहीं है.

इसी तरह, ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ की स्थापना 2002 के गुजरात दंगों के कुछ ही महीनों बाद की गई, ताकि यह दिखाया जा सके कि संघ मुसलमानों से ‘नफ़रत नहीं करता’. यह संगठन संघ की छवि सुधारने की रणनीति का एक हिस्सा था.

इन संगठनों की नेटवर्क में स्थिति आमतौर पर अंतिम छोर जैसी होती है. इसका मतलब यह है कि ये शोपीस संगठन उन बाकी संघ संगठनों की तरह आगे नई शाखाएं या नए संगठन नहीं बनाते. ये आमतौर पर आरएसएस के सीधे अधीन होते हैं और इनमें प्रचारकों की मज़बूत मौजूदगी होती है. शोपीस संगठन संघ की बड़ी जन-संगठन रणनीतियों के मुख्य केंद्र नहीं लगते. उदाहरण के तौर पर, ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ दो दशक पहले बना था, लेकिन आज भी यह संघ और मुस्लिम समाज के संपर्क का अंतिम छोर बना हुआ है. इससे पता चलता है कि यह क्षेत्र संघ के लिए बहुत बड़ा प्राथमिकता वाला क्षेत्र नहीं है.

हमने कई तरह के ‘प्रशिक्षण संगठन’ भी पहचाने. संघ की स्थापना को 100 साल हो चुके हैं, और संघ हमेशा यह कहता रहा है कि उसका मूल लक्ष्य व्यक्ति-निर्माण है. व्यक्ति-निर्माण का अर्थ है लोगों की शारीरिक क्षमता, स्वभाव, विश्वास और पहचान को इस तरह गढ़ना कि वे हिंदू राष्ट्र के आदर्श नागरिक बन जाएं.

शाखा प्रणाली के माध्यम से होने वाले इस व्यक्ति-निर्माण पर बहुत लिखा गया है, लेकिन कैडर-आधारित आरएसएस ऐसे कई संगठनों में से सिर्फ़ एक है जो यह काम करते हैं.

संघ ने कई प्रकार के दूसरे प्रशिक्षण संस्थानों में निवेश किया है, जिन्हें ऐसे ‘कारख़ाने’ की तरह तैयार किया जाता है जो ग़ैर-संघ लोगों को संघ के विस्तार के साधनों में बदल देते हैं. ‘रांभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी’ राजनीतिक नेताओं को प्रशिक्षित करती है. ‘सेंट्रल हिंदू मिलिटरी एजुकेशन सोसाइटी’ ऐसे ‘संघी सैनिक’ तैयार करती है जिनसे उम्मीद होती है कि वे एक दिन ‘संघी जनरल’ बनेंगे. ‘स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान’ एक बड़े उत्पादन केंद्र की तरह है, जो ऐसे योग शिक्षक तैयार करता है जो दुनिया भर में हिंदू राष्ट्रवादी योग की सॉफ्ट पावर फैला सकें. प्रशिक्षण संगठनों के पास ही एक और श्रेणी होती है, जिसे ‘ज्ञान-उत्पादन संगठन’ कहा जा सकता है.

ये वे संस्थान होते हैं जो ऐसा बौद्धिक, सांस्कृतिक, भावनात्मक और कलात्मक वातावरण तैयार करते हैं, जिसमें संघ के अन्य संगठनों की गतिविधियां वैध और सही लगने लगती हैं. उदाहरण के लिए : ‘फोरम फ़ॉर इंटीग्रेटेड नेशनल सिक्योरिटी’; ‘फोरम फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड सिक्योरिटी स्टडीज़’; ‘जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर’; ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन’. ये संस्थान मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े नीतिगत सवालों पर काम करते हैं.

कारवां की रिपोर्ट के अनुसार, विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन कश्मीर में सैन्य हस्तक्षेप से संबंधित विस्तृत प्रस्ताव तैयार करता है, जिनका उपयोग बाद में बीजेपी सरकार के अधिकारी कश्मीर के अधिग्रहण को सही ठहराने के लिए करते हैं.

इस श्रेणी के अंतर्गत, हमने संघ के अनुसंधान कार्य को उसके थिंक-टैंक, नीतिगत संस्थानों और भारतीय ज्ञान केंद्रों की व्यवस्था से जोड़ कर समझा : दीनदयाल शोध संस्थान’ और ‘सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज़’, आर्थिक (विशेषतः ग्रामीण) विकास पर काम करते हैं; ‘भारतीय विचार केंद्रम’ और ‘विश्व अध्ययन केंद्र’, भारतीय सभ्यता की उपलब्धियों पर केंद्रित हैं; कुछ लिंग-संबंधी मुद्दों पर कार्य करते हैं जैसे ‘दृष्टि स्त्री अध्ययन प्रबोधन केंद्र’. कुछ शिक्षा से संबंधित हैं जैसे ‘संवित रिसर्च फाउंडेशन’ और कुछ आदिवासी व मूलनिवासी अध्ययन से जैसे ‘इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर कल्चरल स्टडीज़’.

इन संस्थाओं की गतिविधियां अक्सर एक प्रतिक्रियात्मक रूप में देखी जा सकती हैं. यह संघ की वह प्रतिक्रिया है जो हिंदू राष्ट्रवादियों पर लगे आरोपों के विरुद्ध विकसित हुई कि उनके पास न तो कोई ‘महान बौद्धिक परंपरा’ है, न ही कोई ‘गंभीर शासन दृष्टि’. इनमें से अधिकांश शोध संस्थान 1990 के दशक के बाद और 2000 के दशक की शुरुआत में उभरे, ठीक उसी समय जब अल्पसंख्यक समुदायों पर हिंसा भड़काने में संघ की भूमिका की आलोचना बढ़ रही थी.

अंततः संघ के भीतर सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण वर्ग है ‘लास्ट-माइल ऑर्गनाइजेशन्स’ यानी वे छोटे-छोटे सेवा प्रदान करने वाले संगठन, जो संघ के संसाधनों और सामान्य जनता के बीच अंतिम संपर्क बिंदु बनते हैं. ये वे नेत्र-चिकित्सालय, रक्त बैंक, गांवों के स्कूल, अनाथालय, कुष्ठ रोग क्लिनिक जैसी संस्थाएं हैं, जो उन समुदायों में सेवाएं प्रदान करती हैं जिन्हें संघ अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना चाहता है. इन संगठनों का आकार छोटा है, परंतु इनकी संख्या, भौगोलिक फैलाव और समुदायों में गहरी पहुंच इन्हें अत्यंत प्रभावशाली बनाते हैं, ये लगातार और सीधे तौर पर बड़ी आबादी से संपर्क में रहते हैं.

इन संगठनों का स्थान संघ नेटवर्क की संरचना में काफ़ी हद तक हाशिए पर होता है. इनमें से अधिकतर संगठन नेटवर्क के अंतिम छोर पर होते हैं, जिनकी सिर्फ़ एक ही कड़ी किसी समन्वय करने वाले संगठन से जुड़ी होती है और अन्य समान संगठनों से लगभग कोई संबंध नहीं होता. ये संगठन किसी मज़बूत संघ-सम्बंधित सामाजिक माहौल में काम नहीं करते और अक्सर हिंदुत्व विचारधारा पर ज़ोर नहीं देते, जिससे नए समर्थकों के लिए यह नेटवर्क से जुड़ने का एक सुरक्षित और बिना विवाद वाला रास्ता बन जाता है. इनका ध्यान ज़्यादातर ज़मीनी स्तर पर सेवा कार्य करने पर होता है, जो संघ की आत्म-छवि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, वैसा ही जैसा वह अपने बारे में लोगों को दिखाना चाहता है. लेकिन ये संस्थान धीरे-धीरे राष्ट्रवादी सोच को बढ़ावा देने और समर्थकों को तैयार करने के भी महत्वपूर्ण स्थान होते हैं. यह भी ध्यान देने योग्य है कि ऐसे संगठनों के माध्यम से प्रवासी संघ समर्थकों से बहुत बड़ी मात्रा में धनराशि चैरिटी के नाम पर आती है.

हमारी टीम को पूरा विश्वास है कि यह शोध और भी नए शोधों और पत्रकारिता के लिए नए रास्ते खोलेगा. इसमें शामिल हैं : संघ धन और संसाधनों का प्रवाह कैसे करता है, इसका पता लगाना; संघ की कम सार्वजनिक प्राथमिकताओं को समझना, जैसे कि इसके सैकड़ों रेज़िडेंशियल स्कूल और छात्रावास का नेटवर्क और संघ के भीतर छुपे हुए विभिन्न आंतरिक संघर्षों को समझना और उजागर करना. इन सवालों और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को समझने के लिए, यह आवश्यक है कि सबसे पहले यह समझा जाए कि संघ वास्तव में क्या है. हमें उम्मीद है कि इस दिशा में हमने एक प्रारंभिक रोडमैप प्रदान किया है.

लेकिन इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण योगदान केवल तथ्यात्मक नहीं, बल्कि विचारात्मक भी है. पिछले कई दशकों से संघ को लेकर दो समानांतर धारणाएं प्रचलित रही हैं. पहली धारणा यह मानती है कि संघ के विभिन्न घटक केवल एक साझे वैचारिक लक्ष्य के आधार पर ढीले-ढाले रूप से जुड़े हुए हैं

यानी, आरएसएस स्वयं को केवल ‘प्रेरणास्रोत’ के रूप में देखता है, जो समर्पित स्वयंसेवकों और संगठनों की एक श्रंखला को प्रेरित करता है. दूसरी धारणा, इसके विपरीत, यह मानती है कि संघ को केवल वैचारिक समानता से नहीं, बल्कि संगठनात्मक ढांचे से उत्पन्न भौतिक और प्रशासनिक संबंधों से अधिक परिभाषित किया गया है. इस दृष्टिकोण में, संघ अपने प्रबंधन और समन्वय को मुख्य कार्यों में गिनता है और वह अक्सर जानबूझ कर विभिन्न समुदायों के सामने अलग-अलग चेहरों को प्रस्तुत करता है, परंतु वह इन्हें एक ही मातृ-संगठन से उत्पन्न रूपों में देखता है, ऐसे रूप जो मूलतः एक ही इकाई के अभिन्न हिस्से हैं और जिनके बीच यह संगठन निरंतर संसाधन और संरचना के ज़रिए एकता बनाए रखता है.

हमें यह याद रखना चाहिए कि दोनों ही दृष्टिकोणों को, स्वयं आरएसएस ने ही प्रोत्साहित किया है. लेकिन मुख्य बात यह है कि इनमें से एक रूप जनता के सामने प्रस्तुत किया जाता है, जबकि दूसरा संघ के आंतरिक दर्शकों के लिए सुरक्षित रखा जाता है. अब संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है, तो जनता का यह अधिकार है कि वह यह जाने कि संघ अपने बारे में अपने आंतरिक दस्तावेजों में क्या कहता है और उसी आधार पर अपनी समझ विकसित करे.

  • फीलिक्स पाल यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में राजनीतिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लेक्चरर हैं.)
    कारवां पत्रिका से साभार

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लॉग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
G-pay
Previous Post

आरएसएस का पर्दाफाश : इतिहास के सबसे बड़े दक्षिणपंथी संगठन की संरचना का ख़ुलासा, भाग – 2

Next Post

ऑपरेशन कगार : भारत का अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

ऑपरेशन कगार : भारत का अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

लक्ष्मी विलास बैंक का सिंगापुर की सबसे बड़े ऋणदाता डीबीएस बैंक के लोकल यूनिट डीबीएस बैंक के साथ विलय

November 19, 2020

बैन की राजनीति यानी भयदोहन का आज़माया हुआ हथियार

November 4, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.