'मनुवादी कॉरपोरेटपरस्त मोदी-शाह की सत्ता के खिलाफ संघर्ष तेज करो' - सीपीआई माओवादी
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'मनुवादी कॉरपोरेटपरस्त मोदी-शाह की सत्ता के खिलाफ संघर्ष तेज करो' - सीपीआई माओवादी
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की तेलंगाना राज्य समिति के प्रवक्ता जगन के नाम से 4 दिसम्बर को जारी प्रेस बयान में कहा गया है कि आरएसएस-भाजपा की फासीवादी केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ लड़ें, जिसने विकासशील भारत के नाम पर एक कॉर्पोरेटवादी भारत के निर्माण का बीड़ा उठाया है. इसके साथ ही उन्होंने आह्वान किया है कि विपक्षी दलों द्वारा आयोजित अखिल भारतीय विरोध प्रदर्शनों में हजारों की संख्या में भाग लें और संघर्ष करें.
प्रेस बयान जारी करते हुए उन्होंने बताया कि प्रिय लोग, मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली केंद्र की मनुवादी सरकार ने 28, 29 और 30 नवंबर को रायपुर में डीजीपी, अर्धसैनिक बलों के प्रमुखों और खुफिया एजेंसियों की बैठक की. इसमें कहा गया कि पुलिस व्यवस्था को मजबूत किया जाए और विकासशील भारत (कॉर्पोरेट) के निर्माण में कोई बाधा न आए. आने वाले समय में जनता, नागरिक समाज, राजनीतिक दलों और संगठनों की ओर से उठने वाले आंदोलनों का सख्ती से दमन करने का निर्णय लिया गया.
पिछले 11 वर्षों से ये मनुवादी एलपीजी नीतियों को अमृत काल, आत्मनिर्भर भारत, नया भारत, शेष भारत, एक भारत, विकासशील भारत जैसे आकर्षक नाम और गोएबल्स प्रोपेगैंडा देते आ रहे हैं. मोदी सरकार में जहां निजी कॉर्पोरेट कंपनियों की संपत्ति बढ़ रही है, वहीं सरकार का कर्ज भी बढ़ रहा है.
संसदीय लोकतंत्र और संविधान का राग अलापते हुए, राष्ट्रीय स्वयंसेवक के एजेंडे में शामिल मुद्दों को नीतियों और कानूनों के रूप में लागू किया जा रहा है. सभी वर्गों, सभी दलों, प्रगतिशील ताकतों, लोकतंत्रवादियों, बहुजनों, दलितों और आदिवासियों पर हमला जमकर जारी है. हाल के बिहार चुनावों ने साबित कर दिया है कि वे किसी भी तरह से चुनाव जीत सकते हैं और विपक्षी दलों को हरा सकते हैं, चाहे उनके पास कितना भी जनसमर्थन क्यों न हो.
वास्तव में, कई क्षेत्रीय पर्यवेक्षकों ने कहा है कि चुनाव से पहले बिहार में लोगों का मूड विपक्षी दलों के लिए बहुत अनुकूल था लेकिन परिणाम बहुत अलग आए हैं. भारत में चुनाव आयोग, अदालतें, सीबीआई, एनआईए, ईडी, सेबी, यूजीसी, सतर्कता आयोग, सीएजी और अन्य सभी संस्थान पूरी तरह से भाजपा के नियंत्रण में आ गए हैं. जल्द ही, 130वें संविधान संशोधन के माध्यम से विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को हटाने का कार्यक्रम भी बनाया जा सकता है.
उन्होंने बिहार में एसआईआर कराकर चुनाव कराए और जीत हासिल की. हरियाणा और महाराष्ट्र में, उन्होंने एसआईआर कराए बिना भी चुनाव जीत लिए. वे साबित कर रहे हैं कि वे किसी भी तरह से जीतेंगे. इस तरह, उनका व्यवहार विपक्षी दलों में निराशा और विभाजन पैदा करता है. ऐसी स्थिति में संसदीय दलों को जनता के बीच जाकर सड़कों पर संघर्ष करना पड़ा.
बिहार चुनाव के बाद, श्रम शक्ति नीति-2025 के नाम से चार श्रम संहिताएं लागू की गईं. इनमें सस्ते श्रम का शोषण, काम के घंटे बढ़ाना, कानूनी अधिकारों को खत्म करना, यूनियन बनाने और हड़ताल करने के अधिकार में बाधा डालना और श्रमिकों की बर्खास्तगी को प्रबंधन की मनमानी पर छोड़ देना जैसे बदलाव किए गए. यह संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 23 का उल्लंघन है. इस तरह, लगभग 50 करोड़ के संगठित और असंगठित मजदूर वर्ग पर हमला तेज़ कर दिया गया. मनुवादियों ने केंद्रीय श्रमिक आंदोलन को कमज़ोर और तोड़ने के लिए ये संहिताएं लाईं.
वर्तमान संसद सत्र में परमाणु ऊर्जा के उपयोग और नियमन से संबंधित परमाणु ऊर्जा विधेयक-2025 पारित किया जा रहा है, जिसके तहत परमाणु ऊर्जा के उत्पादन और वितरण को निजी कंपनियों के हाथों में सौंप दिया जाएगा. आदिवासी, दलित, पिछड़े और सवर्ण समेत गरीब छात्रों को उच्च शिक्षा से वंचित करने के लिए यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीईआरटी को समाप्त करके एक शिक्षा आयोग (हिंदुस्तान शिक्षा आयोग) का गठन किया जाएगा. बिजली विधेयक पेश करके बिजली का पूर्ण निजीकरण किया जाएगा. बैंकों का विलय करके उन्हें कॉर्पोरेट कंपनियों को सौंप दिया जाएगा.
देश की अर्थव्यवस्था वित्तीय निवेश कंपनियों और बाज़ार की ताकतों के हाथों में कैद है. विदेशी निवेशक शेयर बाज़ार में अपना निवेश विदेश ले जा रहे हैं और ट्रम्प हमारे निर्यात पर भारी शुल्क लगा रहे हैं. इन कारणों से, रुपये का मूल्य और गिरकर 90.15 रुपये प्रति डॉलर हो गया है. इससे पेट्रोल, डीज़ल, खाद्य तेल और रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि होगी, जिसका ग़रीब और मध्यम वर्ग पर असहनीय बोझ पड़ेगा.
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के तहत, मोदी सरकार ने ट्रंप के आगे झुककर अमेरिका से कपास, मक्का, सोयाबीन और अन्य कृषि उत्पादों के आयात का समझौता कर लिया है. इससे पहले से ही कर्ज में डूबे हमारे देश के किसानों की स्थिति और खराब हो जाएगी. इसके कारण तेलंगाना के कपास किसानों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.
सीसीआई सरकार द्वारा घोषित कीमतों पर भी कपास नहीं खरीद रही है. इसने देश के सबसे बड़े सार्वजनिक उपक्रम एलआईसी पर दबाव डालकर अडानी की कंपनियों के 45,000 करोड़ रुपये के शेयर खरीद लिए हैं. इस तरह, देश की अर्थव्यवस्था दिन-ब-दिन कॉर्पोरेट्स के नियंत्रण में आती जा रही है.
दूसरी ओर, आरएसएस-भाजपा शासित राज्यों में आदिवासियों, दलितों और अन्य गरीब जातियों पर हमले बढ़ रहे हैं. सनातन धर्म के नाम पर जाति व्यवस्था-मनुवादी विचारधारा का बड़े पैमाने पर प्रचार किया जा रहा है और हमले किए जा रहे हैं. मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने भी उच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर कहा है कि जाति व्यवस्था ने भारत में प्रगतिशील भूमिका निभाई है. इस तरह ये मनुवादी सरकार संविधान का उल्लंघन कर हमले कर रहे हैं.
मोदी सरकार आईएएस, आईपीएस और क्लास वन अधिकारियों को अपने अधीन करके उन्हें अपना एजेंडा लागू करने के लिए तैयार कर रही है. इन 11 वर्षों में, 1500 से ज़्यादा अधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोपों और अवज्ञाकारी अधिकारियों के कारण सेवा से हटाया जा चुका है. कई लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज किए गए हैं. उन्हें तरह-तरह से परेशान किया गया है. हरियाणा के दलित आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार की आत्महत्या इसी स्थिति का एक उदाहरण है.
जो अधिकारी मनुवादियों के एजेंडे को लागू नहीं करना चाहते, वे इस्तीफ़ा देकर सेवा छोड़ रहे हैं. इसलिए, अब समय आ गया है कि दलित और कमज़ोर वर्ग यह तय करे कि उन्हें अपनी पूरी क्षमता मनुवादियों के एजेंडे को लागू करने में लगाकर जनविरोधी बनना है या जनता के पक्ष में खड़ा होना है. इन परिस्थितियों में, हम चाहते हैं कि वे संविधान के अनुसार जनता के पक्ष में काम करें.
खतरनाक स्थिति को देखते हुए, मजदूरों, किसानों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों, संगठनों और सभी दलों को इन आधुनिक मानवतावादियों के खिलाफ लामबंद होना होगा. क्रांतिकारी अभिवादन के साथ यह प्रेस बयान समाप्त होता है.
https://youtu.be/sJliQ4pHuVA
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