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Home कविताएं

मैं चाहता तो…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 14, 2024
in कविताएं
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मैं चाहता तो
आवाज़ बदल कर
बातें कर भी सकता था तुम से

चेहरा बदल कर
मिल भी सकता था तुम से

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SEDITIOUS RIVER

कौन है श्रेष्ठ ?

स्वप्न

जो जर्जर पुल
मेरे और तुम्हारे दरम्यान थे
अगर वे मेरे भार ढोने के काबिल नहीं थे

तो मैं भी
उन पुलों पर
किसी भारहीन कीड़े की तरह
रेंग कर
उस पार पहुंच भी सकता था

जहां मेरी पहचान
तुम्हारी दया के हवाले होती

मुझे मालूम है कि
मुझे नकारने के पहले
कांप जातीं तुम्हारी ऊंगलियां
जैसे किसी रहस्यमयी कहानी को
अनपेक्षित अंजाम तक अगले पन्ने पर पाने का डर
उंड़ेल देता है अपना सारा बर्फ़
सपाट साईबेरिया

हस्की व्हिस्की का मोहताज नहीं है

मुझे मालूम है
तुम्हें शौक़ है अकेले में
अपने को नग्न देखने का
उस आईने के सामने
जिस में अरसा हुआ है
किसी अक्स को उभरे हुए

जल कुंभी की माया ढंक देती है
एक ज़िंदा नहर को
जिसे मेरी शिराओं से काट कर
बहते हुए रक्त को एक अन्य दिशा देने की
कोशिश की गई थी कभी
किसी वातानुकूलित शल्य चिकित्सक के
मृत्यु तुल्य ठंढे कक्ष में
मेरी मरी हुई आंखों को बींधती हुई
रोशनी के तले

जहां से अंधेरा सिर्फ़ एक सांस की दूरी पर था

उस कालिख़ के चेहरे पर अगर मैं देख पाता
रेगिस्तान में गुम होती गई उस नदी को
तो मैं एक दूसरे चेहरे के लिए
मोल भाव कर भी सकता था
तुम्हें रिझाने के लिए

एक दूसरी ज़ुबान की ईज़ाद कर भी सकता था
तुम्हारी रूह के लिए

लेकिन मुझे
अंधेरे में पड़ी रस्सी सा
सांप सा दिखना कभी मंज़ूर नहीं था

इसलिए जा रहा हूं तुम से बहुत दूर
अपनी आवाज़ को हवाले किये
एक बांझ सहरा के हवाले
जो अब नहीं जनता है कोई सुराब

  • सुब्रतो चटर्जी

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