Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

भारत अब बुर्जुआ क्रांति के लिए तैयार है ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 16, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

भारत अब बुर्जुआ क्रांति के लिए तैयार है ?

Subrato Chatterjeeसुब्रतो चटर्जी

किसान आंदोलन की सापेक्षिक सफलता ने साबित किया है कि भारत अब बुर्जुआ क्रांति के लिए तैयार है. हमारे कम्युनिस्ट मित्र इस बात से सबक़ ले सकते हैं कि किसी भी देश या समाज में सर्वहारा की क्रांति कभी भी बुर्जुआ क्रांति के पहले नहीं होती. जिस रूसी क्रांति की बात वे करते हैं, वहाँ भी जारशाही के ख़िलाफ़ पहले बुर्जुआ क्रांति हुई थी.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

दरअसल, भारत में संविधान की स्थापना तथा नेहरू काल की मिश्रित अर्थव्यवस्था, जो कि ईंदिरा युग तक चली, के दौरान हम एक उदारवादी बुर्जुआ काल की तरफ़ ही बढ़ रहे थे, लेकिन इसमें एक समस्या थी. समस्या यह थी कि नेहरू, ईंदिरा के सामाजिक, राजनीतिक चेतना को देश ने विभिन्न क़ानूनों और प्रशासनिक पहलों द्वारा लागू होते हुए देखा, लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा, जो कि अर्ध सामन्ती, अर्ध पूँजीवादी मानसिकता से ग्रसित था, इस परिवर्तन के लिए तैयार नहीं था.

नतीजा ये हुआ कि जातिवाद को तोड़ने की आरक्षण द्वारा कोशिश को दलित को घोड़ी चढ़ने पर गोली मार कर जवाब दिया गया. इसी तरह, ज़मींदारी उन्मूलन क़ानून को बेनामी जमीन रख कर पलीता लगा दिया गया और देश के नब्बे प्रतिशत किसान छोटे और मार्जिनल रह गए. भूमिहीन किसानों की एक बड़ी संख्या भी बनती रही.

ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि सरकारी नीतियों और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच फ़र्क़ गहराता गया. 90 के दशक में जब इस बुर्जुआ मॉडेल का पर्याय बाज़ार वाद में ढूँढा जाने लगा तो समाज की प्रतिक्रिया वादी शक्तियों को पहले लगा कि उन्मुक्त अर्थव्यवस्था से उनके पारंपरिक या निहित स्वार्थों को कोई हानि नहीं होगी. यही कारण है कि भारत का मध्यम वर्ग पूरी तरह से बाज़ारवाद के साथ खड़े मिला.

सिकुड़ती सरकारी खर्च और फैलती बाज़ार व्यवस्था इस मध्यम वर्ग के लिए कोई चिंता की बात नहीं थी. प्राईवेट स्कूलों और तकनीकी संस्थाओं में घूस (डोनेशन) दे कर अपने बच्चों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लखटकिया नौकर बनाना ही इनके जीवन का सार बन गया.

दूसरी तरफ़, भारत में एक विशाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था है, जो कि कृषि पर आधारित है. किसान पारंपरिक समाज का अंग होने के साथ साथ भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी हैं. नये कृषि क़ानूनों ने इस यथास्थिति वाद पर सिर्फ़ दो धंधेबाज़ों के हक़ में हमला किया, और बात वहीं पर बिगड़ गई.

दो बेईमान गुजराती धंधेबाज़ों के बेशर्म दलाल सरकार ने भारतीय कृषि की अर्थव्यवस्था को बाज़ार के हवाले कर किसानों को सस्ते लेबर में बदलने की क्रिमिनल कोशिश की. किसानों ने इसका माकूल जवाब दिया.

किसान आंदोलन में बहुतेरे लोगों को गाँधीवादी सत्याग्रह की झलक दिखी. जो लोग देखना नहीं चाह रहे हैं वह ये है कि दरअसल आंदोलन का स्वरूप भले ही अहिंसक होने के नाते गाँधीवादी दिखा, लेकिन इसके पीछे कम्युनिस्ट लोगों की संगठनात्मक शक्ति का सबसे बड़ा रोल रहा. एक साल से ज़्यादा चले इस आंदोलन में पहली बार मार्क्स और गाँधी इतने क़रीब आए. यह इस आंदोलन का एक ऐसा वैचारिक पहलू है जिस पर आने वाले दिनों में और शोध होगा.

बहरहाल, मुद्दे की बात ये है कि, किसान आंदोलन ने संसद की महत्ता, जनोपयोगी पूंजीवाद, सड़क की ताक़त, लोकतंत्र में आंदोलन और वोट की शक्ति को पुनर्स्थापित करने में जो सफलता पाई है, वह मूलतः उन्हीं बुर्जुआ मूल्यों की पुनर्स्थापना है, जिनके लिए नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक लड़ते रहे.

प्रकारांतर में यह आंदोलन बाज़ारवाद के ख़िलाफ़ भी खड़ा हो गया, जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी. ग्लोबलाइज़ेशन, कम्युनिस्ट लोगों की नज़र में वैश्विक दास प्रथा का ही नव फासीवादी संस्करण रहा है. ज़ाहिर है कि स्वैच्छिक ग़ुलामों का भारतीय मध्यम वर्ग किसानों के साथ नहीं खड़ा मिला, जबकि किसान उनकी लड़ाई भी लड़ रहे थे.

उपसंहार में इतना ही कहना काफ़ी है कि किसान आंदोलन के रास्ते भारत में एक बुर्जुआ क्रांति की शुरुआत हुई है, जिसे पूरा करने की ज़िम्मेदारी कम्युनिस्ट लोगों की है. कोई भी जनक्रांति लोगों पर लादी नहीं जा सकती है, इसके लिए ज़मीन तैयार करनी पड़ती है. यह ज़मीन हमें ऐतिहासिक परिस्थितियाँ मुहैया करतीं हैं, और कोई नहीं.

जैसा कि मैं हमेशा कहता रहा हूँ कि हम क़ानूनी तौर प्रशासनिक रास्तों से वह सब हासिल नहीं कर सकते जो दूसरे समाजों ने ऐतिहासिक प्रक्रिया से हासिल किया है. अगर यूरोप के समाज को अंधराष्ट्रवाद से निकलने के लिए दो विश्वयुद्धों से गुजरना पड़ा तो मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के दाग मिटाने के लिए किसान आंदोलन की ज़रूरत पड़ी.

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें] 

Previous Post

हिंदू धर्म : एक आधुनिक आविष्कार

Next Post

एसआईटी की रिपोर्ट : लखीमपुर खीरी में पांच लोगों की हत्या, दुर्घटना नहीं साज़िश थी

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

एसआईटी की रिपोर्ट : लखीमपुर खीरी में पांच लोगों की हत्या, दुर्घटना नहीं साज़िश थी

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

‘अक्साई चिन कभी भी भारत का हिस्सा नहीं था’ – ब्रिगेडियर. बी.एल. पूनिया (सेवानिवृत्त)

November 14, 2024

देश किस ओर ?

April 12, 2018

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.