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गरीबों के घरों पर दहाड़ने वाला बुलडोजर और गोदी मीडिया अमीरों के घरों के सामने बुलडॉग क्यों बन जाता है ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 30, 2022
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गरीबों के घरों पर दहाड़ने वाला बुलडोजर और गोदी मीडिया अमीरों के घरों के सामने बुलडॉग क्यों बन जाता है ?
गरीबों के घरों पर दहाड़ने वाला बुलडोजर और गोदी मीडिया अमीरों के घरों के सामने बुलडॉग क्यों बन जाता है ?
रवीश कुमार

यह बुलडोज़र नहीं है बल्कि उस खेल का प्रतीक है जिसे मिलकर ताकतवर लोग धर्म, कानून के नाम पर ग़रीबों और साधारण लोगों के खिलाफ खेल रहे हैं. ग़ौर से देखेंगे तो यह बुलडोड़र सबका भारत और एकतरफा भारत के बीच की रेखा पर चलता दिखाई देगा. भारत का गोदी मीडिया कितनी चतुराई से उन लोगों को लेक्चर दे रहा है जो बुलडोज़र पर सवाल उठा रहे हैं, उनसे कहता है कि कानून पर भरोसा करना होगा, सब कानून से चलेगा.

गोदी मीडिया जानता है कि कानून कैसे चलता है. उसे यह भी पता है कि यह कानून किसके हिसाब से और किसके ख़िलाफ़ चलता है. इसलिए जिनके घर टूटे हैं उन्हें वापस उसी कानून को लागू करने वालों के पास भेज रहा है, जो कुर्सी पर बैठ कर किसी और का एजेंडा लागू कर रहे होते हैं.

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कानून के बजाय सत्ताधारी दलों का ऐजेंडा लागू करती पुलिस और गोदी मीडिया

इस साल एक अप्रैल को CBI की स्थापना दिवस पर भारत के प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमना ने कहा था कि ‘पुलिस अफसर सत्ता में मौजूद राजनीतिक पार्टी का फेवर लेते हैं और उनके विरोधियों के खिलाफ कार्यवाही करते हैं. बाद में विरोधी सत्ता में आते हैं तो पुलिस अफसरों पर कार्यवाही करते हैं. इस हालात के लिए पुलिस विभाग को ही जिम्मेदार ठहराना चाहिए. उनको कानून के शासन पर टिके रहना चाहिए. इसे रोकने की जरूरत है.’

गोदी मीडिया को यह सच्चाई मालूम है और वह उस बहुमत की सच्चाई भी जानता है जिसके दम पर कानून के सहारे बुलडोज़र चलवाया जा रहा है. उसे पता है कि पार्षद से लेकर किन नेताओं ने अतिक्रमण किया है मगर वह कभी अपने कैमरे को वहां तक नहीं ले जाएगा. उनको अपनी पीठ के पीछे छिपा कर किसी ग़रीब और साधारण लोगों को ललकारेगा कि आपने कानून का पालन किया तो डर किस बात का. नहीं किया है तो अतिक्रमण स्वीकार करना ही होगा.

अतिक्रमण के नाम पर बुलडोज़र जहां चल रहा है वह केवल कानून के नाम पर या कानून के लिए नहीं चल रहा है. राजनीति उसे चला रही है. कोई बड़ी बात नहीं इस देश में ग़रीब के घर उजाड़ देना, कोई बड़ी बात नहीं कि घर उजाड़ कर वही सत्ता उस ग़रीब को ख़रीद भी ले लेकिन बुलडोज़र चलाने वाला वह ग़रीब चालक जानता है, उसे महसूस होता है जब वह किसी का घर तोड़ता है.

अदालतें भी सत्ताधारियों के अतिक्रमण का ऑडिट क्यों नहीं करती ?

कितना अच्छा होता कि बुलडोज़र पहले सत्ता पक्ष के लोगों के यहां चलता जिन्होंने नियमों को तोड़ घर बनाए, दिल्ली के रेज़िडेंट वेलफेयर एसोसिएशन वाले वाले सब जानते हैं लेकिन वे भी चुप रहेंगे. मीडिया भी नहीं जाएगा देखने कि विधायकों और पार्षदों ने अपने घर नियमों के अनुसार बनाए हैं या नहीं.

काश अदालत भी कम से कम दिल्ली शहर में आडिट करा दे. दिल्ली में सांसद, विधायक, पार्षद और सभी पार्टी के एक एक दर्जन पदाधिकारी के निजी घरों की आडिट कोई बड़ी बात नहीं है. एक महीने से कम समय में हो सकता है. कोर्ट के सामने वह आडिट पेश हो और वह बता दे कि इन लोगों ने अतिक्रमण किया है तो पहले इनके यहां बुलडोजर चलेगा और फिर सबके यहां.

6 फरवरी 2020 के इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार शहरी मामलों के मंत्रालय ने दिल्ली हाईकोर्ट में बताया था कि 11 पूर्व सांसद और अधिकारियों ने 576 सरकारी मकानों को कब्जा़ रखा है. क्या आपने 576 घरों में बुलडोज़र चलते देखा ? यही नहीं इस साल मार्च में सरकार ने राज्य सभा में बताया है कि NDMC के दो अधिकारियों ने भी अवैध रुप से घरों पर कब्ज़ा करने की बात ध्यान में आई है. गोदी मीडिया न तो यह सवाल करेगा और न ऐसी बात करेगा.

जिस बुलडोज़र से आपका बच्चा खेलता है, उसी से सत्ता खेल रही है और अब आप खेल रहे हैं. बहुमत को एकतरफा जमा कर गरीबों के घरों और दुकानों पर हमले हो रहे हैं. सत्ता पक्ष को भरोसा है कि गोदी मीडिया का पत्रकार कैमरा लेकर उनके घरों के सामने कभी नहीं आएगा बल्कि इसके बजाए वह बच्चे के साथ बुलडोज़र के साथ खेलने में व्यस्त हो जाएगा. और लोगों से कहेगा कि अतिक्रमण किया है कानून तोड़ा है तो बुलडोज़र चलेगा.

पुलिस का नेताओं के साथ नेक्सस (गठजोड़)

वह इस सच को नहीं बताएगा कि पुलिस और प्रशासन चाहे तो राजनीति के हिसाब से क्या क्या कर सकते हैं. मौजूदा चीफ जस्टिस ने ही कहा है कि लोग पुलिस के पास इसलिए भी नहीं जाना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार और तटस्थ न होने के कारण भरोसा नहीं करते. पुलिस का नेताओं के साथ नेक्सस (गठजोड़) हो गया है.

हम किसी ऐसे स्वर्ण युग में उड़ रहे हैं, जहां नाइंसाफी खत्म हो गई है. सब कुछ नियमों के हिसाब से होने लगा है या नियम केवल विरोधी दलों, ग़रीबों और अल्पसंख्यकों पर लागू किए जा रहे हैं ? पिछले साल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डॉ. कफील खान के केस में कहा था कि प्रशासन ने अवैध रुप से NSA लगा दिया है. अवैध रुप से कानून के प्रावधान लगाए जाते हैं. गोदी मीडिया के ऐंकर नहीं बताएंगे कि पिछले साल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने NSA के 41 मामलों में से 30 मामलों को खारिज कर दिया.

किसी बुलडोज़र को बाबा कहना या किसी बाबा को बुलडोज़र कहना दोनों के भाव को समझिए. बाबा की पहचान तो दया कृपा और ज्ञान से होती है, बुलडोज़र को जब आप बाबा कहने लगेंगे तो एक दिन बाहुबलियों को भगवान घोषित कर देंगे. ऐसा मत कीजिए. बाबा को बाबा रहने दीजिए और बुलडोज़र को बुलडोज़र. खुद से पूछिए कि इससे कानून प्रक्रिया का चेहरा सामने आता है या भय और मनमाना काम करने का ?

गोदी मीडिया के हमलावर कवरेज और बुलडोज़र के प्रभाव में करोड़ों लोग अपनी कुंठा को तृप्त कर रहे होते हैं. उन्हें किसी ग़रीब की आह का भी अब डर नहीं लगता. वे ईश्वर में यकीन तो करते हैं मगर उसके नाम पर भी पाप और पुण्य का फर्क देखना बंद कर चुके हैं. ग़लत पर पर्दा डालने के लिए एक पूरा नेटवर्क बन गया है, जिसमें मीडिया से लेकर स्कूल कालेजों के पुराने छात्रों और हाउसिंग सोसायटी के व्हाट्स एप ग्रुप तक शामिल है.

लोगों का विश्वास खोती न्यायपालिका

पिछले साल 8 अगस्त को चीफ जस्टिस एन. वी. रमना ने कहा था कि अगर हमारी न्यायपालिका चाहती है कि वह नागरिकों का भरोसा हासिल करे तो हमें भी सबको भरोसा देना होगा कि हम सबके लिए हैं.

देखने की ज़रूरत है कि अदालत के आदेशों और भावनाओं का पालन हो रहा है या नहीं और ऐसे वक्त में और तेज़ी से फैसला देने की ज़रूरत है ताकि इंसाफ समय पर मिले. क्या आप उस समय सबके लिए न्याय होता देख रहे थे जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश आने के बाद भी लोगों के घरों पर बुलडोज़र चल रहा था. आपको लगता है कि अमीरों के मोहल्ले में ऐसा होता और आदेश के बाद भी बुलडोज़र चलता रहता ?

हेट स्पीच और समुदाय की नैतिकता

आज हेट स्पीच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जो बहस हुई है, उसे भी आप इस डिबेट के सिलसिले में ही देखिए. सुनवाई के दौरान दिल्ली के गोविंदपुरी स्थित बनारसीदास चांदीवाला सभागार में हुई धर्म संसद के मामले की विस्तार से चर्चा हुई. इस मामले की पुलिस ने जांच के बाद शिकायतों को बंद कर दिया. दिल्ली पुलिस ने हलफनामे में कहा है कि मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कोई हेट स्पीच नहीं दी गई बल्कि वहां जो लोग जमा थे वे अपने समुदाय की नैतिकता को बचाने के लिए जुटे थे.

इस हिस्से को लेकर कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि वे कहते हैं कि वे मारने के लिए तैयार हैं. पुलिस का कहना है कि यह समुदाय की नैतिकता को बचाने के लिए है. आपको संवैधानिक रूप से तय करना होगा कि नैतिकता क्या है ? तब सुप्रीम कोर्ट भी इस बात पर नाराज़ हो गया और अदालत ने पूछा कि क्या कमिश्नर का यह स्टैंड है कि यह सब समुदाय की नैतिकता को बचाने के लिए जुटे थे ? कोर्ट ने पूछा कि क्या अफसरों ने इसे सत्यापित किया है ? क्या विवेक लगाया है ? कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को चार मई तक नया हलफनामा देने को कहा है.

दिल्ली पुलिस का हलफनामा दक्षिण पूर्वी दिल्ली की पुलिस उपायुक्त ईशा पांडे की तरफ से दायर हुआ है. उन्होंने लिखा है कि याचिकाकर्ता भी साफ हाथों से नहीं आए थे. पुलिस के पास आने के बजाए सीधे कोर्ट चले गए. दरअसल, पत्रकार कुरबान अली और पटना हाईकोर्ट की पूर्व जज जस्टिस अंजना प्रकाश द्वारा दायर रिट याचिका में भारत के मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने 12 जनवरी को केंद्र, दिल्ली पुलिस और उतराखंड सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था.

इसी के बाद उत्तराखंड पुलिस ने यति नरसिंहानंद और जितेंद्र नारायण त्यागी को धर्म संसद में हेट स्पीच के सिलसिले में गिरफ्तार किया था. हिन्दू सेना भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गई है और हेट स्पीच के मामले में कार्यवाही का विरोध किया है. उसका कहना है कि ओवैसी से लेकर तौकीर रज़ा को भी हेट स्पीच के मामले में गिरफ्तार किया जाए. 9 मई को इस मामले में सुनवाई होगी.

मुझे उम्मीद है आप व्हाट्स एप ग्रुप में ठेले जा रहे सांप्रदायिक और एक समुदाय के नरसंहार को सही ठहराने वाले पोस्ट पर चुप रह जाते होंगे. कभी कभी बोला कीजिए क्योंकि इसकी आग हर किसी को चपेट में ले लेगी. शनिवार और रविवार के दौरान सोचिएगा, और हिम्मत कर उस व्हाट्स एप ग्रुप में लिखने की कोशिश कीजिएगा कि नफरत की बात बंद करो.

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