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मई-दिवस : श्रम को पूंजी की सत्ता से मुक्त कराने का संकल्प-दिवस

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 8, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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वाकया तब का है जब मैं एक छोटे उद्योग में नौकरी कर रहा था. 28 अप्रैल को मैंने प्रबंधक महोदय को 1 मई का छुट्टी हेतु दरख्वास्त किया. प्रबंधक महोदय, जो उस उद्योग के मालिक थे, ने मेरा दरख्वास्त वापस करते हुए कहा, ‘1 मई को छुट्टी ही है, तब फिर छुट्टी का आवेदन क्यों ?’ मैं चुप हो गया तभी काम कर रहे दूसरे मजदूर वहां आ पहुंचे और कहने लगे, ‘1 तारीख को आखिर क्या है जो छुट्टी होगा ? हमें छुट्टी नहीं चाहिए. हम काम करेंगे.’ प्रबंधक महोदय ने कहा ‘1 मई को मजदूर दिवस है, इसलिए 1 तारीख को छुट्टी है.’ अकबकाये मजदूरों ने कहा, ‘मजदूर दिवस ?? हमें इससे क्या मतलब ? हम काम करेंगे. हम छुट्टी नहीं लेंगे.’ प्रबंधक महोदय ने गुस्से से भरकर बोले, ‘1 मई को छुट्टी है, और रहेगा. कोई भी यहां नहीं आयेगा. होली-दशहरा में भले ही छुट्टी कम कर लो, परन्तु 1 मई को छुट्टी रहेगा.’ और उन्होंने अपने एक कर्मचारी को बुलाकर कहा, ‘1 तारीख को छुट्टी है, उस दिन गेट ही नहीं खोलना है, देखते हैं कौन कैसे आता है.’

मैं चुप खड़ा इस बहस को देख रहा था और सोच रहा था कि जिन्हें मई दिवस के विरोध में खड़ा होना था, वे उसके पक्ष में डट कर खड़े थे और जिसे मई दिवस के पक्ष में खड़ा होना था, जिसमें उसकी भलाई व सम्मान था, वे उस दिवस के विरोध में खड़े होकर दलीलें दे रहे थे. यह प्रसंग बताता है कि मजदूरों के अन्दर खुद की कौम के लिए समझ कितनी कम है. जिन हजारों मजदूरों ने इन्हीं मजदूरों कौमों के हक और अधिकार के अपनी जानें दे दी, फांसी पर चढ़ गये, उनके प्रति किस हद तक हिकारत भर गई है, जो उनकी अज्ञानता की चरमता को ही दर्शाता है. यही कारण है कि हम यहां मई दिवस के बारे में जानकारी पेश कर रहा हूं. यह आलेख खाये-पिये-अघाये लोगों के लिए तो नहीं है, परन्तु जिस तबकों के लिए है वे आखिर इसे कितना जान पायेंगे, यह तो कहा नहीं जा सकता, परन्तु कोशिशें तो करती रहनी चाहिए.

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मई-दिवस : श्रम को पूंजी की सत्ता से मुक्त कराने का संकल्प-दिवस

एक मई, 1886

शिकागो शहर की सड़कें हथियारबंद सैनिकों और पुलिस के जवानों से भरी हुई थी. नेशनल गार्ड, घुड़सवार दस्ते तथा शेरिफ के सहायक सब हथियारबंद थे. उधर बहुजातीय अमरीकी मजदूर वर्ग श्रमिक-एकता की बढ़ती हुई शक्ति के प्रदर्शन हेतु तत्पर खड़ा था. श्रमिक वर्ग की मांग थी कि 8 घंटे का कार्य दिवस हो. इतिहास ने पहली बार श्रमिक वर्ग के संयुक्त प्रदर्शन की शक्ति का अनुभव किया. पूंजीपति वर्ग श्रमिकों के इस शक्ति-प्रदर्शन को अपनी राज्यसत्ता की ताकत के बल पर कुचलने पर आमादा था. यही नहीं, बुर्जुआ प्रेस ने भी शिकागो में श्रमिक आन्दोलन के विरूद्ध घृणा की मुहिम छेड़ रखी थी. ‘शिकागो मेल’ के अग्रलेख में हड़तालों तथा प्रदर्शन में भाग लेने वालों को ‘अव्यवस्था फैलाने वाले’ कहा गया और उन्हें निर्ममतापूर्वक कुचल देने की अपील की गयी थी. श्रमिक वर्ग अपनी मांग पर अडिग था, शक्ति-प्रदर्शन हुआ. अमरीका में उस दिन एक भी बड़ा शहर ऐसा नहीं था जहां 8 घंटे के कार्य दिवस के पक्ष में हड़ताल या प्रदर्शन न हुआ हो. कुल मिलाकर पांच लाख से भी अधिक श्रमिक इन प्रदर्शनों में शामिल थे.

फिर शुरू हुआ दमन तथा अत्याचार का बर्बर व त्रासद घटनाक्रम :

3 मई को पुलिस ने श्रमिकों के रक्त से शिकागो शहर की सड़कें रंग दी. एक मई का दिन अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक आन्दोलन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित हो गया जब मई से हर वर्ष ‘मई-दिवस’ मनाते समय पूरी दुनिया का श्रमिक वर्ग यह कभी नहीं भूलता कि ‘मई-दिवस’ मूलतः श्रम की गरिमा को स्थापित करने का दिन है. 19वीं सदी के 9वें दशक तक मजदूर 16-16 घंटे तक काम करता था. 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग वस्तुतः श्रम के शोषण के विरूद्ध संघर्ष-चेतना का जागृति-दिवस था. श्रम की गरिमा को स्थापित करने की एक ऐतिहासिक पहल थी यह.




इस संघर्ष चेतना की प्रेरणा कार्ल-मार्क्स व फ्रेडरिक एंगेल्स का समाजवादी दर्शन था. समाजवादी चिन्तन में श्रम को मानव समाज के निर्माण की मूल प्रेरक एवं संचालक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है.

मार्क्स के समाजवादी चिन्तन में समाजवादी व्यवस्था की जो परिकल्पना की गयी थी, उसे साकार करने की दिशा में पहला व्यावहारिक प्रयोग लेनिन के नेतृत्व में 1917 की अक्टूबर क्रांति के रूप में सम्पन्न हुआ. अक्टूबर क्रांति के साथ ही सोवियत रूस में समाजवादी राज्य व्यवस्था की स्थापना हुई और विषमहीन समाज के निर्माण की दिशा में एक कारगर पहल की गयी.

लेनिन ने मार्क्स के चिन्तन को विकसित करते हुए ‘साम्राज्यवाद’ को ‘पूंजीवाद की चरम अवस्था’ के रूप में परिभाषित किया और अपनी ‘नई आर्थिक नीति’ की अवधारणा के अन्तर्गत श्रम को मानव समाज के निर्माण की मूल प्रेरक व संचालक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने हेतु सार्वजनिक या राजकीय-सम्पत्ति के रूप में सहकारी-कृषि तथा सार्वजनिक-स्वामित्व के औद्यौगिक केन्द्रों की स्थापना करते हुए विषमतारहित समाज की रचना की दिशा में ठोस कदम उठाए ताकि श्रम का सामाजिक स्वरूप अपनी सम्पूर्ण उपयोगिता में सोवियत समाज की बेहतरी का आधार बन सके.




अक्टूबर क्रांति की प्रेरणा से इंगलैंड, फ्रांस व अमेरिका जैसे पूंजीवादी-साम्राज्यवादी देशों के उपनिवेशों में मुक्ति संग्राम शुरू हुए और तमाम उपनिवेश एक-एक करके स्वतंत्र होते गये. यह साम्राज्यवादी देशों के लिए एक गहरा आघात था. विवश साम्राज्यवाद ने अपनी पुरानी औपनिवेशिक कार्यशैली का परित्याग करके नव-औपनिवेशिक कार्यशैली अपनायी. पुराने उपनिवेशवाद की तरह ही अकूत मुनाफा कमाने की लालसा इस नव-उपनिवेशवाद में भी थी. नव-औपनिवेशिक कार्य पद्धति के अन्तर्गत सैन्य शक्ति के बल पर उपनिवेश बनाने के स्थान पर पूंजी-निर्यात के जरिए पिछड़े हुए देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर प्रभुत्व जमा कर उन्हें नव-उपनिवेश बनाना शुरू किया गया. यह एक प्रकार से ‘रिकॉलोनाइजेशन’ की प्रक्रिया थी, जिसमें पिछड़े हुए देशों के श्रम, संसाधन और बाजार का दोहन करते हुए साम्राज्यवादी हितों को साधने का लक्ष्य था.

नव-औपनिवेशिकरण की इस प्रक्रिया को आज भू-मण्डलीकरण की नीति के नाम पर आगे बढ़ाया जा रहा है. इसमें पिछड़े हुए देशों, विशेषकर 3री दुनिया के देशों को विश्व अर्थव्यवस्था का अंग बताते हुए उनके बाजारों को हथियाया जा रहा है तथा उनकी समस्त श्रमशक्ति का शोषण व संसाधनों का दोहन अकूत मुनाफा बटोरने के लिए किया जा रहा है. ‘विश्व-बैंक’ एवं ‘अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष’ तथा ‘विश्व व्यापार संगठन’ जैसे अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान भू-मण्डलीकरण के संचालक केन्द्र हैं तथा बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेशन एवं कम्पनियां साम्राज्यवादी पूंजी-निर्यात के जरिए मुनाफा बटोरने का कारगर माध्यम. इस प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे तमाम पिछड़े देशों की अर्थव्यवस्थाओं को नव-उपनिवेशवाद अपने शिकंजे में कसता जा रहा है.




पूंजीवादी सिद्धांत के अनुसार उत्पादन के साधनों पर जिसका अधिकार हो वही श्रम द्वारा उत्पादित समस्त उत्पाद का मालिक होता है. मालिक हो ही इस उत्पाद के उपभोग तथा उसकी बिक्री द्वारा मुनाफा कमाने का अधिकार भी होता है. अपने इसी सिद्धांत के तहत पूंजीवाद सबसे पहले बाजार, संसाधन (कच्चा माल, मशीनें, ईंधन आदि) पर अधिकार जमा कर उजरती कामगारों, अर्थात् वे मजदूर जो उत्पादन के साधनों से वंचित हैं, के श्रम से भौतिक सम्पदा का निर्माण करता है और मुनाफा कमाता है. उजरती कामगार उत्पादन के साधनों से वंचित होने के कारण पूंजीवादी शोषण का शिकार होने के लिए बाध्य हो जाते हैं तथा कानूनी दृष्टि से स्वतंत्र होने के बावजूद आर्थिक दृष्टि से पूंजी के बंधक बन कर रह जाते हैं.

यह श्रम को पूंजी का बन्धक बनाने तथा श्रमिक का, एक दास की तरह, शोषण करने की अमानवीय प्रक्रिया है. वर्तमान भू-मण्डलीकरण के दौर में यह प्रक्रिया और भी अधिक घनीभूत और मनुष्य-विरोधी होती जा रही है.

इस मनुष्य-विरोधी शोषण-प्रक्रिया के खतरों से मानव समाज को बचाने के लिए आवश्यक है कि श्रम की सामाजिक भूमिका को विश्लेषित करते हुए श्रम की गरिमा को प्रतिष्ठित करने की संघर्ष-चेतना को विकसित किया जाए. श्रम को पूंजी का बन्धक बनाने के खिलाफ संघर्ष-चेतना को विकसित करने के प्रयास ही इस 21वीं सदी के ‘मई-दिवस’ के आयोजनों को सार्थकता व प्रासंगिकता प्रदान कर सकते हैं.




श्रम का सामाजिक स्वरूप

समाजवादी चिन्तन में श्रम की भूमिका का विश्लेषण उसके सामाजिक स्वरूप के सन्दर्भ में किया जाना समुचित होगा. इसकी मुख्य विशेषताएं हैं : हर प्रकार के शोषण से मुक्त श्रम, सामूहिकतावाद, बन्धुत्वपूर्ण परस्पर सहयोग भाव पर आधारित श्रम तथा उत्पादन की प्रक्रिया में सुनियोजित ढंग से सामाजीकृत श्रम. श्रम के सामाजिक स्वरूप का सबसे महत्वपूर्ण आधार उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व है इसीलिए समाजवाद की आर्थिक प्रणाली में राजकीय अर्थात् सार्वजनिक स्वामित्व की भूमिका सर्वोपरि मानी गयी है.

श्रमिक वर्ग की राजसत्ता के अन्तर्गत राजकीय स्वामित्व, जो मूलतः सार्वजनिक स्वामित्व है, के तहत उत्पादित सम्पूर्ण सम्पत्ति को सार्वजनिक सम्पत्ति माना गया है. इस दृष्टि से सार्वजनिक स्वामित्व की दो प्रमुख विशेषताएं होती है. एक तो यह कि वह सारे देश के पैमाने पर सभी निर्णायक उत्पादन-साधनों पर राज्य के अधिकार की परिचायक है. दूसरी विशेषता यह है कि वह सम्पूर्ण समाजवादी समाज की सम्पत्ति होती है. सामूहिकतावाद, परस्पर सहायता और योजनाबद्ध ढंग से उत्पादन कार्य संगठित उत्पादकों की सम्पत्ति होती है. समाजवादी शासन-व्यवस्था की स्थापना के प्रारंभिक चरण में लेनिन के नेतृत्व में सहकारी या सामूहिक कृषि और सार्वजनिक-उद्योग की परिकल्पना में इन विशेषताओं को व्यवहारिक रूप देने के प्रयत्न किए गये थे. कृषि के सामूहिक स्वामित्व की धारणा ने किसानों की निजी सम्पत्तियों के स्वैच्छिक एकीकरण को मूर्त रूप दिया. इसी प्रकार उद्योगों पर सार्वजनिक स्वामित्व के सन्दर्भ में सभी आवश्यक एवं बेशी उत्पादन को जनता की सम्पत्ति माना गया.




उत्पादन के साधनों पर समाजवादी समाजीकृत स्वामित्व के दो रूप समाज के दो वर्गों के बीच विद्यमान अन्तर को प्रतिबिम्बित करते हैं. सामाजिक श्रम की प्रक्रिया में मजदूर सीधे राजकीय अर्थात् सार्वजनिक उत्पादन साधनों से जुड़े होते हैं, जबकि किसान उन उत्पादन साधनों से जो सहकारी संस्थाओं अर्थात् सामूहिक फर्मों की सम्पत्ति होते हैं. इसी कारण सामाजिक उत्पादन की प्रणाली में उनकी भूमिकाओं और उनकी आय की मात्रा और रूपों में भी अन्तर होता है. इस प्रकार समाजीकृत स्वामित्व के दो रूपों का परस्पर सम्बन्ध समाजवादी समाज में प्रचलित वर्गीय सम्बन्धों को प्रतिबिम्बित करता है. यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि समाजवादी समाजके प्रारम्भिक चरण में ही वर्गहीन समाज अस्तित्व में नहीं आ जाता समाजवादी समाज की स्थापना के साथ श्रमिक वर्ग की राज्यसत्ता वर्गहीन एवं हर प्रकार की विषमता से रहित समाज के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयत्नशील रहती है.

उत्पादन के साधनों पर समाजवादी स्वामित्व श्रम-विभाजन के शोषणात्मक आधार को समाप्त कर देता है. श्रम-विभाजन शोषण से मुक्त लोगों में परस्पर सहयोग का रूप ले लेता है. समाजवाद में श्रम का विभाजन व्यवस्थित एवं योजनाबद्ध ढंग से होता है. इससे समाज में भौतिक, श्रमिक एवं वित्तीय संसाधों का बेहत इस्तेमाल सम्भव हो पाता है. आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र में आवधिक योजनाओं के आधार पर किया गया श्रम का विभाजन अर्थव्यवस्था में संरचनागत परिवर्तनों को सक्रिय करता है. कृषि व उद्योग तथा इनसे सम्बद्ध उत्पादक गतिविधियों दस्तकारी, शिल्प आदि के साथ नयी तकनीक तथा उन्नत प्रौद्योगिकी से सम्बद्ध सभी नये क्षेत्रों में रोजगार की अभूतपूर्व वृद्धि होती है. योजनाबद्ध ढंग से विशाल भू-भागों तथा भारी उद्योगों का विकास सम्भव हो पाता है. पूंजीवादी असमान विकास की तुलना में यह प्रक्रिया विभिन्न कार्यक्षेत्रों में समान विकास को गति प्रदान करती है. साथ ही, श्रम के विभाजन की धारणा मनुष्य को जीवनभर एक ही प्रकार के श्रम से बांध कर नहीं रखती. इसमें श्रम-वैविध्य होता है. इससे मनुष्य के श्रम की सक्रियता का दायरा व्यापक बनता है, जो ज्ञानवर्द्धक व योग्यता में वृद्धि के साथ ही, मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है. श्रम बहुविध, दिलचस्प तथा आकर्षक बन जाता है.




श्रम का सामाजिक स्वरूप नगर और देहात के वैषम्य को समाप्त करता है. श्रम का दायरा व्यापक हो जाने से श्रम-विभाजन की पारस्परिक श्रेणियां टूट जाती है. पुराने औजारों से श्रम करने तथा उन्नत साज-सामान का उपयोग करने का अन्तर समाप्त हो जाता है. इससे नगर एवं देहात के बीच विद्यमान वर्गीय अन्तर-आर्थिक सामाजिक हैसियत, रहन-सहन आदि विलुप्त होने लगते हैं. यह प्रक्रिया एक संतुलित व समान विकास के जरिए विषमता रहित समाज के निर्माण में सहायक बनती है.

उत्पादन के साधनों का सामाजीकरण बौद्धिक एवं शारीरिक श्रम के वैषम्य को भी समाप्त करता है. पूंजीवादी व्यवस्था में मनुष्य की प्रतिभा द्वारा किया गया सृजन एक छोटे से सम्पन्न वर्ग को ही उपलब्ध हो पाता है. जन सामान्य को जीवनोपयोगी वस्तुओं तक से वंचित रखा जाता है. समाजवादी व्यवस्था में उच्च तकनीक, उन्नत औद्योगिकी तथा कला-संस्कृति की तमाम उपलब्धियां समस्त जनता की सम्पदा होती है. अतः उत्पादन-प्रणाली में शारीरिक श्रम, जो व्यावहारिक उपभोग के उत्पादन में लगता है, तथा विज्ञान, कला-साहित्य आदि में लगे बौद्धिक श्रम के बीच श्रेष्ठता व हीनता की भावना समाप्त हो जाती है. बुद्धिजीवियों तथा श्रमजीवियों में एकता स्थापित करने वाली यह प्रक्रिया सभी नागरिकों में मानसिक तथा संस्कारगत समानता के सोच को विकसित करती है.




समानता का यह सोच अपने लिए श्रम करने की भावना को समाप्त करके समाज के लिए श्रम करने की प्रवृत्ति के विकास में सहायक होता है. पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होने से व्यक्तिगत-हित प्रमुख होता है. अपने उपभोग की वस्तुओं की प्राप्ति के लिए श्रम करना तथा उसके बदले वेतन, लाभ, कमीशन, मुआवजा आदि के रूप में अपनी आय बढ़ाना. श्रम की सार्थकता यहीं तक सीमित रहती है. पूंजीवादी व्यवस्था में सम्पन्न जीवन-शैली के लिए मची चूहा दौड़ का कारण व्यक्तिगत-हित के लिए श्रम करने की चिन्ता ही है. जो श्रमिक तथा श्रम में अलगाव का रिश्ता बनाती है. समाजवादी व्यवस्था में सामूहिक एवं सार्वजनिक हित के लिए श्रम करने की धारणा उत्पादन के सामूहिक उपयोग से जुड़ी होती है, अतः वहां सामूहिक हित प्रमुख होता है. सामूहिक हित में किया गया श्रम सामूहिक जीवन-शैली का निर्धारण करते हुए मानव समूह को वास्तविक अर्थों में सामाजिक संगठन का रूप देता है, वहां इसका केन्द्रीय सोच होता है – संयुक्त श्रम सामूहिक खुशहाली के लिए.




आज भू-मण्लीकरण के नाम पर मुनाफाखोर नव-औपनिवेशिक व्यवस्था बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं विशाल औद्यौगिक कॉरपोरेशनों के माध्यमों से बाजारोन्मुख अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ावा दे रही है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा विज्ञापन की दुनिया सम्पन्न जीवनशैली की लालसा को हवा दे रही है. विज्ञापनों की दुनिया को बहुराष्ट्रीय कम्पनियां व औद्योगिक कॉरपोरेशन संचालित कर रहे हैं. इन संचालकों के संरक्षक राजनीतिक शासक दल इनके तथा अपने हितों के अनुरूप आर्थिक-औद्योगिक नीतियां बना रहे हैं. ये नीतियां पूरी तरह श्रमिक विरोधी हैं. इनमें कारखानेदारों को मनचाहे ढंग से तालाबन्दी करने तथा ठेका-मजदूरी लागू करने की छूट दी गयी है, दूसरी ओर साम्राज्यवादी सरगना अमरीका के दिशा-निर्देश में चलने वाले विश्व-बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व व्यापार संगठन जैसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के दबाव के तहत पिछड़े देशों की साम्राज्यवाद की सहयोगी सरकारों द्वारा उदारीकरण और विनिवेश के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को पूंजी निवेश की रियायतें देने वाली आर्थिक नीतियां बनायी जा रही है, जो वस्तुतः श्रम को पूंजी की सत्ता के अधीन लाने की नीतियां हैं.

श्रम को पूंजी की सत्ता से मुक्त कराने तथा श्रम के सामाजिक स्वरूप की प्रतिष्ठा को स्थापित करने का कार्यभार 21वीं सदी के मई-दिवस आयोजनों का एक प्रमुख कार्यभार है. इस कार्यभार का निर्वाह संयुक्त व संगठित संकल्प द्वारा ही सम्भव है. इस शताब्दी में श्रमिक वर्ग के लिए एक चुनौती भी है यह.




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