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8 मार्च : समकालीन विस्थापन-विरोधी संघर्ष और स्त्री प्रतिरोध

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 10, 2022
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8 मार्च : समकालीन विस्थापन-विरोधी संघर्ष और स्त्री प्रतिरोध
8 मार्च : समकालीन विस्थापन-विरोधी संघर्ष और स्त्री प्रतिरोध

आज महिला दिवस पर आईना दिखाते 14 आंकड़ें-

1. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की जेंडर गैप रिपोर्ट-2021 में भारत 28 पायदानों की गिरावट के साथ 156 देशों में 140 वें स्थान पर पहुंच गया है.

2. एनएफएचएस 5 के अनुसार पिछले 12 महीनों में 15-49 आयु वर्ग की काम करने वाली महिलाओं में से केवल 25.4 प्रतिशत को नकद भुगतान मिला.

3. ऑक्सफेम की 2019 की ‘माइंड द गैप : स्टेट ऑफ एम्प्लायमेंट इन इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार भारतीय महिलाएं समेकित रूप से प्रतिदिन 1640 करोड़ घंटों का ऐसा कार्य करती हैं जिसके बदले में उन्हें कुछ नहीं मिलता.

4. भारतीय पुरुष प्रतिदिन केवल 56 मिनट घरेलू कार्य को देते हैं जबकि महिलाओं के लिए यह अवधि 353 मिनट प्रतिदिन है. विशेषज्ञों द्वारा किए गए अध्ययन हमारी 35 करोड़ घरेलू महिलाओं के श्रम के मूल्य को 613 अरब डॉलर तक आंकते हैं.

5. कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 1999-2000 में 41 प्रतिशत थी जो 2011-12 में घटकर 32 प्रतिशत रह गई और 2019 के आंकड़ों के अनुसार यह 20.3 प्रतिशत है. बांग्लादेश और श्रीलंका के लिए यह आंकड़े क्रमशः 30.5 और 33.7 प्रतिशत हैं.

6. इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली एवं कुछ अन्य संस्थाओं के सर्वेक्षण बताते हैं कि यदि परिवार में पुरुष की कमाई ठीक ठाक है तो लगभग 40 प्रतिशत पुरुष और महिलाएं दोनों यह चाहते हैं कि महिलाएं घर पर रहें.

7. कृषि में महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए रोजगार के अवसर कम हुए हैं. पुरुष तो छोटे-मझोले शहरों एवं महानगरों को पलायन कर प्रवासी मजदूर बन गए हैं, महिलाएं गांवों में छूट गई हैं.

8. नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमी रिसर्च का आकलन है कि भारत में 97 प्रतिशत महिला श्रमिक असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं.

9. अध्ययनों के अनुसार हमारा श्रम बाजार पुरुषों की तुलना में महिलाओं को उनके श्रम की आधी कीमत ही देता है. यहां तक कि निजी क्षेत्र में सुपरवाइजर स्तर पर भी महिलाओं को भी उनके पुरुष समकक्षों से 20 प्रतिशत कम वेतन मिलता है.

10. सरकार ने नवंबर 2018 में घोषणा की थी कि अब वह महिलाओं को मिलने वाले मातृत्व अवकाश के 7 हफ्ते का वेतन कंपनियों को लौटाएगी. किंतु वस्तु स्थिति यह है कि हर वर्ष लगभग तीन करोड़ महिलाएं गर्भवती होती हैं लेकिन इस कानून का लाभ केवल एक लाख महिलाओं को मिलता है.

11. इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पापुलेशन साइंसेज (नोडल एजेंसी, एनएफएच 4) और आईसीएफ, यूएसए के अनुसार, भारत में कामकाजी महिलाओं के शारीरिक हिंसा का सामना करने की आशंका अधिक है. शारीरिक हिंसा झेलने वाली ग़ैर–कामकाजी महिलाओं की संख्या 26 प्रतिशत है जबकि 40 प्रतिशत कामकाजी महिलाओं को शारीरिक हिंसा झेलनी पड़ी है.

12. रैंडस्टड का जेंडर परसेप्शन सर्वे 2019 दर्शाता है कि 63 प्रतिशत महिलाओं ने निजी क्षेत्र में नौकरी पर रखते समय लैंगिक भेदभाव का या तो सामना किया है या वे ऐसी किसी महिला को जानती हैं जो नियुक्ति के दौरान लैंगिक भेदभाव का शिकार हुई है. यह भेदभाव वेतनवृद्धि और पदोन्नति में भी देखा गया है.

13. देश में मात्र 20% उद्यमों पर महिलाओं का स्वामित्व है. केवल 6% महिलाएंं भारतीय स्टार्टअप्स की संस्थापक हैं. महिला संस्थापकों वाले स्टार्टअप्स सकल इन्वेस्टर फंडिंग का सिर्फ 1.43% भाग ही प्राप्त कर सके। 69 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि सांस्कृतिक एवं निजी अवरोध एक उद्यमी के रूप में उनकी यात्रा को कठिन बनाते हैं.

14. वर्तमान संसद में केवल 14 प्रतिशत महिलाएं हैं. इनमें से कुछ केंद्र सरकार में वरिष्ठ पदों पर भी हैं किंतु यह भी उस विचारधारा का समर्थन करती दिखती हैं जो हमारे संविधान को मनुस्मृति से प्रतिस्थापित करने का स्वप्न रखती है, वही मनुस्मृति जिसके अनुसार महिलाओं को बाल्यावस्था में पिता, वयस्क होने पर पति और वृद्धावस्था में बेटों के नियंत्रण में रखना आवश्यक है.

– सौमित्र राय

विकास के वर्तमान मॉडल से महिलाओं के अपवर्जन को पितृसत्ता से पोषित होने वाली व्यवस्था में अंतर्निहित समझा जाना चाहिए, श्रम के लिए संचित बल के तौर पर महिलाओं के देखे जाने के कारण उन्हें आर्थिक गतिविधियों से काट कर रखा जाता है तथा सामाजिक पुनरूउत्पादन में उनकी भूमिकाओं को नजर अंदाज किया जाता है. पुरूषवादी, पूंजीवादी व्यवस्था अधिकांश महिलाओं को घरेलू और बच्चों के देखभाल के कामों तक सीमित रखती है और इसका इस्तेमाल ये मजदूरी कम करने में करती है.

आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की सीमित भागीदारी भी उनके पारंपरिक जेंडर भूमिकाओं (नर्सिग, शिक्षण या ऐसे श्रम केन्द्रित काम जिसमें धैर्य और सूक्ष्म कौशल की जरूरत हो) का ही विस्तार है, जिसमें मजदूरी लैंगिक भेदभाव पर आधारित है. महिलाओं में अधिकांशतया असंगठित क्षेत्र का हिस्सा होने, कानून की सुविधाओं से वंचित होने और असुरक्षा बोध होने की वजह से काम-काजी जगहों पर यौन शोषण के रास्ते खुल जाते हैं. भूमंडलीकरण की संरचना में निर्यात-उन्मुख उद्योगों, सेज और सेवा क्षेत्रों में इस तरह के शोषण में भारी वृद्धि हुई है.

तथाकथित आजादी के 63 (अब 75 – सं.) वर्षों के बाद भी राजनीतिक निकायों में महिलाओं की उपस्थिति नगण्य है और पितृसत्तात्मक राजनीतिक व्यवस्था में इसकी भागीदारी को बनाने वाले आरक्षण का भारी विरोध हुआ है. हालांकि निचले स्तर पर आरक्षण ने सीमित संख्या में प्रवेश को संभव बनाया है लेकिन इनकी सफलता की कहानियां नियम के बजाए अपवाद ही है.

सामंतवादी पितृसत्तात्मक वैचारिकी की बुनियाद पर फलने वाले सामाजिक संस्थाएं उत्पादन में महिलाओं की भागीदारी को हतोत्साहित कर रह रहे हैं और उनके प्रजनन की भूमिका की प्रशंसा कर रहे हैं. पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर महिलाओं को घरेलू चहारदीवारी में एक निर्भर जीवन जीने के लिए सीमित किया है, इसलिए फैसला लेने की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए व्यवस्था में दिखने वाले ‘सशक्तिकरण’ के सांकेतिक चरणों के बजाए महिलाओं का आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों तक पहुंच अपने-आप में पहला कदम है.

इसलिए विकास के इस साम्रज्यवाद समर्थित मॉडल के खिलाफ महिलाओं के प्रतिरोध को उनके द्वारा इस व्यवस्था में, जिसने न केवल उनके समुदाय को नजरअंदाज किया बल्कि उनकी जेंडर तक को इसमें समाहित कर दिया, अपनी जगह और आवाज तलाशने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए.

हालांकि नारीवाद के कुछ नजरिए इसमें यकीन रखते हैं कि विस्थापन-विरोधी आंदोलन और माओवाद आंदोलन की महिलाएं पितृसत्तात्मक खोल में काम करती है, इसके उलट इस पर्चे में यह दिखाया जाएगा कि ऐसे आंदोलनों में उनकी भागीदारी पितृसत्ता की बेड़ियों को तोड़ने की और उनकी निजी से सार्वजनिक स्थल तक पहुंचने की प्रक्रिया है, जहां पचास फीसदी आबादी, मोटे तौर पर, आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों से वंचित हो, वह किसी अर्थ में वास्तविक लोकतंत्र नहीं हो सकता. इन संघर्षों में महिलाओं की भागीदारी लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया है. यदि इन संघर्षों के जेंडर वाले धुरी को मांजा जाता है तब यह तिर्यक रेखा अधिक समानता और स्त्री-स्वतंत्रता की ओर ले जाएगी.

भारत में मौजूदा विकास मॉडल ने आम जनता को भयानक कठिनाईयां दी है और कुछ सीमित लोगों के लिए लाभ मुहैया करवाया है. यह हमें भीषण कृषि संकट की ओर ले आया है जिससे ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं और बच्चों के जीवन को गहरा आघात पहुंचा है और अपने पीछे अपनी पत्नियों और परिवार के सदस्यों को छोड़ जाते हैं, जिनके पास गुजर-बसर करने के लिए कोई संसाधन उपलब्ध नहीं होता. इस कृषि संकट ने बड़ी अल्प-वैतनिक काम और औद्योगिक/विकास परियोजनाओं ने महिलाओं को उनके साझे संपत्ति संसाधनों, उनके परिवारों और उनकी भविष्य की पीढ़ियों को उनकी जमीन से वंचित किया है. जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया ने उन्हें अपनी जिंदगी और जीवनयापन की तरीकों के बारे में स्वयं फैसला लेने से वंचित किया है.

भीषण पर्यावरण क्षरण ने उनके जीवन को भयानक तौर पर प्रभावित किया है. पुनर्वास ने उन्हें अपनी परिचित और स्वस्थ वातावरण से दुरूह और अपरिचित माहौल वाले जगह पर ला छोड़ा है, जिससे उन्हें सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, सामुदायिक जीवन, परिवार और रोजी-रोटी के साधनों का विघटन इन महिलाओं के यौन शोषण की राह पकड़ता है, क्योंकि पारंपरिक मुख्यधारा के समाज में आदिवासी महिलाओं को ‘यौन रूप से खुला होने’ के तौर पर देखा जाता है. अपने जीवन अनुभव से महिलाएं यह समझ गई है कि विकास उनके लिए नहीं बल्कि अन्य लोगों के लिए है, चाहे वह नर्मदा के पानी को गुजरात के शहरों को भेजे जाने का मामला हो या बैलाडिला के लोहा को जापान, जर्जर जीवन और जीवनयापन के बर्बाद हो चुके साधन ही उनके भाग्य में है.

उत्तर-पूर्व और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में महिलाओं को यह महसूस हो गया कि भारत में विकास के तौर-तरीके असंतुलित हैं और कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिनका, ऊर्जा संसाधन, पर्यटन आदि के लिए दोहन किया जाएगा ताकि केंद्र सरकार और साम्राज्यवाद समर्थित औद्योगिक गुट को लाभ मिल सके. कि भारत सरकार उनको स्वायत्ता के किए गए वायदों को भूल गई है और इसलिए वे अलग होने के लिए लड़ रहे हैं.

इस तरीके से लोकतंत्र में जैसा होता है, असहमतियों को न केवल राज्य द्वारा भीषण दमन से दबा दिया जाता है बल्कि नृजातीय और अल्पसंख्यक समुदायों को पाठ पढ़ाने के लिए बलात्कार को राजनैतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इन क्षेत्रों की सैंकड़ों महिलाएं सेना और अर्धसैनिक बलों द्वारा यौन हिंसा का शिकार हुई है. पिछले 52 सालों से आफ्सपा को सख्ती से लागू करके इन गुनाहों पर परदा डाला गया है.

हालिया वर्षों में, खनिज प्रधान क्षेत्रों, मसलन छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिसा और पश्चिम बंगाल तथा महाराष्ट्र के भी कुछ हिस्सों में, जहां स्थानीय लोग साम्राज्यवाद समर्थित विकास मॉडल के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं, एक विस्तृत प्रतिरोधी आंदोलन विकसित हुआ है. इन आंदोलनों में महिलाएं सक्रिय संघर्ष कर रही हैं. राजकीय हिंसा और यौन आक्रमण के दमन सहने के बावजूद, वे भयाक्रांत नहीं है.

पश्चिम बंगाल में सिंगूर और नंदीग्राम संघर्ष के दौरान, महिला स्वत:स्फूर्त तरीके से लड़ने के लिए निकल पड़ी. तेभागा आंदोलन के समय, जैसा बंगाल में कहावत थी, महिलाओं ने घरेलू औजार और मिर्ची पाउडर जैसे मसालों का पारंपरिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया. इन संघर्षों में महिलाएं प्रतिरोध की मूर्त प्रतीक बन गई. कविता जैसे सांस्कृतिक रूप में भी, लालगढ़, पश्चिम बंगाल में जब पीसीएपीए (पुलिस संतस कमेटी) का गठन हुआ तो इसमें यह सुनिश्चित किया गया कि प्रत्येक क्षेत्रों में 50 प्रतिशत कमेटी की सदस्य महिलाएं होंगीं.

उस इलाके में हत्या, बलात्कार, गिरफ्तारी, अपहरण और पुरूषों तथा महिलाओं को भीषण यातना देने के बावजूद, अभी भी वहां जब विरोध जुलूस निकलता है तो कभी-कभी महिलाओं की संख्या 50,000 को पार कर जाती है. यूएपीए (गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम) जैसे क्रूर कानूनों के जरिए साधारण, अशिक्षित ग्रामीण महिलाओं, जिन्होंने कभी माओवाद शब्द नहीं सुना है या फिर शहरी पेशावर महिलाओं, जो इस आंदोलन का हिस्सा नहीं है, लेकिन विकास के इस शोषणकारी तरीके के विरोध में हैं, को गिरफ्तार किया जाता है और उनकी जमानत रोक दी जाती है. चाहे वे गांधीवादी हों, एनजीओ कार्यकर्ता हों या सामान्य उदार बुद्धिजीवी हों किसी को भी इस इलाके में जाकर लोगों से मिलने-जुलने की अनुमति नहीं है.

छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में, जहां इसी तरह का विस्थापन-विरोधी आंदोलन और आदिवासियों और उनसे सहानुभूति रखने वाले लोगों के शिकार करने के लिए ऑपरेशन ग्रीन हंट चल रहा है, महिलाएं वहां लंबे समय से संगठित हो रही है. जैसा कि मीडिया रिपोर्ट और नक्सल साहित्य से जाहिर होता है, क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन (केएएमएस) आज के समय में भारत के सबसे बड़े महिला संगठनों में से एक है. हालांकि दिलचस्प यह है कि प्रतिबंधित होने की वजह से यह ‘अदृश्य’ है.

माओवादी साहित्य और दंतेवाड़ा का दौरा कर चुके शोधकर्ताओं, पत्रकारों की रिपोर्ट ये दावा करती है कि वहां की अधिकांश महिलाओं में आंदोलन की वजह से बड़ा बदलाव आया है. जमीन बंटवारा की प्रक्रिया में महिलाओं के नाम भी जमीन आवंटित की जाती है. मिट्टी बांध बनाने, कृषि में मदद करने से महिलाओं के पानी की घरेलू समस्याओं से भी नियात मिल गया है. नई कृषि प्रणाली और फल तथा सब्जियों के उत्पादन की शुरुआत होने से महिलाओं को अधिक पोषण मिल रहा है.

फिर से एक दिलचस्प लेकिन ज्ञात तथ्य है कि वित्तीय राजधानी मुंबई से कुछ किलोमीटर दूर ठाणे जिला में और विदर्भ के मेलघाट में सैकड़ों महिलाओं और बच्चों की कुपोषण से मौत हुई हैं लेकिन उसी महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित गढ़चिरौली में कुपोषण के कारण मृत्यु नहीं हो रहा है. माओवादी क्षेत्रों में महिलाओं की बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुंच ही एकमात्र रास्ता है जिसके जरिए महिलाएं आज वहां शिक्षित हो रही हैं.

तेंदू पत्ता संग्रहण की मूल्य वृद्धि ने उनके जीवन में अधिक आर्थिक समानता लाया है. चावल मिल की स्थापना ने महिलाओं को थ्रेसिंग की श्रमसाध्य प्रक्रिया से राहत पाने में मदद की है. क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन ने न केवल बाहरी पितृसत्ता (गैर-आदिवासियों द्वारा यौन शोषण आदि) को बल्कि आंतरिक पितृसत्ता को भी निशाना बनाया है. माहवारी के दौरान महिलाओं को अलग करने तथा बच्चे जनने के बाद किए जाने वाले अवैज्ञानिक क्रियाकलापों को सुधारा गया है.

बिहार और झारखंड में ‘नारी मुक्ति संघ’ (एनएमएस) एक मजबूत और लोकप्रिय महिला संगठन है जो महिलाओं की आवाज को तवज्जो देता है और आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक गतिविधियों और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहभागिता को प्रोत्साहन करता है. चाहे वह दहेज आधारित सामंतवादी पितृसत्तात्मक शादी को जनतांत्रिक विवाह में बदलना हो, चाहे यौन हिंसा के अपराधी को जन-अदालत के जरिए सजा देना हो या फिर पारिवारिक विवाद को सौहार्दपूर्ण तरीके से निबटना हो, नारी मुक्ति संघ की महिलाएं गांव-गांव घूमती है और न सिर्फ पीड़ित महिलाओं के जीवन में हस्तक्षेप करती हैं बल्कि महिलाओं और बच्चों को अपने साथ जोड़ती भी हैं.

हजारों महिलाओं और लड़कियों ने क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन और नारी मुक्ति संघ जैसे संगठनों द्वारा चलाने वाली ‘क्रांति का पाठशाला’ के जरिए लिखना-पढ़ना सीखा है और शिक्षित हुई है. स्त्रियों की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों की प्रक्रिया को अधिक लोकतांत्रिक बनाने के लिए इन संगठनों ने जिन स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं है, जिन विद्यालयों में शिक्षक अनुपस्थित हैं, वहां धरना देने, खाद्यान्नों के समान बंटवारे, अधिक मजदूरी और पारिश्रमिक मूल्यों, एक ही काम के लिए स्त्री और पुरुषों को समान मजदूरी के लिए लड़ने का काम किया है और इस तरह विकास और लोकतंत्र को उनके लिए अधिक अर्थपूर्ण बनाया है.

महिलाओं के जीवन पर भूमंडलीकरण के प्रभाव को समझते हुए कि कैसे सौंदर्य और फैशन उद्योगों ने स्त्रियों का वस्तुकरण किया है, मध्य भारत के अंधेरे में इन संगठनों ने विश्व सुंदरी प्रतियोगिताओं के खिलाफ जुलूस निकाले हैं या फिर जॉर्ज बुश के भारत भ्रमण का विरोध किया है. इन संगठनों की प्रमुख एक्टिविस्ट आदिवासी पृष्ठभूमि की हैं जिनमें हमारे शहरों की डिग्रीधारी महिलाओं के मुकाबले कहीं अधिक राजनीतिक चेतना है.

निष्कर्षतः इस पर प्रमुखता से ध्यान दिया जाना चाहिए कि विस्थापन-विरोधी संघर्षों को बल और हिंसा के बदौलत दबाने की कोशिश, जैसा कि ऑपरेशन ग्रीन हंट में किया जा रहा है, लाखों आदिवासी और ग्रामीण जनता का न सिर्फ सर्वनाश कर देगी बल्कि यह इन क्षेत्रों में सामाजिक आंदोलनों के जरिए शुरू हुए लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया का भी गला घोंट देगी.

मौजूदा व्यवस्था में, आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी से वंचित और सिर्फ प्रजनन की भूमिका तक सीमित महिलाओं ने विचारधारा और सामाजिक आंदोलनों में भागीदारी होने में एक नए क्षितिज को तलाश लिया है, चाहे गांधीवादी, समाजवादी, दलित, राष्ट्रीयता के आंदोलन हो या माओवादी आंदोलन, ये सभी महिलाओं को सामाजिक समता और स्वतंत्रता की ओर ले जाते हैं और इन आंदोलनों के दमन का मतलब महिलाओं को फिर से पितृसत्ता के दलदल और वर्ग-शोषण की ओर, जाति और सांप्रदायिक भेद-भाव की ओर ढ़केलना है. अगर भारत में महिलाओं के लिए विकास और लोकतंत्र को वाकई अर्थपूर्ण बनाना है तो सिर्फ उनके सशक्तिकरण की सांकेतिक रूप-रेखा बनाने के बजाए इन प्रक्रियाओं में महिलाओं को जोड़ने के रास्ते विकसित किए जाने चाहिए.

  • शोमा सेन
    (स्त्री गर्जना पत्रिका – दिसंबर 2010)
    (अनुवाद : दिलीप खान)

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