Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

दंगों के बहाने गांधी जी का लेख

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 6, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

दंगों के बहाने गांधी जी का लेख

गुरूचरण सिंह
अब तुम तिरंगे के नाम पर झूठे बहकावे में मरो या तिरंगे में लपेटे जाओ, क्या फर्क पड़ता है. ठग तो नगरिया लूट चुका

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

यह सही है संघ और सांप्रदायिक दंगे एक ही सिक्के के पहलू हैं लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि 1925 में संघ के अस्तित्व में आने से पहले ही देश का सांप्रदायिक माहौल ऐसा बन चुका था, जिसने आरएसएस की फितरत के मुताबिक एक माकूल जमीन तैयार कर दी थी. 1920-24 के दौरान कई जगहों पर हिंदुओं और मुस्सलमानों के बीच हुए दंगे इसकी गवाही देते हैं. बिहार का आरा हो या राजस्थान का अजमेर या उत्तर प्रदेश के लखनऊ, मेरठ, आगरा और सहारनपुर हों या फिर पंजाब (अब पाकिस्तान) के लाहौर और मुलतान – इन और ऐसी कई दूसरी कई जगहों पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कभी मस्जिद के आगे बैंड-बाजा बजाने को लेकर, तो कभी हिन्दुओं द्वारा पक्की मस्जिद न बनने देने को लेकर मूर्खतापूर्ण फसाद होते ही रहते थे. ऐसे बिगड़े हुए माहौल में अहमियत इस बात की नहीं होती दंगों की वजह क्या थी क्योंकि दोनों ही तरफ मसले को सुलझाना तो कोई चाहता ही नहीं. असल मंशा तो मसले को और संगीन बनाने की होती है, इसलिए वहां कोई दलील और अपील काम नहीं करती.

ऐसे दंगे करवाने वाले ‘समाज के इज्जतदार यानी अमीर आदमी’ यकीनन बहादुर तो होते नहीं, असल में हद दर्जे के कायर होते हैं जो खुद के जान-माल की रक्षा के लिए कोई भी खतरा मोल नहीं ले सकते इसलिए वे पैसे और रसूख के बल पर अपने चारों ओर गरीब तबकों के लोगों की मजबूत दीवार खड़ी कर लेते हैं. 1920-24 के इन दंगों के बाद दोनों ही फिरकों के कायर और दंगाई नेताओं ने बेरोजगार युवकों को अपने-अपने गुंडों के रूप में पालना शुरू कर दिया. ऐसा रुझान खास तौर पर उच्च वर्ग के हिन्दुओं में तेजी से पैदा हुई, जिनके आसपास तब के ‘अछूतों’ और आज के दलितों के रूप में ऐसे लोग आसानी से उपलब्ध थे, जो इन ‘भू देवताओं’ की कृपा पाने के लिए हमेशा तैयार रहते थे. लिहाजा इन वर्गों ने इन लोगों को अपने गुंडे के रूप में पालना शुरू कर दिया, ताकि दंगों के समय उन्हें ढाल की तरह आगे किया जा सके.

दंगों की इसी पृष्ठभूमि पर गांधी जी ने 29 मई, 1924 को यंग इंडिया में ‘हिन्दू मुस्लिम तनाव : कारण और उपचार’ नामक एक लंबा लेख लिखा था. इसी लेख के ‘गुंडे’ उपशीर्षक के तहत गांधी जी ने लिखा था :

‘गुंडों को दोष देना भूल है। गुंडे तभी गुंडागर्दी करते हैं जब हम उनके अनुकूल वातावरण का निर्माण कर देते हैं.

… जिस प्रकार मैं कटारपुर और आरा की काली करतूतों के लिए बेहिचक वहां के प्रतिष्ठित हिन्दुओं को जिम्मेवार मानता हूं, उसी प्रकार मुल्तान, सहारनपुर और जिन दूसरी जगहों पर जो काले कारनामें हुए, वहां के (सभी मुसलमानों को नहीं बल्कि केवल) प्रतिष्ठित मुलसमानों को उनका जिम्मेदार मानने में मुझे कोई संकोच नहीं है.

… मैं यह मानता हूं कि अगर हिंदू अपनी हिफाजत के लिए गुंडों को संगठित करेंगे तो यह बड़ी भारी भूल होगी. उनका यह आचरण तो बस खाई से बचकर खंदक में गिरने जैसा ही होगा ! … गुंडों की एक अलहदा जाति ही समझिए, भले ही वह हिंदू कहलाते हों या मुसलमान !

… लोगों को बड़ी शान के साथ कहते सुना गया है कि अभी हाल में एक जगह ‘अछूतों’ की हिफाजत में (क्योंकि अछूतों को मौत का भय नहीं था) हिन्दुओं का एक जुलूस मसजिद के सामने से (धूमधाम के साथ गाते-बजाते हुए) निकल गया और उसका कुछ नहीं बिगड़ा.

यह एक पवित्र तरीके से करने योग्य काम का दुनियावी दृष्टि से किया गया इस्तेमाल है. अछूत भाइयों से इस तरह का नाजायज फायदा उठाना न तो आमतौर पर पूरे हिन्दू धर्म के हित में है, और न खासतौर से अछूतों के … इस तरह के संदिग्ध उपायों का सहारा लेकर भले ही कुछ-एक जूलूस मसजिदों के सामने से सही-सलामत निकल जाएं; पर इसका नतीजा यह होगा कि बढ़ता हुआ तनाव और ज्यादा बढ़ेगा.

तो लड़को देख लो. पहले ये लोग केवल दलितों के लड़कों को आगे करके उनसे दंगा करवाते थे. अब ये तुम सभी ऊर्जावान, संभावनाशील लेकिन बेरोजगार युवकों को किसी न किसी बहाने इसमें झोंक रहे हैं. किसी जमाने में रज्जब अली लखानी और वसंतराव हेंगिस्टे नाम के दो परम मित्र दंगा रोकने की कोशिश में शहीद हो गए थे. ऐसे लोगों ने यह देश बनाया.

तुम दंगा करते हुए अगर मारे जा रहे हो, तो तुम्हारे भोलेपन पर, तुम्हारे ठगे जाने पर केवल करुणा ही जागती है. नहीं मालूम कि मरने के बाद सचमुच आत्मा शेष रहती है या नहीं लेकिन यदि सचमुच तुम्हारी निर्मोही आत्मा सब कुछ देख-सुन सकती और बोल-बता सकती, तो तुम बाकी बचे अपने दोस्तों को जरूर बता पाते कि वे न ठगे जाएं.

अब तुम तिरंगे के नाम पर झूठे बहकावे में मरो या तिरंगे में लपेटे जाओ, क्या फर्क पड़ता है. ठग तो नगरिया लूट चुका इसलिए इसकी-उसकी और किसी की भी “जय-जय” छोड़ो, केवल “जय जगत” बोलो. सारी दुनिया तुम्हारी अपनी और तुम भी सबके अपने.

Read Also –

छात्रों पर हमला : पढ़ाई करने और पढ़ाई न करने देने वालों के बीच
दुनिया भर में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमले
साम्प्रदायिकता की जहर में डूबता देश : एक दास्तां
साम्प्रदायिक और जातिवादी कचरे का वैचारिक स्रोत क्या है ?
मुसलमान एक धार्मिक समूह है जबकि हिन्दू एक राजनैतिक शब्द
कायरता और कुशिक्षा के बीच पनपते धार्मिक मूर्ख
हिन्दू-मुस्लिम एकता के जबर्दस्त हिमायती अमर शहीद अशफाक और बिस्मिल का देशवासियों के नाम अंतिम संदेश
महान शहीदों की कलम से – साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

शिक्षा : आम आदमी पार्टी और बीजेपी मॉडल

Next Post

बिक्री पर एलआइसी और बीपीसीएल

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

बिक्री पर एलआइसी और बीपीसीएल

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

अडानी, अब तक की रिपोर्ट और पूर्व SEBI प्रमुख की ‘नौकरी’

September 21, 2023

शोषण और बलात्कार का केन्द्र बना बाल गृह

August 1, 2018

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.