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नवनीत पांडेय : ‘भले ही हम थोड़े हैं पर हथौड़े हैं’

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 1, 2024
in पुस्तक / फिल्म समीक्षा
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नवनीत पांडेय : 'भले ही हम थोड़े हैं पर हथौड़े हैं'
नवनीत पांडेय : ‘भले ही हम थोड़े हैं पर हथौड़े हैं’
इन्दरा राठौड़

यदि पाने की महत्वाकांक्षा से आप मुक्त हैं , तो खोने का मलाल भी आपमें नहीं रहेगा. तब आप स्वायत्त भी होंगे, और ईमानदार भी. आपकी वही स्वायत्तता आपको इतना मुखर बना देगी कि आप सबका ‘काट’ बन सकते हैं ! सबसे आंखें चार कर सकते हैं !! नवनीत पांडेय को जब भी देखा, मैंने इसी तरह से देखा. समकालीन हिंदी कविता में नवनीत पांडेय को जो हासिल है, वह मिडिल राइज कवि का है. तमगे या कि होड़ के किसी भी बड़े पद पुरस्कारों का नहीं है. बिल्कुल एक आम लेखक सा है. यानी, किसी गुंबद या कि ऊंचे मीनारों का हासिल नहीं है. अलबत्ता वे अपने ईमानदार लेखन और वैचारिक परिपक्वता से हिंदी के उन तमाम झंडाबरों से भी अनूठे दिखे हैं. यद्यपि ये बातें नवनीत पांडेय की न‌ई और ताज़ी संकलन के संदर्भ में नहीं कही है. लेकिन एक जरूरी और महत्वपूर्ण कवि के संदर्भ में कहा है इसलिए इस बात के साथ अपने उत्तरदायित्व को भी, मैं बखूबी समझ रहा हूं.

समकालीन हिंदी कविता में दिल्ली दरबार व उत्तर-पूर्व राज्यों के एकाधिकार के बाद, यदि किसी राज्य की कविता ने कुछ बढ़िया तथा बड़ा हासिल किया है, तो राजस्थान की हिंदी कविता को भी वह स्थान प्राप्त है. चूंकि उसके क्रमोन्नत विकास के साथ एक पूरी पीढ़ी खड़ी है, जिसमें विजयदान देथा, असद ज़ैदी, विजेन्द्र, कृष्ण कल्पित, कैलाश मनहर, ऋतुराज, जीवन सिंह, नंद भारद्वाज, नंद चतुर्वेदी, सवाई सिंह शेखावत, उद्भ्रांत, गोविंद माथुर, हरीश भादानी, कन्हैया लाल सेठिया, मदन डागा, आईदान सिंह भाटी, रति सक्सेना, अजंता देव, विनोद पदरज, प्रभात, अमर दलपुरा, देवेश पथसारिया, राहुल बोयल, देवयानी भारद्वाज, नरेश चंद्राकर, नरेश गुर्जर, ओम नागर, अनुपमा तिवारी, जुवि शर्मा इत्यादि को शामिल किया जा सकता है.

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अब मैं बात कर रहा हूं, नवनीत पांडेय की रचनात्मक जिद और जद्दोजहद से ताल्लुकात का, जो हालिया अभी उनके न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, न‌ई दिल्ली से प्रकाशित कृति ‘तटस्थ कोई नहीं होता’ की कविताओं पर ही आधारित है. नवनीत की कविताएं कंटेंट के लिहाज से आकृति में छोटी हैं और जड़ें, गहरे में जमायी हुई हैं (जिस पर ठोस ब्यौरों की बातें आ सकती है, जो कि कम ब्यौरों में है). इस पर मेरा मानना है कि एक कविता के भीतर मौजूद कंटेंट ही, शब्द सीमा को तय करते हैं. काव्य विस्तार में आखिर शब्दों की आवश्यकता कितनी है ? अथवा उन ब्यौरों के लिए शब्द खर्चने की कुल जरूरत कितनी है ??

मैं देख रहा हूं कि नवनीत पांडेय के यहां कविता कम लागत पर अधिक लाभ की मारकता में दिखे हैं. अर्थात् बिना लंद-फंद और कोई झंझट के नवनीत ने काव्य कारण को सीधे तथा सरल हो कहा है, जो वस्तुत: इस भौतिक जगत की रजिस्टर की गई बातों में दृष्टिगोचर होता है. ताज्जुब कि चीजें जगह पर है और यूजर उसे यूज नहीं कर, खुद ही प्रयोग में बदल जाता है. अतः ऐसी कविताओं के लिए कवि के कथन को उसके फ्लैश बैक में अथवा रि-ओपन या कि जूम कर देखा जाना वांछनीय है –

एक हम ही हैं
ऊपर-नीचे
आगे-पीछे
दाएं-बाएं
होते रहते हैं

निश्चय ही नवनीत की कविता कथित काव्य में, कला के मानकों के इतर है व जो ऑन डिमांड के रूप हैं उससे इत्तेफाक नहीं रखते. अर्थात् कि कोई कहे ‘चंदू के चाचा ने, चंदू की चाची को, चांदनी चौक में, चांदी की चम्मच से, चटनी चटाई’ वाली ‘कला’. कला यह नहीं है; कला वह है जो पांच कप चाय में कितनी चाय, चीनी व नमक व अन्य पदार्थ मिलाएं जाएं ! यह ठीक ठाक तय हो. यह काम नवनीत सध कर करते हैं. मसलन, कविता के संदर्भ में उनकी यह बयानी काफ़ी है कि –

कविता पढ़ कर तय करता हूं
कविता-कवि
है कि नहीं

नवनीत की कविताएं जिस शैली का सहारा लेती है, वह निडर शैली है. लोभ-लाभ के गणित, प्रपंच से मुक्त शैली है. बेबाक पटु आलोचकीय शैली है. वैसा बिलकुल भी नहीं कि पीठ पीछे छुरा घोंपे बल्कि वह सीधे और बता कर छाती पर वार करने वाली है.

हमारे दौर की सबसे बड़ी विडंबना और सबसे अधिक अखरने वाली बात है हमारा मौन. जो मनुष्य के स्वभाव से विपरीत का वास्ता लिया हुआ है. हार का भय बढ़ा हुआ है और जीत का जज्बा कम हुआ है. डिफेंडर की भूमिका में हर कोई खड़ा है. वे असहाय और नीयति के अधीन हैं कि वे मौन हैं. इन मायने में गौर करें तो नवनीत नियति के आगे विवश नहीं हैं. नियतिवाद उन पर प्रभाव जमा नहीं पाता. अलबत्ता अपनी दृष्टि के पैनेपन से झांकते वे तत्कालीन परिस्थितियों की चिंताओं से सराबोर हो हौले-हौले, रफ़्ता-रफ़्ता कर सबकी खबर लेते हैं कि –

‘कौन किधर है ? जो इधर नहीं है, क्या वे उधर हैं !’ ( पृ. सं. 13 )

नवनीत अपनी कविता में प्रतिरोध व संघर्ष के परस्पर शब्दों की टंकार व लय में चेतावनी जारी करते भी दिखे कि वक्त जब-जब करवट लेता है –

मैंने देखा है
कई पहाड़ों को
ऊंटों के नीचे आते हुए !

तटस्थता में बू है. तटस्थता को इतिहास बोध के प्रच्छन्न में देखें तो सबसे अधिक राजनीति वही है, जो गैर राजनीतिक अथवा अराजनीतिक या मध्यस्थ होने का ढोंग रचता है. वे लोग निरपेक्ष हो ही नहीं सकते. एक सॉफ्ट स्पेस के जरिए वे लोग भीतर तक धंसे होते हैं. नवनीत पांडेय इस पर यद्यपि बकौल रामधारी सिंह दिनकर अथवा कवि साथी नित्यानंद गायेन के ही तरह मुखर हैं, यह बात मानें रखती है कि –

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

आज जब/पूरा मुल्क कतार में खड़ा है/यह कतार भी कत्ल करने का/एक नया तरीका है/

आज्ञाकारी बनना मतलब / प्रश्न करने की आजादी को खो देना है/ सही और गलत के चयन का विवेक खो देना है /आज्ञाकारी बनाने वाले / दरअसल हमें भेड़ बनाकर/हमसे अपनी इच्छाएं पूरी करना चाहते हैं…’

‘जब देश से भी बड़ा हो जाता है / शासक/ और नागरिक से बड़ी हो जाती है/ पताका/ जब न्याय पर भारी पड़ता है/ अन्याय/और शिक्षा को पछाड़ दे/ धार्मिक उन्माद/ तब हिलने लगता है / देश का/ मानचित्र/

इसी तरह से भूकम्प आता है/ और ढह जाता है/एक देश

अर्थात कि जो नित्यानंद गायेन या कि रामधारी सिंह दिनकर कहे हैं; नवनीत भी वही कहे हैं. कम ब्यौरों में अधिक बेबाक, साफ़ तथा मुखर हो नए तरह से कह सके हैं. नवनीत के यहां ब्यौरे नहीं है परन्तु सांकेतिक बिम्ब है. जो बताती है तटस्थ, या कि मौन चुप्पियों में उनके जो राजनीति है वह इसलिए है कि –

अगर बोले
पकड़े जाएंगे

अर्थात् जो इधर या उधर होते हैं तटस्थ भी नहीं रहते बल्कि बेईमान दोगलाई में अपना जीवन होम कर देते हैं.

नवनीत की काव्य दृष्टि को अभी मैं मुखर काव्य दृष्टि इसलिए कह रहा हूं कि प्रगतिशील हिंदी साहित्य का एक बड़ा कुनबा विचारधारा की खाल ओढ़े हुए बैठा है और प्रतिष्ठित भी है, जिनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता कागजी ढेर से महल की यात्रा करते रही है. वह कागजी ढेर को आधार बना आम और खास का भेद भी बनाती रही है. इसलिए वह कुनबा है. प्रतिबद्धता के इस प्रश्न में कहना न होगा कि योगेंद्र कृष्णा, भरत प्रसाद, अजीत कुमार राय, महेश चंद्र पुनेठा जैसे कई कवियों की पीढ़ी है, जो इस छद्म आचरण के शिकार हैं. नवनीत पांडे को मैं इन्हीं के समकक्ष श्रेणी में देखता हूं. नवनीत बेबाक हैं तथा अपने आलोचनात्मक कविताओं के मार्फत सच को उद्घाटित करते हैं, जिसकी बढ़िया तस्दीक नवनीत की कविता ‘यह प्रतिशोध नहीं, प्रतिरोध की आवाज है’ में देखे जा सकते हैं –

अब केवल राख में दबी
चिंगारियां से
कुछ नहीं होने वाला

अब केवल
हल्ला बोल !
नारों से कुछ नहीं होगा
हल्ला बोलना होगा
भुजाओं को खोलना होगा

प्रतिबद्धता या कि नागरिक बोध के लिए जरूरी शर्त यह है कि अपने विचारों की दृढ़ निश्चयता. यदि यह आप में है तो दुनिया की कोई भी ताकत टस से मस नहीं कर सकती आपके वज़ूद से. यह बात, कविताओं में नवनीत की ख़ूबी बन उभरती है. ‘कैसे लगाओगे बोली मेरी’ शीर्षक कविता (पृष्ठ संख्या 19) –

जब मैं जाता ही नहीं
कभी किसी दुकान
मंडी-बाजार में
तुम कैसे लगाओगे बोली मेरी
कैसे खरीद लोगे
शामिल कर लोगे
अपने कारोबार
बाजार में

दलित आदिवासी कविताओं के भोगे यथार्थ की तरह ही नवनीत की कविताओं में भी आत्यजयी भाव हैं, किंतु यह भाव सीमित यथार्थ से ऊपर जाती है. अर्थात् कि समय जिस तेजी से बदला है, यथार्थ भी बदलता गया. आत्यजयी भावों ने राजनीतिक परिस्थितियों में करवट ली है. माने कि आसां और वैसा नहीं रहा समय ! मतलब अभी स्थिति यह है कि पतले दूध की शिकायत पर ग्वाला गाय के मनोबल गिराने का आरोप उल्टे प्रतिवादी पर ही मढ़ देता है.

सच या ईमान वह रोग है जिसे लग गया बड़ा भारी बखेड़े में आ खड़ा हुआ है लेकिन कभी उसकी हस्ती मिटती कहां है, जिनके नसों में हस्ती ही लहू बन दौड़ता है. देखें ‘हार जाता हूं, मुंह की खाता हूं’ (कविता पृष्ठ संख्या 21) –

स्वाद के संदर्भ में धूमिल कहते हैं –

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है

अर्थात, सच कहने बोलने के घटित परिणाम को गौर करें तो दुनिया यथार्थ से परे स्तुति गान का आदी होते जा रही है ! सवालों से जूझने की जगह सवालों को मिटाने में जुटी है और मंच, माला, माइक की अभ्यस्त हुई है. ऐसे में एक ईमानदार आदमी के लिए जीवन कितना मुश्किल हो गया है, इस तारतम्य में धूमिल की इन बातों को नवनीत की बहुतों कविताओं से परखा जा सकता है.

कविता मनुष्य तथा जीव जगत को केंद्र में रख लिखने का रिवाज समकालीन कविता की विशेषता है । इसलिए समकालीन कविता मनुष्य तथा जीव जगत के इर्द-गिर्द घुमड़ती है । उससे ही तादात्म्य संबंध स्थापित कर अपेक्षा भी रखती है कि आदमी ईमानदार होए ! नवनीत इससे विलग नहीं हो सकते इसलिए यह बात उनकी कविता में आई कि

गर आदमी ईमानदार हो जाए

आदमी का किरदार
वाकई किरदार हो जाए’

यह आशा विश्वास और मूल्यवान जीवन के प्रति हमें जागरूक करने वाली गुण बात है. नवनीत की कविताई की बात करें तो वह ठोस है, पकी हुई जमीन की कविताएं हैं. सीधे धरातल पर बात करती कविताएं हैं, जिसकी ताकीद भी देखिए –

भले ही हम
थोड़े हैं
पर हथौड़े हैं
संभल के रहना

इन कविताओं से गुजरते हुए मैं फिर-फिर कहना चाहूंगा कि कविता के मानवीकरण में उसका विचार और यथार्थ ही बड़ा होगा, कला बाद में आएगा ! क्योंकि जीवन को जैसा मुश्किल और दुर्धर्ष इधर बना दिए गए हैं, उसके खिलाफ एक आवाज और चिंगारी के जरूरत को नकार पाना नामुमकिन है. भले ही स्वार्थ के वशीभूत आंख कान और जुबान बंद रखने की कवायद में लोग खड़े हैं लेकिन वाकिफ तो हैं ही कि सच क्या है ?

इतिहास गवाह है जीवन के तमाम अवरोधों के खिलाफ, युद्ध तनी हुई मुट्ठियों ने लड़ी है, उठी हुई गर्दनों ने लड़े हैं. पतली गली से निकल जाने वालों को दिशा दे अपनी ओर मोड़े हैं. यह बात नवनीत के यहां इस रूप में अभिव्यक्ति पाती है –

हमें किसी भी हिटलर
सत्ता से कोई खतरा नहीं

एक लेखक पक्षधरता को लेकर जितना उत्तरदायी है, उतना ही सच को लेकर भी वह उत्तरदायी है. इन मायनों में नवनीत पांडे लेखक होने के उत्तरदायित्व से भरे कलाकार दिखते हैं. जो नफा़ नुक़सान का हिसाब नहीं लगाते बल्कि कबिराई तरीके के उच्च मूल्यों और आदर्शों में खड़ा होते हैं, जानते हुए कि –

साधो देखो, जग बौराना सांची कहौ तो मारन धावै झूठे जग पतियाना

कहने नहीं चुके कि –

आपके कहे
आपके लिखे बीच
बहुत बड़ी फांक है

नवनीत के यहां कवि कर्म टुकड़े-टुकड़े में लपटती-सुलगती आग की तरह फैलती है. सवाल दर सवाल और सच ऊपर सच में आती है. दुनिया को हाथ की तरह सुंदर और मुलायम होने की कामना के बजाय सख़्त तथा मजबूत होने की कामना में दिखाई देता है. आजादी के सत्तर साल बाद देश में, एक अजीब किस्म का बयार आया. जैसे देश मनुष्यों का नहीं ‘ईश्वरों’ का है. जबकि वह ईश्वर भी खुद ब खुद नहीं बना. बनाया गया मनुष्यों द्वारा. मनुष्यों से ही देश बना – देश !

मनुष्य समाज में एक आजाद और निर्वैयक्तिक देश की लालसा इस कदर विद्यमान है कि प्रगाढ़ प्रेम की तरह वह अकल्पनीय और अकथनीयता के स्तर में है. किंतु प्रेम में पगे इस देश में, हाल के वर्षों में छद्म, असहिष्णु और हिंसक चोले से लिपटे कथित हिंदू राष्ट्रवादियों ने समाज में हिंदू की अवधारणा को जैसे रखा, वह विधर्मी अथवा नागरिक बोध के लोगों के लिए पाकिस्तान का रास्ता दिखाने लगा. यह न सिर्फ खेदजनक है बल्कि अशोभनीय और शर्मनाक है. नवनीत की कविताएं ‘कब तक खेलोगे यह खेल’ ‘आदमी को देश से बाहर कर सकते हो’ में पूरी शिद्दत के साथ उभरती है.

समकालीन भारतीय राजनीति के चाल और चरित्र को वैसे तो सभी देख-समझ रहे हैं. पर्दे के पीछे का चलने वाला दृश्य अब नंगा ही आ खड़ा हुआ है. यद्यपि देश में कांग्रेस नीत सरकारें भी यह काम बखूबी करते रही, जो बाह्य मर्यादा में होने के कारण इतनी बुरी भी नहीं लगती थी लेकिन तत्कालीन सत्ता के रंगत देख मन खिन्न हुआ जाता है. बेतकल्लुफी में यह रोज हुआ जाता है. सैद्धांतिक विचार और विमर्श के द्वारा अब बंद कर दिए गए हैं. लक्ष्य सत्ता है, जिसके लिए जायज-नाजायज के बीच की रेखा मिटा दी गई है. टर्म एंड कंडीशनिंग तय कर दिए गए हैं. हर हाल में सत्ता पर काबिज रहना इसके बदले में –

दबा दो ! दबा दो ! दबा दो ! राजा, राज
दरबार के हर
भ्रष्टाचार
अनाचार
दुराचार की खबर
साम, दाम, दंड, भेद
हर हथियार आजमा लो, हर कमी, नाकामी दबा दो

यह सब इस समय की सबसे अधिक खौफनाक क्रिया है, जिसका खत्म सोद्देश्य जरूरी है.

ताकत की अवधारणा को उसकी बर्बरता से समझा जाना चाहिए. जो जितना अधिक बर्बर हुआ, उतना ही अधिक ताकतवर हुआ !ताकतवर के सामने मनुष्य ही मरा है. लाख जतन किए गए हैं बचाव के लेकिन बचा कोई भी नहीं है, इसलिए नवनीत जड़ वजहों को बताते हैं कि –

भ्रम निकाल दो
तुम चुप हो
समर्थक हो
धार्मिक हो इसलिए बच जाओगे

चूंकि /उधर खड़े वे लोग हत्या के कीमियागर हैं, कलाकार हैं, व्यापारी हैं.

नवनीत पांडे की खूबी और उनके रचनात्मक सामर्थ्य को मैं इस रूप में भी देख रहा हूं कि वे कोई बैनर पोस्टर उठाए बगैर ही वैचारिकता को केंद्रीकृत किए हुए हैं, बिना ठहरे ! ‘क्या कोई दो बार मरा है’ शीर्षक कविता में नवनीत दा जैसा कहे हैं कि पूछे हैं यह आसां सा सवाल नहीं है –

माना कि
इस विध्वंसक समय में बोलना सबसे बड़ा खतरा है
पर बताओ !
क्या कोई दो बार मरा है ?

संदर्भ मगध का हो, फिर श्रीकांत वर्मा को कैसे नकार सकेंगे ! श्रीकांत वर्मा हिंदी जगत के वे कवि हैं, जिन्होंने-जो लिखा, खूब लिखा. पूरी मुस्तैदी में लिखा. किंतु सत्ता के दलदल में पांव उतरे कि बेदाग़ नहीं रह जाते ! यह श्रीकांत वर्मा के साथ भी हुआ. यदि हिंदी का एक बड़ा वर्ग उनसे सिलेक्टिव स्पेस लिया तो एक बड़ी वजह यह थी. जबकि श्रीकांत वर्मा को उनके पैनी और धारदार भाषा शैली ने एक महत्वपूर्ण कवि के तौर स्थापित किया; लगभग उन्हें धूमिल के समकक्ष मान दिलाया. यद्यपि संदर्भ में वह साठ सत्तर का दशक था और यह है इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक ! बिल्कुल एक बिंदु पर मिलान की दशा में है. तब श्रीकांत वर्मा कह रहे थे –

महाराज
राजसूय यज्ञ संपन्न हुआ

और नवनीत कह रहे हैं –

न्याय / व्यवस्था / पर प्रश्न है / दरबार में /जश्न है

इन दोनों बिंदुओं के मिलान और चरम को हमें नहीं भूलना चाहिए कि कुबध पर कुबध फिर खड़ा है ! मगध डूब रहा है !!

सत्ता के निरंकुश हो जाने का संबंध, राज्य की आलोचना अपरिहार्य है. नवनीत के इस संकलन से यह बात उभर कर आती है कि नवनीत पांडे की अधिकांश कविताएं मूलत राजनीतिक कविताएं हैं, जो ठोस-दावे और उम्मीद के पेंडुलम पर लटकती है. वह चाहे ‘कभी गांधी पैदा नहीं हो सकता’ कि ‘गली-गली गोड़से घूम रहे हैं’ की पाठ को देखें अथवा ‘गांधी टोपी’ या फिर ‘विकास का बाप कितना मस्त है’ सत्ता से आंखें तरेर, उसे चेतावनी देती हैं कि ‘यहां सब गड्मड’ है.

कोई भी राजनीतिक कविताएं नेपथ्य में चल रहे चीजों की अनदेखी , कभी कर ही नहीं सकती ! वह रोम के जलने और नीरो के बांसुरी बजाने को वैसा ही दर्ज करेगी, जैसा है. नवनीत अछूते भला कैसे हों ? कहेंगे ही –

जमीन खोखला रही
जड़ें भरभरा रही
पेड़ संभाले नहीं संभल रहे राजा जी मुस्कुरा रहे

नवनीत की कविताओं पर और भी ढेरों बातें हैं जिसे फिर कभी प्रस्तुत किया जायेगा.

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