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Home पुस्तक / फिल्म समीक्षा

‘Coup pour Coup’ (Blow for Blow) : फ्रांस के टेक्सटाइल महिला मजदूरों की कहानी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 2, 2025
in पुस्तक / फिल्म समीक्षा
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‘Coup pour Coup’ (Blow for Blow) : फ्रांस के टेक्सटाइल महिला मजदूरों की कहानी
‘Coup pour Coup’ (Blow for Blow) : फ्रांस के टेक्सटाइल महिला मजदूरों की कहानी
मनीष आज़ाद

‘Coup pour Coup’ (Blow for Blow). यह फिल्म फ्रांस के टेक्सटाइल महिला मजदूरों की कहानी है. उनके संघर्षो, उनकी कठिन जीवन स्थितियों की कहानी है. 1972 में बनी यह फिल्म फ्रांस के मई 68 आन्दोलन से प्रभावित है.

फिल्म की दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें असल मजदूरों ने अभिनय किया है. इनमें से अधिकांश वे महिला मजदूर हैं जिन्होंने मई 68 आन्दोलन में स्वयं हिस्सा लिया था. सिर्फ मैनेजर और एकाध पुरुष चरित्र ही ‘प्रोफेशनल’ कलाकार हैं. और मजे की बात यह है कि उन्हीं का अभिनय कमजोर है.

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बाकी सभी महिला मजदूर पहली बार अभिनय कर रही थीं. बल्कि यो कहें कि वह अपनी जीवन स्थितियों को कैमरे के सामने दुबारा जी रही थीं. पात्रों के साथ साथ वह फैक्ट्ररी भी असल है जहां फिल्म शूट की गयी है. सच कहें तो यह ‘पीटर वाटकिन’ की परम्परा की फिल्म है. याद कीजिए, पीटर वाटकिन ने भी अपनी मशहूर फिल्म ‘ला कम्यून’ इसी तरह से बनायी थी.

फिल्म में मजदूर महिलाओं ने सिर्फ अभिनय ही नहीं किया है बल्कि फिल्म निर्माण की पूरी प्रक्रिया में भी अपनी सक्रिय हिस्सेदारी की है. चाहे कैमरा एंगिल की बात हो या फिर पटकथा की बात हो.

सच तो यह है कि फ्रेम दर फ्रेम फिल्म शूट करते हुए सभी महिला मजदूर बैठक करते थे और साथी कलाकारों के अभिनय पर अपनी राय जाहिर करते हुए फिल्म के तकनीकी पहलुओं पर भी अपनी राय रखते थे और इसकी रोशनी में फिल्म में आवश्यक बदलाव किये जाते थे. एक तरह से यह एक ‘इम्प्रोवाइज्ड’ फिल्म है.

फिल्म में मजदूर महिलाओं द्वारा फैक्ट्ररी पर कब्जे की प्रक्रिया को काफी असरदार तरीके से दिखाया गया हैं. जो काफी moving है. इस फिल्म के डायरेक्टर ‘Marin Karmitz’ हैं, जिनकी (as a producer) मशहूर trilogy ‘Red’, ‘White’ और ‘Blue’ बहुत चर्चित हुई है.

Marin Karmitz 68 में फ्रांस में फोटो जर्नलिस्ट थे. इसी दौरान उन्होंने कई मजदूर आन्दोलनों विशेषकर महिला मजदूर आन्दोलनों को कवर किया था और उससे खासे प्रभावित हुए थे.

खुद उनके शब्दों में- ‘हम उस वक्त यह जानने को बेहद उत्सुक थे कि अपने देश की मूक जनता की आवाज हम कैसे बनें. विशेषकर उन हजारों महिला टेक्सटाइल मजदूरों की आवाज जो 1970 में पहली बार हड़ताल पर गयी थी और इसके लिए उन्होंने बेहद मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया था.

’मैंने प्रेस फोटोग्राफर के रुप में ऐसी कई हड़तालों को कवर किया और यहां मैने जो देखा उससे मैं इतना प्रभावित हुआ कि मैं यह फिल्म बनाने को बाध्य हुआ, जो इन्हीं बहादुर महिला मजदूरों के अनुभवों पर आधारित है.

’इनकी कहानी मुझे लगातार प्रभावित करती रही है. आज धनी देशों में भले ही मजदूरों की स्थिति थोड़ी भिन्न हो लेकिन उन्होंने अपने अधिकारों के लिए जो लड़ाई लड़ी है, वह आज भी प्रासंगिक है.’ फिल्म ‘यू ट्यूब’ पर उपलब्ध है.

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