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कोरोना के नाम पर विश्वव्यापी दहशत फैलाने के खिलाफ नोवाक जोकोविच और पैट्रिक किंग की लड़ाई

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 20, 2022
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कोरोना के नाम पर विश्वव्यापी दहशत फैलाने के खिलाफ नोवाक जोकोविच और पैट्रिक किंग की लड़ाई

girish malviyaगिरीश मालवीय

आजकल आप देख रहे हैं कि जगह-जगह पर एंट्री के लिए वैक्सीन सर्टिफिकेट मांगे जा रहे हैं. अब ऐसे सर्टिफिकेट मांगे जाने पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि कि ‘उसने ऐसी कोई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी नहीं की है, जिसमें किसी भी उद्देश्य के लिए टीकाकरण प्रमाण-पत्र साथ रखना अनिवार्य हो.’ तो फिर ऐसे सर्टिफिकेट का मांगा जाना गैरकानूनी है, यह बात आपको अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए.

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पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

सबसे महत्वपूर्ण बात जो आप लोग नहीं समझ रहे हैं वो यह है कि यह हमारे मौलिक अधिकारों पर हमला हैं, जो हमें संविधान द्वारा प्रदान किये गए हैं. यह हमारे जीवन जीने के अधिकार पर हमला हैं, यह हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कुचलने की कोशिश है और यह हमारे कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता और आजीविका कमाने के अधिकार पर हमला है.

मेघालय हाईकोर्ट ने जुलाई, 2021 में अपने निर्णय में साफ-साफ कहा है कि टीकाकरण के लिए अधिकार और कल्याण नीति कभी भी एक प्रमुख मौलिक अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती है, खासकर जब टीकाकरण और व्यवसाय और/या पेशे को जारी रखने के निषेध के बीच कोई उचित संबंध नहीं है. एक सामंजस्यपूर्ण और कानून के प्रावधानों, विवेक और न्याय के सिद्धांतों के उद्देश्यपूर्ण निर्माण से पता चलता है कि अनिवार्य या ज़बरदस्ती वैक्सीनेशन करना कानून के तहत उचित नहीं है और इसलिए इसे शुरू से ही अधिकारातीत घोषित किया जाना चाहिए.

समस्या यही है कि हमारी लिबरल बिरादरी जो ऐसी किसी भी जबरदस्ती पर विरोध करती थी, अनिवार्य टीकाकरण पर मुंह सिलकर बैठी रही. जबकि अनिवार्य टीकाकरण पर जुलाई 2021 में मेघालय हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि ‘ज़बरदस्ती वैक्सीनेशन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.’

मेघालय हाईकोर्ट ने जबर्दस्ती वैक्सीन लगाए जाने के विरुद्ध दिए गए अपने निर्णय में कहा है –

‘भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया गया है. इसी तरह से स्वास्थ्य देखभाल का अधिकार, जिसमें टीकाकरण भी शामिल है, एक मौलिक अधिकार है. हालांकि ज़बरदस्ती टीकाकरण के तरीकों को अपनाकर अनिवार्य बनाया जा रहा है, यह इससे जुड़े कल्याण के मूल उद्देश्य को नष्ट कर देता है.

यह मौलिक अधिकार (अधिकारों) को प्रभावित करता है, खासकर जब यह आजीविका के साधनों के अधिकार को प्रभावित करता है जिससे व्यक्ति के लिए जीना संभव होता है.’

‘टीकाकरण के लिए अधिकार और कल्याण नीति कभी भी एक प्रमुख मौलिक अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती है, यानी जीवन का अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आजीविका, खासकर जब टीकाकरण और व्यवसाय और/या पेशे को जारी रखने के निषेध के बीच कोई उचित संबंध नहीं है.

एक सामंजस्यपूर्ण और कानून के प्रावधानों, विवेक और न्याय के सिद्धांतों के उद्देश्यपूर्ण निर्माण से पता चलता है कि अनिवार्य या ज़बरदस्ती वैक्सीनेशन करना कानून के तहत उचित नहीं है और इसलिए इसे शुरू से ही अधिकारातीत घोषित किया जाना चाहिए.’

मेघालय की अदालत ने अपने फैसले में अमेरिका के महान न्यायविद बेंजामिन एन. कार्डोजो को उद्धृत करते हुए कहा कि ‘हर वयस्क और मानसिक रूप से स्वस्थ मानव को यह तय करने का अधिकार है कि उसके शरीर के साथ क्या किया जाना चाहिए.’

‘भारत में वैक्सीन की जो पहली डोज दी गयी दरअसल वह बूस्टर डोज ही थी, क्योंकि भारतीयों में इन्फेक्शन की वजह से स्वाभाविक तौर पर इम्युनिटी पैदा हो चुकी थी.

‘किसी मेडिकल संस्थान ने बूस्टर डोज की सलाह नहीं दी. यह बूस्टर डोज महामारी की स्वाभाविक प्रक्रिया को नहीं रोक सकती है. किसी भी गवर्नमेंट बॉडी ने बूस्टर की सलाह नहीं दी है. जहां तक मेरी जानकारी है, प्रिकॉशनरी डोज की सलाह दी गई है. इसकी वजह वह रिपोर्ट हैं, जिनमें कहा जा रहा था कि 60 साल के ऊपर के लोगों में 2 डोज के बाद भी संक्रमण से लड़ने की क्षमता नहीं विकसित हो रही है.’

यह कहना है ICMR के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एपिडेमोलॉजी की साइंटिफिक एडवाइजरी कमेटी के चेयरपर्सन डॉ. जयप्रकाश मुलियिल का. वे कहते हैं ओमिक्रॉन वैरिएंट को बूस्टर डोज से रोका नहीं जा सकता है और इससे सभी संक्रमित होंगे.

आगे वे कहते हैं कि कोविड की वैक्सीन को बार-बार बूस्टर डोज के तौर पर देना नए वैरिएंट के खिलाफ कारगर रणनीति नहीं है. (अभी ऐसा ही किया जा रहा है.) इसकी जगह नई वैक्सीन दी जानी चाहिए, जो संक्रमण से बेहतर सुरक्षा दे सके. साफ है कि चौथी डोज ठोकने की भूमिका बनाई जा रही है.

कोरोना फासीवाद के खिलाफ छिड़ी विश्वव्यापी लड़ाई में नोवाक़ जोकोविच आप हमारे रियल हीरो हैं

जोकोविच बुरे नहीं फंसे हैं, तुम लोग बुरे फंसे हो. वह जो लड़ाई लड़ रहा है मीडिया को उसको बारे में बताना चाहिए लेकिन ऐसा न कर के जोकोविच को विलेन बनाने में लगा है. जोकोविच दुनिया का न. 1 टेनिस प्लेयर है, अरबों की संपत्ति है उसके पास, एक टूर्नामेंट खेलने नहीं खेलने से उसकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला था. आस्ट्रेलिया की सरकार ने उसके जाने पर कोई कभी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया. एक बार वह आस्ट्रेलिया की कोर्ट में जीत चुका है, उसे ऑस्ट्रेलिया में दूसरी बार हिरासत में लिया गया है.

बिल गेट्स ओर बिग फार्मा लॉबी का गुलाम इंटरनेशनल मीडिया हाथ पांव धोकर नोवाक़ जोकोविच के पीछे पड़ा हुआ है. पहली खबर बीबीसी की है. उन्हें इस बात पर आब्जेक्शन है कि नोवाक़ जोकोविच वैक्सीन विरोधी क्यों है ? आप को क्या तकलीफ है भाई ?

उसके देश सर्बिया को कोई तकलीफ नहीं है तो बीबीसी का पेट क्यों दु:ख रहा है ? नोवाक़ कहते हैं कि ‘यह मेरा शरीर है इसके लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा है यह मैं फैसला करूंगा. मेरा पास यह विकल्प क्यों नहीं होना चाहिए कि मैं वैक्सीन लूं या नहीं ?’

तो फिर आपने नंबर 1 टेनिस प्लेयर नोवाक़ जोकोविच को ऑस्ट्रेलिया छोड़ने पर मजबूर क्यों किया ? उसका भी यही कहना था कि मुझे कोविड संक्रमण हो चुका है. मुझ में नेचुरल इम्यूनिटी मौजूद है जो किसी भी वैक्सीन से ज्यादा ताकतवर है.

पूरी दुनिया मे अनिवार्य वेक्सीनेशन के नाम पर इतना घटिया खेल खेला जा रहा है जिसकी कोई हद ही नहीं है. और एक बात समझ लीजिए कि वैक्सीन से संक्रमण रुकता है, यह कही सिद्ध नहीं हुआ है. इसलिए यह तर्क भी भोथरा है कि यदि आप अनवेक्सीनेटेड व्यक्ति के सम्पर्क में आओगे तो आपको कोरोना हो जाएगा.

कोरोना फासीवाद के खिलाफ छिड़ी विश्वव्यापी लड़ाई में नोवाक़ जोकोविच आप हमारे रियल हीरो हैं. नोवाक जोकोविच अगर चाहते तो वह 6 जनवरी को ही आस्ट्रेलिया छोड़ कर चला जाते क्योंकि आस्ट्रेलिया सरकार ने उसका टीकाकरण नहीं करवाने के कारण उसके वीजा रद्द जरूर किया था लेकिन उसके वापस जाने पर कोई रोक नहीं लगाई थी, लेकिन जोकोविच ने डिटेंशन सेंटर में रहकर आस्ट्रेलिया सरकार की हिरासत के खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ने का फैसला किया. और कोर्ट से आए फैसले में उन्होंने आस्ट्रेलिया की सरकार को तगड़ी पटखनी दी है.

नोवाक की जीत आपकी हमारी जीत है. नोवाक़ के वकीलों ने अदालत में जो दलील दी वह बहुत दिलचस्प थी. जोकोविच ने कहा कि उन्हें टीकाकरण का सबूत देने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनके पास सबूत है कि वह पिछले महीने कोरोना संक्रमण का शिकार हुए थे.

बहुत से महामारी विशेषज्ञ यह दलील रखते आए हैं कि यदि किसी कोई कोरोना संक्रमित होकर ठीक हो जाता है तो उसके शरीर में जिस नेचुरल इम्युनिटी का निर्माण होता है, वो वही इम्यूनिटी है जो वैक्सीन की दो डोज लेने के बाद मिलती है बल्कि ऐसी नेचुरल इम्यूनिटी वैक्सीन से प्राप्त इम्यूनिटी से भी बेहतर रिजल्ट देती है.

अदालत के सामने यही प्रश्न था कि इस आधार पर किया गया जोकोविच का दावा कितना सही है ? दरसअल ऑस्ट्रेलिया के चिकित्सा विभाग ने भी छह महीने के भीतर कोरोना संक्रमण के शिकार लोगों को टीकाकरण में अस्थायी छूट दी है. इस आधार पर भी जोकोविच का पक्ष मजबूत था. जोकोविच के वकील ने कहा कि जोकोविच ने अधिकारियों की समझाने की काफी कोशिश की कि ऑस्ट्रेलिया में प्रवेश के लिये वह जो कुछ कर सकते थे, उन्होंने किया.

आस्ट्रेलिया की सर्किट कोर्ट के जज केली ने पाया कि जोकोविच ने मेलबर्न हवाई अड्डे पर अधिकारियों को टेनिस आस्ट्रेलिया द्वारा उन्हें दी गई मेडिकल छूट के दस्तावेज सौंपे थे और वे इतना ही कर सकते थे. उनकी तरफ से कोई कोताही नहीं हुई.

जज ने फैसला सुनाते हुए आस्ट्रेलिया सरकार को आदेश दिया कि फैसले के 30 मिनट के भीतर जोकोविच को मेलबर्न के पृथकवास होटल से बाहर किया जाए. जज ने जोकोविच का वीजा भी बहाल कर दिया है. अनिवार्य कोरोना टीकाकरण के खिलाफ चल रही विश्वव्यापी लड़ाई में यह एक बड़ी जीत है.

जोकोविच ने इस फैसले के सामने आने के बाद लिखा कि मेलबर्न कोर्ट के जज द्वारा जो फैसला दिया गया है, उससे वह खुश हैं. उन्हें उम्मीद है कि वह ऑस्ट्रेलियन ओपन में खेल पाएं. अब एक बार गेंद फिर से आस्ट्रेलिया सरकार के पाले में पहुंच गयी है. अगर अब आस्ट्रेलिया की सरकार आस्ट्रेलियन ओपन खेलने से इस चेम्पियन खिलाड़ी को रोकती है तो उसकी पूरी दुनिया मे थू थू हो जाएगी. हमारी शुभकामनाएं इस चेम्पियन खिलाड़ी के साथ है.

कनाडाई कोर्ट में कोरोना के खिलाफ जीत

कनाडियन नागरिक ने कोरोना के खिलाफ कोर्ट की जंग जीत ली. कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में, लॉकडाउन, मास्क और जबरन टीकाकरण सभी को समाप्त कर दिया गया है. कोरोना को अब आधिकारिक ‘महामारी’ के बजाय ‘फ्लू वायरस’ के रूप में संदर्भित किया जा रहा है. कोर्ट के फैसले के बाद से पूरे प्रांत में दहशत खत्म हो गया है क्योंकि कोरोना का कोई अस्तित्व था ही नहीं.

क्या हुआ ? दरअसल, कनाडा के नागरिक पैट्रिक किंग ने हजारों अन्य लोगों के साथ कोरोना के नाम पर जबरन लॉकडाउन, मास्क और टीकाकरण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. सरकार ने सरकारी निर्देशों का उल्लंघन करने वालों पर नकेल कसी पकड़-धकड़ किया और जुर्माना लगाया. प्रांतीय स्वास्थ्य मंत्री द्वारा उल्लंघन के लिए पैट्रिक पर 1200 डॉलर का जुर्माना भी लगाया गया था.

कोरोना की पहचान की पूरी जानकारी रखने वाले पैट्रिक को पता था कि महामारी नकली है और उसका अस्तित्व ही नहीं है. उन्हें मौका मिला और वे कोरोना का पर्दाफाश करने के लिए अदालत गए.

पैट्रिक ने कोर्ट में स्टैंड लिया कि ‘जज साहब, जब कोरोना का वजूद ही नहीं तो क्या पाबंदियां ?’ पैट्रिक ने सरकार को चुनौती दी कि ‘पहले अदालत में साबित करें कि कोरोना का वैज्ञानिक अस्तित्व है, फिर मैं जुर्माना भरूंगा और मास्क पहनूंगा.’

कोर्ट ने सरकार के स्वास्थ्य मंत्री को यह साबित करने का आदेश दिया कि कोरोना का वैज्ञानिक अस्तित्व है ? यहां सरकार के गले में हड्डी फंस गई. सरकार के मंत्री ने हार मान ली और स्वीकार किया कि ‘कोरोना वायरस वैज्ञानिक रूप से मौजूद नहीं था क्योंकि हमने कभी वायरस को अलग नहीं किया था। यानी हमारे पास कोरोना को साबित करने के लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है.’

पैट्रिक ने जवाब दिया, ‘जज साहब, जब कोरोना नहीं है, तो लॉकडाउन, मास्क और फिर जबरन टीकाकरण क्यों ?

याद रहे, विज्ञान की दुनिया में किसी भी वायरस को ‘आइसोलेट’ किए बिना उसका टीकाकरण करना शत-प्रतिशत असंभव है, क्योंकि आइसोलेट करने के बाद ही वायरस का एबीसी पता लग सकता है कि यह कैसे काम करता है. उसके बाद ही इस गणना के अनुसार उसके खिलाफ दवा तैयार की जाती है.

जबकि वर्तमान कोरोना को कभी अलग नहीं किया गया है, जो टीके विकसित किए गए है, वे सभी मान्यताओं पर आधारित हैं जिन्हें किसी स्वतंत्र निकाय द्वारा अनुमोदित नहीं किया गया है. संक्षेप में कहें तो विज्ञान का मूल उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से दुनिया पर राजनीति विज्ञान को वायरस को अलग करने के मुद्दे पर गोलबंद (क़ैद) करना है और इसके मद्देनजर सभी को जबरन टीका लगाने का एजेंडा पूरा किया जाना है.

परीक्षण में ‘राजनीति विज्ञान’ बुरी तरह से उजागर हुआ था. इस तरह के विज्ञान का ‘वास्तविक विज्ञान’ से कोई लेना-देना नहीं है. पैट्रिक ने कहा, ‘न्यायाधीश, जब वैज्ञानिकों ने कभी वायरस को अलग नहीं किया है, तो हमें मास्क क्यों पहनना चाहिए ? हमें अपनी नौकरी क्यों छोड़नी चाहिए ? और हमें किस उद्देश्य से टीकाकरण करना चाहिए ? और वायरस को अलग किए बगैर उन्होंने टीका कैसे बनाया ?’

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुनाया कि सरकार वायरस की उपस्थिति को साबित करने में विफल रही है. तब से, कनाडा के अल्बर्टा प्रांत की प्रांतीय सरकार ने आधिकारिक स्तर पर सभी कर्फ्यू हटा लिया है.

एक बात तो तय है कि भारतीय मीडिया, सरकार और लिफाफा पत्रकार आपको इस खबर की सूचना नहीं देंगे, वे इसे आपसे छिपाएंगे क्योंकि वे आपको अनजान रखकर टीकाकरण के एजेंडे को पूरा करने में संयुक्त राष्ट्र के साथ हैं. इसलिए, यह आपकी और मेरी जिम्मेदारी है कि ज्यादा से ज्यादा इसे लोगों तक पहुंचाएं.

मुझे लगता है कि कोरोना के खिलाफ भारत में भी कानूनी जंग होनी चाहिए. गंभीर वकीलों को सरकार को कोरोना की उपस्थिति साबित करने के लिए अदालत में चुनौती देनी चाहिए कि कोरोना की उपस्थिति साबित करें वरना प्रतिबंध अवैध हैं.

जब सरकार इसे साबित करने में नाकाम रहेगी तो कोरोना के सारे ड्रामे अपने आप धरातल पर आ जाएंगे, फिर कनाडा की सरकार की तरह यहां के लोग भी राहत की सांस ले सकेंगे.

कोरोना की दहशत के खिलाफ

http://www.pratibhaekdiary.com/wp-content/uploads/2022/01/10000000_119725150559535_4163961745904296562_n.mp4
  • (इस आलेख का अधिकांश हिस्सा गिरिश मालवीय के आलेखों से लिया गया है, बाद का हिस्सा अन्य स्त्रोत से लिया गया है.)

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