‘ज्वायलैंड’ : लेकिन शहरों में जुगनू नहीं होते…
'ज्वायलैंड' : लेकिन शहरों में जुगनू नहीं होते... अगर अगली बार कोई गुस्से या नफ़रत से भरकर आपसे कहे कि...
Read moreDetails'ज्वायलैंड' : लेकिन शहरों में जुगनू नहीं होते... अगर अगली बार कोई गुस्से या नफ़रत से भरकर आपसे कहे कि...
Read moreDetailsTwo poems of revolutionary poet Vinod Shankar विनोद शंकर सिलगेर सत्ता की आंखों में आंखें डाल कर खड़ा है सिलगेर...
Read moreDetailsशैलेन्द्र : गीतों के जादूगर का मैं छंदों से तर्पण करता हूं 'हर जोर ज़ुल्म के टक्कर में हड़ताल हमारा...
Read moreDetailsवे उभारेंगे 'आदिकवि' वाल्मीकि को और चर्चा जन-जन तक पहुंचा देंगे कि वाल्मीकि भी पहले एक 'डाकू' थे और चुटकियों...
Read moreDetails'दी सेंटीपीड' : आज के दौर के 'दुःस्वप्न' का यथार्थ...' 'एक सपने में मैंने देखा कि सड़क पर खून फैला...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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