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अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
in गेस्ट ब्लॉग
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अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा
अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

जियोपॉलिटिक्स नहीं समझने वाले लोगों को लगता है कि चूंकि अमेरिका-इज़रायल अभी भी ईरान पर हमले कर रहा है और आधिकारिक तौर पर ईरान में ज़्यादा लोगों की मौत हुई है, इसलिए इस युद्ध में ईरान हार रहा है.

इसमें दो-तीन बातें और जोड़ दीजिए. मसलन, तुरंत कुछ लोग यह कहते नज़र आ जाएंगे कि अमेरिका-इज़रायल ने तो ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या कर दी, अली लारिजानी की हत्या कर दी. कई और कमांडर मार दिए, इसलिए ईरान हार रहा है.

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मैं इस पर नहीं जाऊंगा कि ईरान ने क्या-क्या किया. वह सही से गूगल करने पर आपको भी कई जगह मिल जाएगा. लेकिन एक मोटी-मोटी बात होती है, सैन्य क़ामयाबी और रणनीतिक क़ामयाबी की. अव्वल तो अमेरिका-इज़रायल सैन्य ऑपरेशन में भी शिकस्त खाए हुए बैठे हैं, लेकिन 50-100 छोड़िए, अगर वे ईरान के ऊपर 15-20 हज़ार जगहों पर भी बमबारी कर ले, तो इसे क़ामयाबी नहीं कहा जाएगा.

दुनिया भर के लोग घूम-फिरकर यही पूछेंगे कि युद्ध का मक़सद हासिल हुआ ?

अब तक इस युद्ध के दो चरण हुए हैं. पहला, अमेरिका-इज़रायल की ओर से हमला और दूसरा ईरान के पलटवार के दौरान दो-तरफ़ा हमले. अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो तीसरा चरण शुरू होगा और यह एक तरह का एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा.

इसके बाद दोनों पक्षों के लिए वापस मुड़ने की राह बहुत मुश्किल हो जाएगी. जैसे-जैसे अमेरिकी सैनिकों की मौत होगी, युद्ध के समर्थक माहौल बनाएंगे कि सैनिकों का बलिदान बेकार नहीं जाना चाहिए, इसलिए और युद्ध लड़ो. ईरान तो ख़ैर लड़ेगा ही.

इराक़ में साढ़े चार हज़ार अमेरिकी सैनिक मारे गए थे. अफ़ग़ानिस्तान में ढाई हज़ार से ज़्यादा. वियतनाम में 55 हज़ार से ज़्यादा.

अभी कुछ दिन पहले एक अमेरिकी विश्लेषक ईरान को ‘वियतनाम ऑन स्टेरॉयड्स’ कह रहे थे. अमेरिकी जनरल भी लगभग यही चेतावनी दे रहे हैं. मतलब आप समझ ही गए होंगे. दूसरा, वियतनाम के पास तेल नहीं था, ईरान के पास तेल की ‘गर्दन’ है. उसने वही पकड़ ली है.

तीसरा, ईरान ने शुरू से ही इस युद्ध में हूतियों को बचाकर रखा हुआ था. अगर हूती बंदूक़-मिसाइल धो-पोछकर उतरते हैं, तो मौजूदा ईरानी मिलिट्री रणनीति के हिसाब से इसका मतलब होगा कि ईरान अब ऑल आउट वॉर में उतर गया है.

पिछले कई दिनों से हूती, ईरान के इशारे के इंतज़ार में तैयार बैठे हैं. हूती उतरे, तो होर्मुज के साथ-साथ लाल सागर भी बंद हो जाएगा.

अमेरिका और इज़रायल सालों-साल बमबारी करने के बावजूद हूती या फिर हिज़बुल्लाह को ख़त्म नहीं कर पाए, ईरान तो फिर बहुत बड़ी ताक़त है. ईरान ने अमेरिका की इस रणनीति को समझ लिया है कि वह झटके से हमला करके सामने वाले को उबरने का मौक़ा देने से पहले ही अपना काम कर लेता है. यहां भी अमेरिका ने वही किया, लेकिन ईरान 20-30 साल से अमेरिकी तौर-तरीक़ों को देख-समझ रहा है. वह फंसा नहीं.

अमेरिका-इज़रायल की मुश्किल यह है कि उसे यह नहीं पता कि ईरान का ‘ब्रेकिंग पॉइंट’ क्या है. इसलिए, हर रोज़ दोनों मुल्क अंतिम प्रहार की बात करते रहे हैं और हर अंतिम प्रहार के बाद एक नया चैप्टर खुल जाता है.

मौजूदा हालात के हिसाब से बातचीत में अमेरिका को ही झुकना पड़ेगा. अगर नहीं झुका, तो यह चैप्टर जल्द ही खुलता हुआ दिखेगा.

  • दिलीप खान

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