
इस महिला का नाम सोनी सोरी है, जो हिडमा के दाह संस्कार से पहले उनको नमन कर रही हैं. इस महिला को निर्दोष होते हुए केवल इस लिए गुप्तांगों में पत्थर और मिर्च का पावडर भर दिया था कि वो एक आदिवासी महिला थीं और अपने जमीन और जंगल को माइनिंग के लिए विरोध कर रही थी.
वो कोई हथियारबंद नक्सल नहीं थीं. उनका दोष केवल यह था कि उन्होंने खनन के ख़िलाफ़ आंदोलन किया, ग़रीब आदिवासी समाज के साथ हो रहे अन्याय को रोकने का प्रयत्न किया था.
किसी भी समाज में महिलाओं का शोषण-उत्पीड़न अगर शासक और दबंग करे तो उस समाज परिवार का प्रत्युत्तर होता है या नहीं ? हिडमा जैसे लोग क्यों पैदा होते हैं, उसके root causes को समझे बगैर इस समस्या का समाधान ढूंढना बेइमानी है.
सरकार को इस बात पर जरूर ध्यान देना चाहिए कि जो लोग सदियों से, हजारों सालों से जंगल में रहते आये हैं वो लोग अगर भगाए जाएंगे तो विरोध क्यों नहीं होगा ? और सरकार अगर हर शांतिपूर्ण विरोध का भी दमन करेगा तब दमन के बाद ज़िंदा बचे लोग क्या करेंगे ?
जिनको आप नक्सली कह कर मार दिए, उस हिडमा के बारे में स्थानीय लोग क्या सोचते हैं, सरकार को और मीडिया को इसका संज्ञान लेना चाहिए. स्थानीय लोग जिसे जल जंगल जमीन बचाने के लिए आज़ाद भारत का सबसे बड़ा योद्धा मान रहे हैं, आप उनकी बातों को इग्नोर कैसे कर सकते हैं ?
किसी ने लिखा है कि ‘अगर महुवे के पेड़ बचे रहे तो हिडमा महुवे की खुशबू सा हर आदिवासी और उन लोगों में हमेशा महकेगा जो निरंकुश और पूंजीवादी सत्ता के खिलाफ खड़े हैं, खड़े नहीं है तो वे जो उसके खिलाफ सोचते हैं.’
स्थानीय लोग मानते हैं कि आज दंडकारण्य और बस्तर के जंगलों को बचाने की एक बड़ी आवाज ख़ामोश हो गई है, मगर कभी अफ़्रीकी देश कांगो के कम्युनिस्ट लीडर पैट्रिक लुलुंबा की हत्या पर जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि ‘एक लुलुंबा हज़ार लुलुंबाओं को जन्म देगा’, वो बात हिडमा पे लागू होती है.
कैसे बड़े-बड़े उद्योगपती टाटा जिंदल अंबानी अदानी लाखों करोड़ों अरबों में खेलते है और झारखंड छत्तीसगढ़ उड़ीसा में आज भी ग़रीब आदिवासी भूख से मर रहा है, जिनकी जिंदगी से ज़्यादा उनके घरों के नीचे दबा सोना कोयला बॉक्साइट महंगा है, वो बाहर आने के बाद भी वो ग़रीब है.
यह ग़रीबी ओर शोषण ही तो है जो देश में नक्सलवाद को जन्म दे रहा हैं. इस गरीबी और शोषण पर प्रमुखता से सोचने और काम करने की जरूरत है. पूरा का पूरा गांव और शहर अगर जल जंगल जमीन और शोषण के खिलाफ किसी बुनियादी हक की मांग को लेकर आपसे गुहार लगा रहा है तो उसका जवाब बंदूक नहीं हो सकता.
समस्याएं हैं लेकिन उसका शांतिपूर्ण समाधान भी सोचना चाहिए. हर समस्या का जवाब हिंसा और गोली नहीं होता, यह बात सरकार को भी समझना चाहिए और बंदूक उठाए स्थानीय नागरिकों को भी. बड़ी से बड़ी लड़ाई अहिंसा और शांति प्रिय आंदोलन के जरिए लड़ी जा सकती हैं (अगर सरकार इसके लिए अवसर दें तो-सं.) सरकार को ये भी समझना चाहिए कि भूख गरीबी और शोषण के खिलाफ लोग सदियों से लड़ते आए हैं और आगे भी लड़ते रहेंगे.
- अमरेन्द्र शर्मा
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