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कॉमरेड हिडमा और 6 अन्य माओवादी कार्यकर्ताओं को पकड़ कर निर्मम हत्या की निंदा करें !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 22, 2025
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कॉमरेड हिडमा और 6 अन्य माओवादी कार्यकर्ताओं को पकड़ कर निर्मम हत्या की निंदा करें !
कॉमरेड हिडमा और 6 अन्य माओवादी कार्यकर्ताओं को पकड़ कर निर्मम हत्या की निंदा करें !

 

भारत सरकार द्वारा एक और हत्याकांड में, शीर्ष माओवादी नेता माडवी हिडमा सहित 6 माओवादी कार्यकर्ताओं, आंध्र प्रदेश के पापिकोंडा राष्ट्रीय उद्यान में अल्लूरी सीताराम जिले के पूर्वी गोदावरी क्षेत्र में एक संभावित फर्जी मुठभेड़ में मारे गए. हिडमा के साथ, 4 और शवों की पहचान की गई है – राजे अक्का डीवीसीएम (हिडमा का जीवनसाथी), चेल्लूरी नारायण एसजेडसीएम, और टेक शंकर.

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सीएलसी आंध्र प्रदेश के अनुसार, हिडमा और उसके साथियों को आंध्र प्रदेश पुलिस और ग्रेहाउंड्स ने उस समय अगवा कर लिया था जब वे इलाके में शरण लिए हुए थे. बताया जा रहा है कि एक मुखबिर ने सूचना दी थी, जिसके बाद उन्हें अगवा कर लिया गया, मारेडू मिल्ली नामक जंगल में ले जाया गया, प्रताड़ित किया गया और मार डाला गया. यह संभव है कि दस्ते के बाकी सदस्यों को भी यातना दी गई हो और उनकी निर्मम हत्या कर दी गई हो.

यह तथाकथित मुठभेड़ ग्रेहाउंड बलों द्वारा की गई है, जो अतीत में मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए कुख्यात रहे हैं. राज्य दक्षिणी बस्तर के गांवों में बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चला रहा है और ड्रोन हमले कर रहा है, जिनका दावा है कि वे पीएलजीए बटालियन नंबर 1 को निशाना बना रहे हैं, जिसका नेतृत्व कथित तौर पर हिडमा कर रहा है.

यह बेहद संदिग्ध है कि केंद्रीय समिति के सदस्य और पीएलजीए बटालियन नंबर 1 के प्रमुख माडवी हिडमा को इतनी आसानी से मार दिया गया और नेताओं के साथ चलने वाले माओवादियों के बड़े समूह में से अलग कर दिया गया.

हमने माओवादियों को नेतृत्व की रक्षा के लिए मरते दम तक लड़ते देखा है, जैसा कि बसवराज, और शंकर (पुजारी, कांकेर) के मामले में देखा गया. इसके विपरीत, जब भी राज्य ने वरिष्ठ माओवादी नेताओं को अकेले या कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर मारने का दावा किया है, तो वह एक फर्जी मुठभेड़ साबित हुआ है, जैसा कि कट्टा रामचंद्र रेड्डी उर्फ विकल्प उर्फ राजू दादा (63), कादरी सत्यनारायण रेड्डी उर्फ कोसा, चेरुकुरी राजकुमार उर्फ आज़ाद, किशनजी, रेणुका, सीसीएम गजराला रवि, अरुणा और कई अन्य के मामलों में हुआ है.

राज्य ने इतनी गहरी हिंसा फैलाई है कि वह लोगों के एक वर्ग को अपने ही भाइयों पर हथियार उठाने के लिए मजबूर कर देती है. वर्षों से, आत्मसमर्पण करने वालों और जबरन आत्मसमर्पण करने वालों से गुप्तचरों और मुखबिरों का एक काला जाल बुना है. इन्हीं से सरकारों ने डीआरजीएस का गठन भी किया है, एक ऐसा बल जिसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की खुली अवहेलना करते हुए, अपने ही लोगों का खूनी कुत्तों की तरह शिकार करने के लिए भेजा गया है. इन मुखबिरों के नेटवर्क और गुप्त गुर्गों के माध्यम से, राज्य ने ‘गिरफ्तारी नहीं, बल्कि कत्लेआम’ की नीति अपनाई है.

मध्य भारत की खनिज-समृद्ध धरती अपने बेटों और बेटियों के खून से सनी हुई है, जिससे यह ज़मीन एक विशाल, अंतहीन युद्धक्षेत्र में बदल गई है. यह सब राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में हो रहा है, जबकि असली मकसद विदेशी और बड़े भारतीय कॉरपोरेट घरानों को फ़ायदा पहुंचाना है.

पिछले दो सालों में, इस गणतंत्र के लगभग 600 बच्चे जल, जंगल और ज़मीन की रक्षा के संघर्ष में शहीद हो चुके हैं और गणतंत्र खामोश है, जबकि लोग अपने प्रियजनों, अपनी ज़मीन, अपने संसाधनों और अपनी गरिमा के नुकसान का शोक मना रहे हैं. इन सुनियोजित हत्याओं और मुठभेड़ों के पीछे करोड़ों रुपये की परियोजनाएं छिपी हैं.

आज़ादी, न्याय, संसाधनों और ज़मीन के स्वामित्व की दूरगामी पुकार ज़बरदस्त दमन के बीच जारी है – यह एक कठोर चेतावनी है कि जब तक अन्याय, शोषण और उत्पीड़न रहेगा, तब तक जनता का संघर्ष भी जारी रहेगा. हमारा देश बिकाऊ है – इसके लोग, श्रम, पहाड़, ज़मीन और नदियाँ, सब बड़े कॉरपोरेट और विदेशी कंपनियों की लूट के लिए नीलाम कर दिए गए हैं.

आज, हिडमा को मारना, खनन के खिलाफ संघर्षरत आदिवासियों को मारना है. भारतीय राज्य न केवल माओवादियों को निशाना बना रहा है, बल्कि अपने ही लोगों की आवाज़ दबा रहा है. जिस शांति की वह स्थापना का दावा करता है, वह उसके अपने ही बच्चों मार कर, सबसे गरीब लोगों के शरीर पर बनी है.

हिडमा, जिसे हिडमालू और संतोष के नाम से भी जाना जाता है, भाकपा (माओवादी) का सबसे कम उम्र का मुख्य माओवादी था. छत्तीसगढ़ के सुकमा के पुवर्ती गांव में जन्मे, वह तेंदु संघर्ष, भूमि सुधारों और माओवादियों द्वारा किए जा रहे खनन और उत्पीड़न के प्रतिरोध से प्रेरित होकर, 9 साल की उम्र में आंदोलन में शामिल हो गए. उनकी कहानी सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि शोषण और उत्पीड़न से ग्रस्त एक पीढ़ी की है.

इसके विपरीत, वेणुगोपाल उर्फ सोनू जिसने कभी जल, जंगल, ज़मीन और इज्जत की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी थी, क्रांतिकारी आंदोलन के साथ गद्दारी करके सरकार के सामने आत्मसमर्पण करने के बाद लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी का ब्रांड एंबेसडर बनने के लिए उम्मीदवार बन गया.

इस एक ही कार्य में, राज्य ने अपनी प्राथमिकता, युद्ध के पीछे अपने असली इरादे को उजागर कर दिया. जो व्यक्ति बढ़ते दमन के बीच लोगों के बीच खड़ा रहा, उसे प्रताड़ित किया गया और मार डाला गया, दूसरे व्यक्ति ने बड़े निगमों के साथ हाथ मिलाया, उसका स्वागत मालाओं से किया गया.

माओवादियों को मारना जंगलों को खाली करने, ग्रामीणों को चुप कराने का एक आसान रास्ता बन गया हैं. माओवादी विरोधी अभियान के नाम पर ऑपरेशन कगार चला कर आदिवासी जनता को जल, जंगल, जमीन से विस्थापन करना है, एक ऐसा युद्ध है जिसमें कोई गवाह नहीं है, ऐसे लोगों के खिलाफ जिनके पास छिपने के लिए लड़ने और अपनी जमीनों की रक्षा करने के अलावा कोई जगह नहीं बची है.

‘मजदूर अधिकार संगठन’ माओवादी नेताओं निर्मम हत्याओं की निंदा करता है. साथ ही, राज्य से यह मांग करता है कि वह अपने ही लोगों के साथ गृहयुद्ध में उलझा हुआ है और गैर-अंतर्राष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष (एनआईएसी) से संबंधित जिनेवा कन्वेंशन का पालन करे, जो हत्या के लिए गिरफ़्तारी सुनिश्चित करता है, यातना और बंधक बनाने पर प्रतिबंध लगाता है, साथ ही शवों के साथ दुर्व्यवहार को व्यक्तिगत गरिमा के विरुद्ध मानता है.

मांग –

  1. इस तथाकथित मुठभेड़ की विस्तृत जांच की जानी चाहिए.
  2. यातना के निशानों के लिए शवों की तलाशी ली जानी चाहिए.
  3. शवों का पोस्टमार्टम परिवारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में किया जाना चाहिए, और सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों के अनुसार प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए.
    शवों को सम्मानपूर्वक मित्रों और रिश्तेदारों को सौंप दिया जाना चाहिए.
  4. बाकी सभी माओवादियों को सुरक्षित और तुरंत अदालत में पेश किया जाना चाहिए.
  5. फैक्ट फाइंडिंग टीमों को उस जगह पर जाने की अनुमति दी जानी चाहिए.

हम सभी लोकतांत्रिक, प्रगतिशील, न्यायप्रिय और मजदूरों, किसानों, छात्रों से अपील करते हैं कि वे देश के संसाधनों को विदेशी लुटेरों और उनके भारतीय दलाल नौकरशाह पूंजीपतियों को सौंपने के उद्देश्य से ब्राह्मणीय हिंदुत्व फासीवादी सरकार द्वारा ऑपरेशन कगार जरिए आदिवासी जनता और माओवादियों का नरसंहार की निंदा करें. हम ऐसी सभी न्याय पसंद, जनवादी कार्यकर्ताओं से भी आह्वान करते हैं कि वे लूट के समर्थन में इन हत्याओं के लिए सरकार को जवाबदेह ठहराने के लिए एकजुट हो विरोध करें.

एक अन्य संगठन ने भी इस नृशंस हत्याकांड की निंदा करते हुए कहते हैं सीपीआई (माओवादी) के नेता और फौजी कमांडर माडवी हिडमा और उसकी पत्नी मडकम राजे को अन्य 6 साथियों समेत आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामराजू जिले में फ़र्जी मुठभेड़ में शहीद कर दिया गया है. मुक्ति संग्राम मज़दूर मंच, जनमुक्ति के लिए अपनी जानें कुर्बान कर गए संग्रामियों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है और बर्बर भारतीय हुक्मरानों की इस घिनौनी, कायरतापूर्ण कार्रवाई की कड़ी निंदा करता है.

भारत के हुक्मरानों ने आदिवासी क्षेत्रों के बहुमूल्य स्रोत-संसाधनों पर देसी-विदेशी पूंजीपतियों के कब्ज़े, लूट, शोषण के लिए आदिवासी जनता के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है. इन क्षेत्रों में लोगों का क़त्लेआम, झूठे मुकाबले, महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार, बच्चों के क़त्ल, उजाड़ा, सैकड़ों गांवों को तबाह करना आम बन गया है. खनन कारोबार के लिए जंगलों में क़दम-क़दम पर अर्धसैनिक बलों के कैंप बनाकर पूरे बस्तर को एक बड़ी सैनिक छावनी बना दिया गया है.

आदिवासियों को आतंकित करके जंगलों से उजाड़ने के लिए अर्धसैनिक बल हेलीकॉप्टरों और ड्रोनों से बमबारी कर रहे हैं और आम लोगों को माओवादी का ठप्पा लगाकर और माओवादी कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार करके ‘फ़र्जी मुठभेड़ों’ में मारा जा रहा है.

हज़ारों आदिवासियों और माओवादियों को केवल इस वजह से जेलों में ठूंसा गया है, क्योंकि वे लोगों पर सैन्य शक्ति के बल पर थोपी जा रही विनाशकारी परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं. मार्च 2026 तक नक्सलवाद का सफाया करने की मोदी सरकार की नीति, तथाकथित विकास के नाम पर जनविरोधी पूंजीवादी परियोजनाओं का रास्ता साफ़ करने की दमनकारी नीति है, जिसका देश की जनता की बेहतरी से कोई लेना-देना नहीं है.

हम मांग करते हैं कि आदिवासी इलाक़ों में झूठे मुकाबलों, ड्रोन हमलों और अन्य रूपों में क़त्लेआम बंद किया जाए. आदिवासी इलाक़ों से सुरक्षा कैंप हटाए जाएं और विशेष सुरक्षा बल वापस बुलाए जाएं. जल-जंगल-ज़मीन पर आदिवासी लोगों का प्राकृतिक अधिकार बहाल किया जाए. जनवादी आंदोलनों को गैर-कानूनी/प्रतिबंधित करार देकर कुचलने और हुक्मरान वर्ग की जनविरोधी नीतियों पर सवाल उठाने वाले चिंतकों और जनवादी कार्यकर्ताओं पर झूठे केस बनाकर उनकी गिरफ़्तारियां और छापेमारी बंद की जाएं.

सुमो मंडल अपने सोशल मीडिया पेज पर लिखते हैं – कुछ लोगों को यह नापसंद हो सकता है, लेकिन हिडमा एक आदर्श है. एक नायक. और महत्वपूर्ण है हिडमा की वीरता – सरकार या पुलिस के समर्थन से नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली गोलाबारी में से एक के साथ राज्य की सेना के खिलाफ लड़ाई से.

हिडमा जानते थे कि उनके पास केवल एक ही जीवन है, मृत्यु के बाद स्वर्ग, शराब, सेब या अप्सरा जैसा कुछ नहीं है, यह एक जीवन उसने निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि सबसे गरीब लोगों के लिए बिताया. उन्होंने इसे वैसे ही किया जैसा उसने सोचा था, कि किया जा सकता है, यानी उसने इसे क्रांतिकारी युद्ध में इस्तेमाल किया, और इस तरह उसकी मृत्यु हुई. असमान युद्ध में हिडमा का हारना, मरना स्वाभाविक है, लेकिन हिडमा का संघर्ष महाकाव्य है.

अल्ट्रा लेफ्ट और अल्ट्रा राइट में यही फ़र्क़ है. अल्ट्रा राइट तो बस सरकार के समर्थन का बतंगड़ बनाते हैं. अल्ट्रा राइट मरने के बाद इनाम की उम्मीद करता है. कोई हिडमा की राजनीतिक लाइन का विरोधी हो सकता है, होना स्वाभाविक है, लेकिन ये फ़र्क़ समझना होगा, उसकी आत्मा की विशालता समझनी होगी. चड्डिचमूड की गाली, अमित शाह का ताक़तवर होना, जय शाह की संपत्ति, ये सब इस विशाल आत्मा के लिए हवा में उड़ते बाल की तरह हैं.

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