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प्रकाश झा के ‘आश्रम‘! पर हमला के बहाने

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 1, 2021
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प्रकाश झा के ‘आश्रम‘! पर हमला के बहाने

जनवरी, 2016 की बात है देश में असहिष्णुता पर बहस चल रही थी. करण जोहर ने कहा था कि देश में अपनी बात रखना मुश्किल हो चला है. तब प्रकाश झा ने बयान दिया- कि देश में कहीं भी असहिष्णुता नहीं है. भोपाल में एक शूटिंग के दौरान प्रकाश झा और उनके पूरे क्रू को हिंदूवादी गुंडों ने पीट दिया. जेल परिसर के अंदर ही वेब सीरीज की टीम के कर्मचारियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा. वैनिटी वैन समेत 5 गाड़ियों में तोड़फोड़ कर दी. हमले में 4 से 5 कर्मचारियों को चोट लगी. कुछ मीडियाकर्मियों से भी मारपीट की गई.

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इस पूरे मामले में प्रकाश झा ने पुलिस में शिकायत करने से इनकार कर दिया है. वह मीडिया के सामने भी नहीं आए. प्रकाश झा अच्छे डायरेक्टर हैं, उनके साथ जो हुआ उस पर खेद है. हम इस कायर हरकत की मुख़ालिफ़त करते हैं. मगर प्रकाश झा, अजय देवगन, अक्षय कुमार, सचिन तेंदुलकर, कोहली जैसे लोग अगर सरकार के टूल न बनें, बोलें नहीं तो सिर्फ़ चुप ही रह लें, तब भी ये देश कुछ रहने लायक़ बच सकता है.

प्रकाश झा पर संघी गुंडों के हमले के बहाने उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी ने अपने पुराने आलेखों को याद किया है, जिसे हम यहां अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं जब इसी तरह ‘वाटर’ फिल्म के सेट पर इन्हीं गुंडों ने हमला कर तोड़फोड़ किया था, अथवा मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ देश भर में कोहराम मचाया था.

कुछ महत्वपूर्ण प्रसंग

पिछले वर्षों में कुछ महत्वपूर्ण प्रसंग न्यायालयों के कटघरे में जनपथ और राजपथ के संघर्ष के बाद पहुंचे हैं. मशहूर अंग्रेजी लेखक डी. एच. लारेंस की कृति ‘लेडी चैटर्लीज लवर’ से यह सिर फोड़ू श्रृंखला शुरू हुई है. हाल के वर्षों में हुई दो या तीन घटनाएं अपने प्रचारात्मक मूल्यों और तर्कों की जटिलता तथा संविधान से की गई हेठी के कारण ज्यादा चर्चित हैं, उन्हें सूक्ष्म परीक्षा के जरिए देख लेने से बाकी घटनाओं का गुणनफल अपने आप आ जाएगा.

असल में रंग तो सांपों के अलग-अलग होते हैं. जहर के रंग और प्रकृति में कोई फर्क कहां होता है ! कला के विरुद्ध फतवा राज्य, राष्ट्र, राज्य-राष्ट्र या समाज की आड़ में प्लेटो के समय से दिया जा रहा है. मोरारजी देसाई अंतिम प्रधानमंत्री रहे हैं, जिन्होंने आधुनिक कला को बकवास की संज्ञा दी थी.

तरह तरह की तालाबंदियों में एक ही सांस में डी. एच. लाॅरेंस की पुस्तक ‘लेडी चैटर्लीज लवर’ के अतिरिक्त भारतीय संस्कृति पर गजानन माधव मुक्तिबोध की पुस्तक, सलमान रश्दी की किताब ’दी सैटेनिक वर्सेस ’, अम्बेडकर की कृति ‘रिडल्स ऑफ हिन्दुइज्म’, आब्रे मेनन की किताब ‘रामा रीटोल्ड’, ’दी लास्ट टेम्पटेशन ऑफ क्राइस्ट’, सहमत की अयोध्या प्रदर्शनी , हरिशंकर परसाई और असगर अली इंजीनियर पर हमले, पाकिस्तानी ग़जल गायक गुलाम अली को धमकी, ‘मी नाथूराम गोडसे बोलतोय’ नामक नाटक, बसंत गुर्जर की मराठी कविता ‘गांधी मला भेटला’, ‘रामभरोसे’ नामक एकांकी नाटक, विमल मित्र की कहानी ‘सुरसतिया’, आचार्य तुलसी की काव्यकृति ‘अग्नि परीक्षा’, अरुण शोरी की पुस्तक ‘वर्शिपिंग दी फाल्स गाॅड्स’, दीपा मेहता की अनबनी फिल्म ’वाॅटर’, सत्यजीत राय की फिल्म ’दी सिटी ऑफ जाॅय, कमला हसन की ’हे राम’, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् के प्रोफेसर सुमीत सरकार और के. आर. पणिक्कर की पुस्तकों पर प्रतिबंध जैसे बीसियों मामले विचारण में आते है.

इनमें से ऐसी घटनाओं तथा अभिव्यक्तियों पर चर्चा नहीं करनी चाहिए जिनका कलात्मक या बौद्धिक पक्ष स्तरहीन है. उन मामलों पर भी देश के सन्दर्भ में अवधारणा नहीं बनायी जा सकती जिनमें चित्रित विदेशी नैतिक मूल्यों की टकराहट भारतीय दृष्टिबोध से हो. हुसैन के चित्र, गुलाम शेख की पेंटिंग, के. के. सुब्रह्मण्यम की कृतियां और ए. रामचन्द्रन की म्युराल शैली की कलाकृतियां प्रख्यात कला समीक्षक डाॅ. हेन्स मैथ्यू के अनुसार किसी एक भूगोल या इतिहास की नहीं हैं. हुसैन के जीवनीकार रिचर्ड बाॅर्थोलोम्यू तल्खी में कहते हैं कि पश्चिम की तकनीक और परम्पराओं की गहरी व्यावहारिक समझ रखने के बाद भी हुसैन की कृतियां निर्विवाद रूप से भारतीय रूप, गंध और ध्वनि की हैं.

जिस मुद्दे पर दीपा मेहता ने फिल्म बनानी चाही वह साहित्य और संस्कृति कर्म के लिए अछूता या नया मुद्दा नहीं था. अनेक उपन्यासों , कहानियों और यात्रा-वृत्तांतों में बनारस के इस जीवन का ज़िक्र है. संभवतः प्रेमचंद का ‘सेवा सदन’ भी इस मुद्दे का संस्पर्श करता है. अंग्रेजी के प्रसिद्ध भारतीय उपन्यासकार राजा राव ने ‘ऑन दी गंगाघाट’ नामक अपनी कहानियों का संग्रह लिखा है.

राजा राव यह भी कहते हैं कि उपरोक्त विवरण में सभी व्यक्ति और स्थान सत्य नहीं लेकिन यथार्थ हैं. राजा राव ने उपरोक्त कृति में ये शब्द लिखे हैं ‘और औरतें, मैं तुम्हें बताऊं, बनारस का विषय हैं. वे बहुतायत में हैं और अधिकांश का बस वही एक काम है. यहां तक कि अमीर विधवाएं जो आती हैं, वे भी घाट की ओर बैलगाड़ी पर जाते हुए नौजवानों पर भरपूर नज़र डाले बिना नहीं रह पाती. अच्छाई बनारस में आसानी से नहीं उपजती और बुराई के लिए इससे अच्छी कोई जगह नहीं है.’ यह एक मनोरंजक संयोग है कि उनकी पुस्तक में शुरू में किन्हीं श्री आत्मानंद गुरु का संदेश इन शब्दों में उद्घृत है-  ‘वाॅटर डज़ नाॅट फ्लो.’

देश के अधिकांश पत्र और प्रबुद्ध व्यक्ति दीपा मेहता के प्रकरण को केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला मान रहे हैं. बात सिर्फ इतनी-सी नहीं है. यह मामला अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी का तब भी बनता, जब सरकार किन्हीं आधारों पर फिल्मांकन की अनुमति नहीं देती या चुप बैठी रहती. इस प्रकरण में देश के संविधान के साथ घात हुआ है.

संविधान के आदेशात्मक प्रावधानों में यह साफ लिखा है कि देश में संविधान सम्मत राज्य ही चलेगा. उसका पूरा उत्तरदायित्व सातवीं अनुसूची के अनुसार राज्य सरकार का था. फिल्म की शूटिंग केवल एक आधार पर रोकी जा सकती थी, जब इसके विरोधी संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के अनुसार इसे शिष्टाचार (डीसेन्सी) या सदाचार (माॅरेलिटी) अथवा लोकव्यवस्था के विरुद्ध सिद्ध करते. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्त ने इसे लोकव्यवस्था के लिए खतरा बताते हुए प्रशासनिक असमर्थता को राज्य का व्यावहारिक निर्णय प्रचारित किया. सूक्ष्म बात यह है कि यह ऐलान और आचरण संविधान विरोधी है.

वाॅटर-विवाद

दीपा मेहता यदि काशी को लेकर कुत्सित फिल्म बनातीं तो इतिहास उन्हें कूड़ाघर में फेंक देता. गर्हित, प्रतिबंधित और त्यज्य विषयों पर संसार में जितना साहित्य, कला संस्कृति या परिवेश रचा गया है, वह क्या जीवित भी है ? संविधान सम्मत संस्था सेन्सर बोर्ड को इस बात के अबाधित अधिकार हैं कि वह किसी फिल्म के बनने या प्रदर्शित होने के पहले कभी जांच ले कि वह संविधान के तहत बने किसी निर्देश या प्रतिबन्ध का उल्लंघन तो नहीं करती.

तत्कालीन केन्द्र सरकार एक पांच साला फिल्म है जिसका निर्देशन संघ-परिवार करता रहा है. प्रधानमंत्री, सूचना प्रसारण मंत्री, उत्तरप्रदेश के प्रश्न बने मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन संघ-परिवार की तयशुदा पटकथा के अनुसार अंतिम सीन में असफल हो गये. कानून को अराजक होने से बचाने की आड़ में संविधान को अराजक बना दिया गया. अपनी सरकार की मशीनरी की असफलता पर सब आत्ममुग्ध थे ! सवाल यह है कि संविधानिक मशीनरी के खत्म या नाकारा हो जाने पर संविधान में क्या विकल्प हैं ? देश में ऐसा कौन सा मुद्दा है जो संविधान की परिधि के बाहर है ? अब तो संविधान भी खुद नहीं.

लेकिन सहस्त्राब्दी के पहले बरस संविधान की असमर्थता का उदाहरण उसके लुंजपुंज कर दिए जाने का ऐलान है. यह अघोषित सेंसरशिप है. इसकी इबारत संघ परिवार ने लिखी और हस्ताक्षर सरकार ने किए. यह हिन्दूवादी फतवा है. यह भारत में फासीवादी चेहरे के कन्टूर की एक स्थायी लकीर है. ‘वाॅटर’ अयोध्या ड्रामा का काशी-कांड और संघ-परिवार के इरादों का वाॅटरगेट है.

अंग्रेजी के विश्वविख्यात कवि काॅलरिज की कविता की पंक्तियां हैं :  ‘वाॅटर वाॅटर एवरी वेयर, एण्ड ऑल दी बोर्ड्स डिड स्रिंक, वाॅटर वाॅटर एवरी वेयर, नाॅट ए ड्राप टू ड्रिंक.’ दीपा मेहता ने काॅलरिज को पढ़ा होगा ? दीपा मेहता चिंतक या अप्रतिम कलासर्जक नहीं लगती. उनकी कलात्मक समझ चुस्त-दुरुस्त और व्यावसायिक है. यह भी हो सकता है कि यौन वर्जनाएं ही उनका मूल आग्रह हों. काशी या भारत का संदर्भ चुन लेने से उनका स्थानीयकरण नहीं हो जाता.

दुर्भाग्य से यह बात उनके आलोचकों की समझ में नहीं आती. ‘वाॅटर’ शायद दीपा इस तरह बनातीं कि फिल्म चले, बिके, यहां तक कि उसके विदेशी अनुवाद भी हो. इसके साथ-साथ इस बात की चर्चा या प्रचार भी हो कि उन्होंने काशी की विधवाओं के बहाने नारी को केवल देह समझकर उसका वैधव्य की आड़ में शोषण करने वालों के चेहरे बेनकाब किए हैं.

पटकथा पढ़े बिना काशी की संस्कृति के नाम पर झंडाबरदारों की फौज खड़ी हो गई. यह वही फौज थी जिसने अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई थी. वह मथुरा और काशी में जाने कब से ड्रेस रिहर्सल कर रही है. दीपा मेहता ने बैठे ठाले उन्हें मौका दे दिया. एक मुसलमान नायिका ने भी अपने धर्म के खिलाफ सिर मुंडवाकर हिन्दू औरतों का किरदार निभाने का धर्मच्युत आचरण किया ! संस्कृति को सड़क पर लाकर पुतले की तरह जलाने के लिए कटिबद्ध लोगों को ‘कटिबद्ध’ शब्द में श्लेष अलंकार ढूंढ़ने में वक्त नहीं लगा. ऐसे ‘राष्ट्रवादी’ अवसर छप्पर फाड़कर आ ही जाते हैं.

अभिव्यक्ति एक वैयक्तिक सम्पत्ति है. आज़ादी अभिव्यक्ति का परिवेश, उसकी संगति, अनिवार्यता है. दीपा मेहता की ‘वाॅटर’ मील का इतना बड़ा पत्थर नहीं बनती. उसकी रचनात्मकता सीमित है. फिर भी ‘वाॅटर’ में इतिहास के एक कालखंड की औरतों के एक उपवर्ग की वेदना के चित्रण के आग्रह के अलावा आपत्तिजनक क्या होता ? क्या काशी उनकी ही है जो वहां के नागरिक और मतदाता हैं ? काशी उनकी नहीं जो मृत्यु के बाद वहां पहुंचेगे ? क्या काशी उनकी नहीं जो वहां कभी थी, अब नहीं है ? इसलिए वे दीपा की फिल्म में शबाना और नन्दिता की देह धरकर आना चाहती थी.

काशी उनकी तो है जो वहां के नागरिक होते हुए हत्यारे, डकैत और बलात्कारी होने के कारण जेलों में सजा काट रहे हैं. उनकी काशी नहीं हो सकती जो इस नगरी को अपनी रचनाओं में रचते हैं, अपनी कलाकृतियों में कूची से रंगते हैं और इसके नाम और यादों को लेकर फिल्मों में पान लगाते रहते हैं ? स्थानिकता के तर्क के आधार पर यदि धरती से रिश्ते तय होते हैं तो भारत किसका होगा ? विश्व हिन्दू परिषद का तो कतई नहीं क्योंकि वे किसी ‘भारत हिन्दू परिषद’ के तो सदस्य हैं नहीं. भूगोल संस्कृति का घटक हो सकता है, नियामक नहीं.

आज़ादी की परिभाषा संविधान में अधिनियमित हो जाने के बाद उसकी व्याख्या का नैतिक दायित्व भी संविधान ने ले लिया है. धर्म और धर्मगत अवधारणाओं की व्याख्या भी अब न्यायालयों की मोहताज है. बनारस की सड़कों पर आज़ादी लिए जो लठैत, बमबाज और गणवेशधारी घूम रहे थे, वह संविधान सम्मत आज़ादी के तहत नहीं.

वही आज़ादी लिए कुछ लोग नोआखाली में घूम रहे थे. वही आज़ादी लिए कुछ लोग गांधी को गोली मार रहे थे. वही आज़ादी लिए कुछ लोग साल में एकाध बार अयोध्या की सड़कों पर परेड कर आते हैं. आज़ादी नगर निगम या सेल्स टैक्स विभाग का स्वनिर्धारित कर-आरोपण नहीं है. उसकी व्याख्या अलग-अलग परिस्थिति में पुलिस के डंडे, न्यायाधीशों की क़लम और ज़ल्लाद के फंदे से भी तय की जाती है. यह नहीं होने से वाराणसी में संविधान के मूल अधिकारों में वर्णित आज़ादी ही गुलाम हो गई. कुछ हमलों के लिए ‘आग लगाए जमालो दूर खड़ी’ का मुहावरा चस्पा होता है.

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधे-सीधे केन्द्र सरकार द्वारा हमले किए गये. दीपा मेहता का ‘वाॅटर’ इसका उदाहरण है. दीपा श्रद्धा या प्रशंसा की पात्र नहीं भी हैं लेकिन सहानुभूति की क्यों नहीं ? उन्होंने शायद एक लोकप्रिय मुहावरे की अगली पायदान भी ढूंढ़ निकाली है कि ‘नेकी कर दरिया में डाल’, मौका पड़े तो बाल्टी भर निकाल.’ यश या लाभ का यह बाल्टी भर ‘वाटर’ उनके हाथ में नहीं आया. बनारस के भैयों ने उन्हें चुल्लू भर ‘वाटर‘ में डूब मरने की सशक्त समझाइश दे डाली.

‘वाॅटर’ विवाद को लेकर गोविन्दाचार्य ने बहुत सुविचारित, बहुआयामी तथा खतरनाक बातें कहीं हैं. गोविन्दाचार्य की पहली स्थापना यह है कि संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) में वर्णित वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का अधिकार लेखकों, फिल्मकारों या कलाकारों को बतौर अभिव्यक्तिकार मिलता है. उनके अनुसार ‘विरोधियों को भी विरोध करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए.’

वे कहते हैं कि वाराणसी के (कुछ) लोगों ने इसी स्वतंत्रता का इस्तेमाल किया है. संविधान की यह उर्वर, नई और सम्भावनायुक्त व्याख्या है. बेचारे संविधान ने हर तरह की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अनुच्छेद 19(2) में प्रतिबन्ध लगा दिए हैं लेकिन ये प्रतिबंध लगाने के अधिकार राज्य को दिए हैं, लोगों को नहीं.

गोविन्दाचार्य की स्थापना से ये अधिकार राज्य के बदले लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जा सकते है. राज्य यदि प्रतिबंध लगाता है तो उसकी वैधता की जांच उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय द्वारा की जाएगी. लोग यदि खुद करेंगे तो संविधान क्या वाॅटर भरेगा ?

भाजपा के पूर्व थिंकटैंक कहते हैं कि इस मामले में यदि उत्तरप्रदेश सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो वह असंवेदनशील कृत्य होता क्योंकि इस मामले को केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता था. ‘हस्तक्षेप’ को यहां ‘संवैधानिक कृत्य’ बना दिया गया.

‘लेडी चैटर्लीज़ लवर’ के प्रकरण में फैसला देते हुए न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला ने दो टूक लहजे में कहा था, ‘यह स्पष्ट है कि अश्लीलता विचारों, राय और जनहित की सूचनाओं या लाभ के मूल्यबोध प्रसारण के लिए अपने आप में बहुत कमजोर तत्व है.’

ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि उन्हें अन्य कलाओं से पृथक कर देखना होगा क्योंकि फिल्में देखने के अतिरिक्त सुनी भी जाती हैं. भारत रत्न सत्यजीत राॅय की फिल्म ‘दी सिटी आॅफ जाॅय’ की कलकत्ता में शूटिंग को लेकर भी कलकत्तावासियों ने एक विवाद किया था, उसे अन्ततः पश्चिम बंगाल की सरकार ने सुलझा लिया था.

अभिव्यक्ति की आज़ादी के ताजातरीन मसलों में ज्यादा चिल्लपों तब मचती है जब कृतिकार यौन कुण्ठाओं तथा / अथवा साम्प्रदायिक भावनाओं से विवादित ढंग से खिलवाड़ करने तत्पर हो. सलमान रश्दी, डी. एच. लाॅरेन्स, तस्लीमा नसरीन, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र ’, विमल मित्र , खुशवंत सिंह, शोभा डे आदि कई लेखकों सहित हुसैन और दीपा मेहता के प्रकरण भी इसी श्रेणी में आते हैं.

इनका दूसरा पहलू यह भी है कि कई संस्कृतिकर्मी अपने पूर्ववर्ती एवं समकालीनों से श्रेष्ठ होने की दम्भोक्ति या कुण्ठा पाले होते हैं. अश्लीलता और यौन वर्जनाओं के मामले में अभिव्यक्तिकार की स्वतंत्रता के साथ-साथ निष्कपटता, तटस्थता और रचनात्मकता भी उतनी ही ज़रूरी है. स्त्री-पुरुष के विसंगत, असंतुष्ट तथा क्रूर संबंधों को अनेक कलात्मक फिल्मों द्वारा दिखाया गया है. दीपा मेहता उनके सामने बौनी हैं. वे एक ही तरह के मुद्दों पर फिल्म बनाने के आग्रह को और अधिक कलात्मक संस्पर्श क्यों नहीं दे पाती ताकि उनकी फिल्में मानवीय करुणा का दस्तावेज बन सकें.

संघ परिवार शून्य से अनन्त की यात्रा का शोध विश्वविद्यालय है. यह समझना कि कातिल अदाओं की रचना मनुष्य द्वारा नहीं हो सकती, मनुष्य की उन क्षमताओं में अविश्वास करना है जो उसे संघ परिवार से सीखनी हैं. हमले व्यक्तियों पर हो रहे हैं. हमलावर एक सुसंगठित गिरोह है.

आखिर सवाल है, यह ‘लोग’ क्या है ? संविधान का पहला शब्द है – ‘हम भारत के लोग.’ सौ सवा सौ करोड़ लोग मिलकर भारत हैं. वाराणसी में कौन से ‘लोग’ थे ? अयोध्या में उनमें से या उनकी तरह के बहुत से ‘लोग’ थे. यही ‘लोग’ भोपाल में ऊधम करने गए थे.

इन्हीं ‘लोगों’ की लिस्ट में वाराणसी और काशी सहित कई शहरों की मस्जिदें अपनी कलात्मक मुक्ति तक पहुंचाए जाने के लिए छटपटा रही हैं !गोविन्दाचार्य हुसैन के चित्रों पर हुए हमले को भी जायज ठहराते हैं. वे समझाते हैं कि ‘कला, कला के लिए’ मुहावरे का यह अर्थ है कि विवादास्पद चित्र कलाकार और उनके मित्र तो देख सकते हैं, उनका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं किया जा सकता. यदि दीपा मेहता भी ‘वाॅटर’ फिल्म को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए नहीं बनाने (बल्कि अपने निजी उपयोग के लिए बनाने) का ऐलान कर दें तो संघ परिवार सिद्वान्ततः अनुमति दे देगा ! ब्ल्यू फिल्में शायद इसी तरह बनती हैं.

‘हे राम’ फिल्म के ऊपर हमला भी कोई प्रशंसनीय बात नहीं है. राम और गांधी किसी फिल्मकार की कृपा पर जीवित या मृत नहीं हो सकते. ‘मी नाथूराम गोडसे बोलतोय’ जैसे नाटकों के प्रदर्शन की भी अनदेखी नहीं की जा सकती. गांधी का समर्थन गोडसे की भौतिक हत्या के बराबर नहीं है, गोडसे के समर्थक भले ही गांधी की हत्या को अपने विचारों का विस्तार समझते हों. अरुण शोरी की कृति ’वर्शिपिंग दी फाल्स गाॅड्स ’ को लेकर मचाई गई चिल्लपों भी उपेक्षित कर देने लायक बात नहीं है. बेहतर तो यह होता कि अरुण शोरी को तीखे बौद्धिक उत्तर दिये जाते.

संविधान के प्रस्तोता और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डाॅ. अम्बेडकर अपने बौद्धिक विन्यास में करुणा और क्रोध का इस कदर घालमेल करते हैं कि इतिहास में अक्सर अपने क्रोध की बानगी के कारण तीखे व्यक्ति के रूप में प्रचारित किये जाते हैं. अम्बेडकर कोई शास्त्रीय इतिहासकार या समाज विज्ञानी नहीं हैं. उन्होंने प्रखर तर्क के सहारे नश्तर बनाकर कई पुराने घावों का इलाज करने की कोशिश की. सवाल उन आदिम स्थितियों और अम्बेडकर की नीयत की जांच का होना चाहिए जिनसे कतराकर अभिव्यक्तिकार भी निकल जाते हैं.

अरुण शोरी चाहते तो उन परिस्थितयों में घिरे अम्बेडकर की हताशा का सहानुभूतिपूर्वक चित्रण भी कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. वे इक्का दुक्का छोटे व्यक्तियों के मामलों को उठाते रहते हैं लेकिन उनकी दृष्टि में अम्बेडकर जैसा विस्तार नहीं है. इतिहास यह बात गहरे से रेखांकित करेगा कि यदि डाॅ. अम्बेडकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी में समाज के लिए करुणा नहीं होती तो गांधी उन्हें कांग्रेस के सदस्य नहीं होने पर भी केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में शामिल करने के लिए नेहरू को नहीं कहते. यह अलग बात है कि यदि संविधान सभा की भूमिकाओं को लेकर गहरी छानबीन की जाय तो अरूण शोरी खुद डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को डाॅ. भीमराव अम्बेडकर से बड़ा डाॅक्टर नहीं बता पायेंगे.

अभिव्यक्ति की आज़ादी के तहत ईसाई धर्म प्रचारकों से जुड़े सवाल भी हैं, जो उनकी हत्या पर जाकर खत्म नहीं होते, पुनर्जीवित होते हैं. नि:स्संदेह धर्म प्रचार अभिव्यक्ति की आज़ादी है, धर्मान्तरण नहीं. धर्मान्तरण का विरोध अभिव्यक्ति की आज़ादी है, पादरियों की हत्या नहीं. हिंसा अहिंसा का वैचारिक धर्मान्तरण है. वह शारीरिक धर्मान्तरण से कहीं ज़्यादा खतरनाक है.

बजरंग दल का सदस्यता अभियान अभिव्यक्ति की आज़ादी के तहत किया जा सकता है, उसके खुले सम्मेलनों में असहमति के कत्लेआम करने का ऐलान, अलग-अलग टुकड़ियों या संयुक्त ‘सेनाओं’ द्वारा दी गई धमकियों को जज़्ब कर लेना अभिव्यक्ति से ज़्यादा अनुभूति की आज़ादी पर ख़तरा है. वह कलम या तूलिका से ज्यादा विचार को भोथरा बनाने की धमकी है. विचार खत्म, शून्य, निस्पृह या भयभीत हुआ तो सबसे पहले अभिव्यक्ति और आज़ादी की पृथक-पृथक मौत होगी. वे जुड़वा बहने हैं. एक को चोट लगने पर दूसरे को दर्द होगा ही.

भारतीय इतिहास परिषद के बवाल बने सवाल

मुरली मनोहर जोशी भौतिकशास्त्र के आध्यात्मिक प्रोफेसर हैं. पढ़ाते नहीं हैं, फिर भी प्रोफेसर हैं. मानव संसाधन विकास मंत्रालय उनके नेतृत्व में संघ परिवार का गुरुकुल बनाया गया. सरस्वती, स्वदेशी, वंदेमातरम, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक मानववाद वगैरह भी गांधी-शब्दकोश के कुछ अछूत शब्द हैं जो कांग्रेस-पथ को बुहारते जोशी को पड़े मिल गए.

एक हिन्दुस्तानी बच्चे को अंग्रेज मां-बाप पालने लगें तो वह अंग्रेजी तो बोलेगा ही. ये बेचारे शब्द भी अपनी भाषा, व्याकरण और पहचान भूलकर संघ परिवार का पंथसापेक्ष तर्जुमा परोसने के काम पर लगाए गए. इसी मंत्रालय के अंतर्गत कई संस्थाएँ, संस्थान और अकादमियां हैं जिनका साहित्य, संस्कृति, कलाओं के संरक्षण करने का दायित्व है. भारतीय इतिहास शोध परिषद के अधिकांश विद्वानों को निकाल बाहर कर उन इतिहासविदों से भर दिया गया जो विश्व हिन्दू परिषद के मंच या माध्यम से अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर के विद्यमान रहने के कट्टर प्रचारक रहे हैं.

परिषद ने सुमीत सरकार और के. एन. पणिक्कर के पूर्व प्रकाशित शोध लेखों के परिषद द्वारा दुबारा हो रहे प्रकाशन पर पाबंदी लगा दी. जोशी संघ परिवार के एक मुखर प्रवक्ता हैं. वे सार्वजनिक समारोहों में कह चुके हैं कि भारत के संविधान का दोष यही है कि वह हिन्दूवादी नहीं है.

इन वामपंथी इतिहासकारों पर जोशी की गाज इसलिए गिरी क्योंकि पणिक्कर ने अपने एक विचारोत्तेजक लेख में उन पर यह आरोप लगाया था कि जोशी ने संविधान की उस कण्डिका में संशोधन के लिए कहा है जिसके अनुसार अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थाओं को कतिपय छूटें और सुविधाएं मिलती हैं.

पणिक्कर के अनुसार जोशी ने विशेषकर संघ परिवार की शैक्षणिक संस्थाओं को लाभ पहुंचाने के लिए न केवल संविधान की पैरवी कर डाली बल्कि केन्द्र की शिक्षा नीति के नए निर्माण के लिए संघ परिवार के शैक्षिक विचारकों को आमंत्रित भी कर लिया, जिसके कारण राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के सम्मेलन में बेहद हंगामा हुआ था.

प्रश्न इतिहास के वामपंथ या दक्षिणपंथ का नहीं हैं. बुनियादी प्रश्न है कि कोई पुस्तक यदि नियमों के अनुसार संपादित तथा परीक्षित होकर छपने के लिए प्रेस तक पहुंच गई थी, तब उसे बिना कारण बताए किस आधार पर बुलाया गया ? प्रशासन की उस योजना पर करदाताओं के करोड़ों रुपये खर्च हो चुके थे और योजना वर्षों पीछे चल रही है.

असगर अली इंजीनियर पर लगातार हमले

असगर अली इंजीनियर के मामले में यह बेहद उलझा हुआ रिश्ता है, जो छत्ता खुलते ही डंक से देह को छलनी कर डालता है. संसार का ऐसा कोई धर्म नहीं जिसमें दकियानूस और सड़ रही बांझ व्यवस्थाएं नहीं हो. उन पर पालथी मारकर बैठे संत शिरोमणि ज्ञान का निर्झर बने हुए हैं. यूरोप में मार्टिन लूथर ने कितनी बड़ी क्रान्ति की. कबीर धर्म को पंडों, पुरोहितों की बांबियों से निकालकर सड़कों पर धोते रहे. नानक ने वृक्ष बनने के बदले दूब बनने की ही सदैव सलाह दी लेकिन उसी राह के राही असगर अली इंजीनियर अपने मजहब में अल्पसंख्यक हैं. चोरी से उन्हें समर्थन देने वाले रोशनी से परहेज करते हैं.

भारतीय प्रेस और हिन्दू सुधारवादियों के एक बड़े तबके को मुस्लिम कठमुल्लेपन के खिलाफ वस्तुपरक टीका-टिप्पणी करने से परहेज रहा है. इसका एक बड़ा कारण हिन्दू कठमुल्लापन के प्रसार के लिए भी माना जाना चाहिए. धर्म को जीवन बल्कि सार्वजनिक जीवन की सत्ता मानने वाले विवेकानंद और गांधी प्रसरणशील ईसाई धर्म और इस्लाम की कट्टरपंथी आदतों के निरेपक्ष कटु आलोचक थे, लेकिन हिन्दू अंधविश्वासों को वे उसी सांस में बख़्शते नहीं थे.

असगर इली इंजीनियर इस परम्परा के अप्रतिम समकालीन विचारक हैं. उन पर हमला धर्म निरपेक्षता के केन्द्रीय कमांडमेन्ट पर किया गया आक्रमण है. मध्यप्रदेश दीपा मेहता को तो फिल्मांकन के लिए आमंत्रित करता है (हालांकि मृणाल सेन इसे राजनीतिक खेल की संज्ञा देते हैं) लेकिन इंजीनियर पर कोई दो दिन बाद अश्लीलता, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने का जुर्म दर्ज करता है.

ऐसा कथित अपराधी इन्हीं अपराधों का शिकार होकर अस्पताल पहुंचाया जाता है. उसके घर का सामान तहस-नहस कर उसे कबाड़खाना बना दिया जाता है. अंग्रेज रहित भारतीय दंडविधान अब अंग्रेजी बुद्धिराज की भारतीय पुलिस के हवाले है. लोहिया की यह प्रसिद्ध उक्ति इंजीनियर का सम्बल हुई होगी कि व्यक्ति का नहीं, इतिहास का पुनर्जन्म तो होता है. वाराणसी का पुलिस प्रशासन निहितार्थ में हुल्लड़बाजों को संरक्षण दे रहा था. मध्यप्रदेश की पुलिस जुर्म दर्ज करने की धार्मिक रस्म अदायगी कर रही थी.

हुसैन का संकट

सबसे बुनियादी और बहुचर्चित मामला मकबूल फ़िदा हुसैन का है, जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लगातार हमारी व्यापक चिंता और सरोकार का केन्द्र रहा है. हुसैन को लेकर एक विवाद तब हुआ, जब भोपाल से प्रकाशित ‘विचार मीमांसा’ नाम की पत्रिका ने उनके द्वारा बनाई गई कलाकृतियों के कुछ चित्र ओम नागपाल के लेख ‘यह चित्रकार है या कसाई’ शीर्षक से छापे.

महाराष्ट्र के तत्कालीन शिव सेनाई संस्कृति मंत्री प्रमोद नवलकर ने वह लेख पढ़ कर मुम्बई के पुलिस कमिश्नर को जो लिखित शिकायत भेजी, उसे पुलिस ने आनन-फानन में भारतीय दण्ड विधान की धारा 153(क) और 295(क) के अंतर्गत पंजीबद्ध कर लिया. ऐसे अपराध विभिन्न धार्मिक समूहों में जान बूझकर धार्मिक उन्माद भड़काने के लिए वर्णित हैं. इस घटना को लेकर हुसैन के समर्थन में देश भर में बुद्धिजीवी अभिव्यक्ति की आजादी के पक्षधर बनकर खड़े हुए.

हुसैन के विरुद्ध आरोप यह था कि उन्होंने सीता और शिव-पार्वती सहित अन्य हिन्दू देवी-देवताओं को लगभग नग्न अथवा अर्द्धनग्न चित्रित किया, जो धर्म और हिन्दुत्व की भावना के प्रतिकूल है. तर्क यह भी था कि एक मुसलमान को हिन्दू देवी देवताओं के चित्रण की इज़ाजत नहीं मिलनी चाहिए. भाजपा के विचारक और उपाध्यक्ष के. आर. मल्कानी यहां तक पूछते हैं कि हुसैन ने आज तक वास्तविक अर्थों में एक भी कलाकृति बनाई है ?

उनके आलोचक कुछ बुनियादी बातें जानबूझकर भूल जाते हैं. भारतीय अथवा हिन्दू स्थापत्य और चित्रकला के इतिहास में देवी देवताओं को नग्न अथवा अर्द्धनग्न रूप में चित्रित करने की परम्परा रही है. अजंता, कोणार्क, दिलवाड़ा और खजुराहो की कलाएं विकृति के उदाहरण नहीं हैं.

कर्नाटक में हेलेबिड में होयसला कालखंड की बारहवीं सदी की विश्व प्रसिद्ध सरस्वती प्रतिमा एक और उदाहरण है. कुषाण काल की लज्जागौरी नामक प्रजनन की देवी को उनके सर्वांगों में चित्रित किया गया है. तीसरी सदी की यह प्रतिमा नगराल (कर्नाटक) में आज भी सुरक्षित है. इस तरह के उदाहरण देश भर में मिलेंगे.

असल में देवी देवताओं को वस्त्राभूषणों में चित्रित करने की अंतिम और पृथक परम्परा उन्नीसवीं सदी में राजा रवि वर्मा ने इंग्लैंड के विक्टोरिया काल की नैतिकता के मुहावरों से प्रभावित होकर डाली. भारतीय देवियां औपनिवेशिक पोशाकों में लक-दक दिखाई देने लगीं जो कि पारम्परिक भारतीय मूर्तिकला से अलगाव का रास्ता था. कलात्मक सौन्दर्यबोध से सम्बद्ध नग्नता से परहेज़ करना भारतीय दृष्टिकोण नहीं रहा है, वह सीधे सीधे पश्चिम से आयातित विचार है. अब यह उनके हाथों में है जो भारतीय तालिबान बने हुए हैं. उन्हें अपनी संस्कृति की वैसी ही समझ है.

मशहूर चित्रकार अर्पिता सिंह, मनजीत बावा और जोगेन्द्र चैधरी ने दुर्गा, कृष्ण और गणेश के ऐसे तमाम चित्र बनाए हैं, जिनमें नए और साहसिक कलात्मक प्रयोग किए गए हैं लेकिन वे मुसलमान नहीं हैं. बंगाल में नक्काशी करने वाले हिन्दू-मुसलमान कलाकारों ने सत्यनारायण और मसनद अली पीर को एक देह एक आत्मा बताते हुए सत्यपीर के नाम से मूर्तियां बनाई हैं. वे उसी श्रद्धा का परिणाम हैं जो हरिहर और अर्द्धनारीश्वर की छवियों में दिखाई पड़ती है. यह अलग लेकिन सिक्के के दूसरे पहलू की बात है कि मुस्लिम कठमुल्ले ऐसे नक्काशीकारों और कलाकारों को मस्जिदों से हकाल रहे हैं कयोंकि वे हिन्दू देवताओं को चित्रित करते हैं.

हुसैन को विद्या की देवी सरस्वती के जिस कथित नग्न रेखांकन के लिए प्रताड़ित किया गया, वह उन्होंने उद्योगपति ओ. पी. जिन्दल के लिए 1976 में किया था. यह भी एक विचित्र संयोग है कि अपने अपूर्ण सरस्वती रेखांकन को बाद में हुसैन ने उन्हें खुद ही कपड़े पहना भी दिए थे, वह भी विवाद के कई वर्ष पहले. भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के पूर्व अध्यक्ष, प्रख्यात कला समीक्षक एस. सेट्टार दो टूक कहते हैं कि ‘कोई मुझे बताए कि देश में सरस्वती की एक भी पारम्परिक प्रतिमा अपने धड़ में कपड़ों से लदी-फंदी हो.’

कला समीक्षक सुमीत चोपड़ा के अनुसार हमारे पारम्परिक सौंदर्यशास्त्र में शरीर में ऐसा कुछ नहीं है कि उसे दिखाने से परहेज किया जाए या छिपा कर उसे महत्वपूर्ण बनाया जाए. उनके अनुसार आधुनिक भारतीय चित्रकला में हुसैन भी ऐसे हस्ताक्षर हैं जो हमारी लोक संस्कृति की छवियों को आधुनिक माध्यम और आकार देते हैं. इन कलाकारों ने जो अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि हासिल की, वह एक तरह से भारत के लोक कलाकारों, कारीगरों, नक्काशीकारों और मूर्तिकारों की दृष्टि का विस्तार है.

मशहूर चित्रकार अकबर पदमसी को भी शिव और पार्वती की कथित नग्न मूर्तियां चित्रित करने के लिए आपराधिक मामले में फंसाया गया था लेकिन बाद में न्यायालय ने उन्हें विशेषज्ञ के राय लेने के बाद छोड़ दिया. कलात्मक दृष्टि का दावा करने के बाद हुसैन के आक्रमणकारी यह भी फरमा सकते हैं कि शिव और पार्वती के नग्न चित्रों को देखकर उन्हें वह गुस्सा नहीं आता जो हुसैन द्वारा किए गए सीता के चित्रण से हुआ है क्योंकि शिव और पार्वती को इन रूपों में देखने की उनकी सांस्कृतिक आदत हो गई है !

हुसैन ने इंदौर और धार में भी कलात्मक शिक्षण पाया. 1996 में धार में 11वीं सदी की निर्मित भोजशाला पर बजरंग दल ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद की अनुकृति में जबरिया कब्जा करना चाहा. राजा भोज के इस विश्वविद्यालय में एक हिन्दू मंदिर और एक मस्जिद दोनों हैं. स्थापत्य कला के इस संग्रहालय में सरस्वती की एक बेजोड़ प्रतिमा रखी है. उसके लंदन में होने के कारण हुसैन ने शायद उसे वहीं देखा हो.

इस दुर्लभ प्रतिमा का चित्र ए. एल. बासम की पुस्तक ‘द वन्डर दैट वाज़ इंडिया’ में प्रकाशित है. संभवतः हुसैन को इस कलाकृति से भी प्रेरणा मिली हो. इस कलाकृति में भी उतनी ही नग्नता है जितनी हुसैन के चित्रांकन में. संघ परिवार ने यह मांग की है कि लंदन से इस कलाकृति को वापस बुलाकर उसे भोजशाला में स्थापित किया जाए ताकि उसका सीता मंदिर के रूप में उपयोग हो सके.

खतरा केवल अभिव्यक्ति की कलात्मकता के विवाद का नहीं है, सच्चाई के मुंह पर तालाबंदी जैसा काम ताला उद्योग के वे लोग कर रहे हैं जो अपने गढ़ के अली हैं. शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे यह कहते हैं कि यदि हुसैन हिन्दुत्व में घुस सकते हैं तो हम उनके घर में क्यों नहीं घुस सकते. अहमदाबाद की प्रसिद्ध हरविट्स गुफा गैलरी में हुसैन और वी. पी. जोशी द्वारा संयुक्त रूप से संचालित कला-केन्द्र पर हमला किया गया और लगभग डेढ़ करोड़ रुपयों की पेंटिंग्स को नष्ट कर दिया गया. इनमें से कई पेंटिंग गणेश-हनुमान, शिव, बुद्ध आदि की भी थी.

1998 में हुसैन की दिल्ली में लगी प्रदर्शनी पर हमला किया गया और सुप्रसिद्ध चित्रकार जतिन दास को भाजपा के एक पूर्व सांसद ने मारा. सीता को हनुमान द्वारा छुड़ाए जाने सम्बन्धी एक चित्र को लेकर संघ परिवार की बदमिज़ाजी की पुनरावृत्ति की गई. इस सीरीज के तमाम चित्र लोहिया के समाजवादी शिष्यों के आग्रह पर हुसैन ने 1984 में बनाकर दिए थे.

बद्रीविशाल पित्ती के अनुसार हुसैन की इस चित्र-रामायण का संदेश नास्तिकता, साम्यवाद और नेहरूवादी आधुनिकता से अलग हटकर भारतीय सांस्कृतिक सत्ता को कलात्मक आधुनिकता से लबरेज़ कर देना था. असल में इस तरह मुंह में कपड़ा ठूंसने की हरकतों का इतिहास नया नहीं है.

यह जानकर आश्चर्य और दुःख होता है कि इस विचारधारा के एक अधिक प्रचारित बौद्धिक और महत्वपूर्ण व्यक्ति वी. डी. सावरकर ने शिवाजी के बारे में यह तक कह दिया था कि उन्हें हिन्दू महिलाओं के शीलहरण का बदला मुसलमान शत्रुओं की महिलाओं के बलात्कार से लेना था.

यही हाल हुसैन का है. उन पर अपने लेख में ओम नागपाल ने निम्नलिखित आरोप भी लगाए हैं, जो कलात्मक अभिव्यक्ति से अलग हटकर उनकी मानसिकता और प्रतिष्ठा का प्रश्न हैं. आरोपों का उत्तर दिए बिना भी उन्हें जान लेने में कोई हानि नहीं होगी : ‘कलकत्ता में जब उसके चित्रों की पहली प्रदर्शनी लगी थी तो महान कला समीक्षक ओ. सी. गांगुली ने उसे जैमिनी राय के साथ गद्दारी बताया था.’

एक दूसरा दृष्टांत देते हुए नागपाल कहते हैं : ‘अभी कुछ ही वर्ष पूर्व दिल्ली में आधुनिक भारतीय चित्रकला के पितामह राजा रवि वर्मा की जन्मशती के अवसर पर उनके चित्रों की एक प्रदर्शनी लगी थी. चित्रकला की इस गौरवपूर्ण एवं वैभवशाली परम्परा पर गर्व करने के बजाय एहसान फरामोश हुसैन ने मांग की कि दिल्ली से रवि वर्मा के चित्रों की प्रदर्शनी हटा ली जाए.’ इन आरोपों की सत्यता की पड़ताल के बाद या तो इन्हें अफवाह कहा जाना चाहिए या अफवाहों के पुष्ट होने पर हुसैन के विरुद्ध एक फतवा, जिससे उबर पाना उनके लिए सरल नहीं होगा.

सरस्वती, सीता, हनुमान बल्कि दुर्गा तक के चित्रों की कलात्मक नग्नता को सौंदर्यशास्त्र का हिस्सा समझकर हुसैन को कदाचित बरी कर दिया जाए लेकिन जब हमारी पीढ़ी के एक बहुत महत्वपूर्ण लेखक उदय प्रकाश ख्वाजा नसरुद्दीन की कथा कहते कहते अपनी राय व्यक्त करते हैं, जिसमें वे हुसैन पर व्यंग्य करते हैं तब ऐसी स्थिति में उदय प्रकाश को सरसरी तौर पर खारिज भी नहीं किया जा सकता _

उनकी प्रसिद्धि स्कैंडल्स के चलते नहीं थी. इसके लिए वे किसी फाइव-स्टार होटल में लुंगी लपेटकर नंगे पांव घुसकर रिसेप्शनिस्ट’ और सिक्योरिटी गार्ड से झगड़ा करके अखबारवालों के पास नहीं गए थे. उन्हें किसी माॅडल’ की नंगी देह पर घोड़ों के चित्र बनाने की जरूरत नहीं पड़ी थी. इस प्रसिद्धि की खातिर उन्होंने न तो किसी मशहूर हीरोइन को बलशाली बैल के साथ संभोगरत चित्रित किया था, न किसी शक्तिशाली तानाशाह को देवी या दुर्गा का अवतार घोषित किया था. अपनी प्रसिद्धि के लिए ख़्वाजा नसरुद्दीन को किसी अन्य धार्मिक समुदाय की किसी पूज्य और पवित्र देवी के कपड़े उतार कर उसे किसी कला-प्रदर्शनी में खड़ा करने या सूदबी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय कला-बाजार में नीलामी लगाने की जरूरत नहीं पड़ी थी. उनकी ख्याति के पीछे कोई स्कैंडल नहीं था.’

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