Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

राजसत्ता के आतंक का जवाब जनसत्ता मौन रहकर भी देना जानती है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 9, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

राजसत्ता के आतंक का जवाब जनसत्ता मौन रहकर भी देना जानती है

जनता की चुप्पी सरकार की दमनकारी और जनविरोधी नीतियों और निर्णयों की स्वीकृति ही नहीं होती, उनकी अपनी राजनीतिक रणनीति भी होती है. राजसत्ता दमन और उत्पीड़न के अपने साधनों और माध्यमों द्वारा जनता को भयाक्रांत तो कर सकती है, पर उसे पराजित नहीं कर सकती. जनता का धैर्य, विश्वास और साहस ही उसका स्थायी संबल है, जिसे वह उचित अवसर पर उचित रणनीति के रूप में प्रयोग करती है. राजसत्ता अपने अहंकार में जनता को सताने, डराने, मारने-पीटने और अपमानित करना अपना अधिकार और धर्म समझने की भूल कर बैठती है, और यही भूल उसके पतन का कारण बनती है.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

छः वर्षों से भारतीय जनता को जिस तरह सताया गया, दमित किया गया और अपमान का घूंट पीने को मजबूर किया गया, वही राजसत्ता के खिलाफ जनसत्ता के हाथों में एक मजबूत हथियार बनता गया. नोटबंदी से शुरू हुआ राजसत्ता की दमनकारी नीतियों, निर्णयों और कार्ययोजनाओं के कारण बहुसंख्यक मेहनतकश अवाम को जितनी शारीरिक पीड़ा, अपमान, बेकारी, भूख और रोग जैसे दारुण दुखों का सामना करना पड़ा, वह उनके मन में घनीभूत होकर प्रतिरोध के एक ऐसे ब्रह्मास्त्र का रूप धारण कर लेती है कि जब जनता उसका प्रयोग अपनी सारी शक्ति लगाकर करती है, तो बैलेट बॉक्स से ऐसा जिन्न निकलता है, जो बड़े-बड़े शूरमाओं को दिन में भी तारे दिखा देती है, और वे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं होते.

चंद पूंजीपतियों के हितों के संरक्षण और संवर्धन के लिए भारत की बहुसंख्यक मेहनतकश अवाम को भूखमरी, रोग, बेरोजगारी, अधिकार विहीन, अशिक्षा और आज्ञानता के नागपाश में बांध देने का प्रयास न तो संवैधानिक था, न लोकतांत्रिक था, और न ही मानवीय ही था. किसानों और मजदूरों को अधिकार से वंचित कर एवं नवजवानों को बेरोजगार बनाकर उन्हें दाने-दाने को मोहताज बनाकर आत्महत्या करने के लिए विवश करना क्या सरकार की जिम्मेवारी और दायित्वबोध का प्रमाण था ? पांच लाख से अधिक कल-कारखानों और कंपनियों की तालाबंदी ने करोड़ों मजदूरों और अन्य कर्मचारियों को बेरोजगार बनाकर मरने को अभिशप्त किया. क्या यही सरकार सबका साथ और सबका विकास के नारे का परिणाम होना था ? देश के करोड़ों शिक्षित नवजवानों को पकौड़ा बेचने और साईकिल का पंक्चर बनाने को कहना भारत के नवजवानों को सरेआम जूता मारना नहीं था ?

क्या देश की जनता ने मोदी सरकार को इसलिए वोट दिया था कि वे धर्म, राष्ट्र, संस्कृति, रामराज्य, राममंदिर, हिंदू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान, मंदिर-मस्जिद और गाय-गोबर के नाम पर जनता के बीच नफरत फैलाते रहें, माब लिंचिंग करते रहें, दंगा करते और करवाते रहें, बहुसंख्यक भारतीयों को नागरिकता से वंचित करने का भय दिखलाते रहें, जनता को अधिकार से वंचित करते रहें, उन्हें गुलाम बनाते रहें, और जनता इनके दुष्कर्मों पर ताली, थाली, शंख और घंटा बजाकर इनकी जय-जयकार करती रहे ? जनता को क्या इतना मूर्ख समझ लिया था ? सारे सरकारी उद्योगों और लोक उपक्रमों, कंपनियों, निगमों, कल-कारखानों; संपत्ति, संपदा और प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीपतियों के हाथों कौड़ियों के मोल बेच देना ही क्या इनका राष्ट्रप्रेम और सबका विकास का माडल था ? सारे सरकारी शिक्षण संस्थाओं और अस्पतालों का निजीकरण कर उन्हें सामान्य मेहनतकश लोगों की पहुंच से दूर करना ही क्या इनका लोकतंत्र था ?

जो सरकार लाकडाउन के दौरान लाखों-करोड़ों मजदूरों को रोजगार से वंचित कर भूखों मरने के लिए छोड़ सकती है, उन्हें घर तक पहुंचने के लिए कोई साधन उपलब्ध न कराकर पुलिस से पिटवाती हो, जिन्हें हजारों किलोमीटर दूर जेठ की तपती धूप में कोलतार की सड़कों पर पैदल चलने के लिए मजबूर किया जा सकता है, क्वारांटाइन के नाम पर जिन्हें कैदियों की तरह साधनहीन डिटेंशन सेंटरों में रखा गया हो, और जिन्हें किसी तरह जीने के लिए महीने में पांच किलो गेहूं और एक किलो चना देने की घोषणा कर अपने को संत मानने वाली सरकार क्या वास्तव में अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन करने में समर्थ रही ? क्या जनता इन अत्याचारों और उत्पीड़नों को भूल जाए ? पीठ का दर्द भले ही हम भूल जाएं, पर भूखे पेट का दर्द भूलने वाला आजतक धरती पर कोई भी व्यक्ति पैदा नहीं हुआ, और यहां तो पेट और पीठ दोनों ही घायल थे. उनकी स्थिति थी ‘क्या भूलूं, क्या याद करूं.’

यही गुस्से का जमा गुब्बार बिहार के चुनाव में मुखरित हुआ, और जिसका परिणाम भी जल्द ही सामने आनेवाला है. बिहार की जनता ने मोदी-नीतीश की आततायी सरकार को अपनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए आखिरकार सबक तो सीखा ही दिया है. दुशासन बाबू, सबके सहने की भी एक सीमा होती है. सहने की परीक्षा लेने की कोशिश मत करना.

  • राम अयोध्या सिंह

Read Also –

 

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

नोटबंदी के चार साल बाद भारतीय अर्थव्यवस्था : मोदी ने भारत को कपोल-कल्पनाओं का देश बना दिया है

Next Post

भाजपा की दीर्घकालिक राजनीतिक जीत

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

भाजपा की दीर्घकालिक राजनीतिक जीत

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

गरीब आदिवासियों को नक्सली के नाम पर हत्या करती बेशर्म सरकार और पुलिस

December 2, 2019

उपेक्षित संविधान नायक जयपाल सिंह मुंडा

January 10, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.