Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

सवाल कविता कृष्णन पर नहीं, सीपीआई (माले) लिबरेशन पर है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 8, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की क्रांतिकारी सिद्धांत के जिस महत्वपूर्ण प्रस्थापना पर मार्क्स के जमाने से ही पूंजीवादी-साम्राज्यवादी पालतू बुद्धिजीवी सबसे ज्यादा हमला करता आया है वह है – सर्वहारा अधिनायकत्व की क्रांतिकारी प्रस्थापना. दरअसल मार्क्स के यही वह सबसे महत्वपूर्ण प्रस्थापना है जो मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की क्रांतिकारी सिद्धांत को वास्तविक धरातल पर उतारा और समाजवादी राज्य की स्थापना की. यही कारण है कि मार्क्स की इस सैद्धांतिक प्रस्थापना पर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी सबसे ज्यादा थर्राता है और मार्क्स की यही वह सैद्धांतिक प्रस्थापना है जिसने मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की क्रांतिकारी सिद्धांत को सबसे अलग खड़ा किया है.

सर्वहारा अधिनायकत्व समाजवादी व्यवस्था को साम्यवादी व्यवस्था की ओर ले जाने का वह रक्षा कवच है, जिसके मजबूत ढ़ाल के नीचे समाजवादी व्यवस्था फलती-फूलती है और शोषणकारी पूंजीवादी व्यवस्था दम तोड़ती खत्म होने की राह पर जाती है. इसीलिए पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-फासीवादी ताकतें और उसके पालतू सिद्धांतकार सर्वहारा वर्ग के इस रक्षा कवच को नष्ट करने के लिए बार-बार भ्रम का जाल फैलाती है.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

और यही भ्रम का जाल भाकपा (माले) लिबरेशन के पोलित ब्यूरो सदस्य कविता कृष्णन ने दो महीने पहले फैलाई जब उसने 1932-33 की यूक्रेन में घटी होलोडोमोर की घटना पर एक बाजारू ट्विट करते हुए सोवियत संघ के राष्ट्रपति कामरेड जोसफ स्टालिन व कुख्यात हिटलर को एक ही खूंटी पर बांध दिया, और मार्क्स के प्रमुख प्रस्थापना सर्वहारा अधिनायकत्व को नकारते हुए सर्वहारा वर्ग को पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-फासीवादियों के सामने मिसरा पढ़ते हुए समाजवाद को ही नकार दी. जनवादी पत्रकार सीमा आजाद ने इस लेख के जरिए सीपीआई (माले) लिबरेशन के पतनशील चेहरा को उकेर कर रख दिया है – सम्पादक

सवाल कविता कृष्णन पर नहीं, सीपीआई (माले) लिबरेशन पर है
सवाल कविता कृष्णन पर नहीं, सीपीआई (माले) लिबरेशन पर है

फासीवाद, जो मुनाफाखोर व्यवस्था को बचाये रखने की एक बदहवास व्यवस्था है, को सिर्फ मार्क्सवाद ही शिकस्त दे सकता है. वैचारिक और भौतिक दोनों ही तरीकों से. इसी कारण फासीवाद सबसे ज्यादा हमला इसी पर करता है. इस हमले के दबाव से कई बार खुद को मार्क्सवादी मानने वाले लोगों में भी अफरा-तफरी मच जाती है, और अन्दर माने जाने वाले लोगों की ओेर से भी मार्क्सवाद पर हमले होने लगते हैं.

सीपीआई (माले) लिबरेशन की पोलित ब्यूरो सदस्य कविता कृष्णन स्तालिन और समाजवादी शासन व्यवस्था पर हमले करते हुए पिछले महीने पार्टी से अलग हो गयी. एक वामपंथी पार्टी की पोलित ब्यूरो सदस्य का अपनी पार्टी से अलग होना उतना आश्चर्यजनक नहीं था, जितना एक वामपंथी पार्टी की पोलित ब्यूरो सदस्य का कन्हैया कुमार की परिपाटी पर चलते हुए समाजवाद और मार्क्सवाद के सिद्धांतों पर हमला करते हुए बाहर निकल जाना. लेकिन इन सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक यह था कि सीपीआई माले ने कविता कृष्णन के भ्रामक हमलावर सवालों पर चुप्पी साधते हुए उनके इस्तीफे पर उन्हें विदा किया.

माले ने अपने बयान में कहा – ‘क्योंकि कविता कृष्णन को कुछ ज़रूरी विषयों पर चिंतन करना है, जो पार्टी में रहते हुए संभव नहीं हैं, इसलिए उनका इस्तीफा स्वीकार किया जाता है.’ इतना ही नहीं, माले ने कविता कृष्णन के सवालों का जवाब देने वालों और ट्रोल करने वालों-दोनों को एक ही श्रेणी में रखकर एक साथ फटकार लगाने का काम भी किया और सबसे आखिर में- यह बिल्कुल आश्चर्य की बात नहीं कि बहुत सारे पुराने, निष्क्रिय ‘मार्क्सवादियों’ने इस बात के लिए कविता कृष्णन और माले की तारीफ की, कि उन्होंने अलग होने में ‘शालीनता दिखाई है.’

ज़रूरी सवालों पर चुप रह जाना शालीनता नहीं होती, बल्कि उठाये गये सवालों पर सहमति होती है. व्यक्ति को टारगेट न करके उसके सवालों का जवाब देने से शालीनता भंग नहीं होती, मार्क्सवाद के बचाव के लिए मुंह खोलने से शालीनता भंग नहीं होती, बल्कि उस वैज्ञानिक दर्शन का बचाव होता, जिसने पूरी दुनिया के शासकों कों विचलित कर रखा है. इस अद्भुद ‘शालीनता’ के कारण सवाल विचारधारा छोड़ने वाली कविता कृष्णन पर नहीं, बल्कि माले पर उठना चाहिए. इसलिए भी कि कविता कृष्णन ने जो सवाल उठाये हैं, वे माले द्वारा दी गयी उनकी राजनैतिक और वैचारिक समझदारी से जुड़ी है. इस भ्रामक समझदारी के कारण जो सवाल नहीं है, उसे भी सवाल बनाकर खड़ा कर दिया गया. इन भ्रामक सवालों पर बात करना ज़रूरी है.

अपने इस्तीफे के बाद दिये जा रहे साक्षात्कारों में कविता कृष्णन रूस और चीन के मौजूदा पूंजीवादी राज को समाजवाद बताकर ‘समाजवादी व्यवस्था’ पर सवाल उठा रही हैं. जो पार्टियां और लोग माओ त्से-तुंग की ‘महान बहस’ के बाद भी सोवियत संघ को समाजवादी देश मानते रहे, उनका भ्रम भी 90 में सोवियत संघ के बिखरने के बाद टूट गया, लेकिन पता नहीं किस कारण से कविता कृष्णन और माले रूस को आज भी समाजवादी देश मानते आ रहे हैं (ऐसा उन्होंने अपने सभी साक्षात्कारों में कहा).

मौजूदा चीन को भी उन्होंने ‘समाजवादी चीन’ मानकर समाजवाद की आलोचना कर डाली. अशोक कुमार पाण्डे द्वारा लिए गये एक साक्षात्कार में तो जब उनसे पूछा गया कि ‘वे माओ के पहले के चीन की बात कर रही हैं या माओ के बाद की ?’ तो उन्होंने कहा कि ‘इसके लिए तो चीन का इतिहास पढ़ना होगा मुझे (!) … लेकिन कुछ किसान लोकल समस्याओं के बारे में अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं को नहीं, सीधे माओ को लिख रहे थे…’.

जिसके बारे में ठीक से कुछ पढ़ा और जाना भी नहीं, उसे इतने अधिकार के साथ खारिज करना- यह समाजवाद की खामियों पर बोलना नहीं, बल्कि समाजवाद के खिलाफ मुहिम है. लेकिन उल्लेखनीय है कि यह केवल उनके व्यक्तिगत विचार का प्रदर्शन नहीं उनकी पार्टी सीपीआई माले के विचार का भी प्रदर्शन है, जिसने उन्हें यह बताया था कि आज भी रूस और चीन समाजवादी राज्य है. आज के रूस-चीन को समाजवाद कहना भर ही समाजवाद के खिलाफ खड़े होना है.

दोनों जगह की अर्थव्यवस्था और राजनीति पूंजीवादी-साम्राज्यवादी हो चुकी है, और ये आज नहीं, दशकों पहले हो चुका है, जिस पर न जाने कितने अर्थशास्त्रियों के लेख मौजूद हैं. दरअसल लिबरेशन ही नहीं सीपीएम, सीपीआई भी, जो क्रांति का रास्ता छोड़ चुकी हैं, इन्हीं देशों को समाजवादी बताकर चुनावी मार्ग से मात्र सरकार परिवर्तन की राह पर चल रही हैं. ये पार्टियां जिस रास्ते पर पिछले कई दशकों से चल रही हैं, उन्हें ये सूट करता है कि वे रूस, चीन, क्यूबा, वेनेजुएला सभी पूंजीवादी जनवादी सरकारों को समाजवाद बतायें.

कविता कृष्णन भी इसी राजनीतिक शिक्षा के कारण समाजवाद की बजाय पूंजीवादी जनवाद की वकालत कर रही हैं. बल्कि इस मामले में कविता कृष्णन तो अपनी पार्टी से थोड़ा आगे हैं कि उन्हें अब ये समझ में आ गया कि इन देशों का ‘समाजवाद’ ठीक नहीं है. लेकिन वे अपनी पुरानी सोच को बनाये रखते हुए, इनका हवाला देकर ‘समाजवाद’ को ही खारिज कर रही हैं.

समाजवाद को खारिज करने के इस क्रम में वे कन्हैया कुमार और उन सभी पूंजीवादी उदारवादियों तक पहुंच गयीं, जहां से वे समाजवाद का विरोध करना शुरू करते हैं. उन्होंने हिटलर की तुलना स्तालिन से करते हुए उन्हें क्रूर तानाशाह कहा है. यह सिर्फ सोवियत समाजवाद पर ही नहीं, बल्कि मार्क्सवाद पर एक बड़ा हमला है. हिटलर के बराबर स्तालिन को रखना, दरअसल मुनाफाखोर पूंजीवादी शासकों की जातीय-नस्लीय-धार्मिक तानाशाही को शोषितों की वर्गीय तानाशाही के बराबर बताना है.

शोषित वर्ग के रूप में ‘सर्वहारा की तानाशाही’, जो समाजवादी समाज व्यवस्था के निर्माण के लिए आवश्यक है, की तुलना मुनाफाखोर शासक की तानाशाही से करना मार्क्सवाद का विज्ञान न समझने से उपजा विचार है. सर्वहारा की तानाशाही वह नहीं होती, जो पूंजीवादी शोषकों की तानाशाही होती है, जिसमें किसानों से जमीनें, मजदूरों से मशीनें, आदिवासियों से उनके जंगल और औरतों से उनके बराबरी के अधिकार, नागरिकों से वैज्ञानिक चेतना छीन लेती है.

सर्वहारा की तानाशाही का अर्थ है, अडानियों-अम्बानियों से पूंजी छीनना, जिसे उन्होंने निजी बना लिया है, जमींदारों से अतिरिक्त जमीनें छीनना, साम्राज्यवाद के दलालों को जंगल से बाहर खदेड़ना, और अतार्किकता, अवैज्ञानिकता फैलाने वाले बाबाओं, मौलवियों, पादरियों पाखण्डियों को उसके इज्जतदार आसन से उतार कर मेहनत करवाना, औरतों बच्चों को अपनी सम्पत्ति मानने वाले मनुवादियों को औरतों के मातहत श्रम करवाना- क्या यह ‘तानाशाही’ किसी भी मेहनतकश या मेहनत को सम्मान देने वाले नागरिक, विचार या संस्था को बुरी लग सकती है ? यदि हां, तो उसे कम से कम अपने को मार्क्सवादी नहीं कहना चाहिए, यह बराबरी का दर्शन है, और समाज में बराबरी लाने के लिए ऐसी ‘तानाशाही’ आवश्यक होगी. कोई अपने को मार्क्सवादी भी कहे और इससे इंकार भी करे यह दोनों एक साथ संभव नहीं है.

शासक वर्ग इतनी आसानी से निजी सम्पत्ति का मोह नहीं छोड़ने वाला, इतनी आसानी से शोषक वर्ग का दर्शन नहीं खतम होने वाला. इसे खतम करने के क्रम में सर्वहारा यानी शोषितों की तानाशाही मुट्ठी भर मुनाफाखोरों और शासकों पर आवश्यक होती है, ताकि उन्हें सत्ता से बेदखल किया जा सके. क्रांति इसे ही कहते हैं, जो कि कभी शांतिपूर्ण नहीं होती. यह समाज विज्ञान का नियम है.

लेनिन की मौत के बाद सर्वहारा वर्ग से आये स्तालिन ने शोषक वर्गों की राजनीति और अर्थव्यवस्था को खत्म करने के लिए शोषित वर्गों की अर्थव्यवस्था की समाज व्यवस्था लागू करवाया इसीलिए पूंजीवादी देशों, शोषक वर्गों और ढुलमुल बुद्धिजीवियों ने उन्हें बदनाम किया और अब माले की पूर्व पोलित ब्यूरो सदस्य भी इस अभियान का हिस्सा बन गयी हैं, जबकि माले इस पर ‘शालीन’ चुप्पी ओढ़े हुए है. इन दोनों (मेहनतकश की तानाशाही और मुनाफाखोरों की तानाशाही) तानाशाहियों को समान मानना क्रांतिकारी स्तालिन को नीचा दिखाने से ज्यादा हिटलर को ऊंचा बताये जाने की कार्यवाही है. फासीवाद का विरोध करते हुए दरअसल वे फासीवादियों के गोद में बैठ गयी हैं.

एक साक्षात्कार में यह कहकर वे अपने को और भी खोल देती हैं कि ‘यह दिक्कत व्यक्ति की नहीं सिद्धांत की है.’ इससे ये भी पता चल रहा है कि वे खुद कितना अधिक कन्फ्यूज हैं. वे अपने को अभी भी मार्क्सवादी और कम्युनिस्ट बता रही हैं, जबकि सर्वहारा की तानाशाही जो कि मार्क्सवाद का हिस्सा है, उसे खारिज कर रही हैं.

इस सिद्धांत को लागू करने के लिए वे स्तालिन यानी व्यक्ति पर हमलावर हो रही हैं, फिर तुरंत ही इसे व्यक्ति की दिक्कत नहीं, सिद्धांत की दिक्कत बता रही हैं. इसी साक्षात्कार में अशोक कुमार पाण्डेय ने जब कृष्णन से यह पूछ लिया कि ‘सर्वहारा की तानाशाही की बात तो खुद मार्क्स ने कही थी’, उन्होंने बात को दायें बायें करते हुए कहा- ‘मैं तो साहित्य की छात्रा हूं…दरअसल ये तो एक रिटोरिक पांइट है…’. यानी, मार्क्स ने यह बात ध्यानाकर्षण के लिए कही थी, न कि यह इनकी ठोस राय थी.

यह जवाब साफ तौर पर यह बताता है कि कविता कृष्णन मार्क्सवाद से भागते हुए उसे अपने भ्रमित विचारों के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रही हैं और इस प्रक्रिया में वे और कन्फ्यूज होती जा रही हैं. वे जल्द ही मार्क्सवाद से पल्ला झाड़ लेंगी, संभवतः अभी उन्हें ऐसा करने में शर्म आ रही होगी.

इसके पहले कन्हैया कुमार ‘स्टालिन मुर्दाबाद’ का नारा लगाते हुए कांग्रेस के खेमे में जा पहुंचे हैं, हो सकता है वे भी किसी ऐसी ही पार्टी का रूख करें या मार्क्सवाद छोड़ रहे लोगों की नई पार्टी बना लें. कविता कृष्णन द्वारा स्टालिन को हिटलर के साथ बिठाये जानेे से जेल में बंद ‘वामपंथी’ उमर खालिद भी काफी उत्साहित हैं, इसकी जानकारी खुद कृष्णन ने अपनी फेसबुक वॉल पर उत्साहित होकर दी है.

समाजवाद और सर्वहारा की तानाशाही के मार्क्सवादी सिद्धांत को खारिज करते हुए, वे इसकी तुलना फासीवाद से करती है, जहां ‘एक धर्म, एक विचार, एक पार्टी, और एक व्यक्ति का वर्चस्व होता है. कविता कृष्णन की तरह ही नेपाल में ‘प्रचंड पथ’ बनाने वाले पुष्प कमल दहाल ने भी राजशाही के खात्मे के लिए ‘मल्टी पार्टी डेमोक्रेसी’ का विचार दिया. यानी, नेपाल के माओवादियों ने इतनी सालों की मेहनत के बाद, 10 साल तक छापामार युद्ध के बाद सत्ता हासिल की और सत्ता में आते ही सर्वहारा वर्ग के साथ शोषक वर्गों की पार्टी को भी सत्ता में भागीदारी के लिए आमंत्रित कर लिया.

भारत की माओवादी पार्टी ने इस ‘प्रचंड पथ’ को वर्ग संश्रय, संशोधनवाद और क्रांति के साथ गद्दारी कहते हुए खारिज कर दिया, जबकि भारत के माले ने इस लाइन को सही बताते हुए वहां के माओवादियों के साथ सत्ता में भागीदारी की, नतीजा सामने है कि इतनी शानदार, सफल क्रांति सत्ता हासिल करते ही औंधे मुंह गिर गयी.

सर्वहारा की तानाशाही के कारण ही रूस चीन की सर्वहारा और नवजनवादी क्रांतियां कुछ साल रह सकी, और दुनिया को इसकी शानदार झलक दे सकीं, जैसेे ही दोनों जगहों पर वर्ग संश्रय की लाइन अपनाई गई वैसे ही समाजवादी व्यवस्था उल्टी दिशा में लौट गयी. सालों से सत्ता में जमे रूस के राष्ट्रपति पुतिन किसी तानाशाह से कम नहीं लेकिन वे इस जगह पर समाजवाद के कारण नहीं, बल्कि पूंजीवादी पुनर्स्थापना के कारण पहुंचे हैं.

यह भी स्पष्ट करना ज़रूरी है कि समाजवाद का बचाव करने का यह बिलकुल आशय नहीं है कि वो अब तक जहां भी लागू हुआ, उसमें कोई कमियां नहीं रहीं. समाजवाद के अन्दर से भी इसकी कमियों पर आवाज उठती रही है. स्तालिन का मूल्यांकन खुद माओ ‘महान बहस’ के दौरान करते हैं और कहते हैं – ‘स्तालिन 70 प्रतिशत सही थे, 30 प्रतिशत गलत.’

एक और चर्चित नाम लूं, तो वो अलेक्सांद्रा कोलोन्तई हैं, जिनके लेनिन स्तालिन से हमेशा मतभेद रहे, खासतौर पर पार्टी और नेतृत्व में महिलाओं को आगे बढ़ाने, महिला कमेटियों और आन्दोलनों पर अलग से जोर देने, यहां तक कि स्त्री-पुरूष सम्बन्धों में समाजवादी मूल्यों को लेकर भी उनके लेनिन स्तालिन से मतभेद रहा. लेकिन उनका मतभेद कभी भी समाजवाद के खिलाफ या मार्क्सवाद के खिलाफ नहीं था.

उस वक्त एकमात्र समाजवादी समाज जिस पर सारी दुनिया की नज़र है, और जिसे पूंजीवादी और हिटलर का फासीवाद ध्वस्त करने की योजनायें बना रहा हो, को बचाने के लिए हमेशा सचेत रही. आगे जिस भी देश में समाजवादी को जमींन पर उतारा जायेगा, महिलाओं की मुक्ति के लिए उसे कोलोन्तई के विचारों से होकर गुजरना ही पड़ेगा क्योंकि उनके अधिकांश विचार समाजवाद को समृद्ध करते हैं.

कोलोन्तई से कविता कृष्णन की तुलना नहीं की जानी चाहिए. यह सिर्फ समाजवाद को समृद्ध करने वाले विचार और समाजवाद को ध्वस्त करने वाले विचार में अन्तर दिखाने के लिए है. कविता कृष्णन का भ्रमित विरोध समाजवाद से ही है. वे जिन प्रस्थापनाओं पर भ्रमित सवाल उठा रही हैं उनका विरोध मार्क्सवाद से है. इसलिए उनके इस भ्रमित विरोध को अन्दरूनी वाद-विवाद-सम्वाद न मानकर बाहरी हमला ही माना जाना चाहिए.

आज के फासीवाद दौर में जबकि फासीवाद एक पार्टी नहीं, बल्कि सभी चुनावी पार्टियों की विचारधारा बन गयी है, जब यह चुनाव से जाती नहीं दिख रही है और यह अपनी सबसे हिंसक कार्यवाहियों के साथ हमारे सामने है, मार्क्सवादी इंकलाब ही इसका जवाब है. ऐसे समय में समाजवाद को ही फासीवादी, सर्वसत्तावादी, तानाशाही शासन व्यवस्था बताना किस बात का संकेत है, यह समझा जा सकता है. लेकिन यह अकेले कविता कृष्णन या कन्हैया कुमार की बात नहीं है, उनकी पार्टियों की भी है, जिन्होंने ऐसे मौकों पर अपनी विचारधारा का बचाव तक नहीं किया.

Read Also –

‘Stalin Waiting For … The Truth’
मार्क्सवादी लबादा ओढ़े लोग अवार्ड की आस में सबसे पहले ‘स्टालिन मुर्दाबाद’ बोलते हैं
क्या आप सोवियत संघ और स्टालिन की निंदा करते हुए फासीवाद के खिलाफ लड़ सकते हैं ?
स्तालिन : साम्राज्यवादी दुष्प्रचार का प्रतिकार
भारत में क्रांति के रास्ते : काॅ. स्टालिन के साथ
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास, 1925-1967
‘मैं आखिरी स्टालिनवादी पीढ़ी से हूं’
संसदीय चुनावों के रणकौशलात्मक इस्तेमाल की आड़ में क्रांतिकारी कार्यों को तिलांजलि दे चुके कम्युनिस्ट संगठनों के संबंध में कुछ बातें
मार्क्सवाद की समस्याएं
फ़ासीवाद और औरतें : फ़ासीवाद के साथ बहस नहीं की जा सकती, उसे तो बस नष्ट किया जाना है
स्टालिन : अफवाह, धारणाएं और सच

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

मोहन चंद

Next Post

जीएम टेक्नोलॉजी और ड्रोन : मोदी ने भारत की कृषि व्यवस्था की विनाश कथा लिख दी है

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

जीएम टेक्नोलॉजी और ड्रोन : मोदी ने भारत की कृषि व्यवस्था की विनाश कथा लिख दी है

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

दलित तुम्हारी नाराज़गी की रत्ती भर भी परवाह नहीं करता…

November 13, 2021

जनसंख्या कानून : राष्ट्रवादी सिलेबस का अगला चैप्टर

January 21, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.