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मार्क्सवादी लबादा ओढ़े लोग अवार्ड की आस में सबसे पहले ‘स्टालिन मुर्दाबाद’ बोलते हैं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 8, 2022
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मार्क्सवादी लबादा ओढ़े लोग अवार्ड की आस में सबसे पहले 'स्टालिन मुर्दाबाद' बोलते हैं
मार्क्सवादी लबादा ओढ़े लोग अवार्ड की आस में सबसे पहले ‘स्टालिन मुर्दाबाद’ बोलते हैं

मार्क्सवादी खेमे के बीच एक पुरानी परंपरा है. मार्क्सवादी लबादा ओढ़े हुए लोगों को जब खुद को ज्यादा क्रांतिकारी दिखना होता है तब वो सबसे पहले स्टालिन को तानाशाह बताते हैं और मार्क्सवाद विरोधियों के बीच से आने वाले तालियों की गड़गड़ाहट और कोई अवार्ड की आस में बैठ जाते हैं. ये शुरू करते हैं स्टालिन मुर्दाबाद से और स्टालिन के तानाशाह होने से भले ही इसके समर्थन में कोई फैक्ट इनके पास नहीं हो या हो सकता है कि उस दौरान के तथ्यों से इनका कोई सबका नहीं रहा हो और हमेशा सरस सलिल टाइप लिटरेचर का उदाहरण देकर ये खुद को सबसे ज्यादा स्टालिन के तानाशाह होने का ज्ञाता बन जाते हैं.

इनको अक्सर मार्क्सवाद विरोधियों और त्रोत्स्कीवादी साहित्य में तथ्य दिखता है लेकिन अन्ना लुईस स्ट्रॉन्ग, लुडो मार्टन और ग्रोवर फर जैसे लोगों के तथ्य और साहित्य सस्ते साहित्य लगने लगते हैं. ऐसे स्टालिन और माओ ने कभी खुद को डेमोक्रेट नहीं कहा. मार्क्स ने भी खुद को डेमोक्रेट नहीं कहा. वो तो हमेशा सर्वहारा की तानाशाही की बात करते रहे. जब आपको मालूम है कि मार्क्सवाद ही सर्वहारा की तानाशाही के बारे में है, तब आप मार्क्सवादी लबादा क्यों ओढ़े हुए हैं ? आप बहस में आइए लेकिन मार्क्सवादी लबादा उतारकर और उस दौरान के तथ्यों के साथ.

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क्या कोई मार्क्सवादी कहता है कि मार्क्स, लेनिन, स्टालिन या फिर माओ ने कोई गलती नहीं की ? लोगों को देवता बनाने की परंपरा ब्राह्मणवाद और परंपरावाद में डूबे बुद्धिजीवियों का है, न की मार्क्सवादियों का. हरेक मार्क्सवादी क्रांतिकारी ने पहले के लोगों की अपने व्यवहार में उसकी सीमा बाध्यताओं की बात की और आगे बढ़ते हुए अपने देश में उदाहरण पेश किए.

मार्क्सवाद जब जनवाद की बात करता है तो वो हरेक तरह के सर्वोच्चता और वर्चस्व के बोध को समाप्त करने की बात करता है. इसमें पूंजी और मानसिक श्रम का वर्चस्व और सर्वोच्चता का बोध भी शामिल है. अब सवाल यह है कि ऐसे ज्ञानी लोग इस सर्वोच्चता के बोध को खत्म करने की बात क्यों नहीं करते ? आज तक भारत में सांस्कृतिक सर्वोच्चता के प्रतीक ब्राह्मणवाद को खारिज करते हुए कोई ठोस दिशा क्यों नहीं विकसित की ? आज तक इन कम्युनिस्ट पार्टी में इन सर्वोच्चता के बोध को खत्म करने के लिए कोई ज्ञानी पंडित ने पार्टी लाइन पर बहस क्यों नहीं किया ?

इसका कारण यह है कि ये खुद इस सर्वोच्चता के बोध की ही पैदाइश हैं और अक्सर खुद को पार्टी के अंदर ही बाकी के आम कम पढ़े लिखे जमीन पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं की पीठ पर बैठे होते हैं. ऐसे ज्ञानी लोग कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व में कैसे पहुंच जाते हैं जिन्होंने एक कारखाना या फिर किसी इलाके में संघर्ष तक नहीं खड़ा किया ? मतलब संघर्ष करने के लिए आम कार्यकर्ता है जबकि ये लोग खुद को रास्ता बताने वाला समझते हैं. इंग्लिश कॉन्वेंट में पढ़े और समाज के अंदर हरेक तरह की विशेषाधिकार का उपभोग किए लोग अपने इस विशेषाधिकार से कम्युनिस्ट पार्टी में भी ग्रसित रहते हैं.

सवाल यह है कि इनकी घृणा स्टालिन और माओ से इतनी ज्यादा क्यों है ? इसका एक ही जवाब है कि इन मार्क्सवादियों ने ऐसे ज्ञानियों के विशेषाधिकार को खत्म करते हुए मजदूरों को ज्यादा अधिकार दिया. माओ ने तो ऐसे ज्ञानियों को कहा कि थोड़ा गांव भी घूम लीजिए. देख लीजिए कि गांव में लोग कैसे जी रहे हैं. गांव के ठंड में मर नहीं जायेगा. वहां के लोग आपकी मदद करेंगे.

माओ के इतना कहने पर ही ऐसे ज्ञानियों ने पूरी दुनिया सर पे उठा लिया कि बताइए ये तो शहरी मासूम लोगों को मेहनत करने के लिए कह रहा है. ऐसे ज्ञानी लोगों को मेहनत से दिक्कत है और मजदूर वर्ग के नेतृत्व से दिक्कत है. ऐसे ज्ञानी लोग बिल्कुल नहीं समझते कि ये लोग एक गांव या फिर एक कारखाना में संगठन तक नहीं बना पाते और सबसे सर्वोच्च नेतृत्व का हिस्सा कैसे बन जाते हैं !

यहां भी ये अपने पैदाइशी विशेषाधिकार का लाभुक बनते है. इसका सबक यही है कि ऐसी पार्टियों से सवाल किया जाए जो इन विशेषाधिकार और वर्चस्व के बोध से ग्रसित लोगों को मजदूर वर्ग की पार्टी के माथे पर बैठा देती है. ऐसे ज्ञानी लोगों के हमले से स्टालिन और माओ का कद मजदूर वर्ग के बीच ऊंचा ही होता है. जब पूरा साम्राज्य स्टालिन और माओ को नहीं मिटा पाया तो ऐसे जुगाली करने वाले बौद्धिकों जिनके मार्क्सवाद का ज्ञान भी बहुत छिछला है, क्या बिगाड़ पाएंगे ! ऐसे ज्ञानियों को हमेशा डर रहता है कि कहीं उनका विशेषाधिकार खत्म कर इन्हे भी धान के खेतों में न भेज दिया जाए !

क्या मार्क्सवाद लोकतंत्र के लिए है ? वो सर्वहारा वर्ग की तानाशाही (dictatorship of the proletariat) के बारे में है इसलिए शहरी intellectuals को जनता पर थोपना बंद करिए. भारतीय वामपंथ उच्च जाति के पढ़े लिखे लोगों का जुगाली करने का अड्डा भर बस है. एक साफ साफ डिवीजन आपको दिखेगा. पॉलिट और केन्द्रीय कमिटी में उच्च जाति के पढ़े लिखे लोग और चुनाव लड़ने के लिए दलित और ओबीसी जाति के लोग. महासचिव हमेशा कोई उच्च जाति का लोग होगा, डी. राजा को छोड़कर, वो अपवाद हैं. बुद्धिजीवी हमारा नेता नहीं हो सकता है. बुद्धिजीवी को अपना काम करने दीजिए. पूरे वामपंथ पर शहर के पढ़े लिखे उच्च जाति के लोगों का कब्जा है.

भाई मार्क्सवाद रॉकेट साइंस है जो दलित, आदिवासी और अन्य जातियों को समझ ही नहीं आता है ? उनको अपने शोषण का सब तरीका समझ में आता है. हम कैसे मान ले कविता जी जिस तरह की बात कर रही हैं ? उस तरह की बात दीपांकर कल नहीं करेंगे ? शहरी बुद्धिजीवियों को सबको यही करना है आज न कल और जो लोग मार्क्सवाद को समझने का दावा कर रहे थे, सब के सब अपने अपने रास्ते निकल पड़े हैं. जनता के रास्ते से किसी को कोई मतलब नहीं हैं.

कविता जी यूक्रेन को लोकतांत्रिक देश बोल रही हैं. उनको पता होना चाहिए कि यूक्रेन की नाजीवादी सरकार रसियन भाषी लोगों के साथ क्या कर रही हैं. कविता जी के जानकारी के लिए बता दे कि जिस हिसाब से भारत में मुसलमानों के शोषण पर उनको तानाशाही लगती हैं तो वो यूक्रेन में रसियन भाषी लोगों के साथ जो कीव सरकार कर रही है वो क्या है ? 14000 के ज्यादा लोगों की हत्या अमेरिका समर्थित कीव सरकार द्वारा किया गया हैं, और इसके बाद भी कविता जी को यूक्रेन लोकतांत्रिक देश लगता है.

कविता जी थोड़ा जहमत उठाकर पढ़िए और फिर बात करिए यूक्रेन में क्या चल रहा है. 16 दिसंबर 2021 को Combating glorification of Nazism, neo-Nazism and other practices that contribute to fuelling contemporary forms of racism, racial discrimination, xenophobia and related intolerance : resolution / adopted by the General Assembly. इस रेजोल्यूशन के खिलाफ सिर्फ दो देशों ने वोट किया था – अमेरिका और यूक्रेन की सरकारों ने. इन सब बातों के बाद भी कविता जी को यूक्रेन लोकतांत्रिक मुल्क लगता है !

  • संजय कुमार

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