Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home लघुकथा

अक्‍लमंद, मूर्ख और गुलाम

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 8, 2022
in लघुकथा
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
लू-शुन

एक गुलाम हरदम लोगों की बाट जोहता रहता था, ताकि उन्‍हें अपना दुखड़ा सुना सके. वह बस ऐसा ही था और बस इतना ही कर सकता था. एक दिन उसे एक अक्‍लमंद आदमी मिल गया.

‘मान्‍यवर !’ वह उदास स्‍वर में रोते हुए बोला, उसके गालों पर आंसुओं की धार बह चली, ‘आप जानते हैं, मैं कुत्‍ते की जिन्‍दगी जी रहा हूँ. मुझे दिन भर में एक बार भी खाना नसीब नहीं, और अगर मिलता भी है तो बस वही बाजरे की भूसी, जिसे सुअर भी नहीं खाता. और उसकी भी क्‍या कहूं जो एक छोटी कटोरी भर से ज्‍यादा नहीं मिलती…’.

You might also like

एन्काउंटर

धिक्कार

मैं रहूं न रहूं, पर लड़ाई ज़िंदा रहेगी : एक अपरिचय से परिचय तक की दहला देने वाली मुलाक़ात

‘यह तो वाकई बहुत बुरा है,’ अक्‍लमंद आदमी ने सहानुभूति जतायी.

‘और क्‍या ?’, वह कुछ उत्‍तेजित हो उठा, ‘जबकि मैं सारा दिन और सारी रात खटता रहता हूं. पौ फटते ही मुझे पानी भरना पड़ता है, सांझ को मैं खाना पकाता हूं, सुबह मैं सौंपेे गये काम निपटाता हूं, शाम को मैं गेहूं पीसता हूं, जब मौसम अच्‍छा होता है तो मैं कपड़े धोता हूं, और जब बारिश होती है तो मुझे छाता थामना पड़ता है, जाड़े में मैं अंगीठी सुलगाता हूं, और गर्मी में पंखा झलता हूं. आधी रात को मैं खुम्मियां उबालता हूं और जुआरियों की पार्टियों में व्‍यस्‍त अपने मालिक का इन्‍तजार करता हूं. लेकिन कभी मुझे कोई बख्‍़शीश नहींं मिलती, बस जब-तब चाबुक ही खानी पड़ती है…’.

‘मेरे प्‍यारे…’ अक्‍लमंद आदमी ने नि:श्‍वास छोड़ी. उसकी आंखों के किनारे कुछ-कुछ लाल हो चुके थे, मानो अब वह रो देने वाला हो.

‘मैं ऐसे नहीं जी सकता, मान्‍यवर. मुझे कोई न कोई उपाय ढूँढना ही होगा लेकिन मैं क्‍या करूं ?’

‘मुझे विश्‍वास है कि हालात जरूर सुधरेंगे…’.

‘क्‍या आप ऐसा सोचते हैं ? निश्‍चय ही मैं इसकी उम्‍मीद करता हूं, लेकिन अब जबकि मैंने आपको अपना दुखड़ा सुना दिया है और आपने इतनी हमदर्दी के साथ मेरा हौसला बढ़ाया है, मैं पहले से बेहतर महसूस कर रहा हूं. इससे जाहिर होता है कि अभी भी दुनिया मेें कुछ इंसाफ है.’

हालांकि थोड़े ही दिन बाद वह फिर उदासी से भर उठा और अपना दुखड़ा सुनाने के लिए किसी दूसरे आदमी से मिला.

‘मान्‍यवर !’ उसने आंसू बहाते हुए सम्‍बोधित किया, ‘आप जानते हैं, जहां मैं रहता हूं वह सुअरबाड़े से भी बदतर जगह है. मेरा मालिक मुझेे आदमी नहीं समझता. वह अपने कुत्‍ते को मुझसे दस हजार गुना बेहतर समझता है…’.

‘उसका सत्‍यानाश हो !’ दूसरे व्‍यक्ति ने इतने जोर से गाली दी कि गुलाम भौचक्‍का रह गया. यह दूसरा आदमी मूर्ख था.

‘मैं जिसमें रहता हूं, मान्‍यवर, वह टूटी-फूटी एक कमरे वाली झोपड़ी है, जिसमें सीलन, ठंडक और बेशुमार खटमल है. ज्‍यों ही मैं सोने जाता हूं वे काटने लगते हैं. वह जगह बदबू से भरी हुई है और उसमें एक भी खिड़की नहीं है…’.

‘क्‍या तुम अपने मालिक से एक खिड़की बनवाने के लिए कह सकते हो ?’

‘मैं कैसे कह सकता हूं ?’

‘ठीक है, मुझे दिखाओ वह जगह कैसी है.’

मूर्ख आदमी गुलाम के पीछे-पीछे उसकी झोपड़ी में गया और मिट्टी की दीवार पर चोट करने लगा.

यह आप क्‍या कर रहे हैं, मान्‍यवर ?’

गुलाम डर गया था.

‘मैं तुम्‍हारे वास्‍ते एक खिड़की खोल रहा हूं.’

‘यह ठीक नहीं होगा. मालिक मुझे मारेगा.’

‘मारने दो.’ मूर्ख आदमी दीवार पर चोट करता रहा.

‘दौड़ो ! एक डाकू घर तोड़ रहा है. जल्‍दी आओ नहीं तो वह दीवार ढहा देगा…’.

चिल्‍लाते-सिसकते वह गुलाम पागलों की भांति जमीन पर लोटने लगा. गुलामों का एक पूरा दल ही उमड़ आया और उस मूर्ख को खदेड़ दिया. इस हल्‍ले-गुल्‍ले को सुनकर जो सबसे आखिर मेंं धीरे-धीरे बाहर आया, वह मालिक था.

‘एक डाकू हमारा घर गिरा देना चाहता था. मैंने सबसे पहले खतरे की सूचना दी, और हम सबने मिलकर उस मूर्ख को खदेड़ दिया.’ गुलाम ने ससम्‍मान और विजय गर्व से कहा.

‘तुम्‍हारा भला हो !’ मालिक नेे उसकी प्रशंसा की.

उस दिन हमदर्दी दिखाने कई लोग आये, जिनमें वह अक्‍लमंद आदमी भी था.
‘मान्‍यवर, चूंकि मैंने अपने को काम लायक सिद्ध किया, इसलिए मालिक ने मेरी प्रशंसा की. आप सचमुच दूरदर्शी हैं, आपने उस दिन कहा था कि हालात सुधरेंगे,’ वह बहुत आशान्वित और खुश होकर बोला.

.यह सही है…’. अक्‍लमंद आदमी ने जवाब दिया, और वह भी अपने पर खुश लग रहा था.

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें]

Previous Post

आज बचेंगे तो कल सहर देखेंगे

Next Post

लू-शुन : विचारों के बीज साहित्य के हल से ही बोये जा सकते हैं

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

लघुकथा

एन्काउंटर

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
लघुकथा

मैं रहूं न रहूं, पर लड़ाई ज़िंदा रहेगी : एक अपरिचय से परिचय तक की दहला देने वाली मुलाक़ात

by ROHIT SHARMA
February 7, 2026
लघुकथा

इतिहास तो आगे ही बढ़ता है…

by ROHIT SHARMA
January 5, 2026
लघुकथा

सवाल

by ROHIT SHARMA
August 16, 2025
Next Post

लू-शुन : विचारों के बीज साहित्य के हल से ही बोये जा सकते हैं

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

सबूत

October 6, 2021

नवनाजीवादी जेलेंस्की वध का खाका खींच रखा है नाटो ने

May 5, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.