
‘जिन लोगों के पास सेना नहीं है, उनके पास कुछ भी नहीं है.’ – माओत्से तुंग
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही जन मुक्ति गुरिल्ला सेना (पीएलजीए) अपने संघर्ष के 25वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है. भारत में लोकतांत्रिक जनक्रांति और समाजवाद एवं साम्यवाद के संघर्ष की अग्रणी संगठित शक्ति के रूप में पीएलजीए के इस ऐतिहासिक अवसर पर, हम भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय समिति, पार्टी कार्यकर्ताओं, सदस्यों और सेनानियों, पीएलजीए के कमांडरों और सेनानियों, मजदूर वर्ग, गरीब किसानों और भारत की मेहनतकश जनता को अपनी हार्दिक कम्युनिस्ट शुभकामनाएं देते हैं.
हम उन अमर शहीदों को अपनी गहरी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने 2 दिसंबर 2000 को गठित पीएलजीए के झंडे तले लड़ते हुए, कॉमरेड चारु मजूमदार द्वारा स्थापित जन संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर अपने जीवन और रक्त का बलिदान दिया.
भारत में लोकतांत्रिक जनवादी क्रान्ति आज एक कठिन दौर से गुज़र रही है. एक ओर, भारतीय शासक वर्ग, साम्राज्यवादियों की मदद से, भाकपा (माओवादी) और उसके नेतृत्व वाली पीएलजीए के विरुद्ध ‘कगार’ ऑपरेशन चला रहा है, तो दूसरी ओर, सोनू और सतीश जैसे देशद्रोहियों के नेतृत्व में आंतरिक विघटनकारी हमले आयोजित किए जा रहे हैं.
कोई भी क्रांति बिना नुकसान, रुकावटों और उतार-चढ़ाव के सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ती. भारत में क्रांतिकारी संघर्ष एक दौर से गुज़र रहा है – यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि दुनिया भर में साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था के गहरे संकट का प्रतिबिंब है. इस संकट में डूबते हुए, साम्राज्यवाद और उसके एजेंट राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले सशस्त्र संघर्ष – जो संगठित विद्रोह का सर्वोच्च रूप है – को कुचलने की कोशिश कर रहे हैं. ‘कगार ऑपरेशन’ और देशद्रोहियों की गतिविधियां इसी व्यापक हमले का हिस्सा हैं.
क्योंकि शासक जानते हैं: सशस्त्र संघर्ष जितना मजबूत होगा और लोगों के बीच उसकी जड़ें जितनी गहरी होंगी, उनके शासन का अंत उतना ही करीब आएगा. इसीलिए एक तरफ पार्टी को खत्म करने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी तरफ जनता को दबाने और नेतृत्वविहीन करने की कोशिश हो रही है. नेतृत्वविहीन जनता और जनता से अलग-थलग पार्टी – यही ‘कगार अभियान’ का लक्ष्य है.
इन हमलों से निस्संदेह जनयुद्ध को भारी क्षति हुई है लेकिन हमारा दृढ़ विश्वास है कि भाकपा (माओवादी) और उसके नेतृत्व में पीएलजीए इस विनाश से उबर जाएंगे. क्योंकि इस पार्टी और सेना ने 50 वर्षों से वैचारिक और राजनीतिक युद्ध-रेखा – मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की लाल युद्ध-रेखा – को अडिग रखा है.
पिछले एक साल में पार्टी महासचिव कामरेड बसवराज और पीएलजीए कमांडर कामरेड हिडमा समेत लगभग 300 पार्टी सदस्य, कमांडर और लड़ाके शहीद हुए हैं. वहीं दूसरी ओर, पीएलजीए के अभियानों में 116 दुश्मन सैनिक और पुलिसकर्मी मारे गए हैं. शहीद साथियों के बलिदान और पीएलजीए द्वारा अपनाए गए संघर्ष के रास्ते ने कगार अभियान के विरुद्ध एक मज़बूत दीवार का काम किया है, साथ ही आत्मसमर्पण करने वालों की गलत मानसिकता पर भी प्रहार किया है.
संघर्ष का यह मार्ग एमएलएम द्वारा पोषित है और दुश्मन के सभी हमलों के विरुद्ध एक शक्तिशाली मारक के रूप में कार्य करता है. नुकसान अस्थायी हैं; जनयुद्ध की अंतिम विजय ऐतिहासिक रूप से निश्चित है.
भाकपा (माओवादी) के साथी जितना ज़्यादा एमएलएम में डटे रहेंगे और जनता के साथ गहराई से जुड़ेंगे, उतना ही ज़्यादा वे सही राजनीतिक और सैन्य रास्तों से इस आपदा पर विजय पाएंगे, खोई हुई ज़मीन वापस पाएंगे और विध्वंसकारियों के ख़िलाफ़ एक मज़बूत दीवार खड़ी करेंगे. हमें पूरा विश्वास है.
साथियों, पीएलजीए भारतीय साम्राज्यवाद और उसके घरेलू पिट्ठुओं – दलाल पूंजीपतियों और सामंती जमींदारों के खिलाफ सीपीआई (माओवादी) द्वारा नेतृत्व किए गए क्रांतिकारी संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण साधन है.
पीएलजीए का जन्म भारत की क्रांति के पथ से हुआ था – जनयुद्ध की युद्ध रेखाओं से; तथा इसका गठन और सुदृढ़ीकरण कामरेड चारु मजूमदार की क्रांतिकारी परंपरा की आग से हुआ था.
जब तक भारत में जनयुद्ध को ज़रूरी बनाने वाली परिस्थितियां – अत्यधिक आय असमानता, निर्मम शोषण, गरीबी, भुखमरी, वंचना और पिछड़ापन – बनी रहेंगी, पीएलजीए जीत की गारंटी बनी रहेगी. कोई भी ताकत इसे नष्ट नहीं कर सकती.
न तो कगार अभियान और न ही आंतरिक गद्दार भाकपा (माओवादी) और उसके पीएलजीए नेतृत्व को पराजित कर पाएंगे. अस्थायी सफलता का झूठा भरोसा किसी काम का नहीं होगा. भारत का प्रतिक्रियावादी शासक वर्ग पराजित होगा – जनयुद्ध विजयी होगा.
जैसा कि हम पीएलजीए की स्थापना की 25वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, हमारी जिम्मेदारी है कि हम कगार अभियान और देशद्रोहियों के हमलों के खिलाफ जनता के युद्ध में और अधिक मजबूती से खड़े हों तथा अपनी एकजुटता को गहरा करें.
भाकपा (माओवादी) ने पीएलजीए की 25वीं स्थापना वर्षगांठ मनाने के लिए 2 से 8 दिसंबर तक अभियान चलाया है. ‘आइये हम पार्टी, पीएलजीए, जन संगठनों और क्रांतिकारी आंदोलन को दुश्मन के युद्ध से बचाएं’ – आइए हम इस अभियान को अपनी जिम्मेदारी के रूप में लें.
इस ढांचे के तहत, आइए हम भारतीय जनयुद्ध के समर्थन में विभिन्न कार्रवाइयां करें, तथा कगार अभियान और परिसमापनवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष और एकजुटता को और मजबूत करें. इस जिम्मेदारी को पूरा करना हमारा अंतर्राष्ट्रीय कर्तव्य है. इसी कर्तव्य भावना के साथ, हम एक बार फिर पीएलजीए की स्थापना की 25वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. सीपीआई (माओवादी) और उसके नेतृत्व वाली पीएलजीए अमर रहे ! जनयुद्ध अमर रहे ! मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद अमर रहे ! सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयवाद अमर रहे !
- नवंबर 2025
टीकेपी/एमएल – तुर्की की कम्युनिस्ट पार्टी/मार्क्सवादी-लेनिनवादी
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