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Home कविताएं

हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 27, 2021
in कविताएं
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यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना ज़मीर होना ज़िंदगी के लिए शर्त बन जाए
आंख की पुतली में ‘हां’ के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है

हम तो देश को समझे थे घर–जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है
गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

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हम तो देश को समझे थे
आलिंगन–जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम–जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझे थे क़ुर्बानी–सी वफ़ा

लेकिन ’गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारख़ाना है
’गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे ख़तरा है

’गर देश का अमन ऐसा होता है
कि क़र्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख़्वाहों के मुंह पर थूकती रहे
क़ीमतों की बेशर्म हंसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से ख़तरा है

’गर देश की सुरक्षा ऐसी होती है
कि हर हड़ताल को कुचलकर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मरकर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक़्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
मेहनत, राजमहलों के दर पर बुहारी ही बनेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है.

  • अवतार सिंह ‘पाश’

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