जिन्होंने खेतों में पसीना बहाया,
लोहे को यंत्रों में ढाल
सभ्यता को गति दी,
पशु पालन से समाज को पोषित किया,
जिन हाथों ने चमड़े को चप्पल में ढाला,
कांटों भरी राहों को नरम बना गए
रेशम-कपास से वस्त्र बुनें,
सभ्यता को लज्जा और गरिमा दी
जिन्होंने नाव बनाई,
दूरियों को नज़दीकियों में बदला,
संस्कृति और व्यापार को जोड़ा —
वे श्रेष्ठ नहीं ?
पर वे —
जो पुरोहिती पाखंड के बाज़ार में
भाग्य बेचते हैं,
जो अंधविश्वासों की ज़ंजीरों से
ज़मीर को जकड़ते हैं,
जो स्वर्ग का झांसा देकर
धरती को नरक बना देते हैं,
वे, सिर्फ़ जातिमूलक पहचानों से —
श्रेष्ठ माने जाते हैं !
ये कैसी विडम्बना है
कि जिन्होंने सभ्यता रची —
वे नीचे गिने गए,
और जिन्होंने
संवेदना और वैज्ञानिकता की चिंगारी को
राख में दबा दिया —
वे बने मंदिरों के केंद्र.
यह समय है
पूछने का,
‘श्रेष्ठता’ का परिभाषा-पत्र
अब कौन लिखेगा ?
अब समय है
श्रम को प्रतिष्ठित करने का,
श्रमिकों को गरिमा लौटाने का.
क्योंकि जो हाथ
सभ्यता गढ़ते हैं —
उनसे बड़ा कोई श्रेष्ठ नहीं.
- एम. के. आजाद
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