Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

हां, जब मैं नेहरू से मिला…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 14, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
हां, जब मैं नेहरू से मिला...
हां, जब मैं नेहरू से मिला…
kanak tiwariकनक तिवारी

आज जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन है. नए भारत के निर्माता का जन्मदिन और जो आज मौजूदा निजाम की नफरत का सबसे बड़ा शिकार है. बहरहाल मैं नेहरू जी से कुल एक बार मिला. देखा तो कई बार लेकिन एक बार मिला भी. अक्टूबर 1961 में तब हो रहे अंतर विश्वविद्यालयीन यूथ फेस्टिवल में मैंने वाद विवाद (भाषण) में सागर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया था. उस अवसर का लाभ उठाकर थोड़ा समय मिल गया था, जब पंडित जी सभी छात्रों से मिलने बारी-बारी से आते थे

मैंने उनका एक इंटरव्यू लिया था. मैं वहीं प्रधानमंत्री के निवास के लान में लिया था. वह इंटरव्यू मैं पहले कभी पोस्ट कर चुका हूं. 27 म‌ई 1964 को पंडित जी चले गए. मैं बहुत पीड़ित हो गया था और मैं आपको बताऊं अखबारों में लिखना मैंने पहली बार शुरू किया 14 नवंबर 1965 से. जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन पर उनकी आत्मकथा की मैंने समीक्षा की थी. दोनों सबूत आप देख लीजिए.
यादें, जिस तरह अखबार के पन्ने फट गए हैं, उस तरह जीर्ण शीर्ण हो रही हैं.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

1961 में मैं उनसे पहली और आखिरी बार मिला. तालकटोरा मैदान नई दिल्ली में अंतर विश्वविद्यालयीन यूथ फेस्टिवल में वे ताजा गुलाब अपनी शेरवानी के बटन होल में खोंसे हमारी जवानियों को लजा रहे थे. हम सागर विश्वविद्यालय के कन्टिन्जेट में थे. डिकी वर्मा, सी. के. शर्मा, नरेन्द्र देव वर्मा, गुणवंत व्यास, कनक शाह, पांडे (कहीं पुलिस वुलिस में है), विष्णु पाठक, प्रोफेसर विजय चौहान और सबका लकड़दादा श्यामा मिश्रा और कोई पच्चीसेक लड़के लड़कियां तीन मूर्ति के लाॅन में अपने विश्वविद्यालय का इतिहास, झंडा तथा प्रतीक चिन्ह लिए बैठे हैं. देश के तीसेक विश्वविद्यालयों के लड़के लड़कियां आए हैं. उनसे हर साल चाय का कप लिए फोटो खिंचाते मिलना इसकी वार्षिक आदत है.

वह सधे कदमों से आ रहा है. हमारी बोलती बन्द हो रही है. कोई फुसफुसाता है, ‘हमें पहले मिला होता तो हम सागर विश्वविद्यालय से इसे अपने नाटक का हीरो बनाकर लाते.’ इसे अभी हमारे पास आने में वक्त है. अक्टूबर की शाम लाॅन पर गुनगुनी लग रही है. इसकी सीरत में भी शाम वाली गुनगुनाहट है, सुबह की खुनकी नहीं.

वह हमारे पास आ रहा है. सेक्रेटरी कलाई घड़ी देखकर कहता है, ‘दस पन्द्रह मिनट बाकी हैं, सर.’ सब विश्वविद्यालयों को इसने या उन्होंने जल्दी निपटा दिया है. भाग्य से बचा समय हमें मिल रहा है. हम अंगरेजी में अभिवादन करते हैं. अंतरराष्ट्रीय ख्याति के प्रोफेसर वेस्ट के नेतृत्व में प्रोफेसर एस. डी. मिश्रा के संरक्षण में हम अंगरेजी बोलते हैं. नाचने गाने वाले लड़के इसे अपने काम का नहीं समझ पीछे हटते जाते हैं. मैं अंगरेजी साहित्य का विद्यार्थी हूं. भाषण देने ही आया हूं. आगे बढ़ता हूं.

प्राध्यापकों से संक्षिप्त बातचीत के बाद वह स्नेहिल निगाहों से हमारी ओर देखता है. कैम्प की व्यवस्था पर सवाल कर चुका. यूथ फेस्टिवल को लेकर नये सुझाव मांग चुका. काफी देर मुस्करा चुका. बटन होल का गुलाब उससे मुकाबला कर ही रहा है. वह सागर विश्वविद्यालय की जानकारी ध्यान से लेता चलता है. हमारी पीढ़ी की ओर उत्सुक निगाहों से देख रहा है.

हम पूरे देश के छात्रों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं इन दस पन्द्रह मिनटों के लिए. आज मैं देश की युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर सकता हूं. मसखरों की टोली की इसकी अंगरेजी के सामने सिट्टी पिट्टी गुम है. अध्यापकों की ओर वह देख नहीं रहा. मौका अच्छा मिला है. नहीं चूकूंगा. मैं, मैं नहीं हूं, देश की युवा पीढ़ी हूं. थोड़ी धृष्टता का पुट लिए बिना कोई भी युवा पीढ़ी वास्तविक जिज्ञासु कहां प्रतीत होती है !

‘पंडित जी, बताइए, कृपालानी जी जीतेंगे या कृष्णमेनन ?’ अंगरेजी के बहुत देर से मन की पतीली में पकाए जा रहे वाक्य में खखारता हूं. बता देता हूं साइन्स काॅलेज यूनियन का प्रेसीडेन्ट हूं. प्रकटतः खुश होकर मुझे पास बुलाता है. मै एकदम करीब हूं. मुझे रूसी कथा सुनाता है –

‘एक राजा था. उसे रथदौड़ का अभूतपूर्व शौक था. उसके रथ में चार घोड़े जुतते थे. उसने सुन रखा था कि उसके घोड़ों से ज़्यादा अच्छे घोड़े ज़ार शासकों के पास और भी हैं. वह पूरे साम्राज्य के सबसे अच्छे धावक चार घोड़े चुनकर अपने रथ में जोतता है. वह शान से रथ पर चढ़कर घोड़ों को ऐड़ लगाता है. घोड़े रथ को लेकर सरपट भागते हैं.

‘वह रथ के ऐश्वर्य या नियति नहीं खुद अपनी गति पर रश्क करते हैं. वे अलग-अलग शासक वंशों के अश्व हैं. उनकी अलग-अलग गति है. वे नगर के बड़े चौराहे पर पहुंचते हैं. यहां से दर्शर्कों की दीर्घा शुरू होती है. वे चारों घोड़े चौराहे पर पहुंचकर अपने-अपने घरों की ओर दौड़ पड़ते हैं. यही उनका अब तक का अनुशासन था. यही उनकी गति की परिभाषा भी है. वह रथी चारों खाने चित्त गिर पड़ता है.’

वह कथा सूतजी की शैली में कह रहा था. हम सब शौनकादिक ऋषि हुए. हमें कृपालानीजी से सहानुभूति हो जाती है. उनके कपड़े झाड़ने लगते हैं. उनके लिए ‘फर्स्ट एड बाक्स‘ का इंतजाम करने निकल जाते हैं. वह निश्छल कश्मीरी हंसी हंसता है. मैं तय कर लेता हूं कि पढ़ाई खत्म कर इसी की पार्टी में रहूंगा. अपने भविष्य के चौराहों पर चारों खाने चित्त नहीं गिरना चाहता.

मैं वाचाल हूं. दूसरा सवाल दागता हूं. इन्हीं दिनों समाजवाद की कुछ अधकचरी जानकारी मेरे पास इकट्ठा हुई है. पूछता हूं – ‘आपके और डाॅ. लोहिया के समाजवाद में क्या फर्क है ?’ वह फक पड़ जाता है. ऐसे सवाल की उसे कल्पना नहीं थी. वह सीधा जवाब नहीं देता. इस कश्मीरी ब्राह्मण में रोमन बादशाहों की तुनकमिजाजी नाक पर बैठी मक्खी है. तल्ख होकर कहता है – ‘उन्हीं से पूछो.’ बात बिगड़ने-सी लगती है.

मैं उसकी ‘मेमोरी लेन’ में उतर जाता हूं. आखिरी तीर मारता हूं – ‘पंडितजी, आपके जीवन और उपलब्धियों पर कमला नेहरू का कितना असर है ?’ सवाल निशाने पर लगा है. वह कवि हो रहा है. अब मुझे पहचान लेता है. मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर दूसरा कंधे पर रख देता है. मेरे अस्तित्व का सर्वोत्कृष्ट क्षण है. वह संजीदा हो रहा, जैसे झील में डूब रहा. उसे अदृश्य में साफ-साफ कुछ दिखाई पड़ने लगा है.

बीस बरस के छोकरे ने नादानी में जुर्रत की है लेकिन सवाल पूछने के पीछे हेतु निष्कपट है. बेहद संजीदगी से नम आंखों में स्मित मुस्कराहट ओढ़ते बताता है, ‘कमला का मेरे जीवन में सर्वोत्तम स्थान है. मेरा बहुत कुछ कमला का ही है. तुम सोच नहीं सकते हो कि कमला ने मुझे क्या क्या दिया होगा.’ अचानक अपनी विश्व प्रसिद्ध मुद्रा में झेंप रहा है. मेरी ओर स्नेह और शरारत से देखता है. बेटी इन्दिरा आ गई हैं उसे ले जाने. कोई विदेशी अतिथि इंतज़ार कर रहा है.

अपनी वाचालता में भूल जाता हूं, अपनी ‘आत्मकथा‘ कमला नेहरू की स्मृति को ही समर्पित की है. कितनी काव्यात्मक वेदना से उसने मेरे सवाल से कोई छब्बीस बरस पहले ही लिख दिया था, ‘स्विटज़रलैंड में मेरी पत्नी की मृत्यु ने मेरे वजूद का एक अध्याय ही खत्म कर दिया, और मेरे जीवन से उसका बहुत बड़ा अंश ही छीन लिया जो अन्यथा मेरा अस्तित्व था. यह मेरे लिए मन को समझाना ही मुश्किल था कि वह अब नहीं है मेरा जीवन. मैं भारी भीड़, सघन गतिविधियों और एकाकीपन का पर्याय बनकर रह गया.’

मुझ तीसमारखां ने वह सवाल पूछ लिया जिसका जवाब देने में उसे बर्र के छत्ते पर हाथ रखने जैसा महसूस हुआ होगा. वह मेरी ओर अपलक सूनी आंखों से देख रहा. वातावरण में खामोशी है. इस घटना के तीन चार बरस पहले मैंने बिमल राय की फिल्म ‘देवदास’ देखी है. ‘मितवा नहीं आए’ वाला गीत तलत की आवाज़ में अंदर कहीं फूट रहा है. वह मुझे मौन में गाता हुआ दिखाई देता है.

मैं उसकी गम्भीरता में खो रहा हूं. उसकी दो ही तो मुद्राएं हैं. ट्रेजेडी के नायक सी और शिष्ट काॅमेडी की. वह मुस्करा देता है तो लोग लोटपोट हो पड़ते हैं. वह सहसा अपने ऊपर से किसी आत्मा के उतर जाने से मुक्त लगने लगता है. उसके चेहरे की मुस्कराहट लौटने लगती है. मैं उदास क्या मनहूस हो जाता हूं.

Read Also –

नेहरु का पत्नी प्रेम : ‘मैं उसे हद से ज्यादा चाहता था.’
नेहरू को सलीब पर टांग दिया है और गिद्ध उनका मांस नोच रहा है
नेशनल कीचड़ ब्रांड कमल
नेहरु द्वेष की कुंठा से पीड़ित ‘मारवाड़ी समाजवाद’ ने लोहिया को फासिस्ट तक पहुंचा दिया
सावरकर के युग में गांधी और नेहरू एक बार फिर लाज बचाने के काम आ रहे हैं
नेहरू के भारत में राजनीति के अपराधीकरण पर सिंगापुर की संसद में चर्चा
नेहरू को बदनाम करने की साजिश में यह सरकार हमें ‘इतिहास’ पढ़ा रही है
जवाहरलाल नेहरू : देश की अर्थव्यवस्था की बुनियाद रखने वाले बेजोड़ शिल्पी, एक लेखक के रूप में
भारत में नेहरू से टकराता फासीवादी आंदोलन और फासीवादी रुझान
नेहरू को सलीब पर टांग दिया है और गिद्ध उनका मांस नोच रहा है
नेहरू परिवार से नफरत क्यों करता है आरएसएस और मोदी ?

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

सदी का सबसे बेचैन कवि : मुक्तिबोध

Next Post

मुझसे अक्सर सवाल होता है कि मुसलमान के पक्ष में क्यों लिखते हो ?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

मुझसे अक्सर सवाल होता है कि मुसलमान के पक्ष में क्यों लिखते हो ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

राहुल गांधी के खिलाफ न्यूज़ चैनल्स पर झूठ और नफरतों का डिबेट

July 3, 2022

पूरी तरह से कोई नहीं लौटता घर

October 5, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.