Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home ब्लॉग

ऋषि सुनक की सनक में उन्मत ‘भारतीय मुनी’

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 27, 2022
in ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
ऋषि सुनक की सनक में उन्मत 'भारतीय मुनी'
ब्रिटिश ‘ऋषि’ और भारतीय ‘मुनी’

ब्रिटिश नागरिक ऋषि सुनक ब्रिटेन का प्रधानमंत्री क्या बना भारतीय मुनियों का गिरोह सनक गया है. बल्लियां उछल-उछल कर इस परिघटना का इस तरह ढ़ोल पीट रहा है मानो ब्रिटिश ‘ऋषि’ भारतीय ‘मुनी’ साथ मिलकर किसी काल्पनिक हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करने वाला है. इसके साथ ही ये भारतीय मुनी गिरोह इस बात पर भी उछल रहे हैं कि ‘जिस ब्रिटेन ने भारत को 200 साल तक गुलाम बनाकर रखा अब वह एक भारतीय ब्रिटेन को गुलाम बनायेगा !’ सवाल है, क्या सचमुच ऋषि सुनक ब्रिटेन को गुलाम बनाने जा रहा है ?

ऐसी ओछी सोच रखने वाले ये भारतीय मुनी अपनी नीचता की पराकाष्ठा तब पार कर जाता है जब भारत में ही बकायदा विवाहिता सोनिया गांधी को जब प्रधानमंत्री बनने की बारी आती है, तब ये भारतीय मुनी और उनकी मुन्नियां नंग-धरंग होकर सिर मुड़ाने और विधवा होने की ढ़ोंग करने लगता या लगती है. मर चुकी सुषमा स्वराज की यह निर्लज्ज ढ़ोंग सबने देखा है.

You might also like

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

भारत के सम्पूर्ण इतिहास के कुछ वर्षों को छोड़ दें तो तकरीबन तमाम वक्त यहां के बहुसंख्यक निवासी गुलामी की जिन्दगी व्यतीत करते आये हैं. खासकर आर्यों के हमले और उसके बाद रचित मनुस्मृति ने भारत की बहुसंख्यक आबादी को निकृष्ट दास से भी बदतर जीवन जीने को विवश कर दिया है. जिस कारण बड़ी तादाद में भारतीयों ने इस देश से पलायन किया है, जो आज भी जारी है. अथवा विदेशी शासकों ने जबरन काम करवाने के लिए गुलाम बना कर ढ़ो ले गये हैं.

‘भारतीय मूल’ आखिर कितना भारतीय ?

इन दोनों तरीकों से पलायित भारतीय आबादी ने जहां भी गये, खुद को वहीं पर पूरी तरह संयोजित कर लिये और उस देश के विकास में अपना भरसक योगदान दिये, जिस कारण कई जगहों पर वे उच्च पदों पर भी पहुंचे. इसी में अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस है तो इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री राम गुलाम और अब ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक है. अपने-अपने देशों में उच्च पदों पर पहुंचे ये तमाम लोगों पूरी तरह अपने देश की नीतियों के पक्षधर है,

अगर उनके देश की नीतियों के आड़े अगर भारत भी आयेगा तो वह उसे उसी समय खड़ी खड़ी सुना देगा, जैसा की कमला हैरिस मोदी के साथ कर चुकी है और उससे भी पहले भारतीय मूल के एक अमेरिकी वकील ने भारतीय दूतावास की एक महिला कर्मचारी को अमेरिकी श्रम कानून के उल्लंघन के अपराध में अमेरिकी थाने में रातभर बंद करवा चुके हैं, जिसको लेकर भारत में खूब शोर-शराबा हुआ था.

यही कारण है कि अगर भारतीय मूल के किसी व्यक्ति ने अपने देश में कोई उच्च पद हासिल कर लिया है तो यह उस देश के आन्तरिक सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान के कारण है, न कि वह कोई भारतीय है, इसके कारण. वह उतनी ही मजबूती से अपने देश की नीतियों पर अडिग रहेगा जितना उस देश का कोई मूलनिवासी होता.

‘भारतीय मूल’ का भारत में कितना सम्मान

विदेशों में बसे भारतीय मूल के किसी व्यक्ति के उच्च पद पर आसीन होते ही भारतीय मुनी बल्लियां उछलने लगते हैं. दरअसल यह गुलाम मानसिकता का परिचायक है. लेकिन वही उच्च पदस्थ भारतीय मूल के व्यक्ति अपने पुरखों की खोज में यहां आते हैं तब यही मुनी-महात्मा उसके जड़ों को ही मिटा डालते हैं. राम गुलाम के साथ घटी इस घटना ने भारतीय उल्लास के पीछे छिपी घृणा को बखूबी उजागर किया है.

दरअसल, मॉरिशस के प्रधानमंत्री राम गुलाम जब प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए तो भारतीय मुनियों ने खूब खुशियां मनाई. इससे भारत से गुलाम बनाकर ले जाये गये राम गुलाम के पुरखों के वास्तविक आवास की खोज भारत में शुरु की गई. पता चला कि वह बिहार के एक जिले के किसी गांव से संबंध रखते थे. भारत सरकार के बुलाहट पर जब राम गुलाम भारत आये और अपने पुरखों की जमीन पर जाने की कोशिश की तो उन्हें उनकी स्मृतियों से ही मिटा दिया गया और बरगला कर भगा दिया.

उनके पुरखे के गांव के लोगों को यह डर सताने लगा कि यदि वास्तव में उनको उनका अपना जमीन दिखा दिया जाये तो कहीं वह उस जमीन पर अपना दावा न कर दें, जिस जमीन पर आज से माफिया गिरोह या अन्य लोगों ने किसी यरह कब्जा कर रखा है. इसी डर के कारण राम गुलाम को उनका अपना जमीन देखने ही नहीं दिया गया. और फिर अंत में वह निराश होकर अपने देश वापस लौट गये. इसी के साथ फिर भारतीय मुनियों ने फिर कभी राम गुलाम को बुलाने का आमंत्रण भी नहीं दिया.

सोचिए, आज जिस ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने पर भारतीय मुनि बल्लियां उछल रहे हैं, अगर ऋषि सुनक ने अपने मूल स्थान के जमीन पर अपना दावा करने आ जाये तो यह सारी खुशियां एक क्षण में हवा हो जायेगी. दरअसल, गुलामों की इस प्रवृत्ति ने भारतीयों को दुनिया भर में हास्यास्पद बना दिया है.

सुनक बनाम मोदी, नागरिक बनाम हिन्दुत्व !

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी लिखते हैं  भारत के हिन्दुत्ववादी लोगों में इन दिनों ब्रिटेन का नशा चढ़ा हुआ है. अभी तक वे हिंदुत्व के नशे में थे, इन दिनों सुनक के नक़ली नशे में हैं. यह नशा पैदा किया है मीडिया के हिन्दुत्ववादी अबाध प्रवाह ने. यह सच है ब्रिटेन में सुनक ऋषि पीएम बनने वाले हैं, पर उनका भारत से कोई लेना देना नहीं है. इसके बावजूद हिन्दुत्ववादी गैंग उनके पीएम बनने को हिन्दूधर्म की विजय के रुप में देख रहा है.

सुनक की खूबी है उनका ब्रिटेन का नागरिक होना, न कि हिन्दू होना. वे इसलिए पीएम नहीं बनाए जा रहे क्योंकि वे हिन्दू हैं. हिन्दूधर्म उनकी व्यक्तिगत चीज है, यह उनकी पहचान का मूल नहीं है. उनकी पहचान ब्रिटेन की नागरिकता से बनी है लेकिन हिन्दुत्ववादियों को तो धर्म की पहचान के आगे नागरिक की पहचान नज़र नहीं आती. सुनक और उनके राजनीतिक दल ने कभी हिन्दूधर्म के नाम पर वोट नहीं मांगा. भारतवंशी के नाम पर वोट नहीं मांगा, वे हमेशा राजनीतिक कार्यक्रम के आधार पर चुनाव लड़ते रहे लेकिन हिन्दुत्ववादियों को इस सबसे कोई लेना-देना नहीं है.

हिन्दुत्ववादी एक फेक थ्योरी पर काम कर रहे हैं. थ्योरी यह है कि हिन्दू धर्म महान है. विश्व में वर्चस्व स्थापित करने की उसमें क्षमता है. जिसका इस थ्योरी का अनेक दंतकथाओं के ज़रिए वे आए दिन प्रचार करते रहते हैं. उनके सिद्धान्त प्रचार में एक सूत्र है ‘वसुधैव कुटुम्बकम.’ इस धारणा का वे खूब दोहन करते हैं जबकि वास्तविकता यह है हिन्दू धर्म भारत में किसी भी युग में सर्व-स्वीकृत धर्म नहीं रहा. हिन्दू धर्म में जितने भी विचार हैं वे सब लोकल यानी स्थानीयता से बंधे हैं. जाति और वर्णाश्रम व्यवस्था से बंधे हैं.

विश्व में वे तमाम देश जो लोकतंत्र, लोकतांत्रिक, संरचनाओं और लोकतांत्रिक मनुष्य के निर्माण में लगे हैं, वे कभी उन विचारों की ओर नहीं लौट सकते जिनकी धुरी असमानता है. हिन्दू धर्म व्यक्ति से व्यक्ति के बीच असमानता के आचरण पर टिका है, आज भी असमानता इसकी धुरी है. उसने समानता के नज़रिए का कभी समर्थन नहीं किया. समर्थन किया होता तो ब्रिटेन के शासकों को मनुस्मृति के स्थान पर भारतीय दण्ड संहिता लागू न करनी पड़ती.

आज भी आरएसएस के लोग कहते हैं – गर्व से कहो हम हिन्दू हैं. वे यह नहीं कहते कि गर्व से कहो हम नागरिक हैं. उनके यहां अनेक रुपों और स्तरों पर संविधान का प्रवेश वर्जित है और मनुस्मृति और धर्मशास्त्रीय मान्यताएं और धार्मिक रुढ़ियां जीवन में मुख्य संचालक हैं. संघ के लोग आज भी संविधान का पालन करने से डरते हैं और उससे दूर रहकर चलते हैं. उनको भय है कि कहीं संविधान का उन्होंने पालन किया तो हिन्दूधर्म ख़त्म न हो जाए इसलिए वे अहर्निश धर्मनिरपेक्षता पर हमले करते रहते हैं जबकि सुनक को धर्मनिरपेक्षता पसंद है.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि लोकतंत्र का धर्म के साथ अंतर्विरोध है. लोकतंत्र जब आता है तो वह ईश्वर और धर्म के स्थान पर मनुष्य को प्रतिष्ठित करता है. सारी दुनिया में ईसाईयत और राजा के वर्चस्व को लोकतंत्र ने ख़त्म किया. ब्रिटेन में भी ईसाईयत के वर्चस्व को लोकतंत्र ने ख़त्म किया, मनुष्य की शक्ति और नागरिकता की पहचान को प्रधान बनाया. भारत में भी जब संविधान बना तो धर्म को नहीं मनुष्य को प्रधान बनाया गया. मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की नई व्याख्या और नई समानता पर आधारित व्यवस्था पैदा हुई.

हमारे पुराने अधिकांश शास्त्रों में समानता की धारणा नहीं है. जहां है भी वहां वे वर्णाश्रम व्यवस्था को जीवन से अपदस्थ नहीं कर पाए. एकमात्र लोकतंत्र और मनुष्य की सत्ता ही है जो समानता का जयघोष करती है।धर्म कभी समानता का जयघोष नहीं करता. धर्म में तो निषेधों और असमानता और शोषण से लड़ने की क्षमता ही नहीं है. हिन्दू धर्म भेदों को मानता है और भेदों को पालता-पोसता है. यही वजह है कि राजा राजमोहन राय ने हिन्दू धर्म की तीखी आलोचना विकसित की और उसका प्रचार किया.

राजा राजमोहन राय आधुनिक भारत के जनक हैं. कोई हिन्दू नेता या आरएसएस का नेता आधुनिक भारत का जनक नहीं है. राजा राजमोहन राय ने हिन्दू धर्म को अस्वीकार करते हुए ब्रह्म समाज की स्थापना की. आधुनिक भारत में सबसे पहले आधुनिक मनुष्य और आधुनिक मूल्यों की ओर हम सबका ध्यान खींचा और हिंदू धर्म की तीखी आलोचना विकसित की.

राजा रामममोहन राय ने हिन्दू, इस्लाम और ईसाई तीनों ही धर्मों की अपने लेखन में तमाम बुरी चीजों की आलोचना विकसित की. धर्म की पहचान से देश की जनता को मुक्त करके मनुष्य की पहचान को प्रतिष्ठित किया. उस ज़माने के सनातन हिन्दू धर्म के मानने वालों के ख़िलाफ़ समझौताहीन वैचारिक-सामाजिक संघर्ष चलाया और आधुनिक भारत के निर्माण में केन्द्रीय भूमिका अदा की.

ब्रिटेन में सुनक के पीएम बनने से भारत में घी-दूध की नदियां बहने वाली नहीं हैं, न हीं ब्रिटेन में आर्थिक संकट दूर होने वाला है. सुनक के वित्तमंत्री रहते ब्रिटेन में आर्थिक संकट कम नहीं हुआ, अब वे प्रधानमंत्री बनेंगे तो कोई मूलगामी परिवर्तन वहां के समाज में आने की संभावनाएं नहीं हैं. बुनियादी बात यह है सुनक ऋषि एक राजनीतिक नेता हैं, वे हिन्दू नेता नहीं हैं. उनके पास लोकतंत्र की परंपराओं और मूल्यों की समृद्ध परंपरा है, जिसका हमारे हिन्दुत्ववादियों और उनके नायक पीएम नरेन्द्र मोदी में एक सिरे से अभाव है.

नरेन्द्र मोदी और सुनक में कई बुनियादी अंतर

नरेन्द्र मोदी और सुनक में कई बुनियादी अंतर हैं. पहला अंतर यह है कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद भी हिन्दू की पहचान से अपने को मुक्त नहीं कर पाए हैं, जबकि सुनक ने कभी हिन्दू पहचान के प्रतीकों को अपने राजनीतिक सार्वजनिक आचरण का अंग नहीं बनाया. वे अपने लोकतांत्रिक व्यक्ति की तरह पेश करते रहे.
लोकतांत्रिक व्यक्ति और हिन्दू व्यक्ति में जमीन-आसमान का अंतर होता है. हिन्दू व्यक्ति धर्म के बोझ को ढोता है, लोकतांत्रिक व्यक्ति धर्म से मुक्त स्वतंत्र नागरिक की भूमिका निभाता है.

दूसरा बड़ा अंतर यह है कि सुनक ने उन्मादी प्रचार नहीं किया, मोदी ने उन्मादी प्रचार किया. तीसरा अंतर यह है कि सुनक ने कभी ब्रिटेन के सरकारी धन का धार्मिक-पर्व महोत्सव पर अपव्यय नहीं किया, जबकि मोदी ने अरबों रुपए का सरकारी धन हिन्दू धर्म और उत्सवों पर खर्च किया. इसे धार्मिकता का प्रचार कहते हैं. सुनक के लिए जनता प्रमुख है मोदी के लिए संघ और उसका प्रौपेगैंडा प्रमुख है. सुनक ने कभी मीडिया सेंसरशिप की हिमायत नहीं की, मीडिया के दमन का समर्थन नहीं किया जबकि मोदी ने मीडिया का दमन किया, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले बोले.

सुनक के देश में यूएपीए जैसे क़ानून में न्यूनतम लोग बंद हैं जबकि भारत में विश्व के सबसे अधिक क़ैदी यूएपीए जैसे जनविरोधी-राष्ट्र विरोधी क़ानून के तहत मोदी शासन में बंद किए गए. भारत में तकरीबन साढ़े तेरह हज़ार से अधिक निर्दोष लोग बंद हैं.

सुनक ने कोरोना में पीरियड में हर नागरिक को सब्सीडी दी, मोदी ने किसी की आर्थिक मदद नहीं की क्योंकि हिन्दुत्व में जनता की मदद करना मुख्य नहीं है. मुख्य है – सत्ता हथियाना और दलाली खाना. सुनक को लोकतंत्र के लिए सांसदों की ख़रीद फ़रोख़्त और अपहरण, जोड़तोड़, होटलबाजी नहीं करनी पड़ी, पीएम मोदी आए दिन विधायकों-सांसदों की खरीद-फरोख्त, नेताओं की ख़रीद फ़रोख़्त करते रहते हैं.

मोदी चुनी हुई सरकारों को गिराते रहते हैं क्योंकि उन्हें लोकतंत्र और उसकी कार्यप्रणाली में विश्वास नहीं है. जबकि सुनक का लोकतंत्र में अटूट विश्वास है. सबसे बड़ी बात यह है सुनक बातूनी-भाषणबाज-असत्यवादी नहीं हैं. मोदी को भाषण और असत्यवाचन के अलावा कुछ नहीं आता. अहर्निश भाषण देना और असत्य बोलना उनके व्यक्तित्व का गुण है.

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

अनकही

Next Post

सीएसआर का पैसा आदिवासी इलाके से बाहर ले जाने के खिलाफ आन्दोलन

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

ब्लॉग

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

by ROHIT SHARMA
December 22, 2025
ब्लॉग

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

by ROHIT SHARMA
November 25, 2025
ब्लॉग

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

by ROHIT SHARMA
November 20, 2025
ब्लॉग

‘राजनीतिक रूप से पतित देशद्रोही सोनू और सतीश को हमारी पार्टी की लाइन की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है’ : सीपीआई-माओवादी

by ROHIT SHARMA
November 11, 2025
ब्लॉग

आख़िर स्तालिन के अपराध क्या था ?

by ROHIT SHARMA
November 6, 2025
Next Post

सीएसआर का पैसा आदिवासी इलाके से बाहर ले जाने के खिलाफ आन्दोलन

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

कोराना संकट : विश्व बाजार व्यवस्था पर विमर्श की खुलती खिड़कियां

April 21, 2020

ज्ञानियों की गति

February 3, 2023

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

March 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

March 7, 2026

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.