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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का इतिहास

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 24, 2018
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस उन आम औरतों की कहानी है जिन्होंने इतिहास की सृष्टि की थी. समाज में पुरूषों के साथ समान स्थान और भागीदारी पाने के लिए सदियों से स्त्रियां जो लड़ाई लड़ती आ रही थीं, उसी में इसकी जड़ें विद्यमान हैं. परिस्थितियों के प्रति विरोध की भावना को पैदा करने वाला तेजी से बढ़ता औद्योगीकरण और पूंंजीवादी आर्थिक विस्तारवाद के बीच 20 वींं सदी के प्रारंभ में पहली बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सृष्टि करने का विचार आया.

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस ऐसा एक अवसर है जब, अब तक हुए विकास को प्रतिबिंबित करता है. वह बदलाव को आवाज देता है. महिलाओं के हकोें के इतिहास में असामान्य भूमिका निभाने वाली सामान्य स्त्रियों का साहस और श्रद्धा को मनाने के लिए मनाया जाने वाला दिन है. खासकर, न्यूयार्क के लोयर ईस्टसाइड में प्रवासी बनकर आनेवाले पोशाक बनानेवाले श्रमिकोें की स्फूर्ति से स्त्रियों की लड़ाई को एक विशेष दिवस के रूप में मनाने की मांग उठी और इस तरह एक त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा.

अमेरिका में मजदूर स्त्रियों के मार्गदर्शन में छेड़ी गई लड़ाइयां

19वीं सदी की शुरूआत में न्यूयार्क के ‘पोशाक जिलों’ में हजारों औरतें काम करती थीं. इनमें से अधिकांश रूस, इटली, पोलैंड से प्रवासी बनकर आई थीं. ये हर रोज 15 घंटे काम करती थीं. उन्हें उनके द्वारा बनाये गये कपड़ों के हिसाब से वेतन मिलता था. सुइयां, धागे, बिजली के लिए और कुर्सियों की जगह वे जिन बक्सों का इस्तेमाल करती थीं, उनके लिए भी अपनी जेब से पैसे देने पड़ते थे. देर से आने पर, या काम खराब होने पर, गुसलखाने में ज्यादा देर रहने पर भी उन्हें जुर्माना चुकाना पड़ता था. बच्चे भी दुकान के कोनों में दुबककर बैठते थे और सिले हुए कपड़ों में लगे अनचाहे धागे काटने का काम करते थे. उन्हें भी कई घंटे काम करना पड़ता था. एक श्रमिक औरत ने अपनी पिछली जिंदगी को याद करके कहा, हम सस्ते कपड़े पहनती थीं, सस्ती झोंपड़ियों में रहती थीं, सस्ता खाना खाती थीं. आशा करने के लिए कुछ भी नहीं होता था. अगला दिन, यानी कल, आज से बेहतर होगा, इस बात की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी.

अमेरिका का श्रमिक आंदोलन पारंपरिक रूप से पुरूषों पर ही केन्द्रित था. थोड़ा ध्यान देने पर पता चल जाता है कि शुरू से ही महिलाएं, पुरूषों के द्वारा संगठित किये जाने को समर्थन देने में भी और जब यह पता चला है कि मौजूदा संगठनों में महिलाओं की आवश्यकताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है, तब सिर्फ महिलाओं से युक्त संगठन या महिला समूह बनाने में भी अपने जिम्मेदारी का हिस्सा और भार बखूबी उठाये हैं. पुरी तरह से महिलाओं के द्वारा किए गए हड़ताल 1820 के दशक में न्यू इंग्लैंड टेलरिंग ट्रेड्स में हुए थे.

शुरू के हड़तालों में से सबसे प्रसिद्ध थी मसाचुसेट्स के लोवेल कांटन मिल में हुई हड़ताल. यहां जवान औरतें तीन डॉलर प्रति सप्ताह के वेतन पर 81 घंटे काम करती थीं. उनमें से सवा डॉलर लोवेल कंपेनी बोर्डिग हाउस कें कमरे के लिए और खाने के लिए खर्च हो जाते थे. सामान्यमः कारखाने सुबह सात बजे सिर्फ पुरूषों के लिए खुलते थे. कंपनी ने देखा कि खाने के बाद औरतों का काम में तेेजी कम हो जाती थी और इसलिए उन्हें सुबह पांच बजे काम पर जाना होता था. नाश्ते के लिए सुबह 7 बजे आधा घंटा दिया जाता था. कई कटौतियों के बाद 1834 में लेवेल में काम करने वाली औरतें कंपनी छोड़कर बाहर आ गई. कई दिनों के बाद और भी कम वेतन पर उन्हें काम पर लौट जाना पड़ा. स्त्रियां साहसी थीं पर हुकूमत तो कंपनी का था. उन्हें असमर्थ कहकर अनुशासनहीनता की शिकायत किए जाने पर उन्हें नौकरी से बरखास्त भी किया जा सकता था –

हाथ मुझ जैसी सुंदर युवती को
सूखकर मर जाने के लिए
कारखाने में भेजना कितने दुख की बात है…

इस तरह शहर की गलियों में गाती-फिरती वे बाहर आ गई.

कुछ ही दिनों में वे पफर से काम पर लौटीं. 1844 में उन्होंने एकजुट होने का पक्का इरादा कर लिया और लोवेल श्रमिक महिला संशोधन संघ स्थापित कर लिया. उनकी सबसे बड़ी मांग थी, 10 घंटे काम करना. कपड़े के उद्योग की परिस्थितियों में पहली बार संशोधन के कदम उठाने का श्रेय इसी नेतृत्व को और यूनियन को जाता है.

कपड़े और पोशाक बनाने के कारखानों में काम करने वाली औरतें 8, मार्च 1857 को न्यूयार्क शहर में विरोध करने निकल पड़ीं. काम करने के हालातों की बेहतरी, हर रोज सिर्फ दस घंटे काम करने, और स्त्रियों के लिए समान अधिकारों की मांग करते हुए पोशाक बनाने वाली मजदूर औरतों ने मोर्चा निकालते हुए करते हुए पिकेटिंग की. जिन अत्यंत निकृष्ट परिस्थितियों में वे काम करती थीं, उनके खिलाफ और वेतन कम पाने के खिलाफ वे उठ खड़ी हुई. आंदोलनकारियों पर हमले हुए. पुलिस ने उनकी कतारों को तोड़कर उन्हें भगा दिया. दो साल बाद इन्हीं औरतों ने उसी मार्च महीने में अपना पहला लेबर यूनियन स्थापित किया. उसके बाद के सालों में 8 मार्च को और भी असम्मति-प्रदर्शन किए गए.

51 साल बाद 8 मार्च, 1908 केे दिन न्यूयार्क में दर्जी का व्यापार करने वाली बहनों ने फिर एक बार 1857 की मोर्चा को याद दिलाते हुए वोट डालने के अधिकार की मांग करते हुए, ‘स्वेट शाॅपों’ (अत्यंत घिनौनी परिस्थितियों में बहुत ही कम वेतन पर काम करने की एक जगह), बच्चों से श्रम कराने को खत्म करने की मांग करते हुए मोर्चा निकाली. उस समय भी पुलिस उनके साथ थी.

1908 में स्त्रियों ने विभिन्न सिलाई के कारखानों में काम बंद करना, हड़ताल करना आदि शुरू किया. 1908 मेंं 15,000 आरतों ने कम घंटों का काम, बेहतर तनख्वाह, वोेट का अधिकार मांगते हुए न्यूयार्क शहर में से मोर्चा निकाली थी. कभी-कभी कोई कंपनी पुरूष हड़तालियों की मांगों में से कुछ के प्रति सम्मति प्रकट करके हड़ताल को खत्म करवाती थी. पर, “इस समझौते के किसी भी भाग महिलाओं के लिए लागू नहीं होगी” की शर्त उस समझौते के साथ जोड़ देती थी. कई औरतों को हिरासत मे ले लिया जाता था, उन्हें भारी जुर्माने भरने पड़ते थे, पुलिस और गुंडों के हाथ बेरहमी से पिटना पड़ता था. इसके बावजूद अधिकतर किशोरावस्था की लड़कियों से युक्त उस स्त्री-समूह ने काम का बहिष्कार किया, उसे जारी रखा. हड़तालियों से स्फूर्ती पाने वाली मध्यमवर्गीय तथा उच्चवर्गीय औरतों ने अपना संघीभाव प्रकट करने के लिए पिकेटों के पास आकर उनमें भाग लिया और कैद कर ली गई. इन असाधरण गिरफ्तारियों के बारे में अखबारों में लिखे जाने से लोगों को उन औरतों के क्रूर हालातों और गुलामों जैसे वेतनों के बारे में मालूम होने लगा.

पोशाक बनाने वाले श्रमिक अमेरिका के इतिहास के कुछ अत्यंत प्रसिद्ध यूनियनों की व्यवस्था की. उनमें से 1900 में स्थापित अन्तरराष्ट्रीय महिला-पोशाक-श्रमिकों का यूनियन उल्लेखनीय है. न्यूयार्क जैसे बड़े शहरों में पोशाक बेचने वाली दुकानों की परिस्थिति अत्यंत दयनीय थी. अक्सर आग लग जाती थी, रोशनी कम रहती थी, मशीनों की आवाज इतनी ऊंची कि कान फट जाते थे, वातावरण में प्रदूषण की भरमार थी. बात करना, हंसना, गाना मना था. ऐसा करने से औरतों को जुर्माना भरना पड़ता था. इसी तरह कपड़ों पर मशीन के तेल के धब्बे लग जाने से, सिलाई ज्यादा बड़ी या छोटी होने से, ऐसी कई बातों के लिए उन्हें जुर्माना भरना पड़ता था. हमेशा ओवर टाईम काम करना पड़ता था, पर उसके लिए अतिरिक्त पैसे नहीं दिए जाते थे. श्रमिक स्त्रियों की लड़ाई का समर्थन करने वाली मध्यम वर्ग की और बुद्धिजीवी वर्ग की स्त्रियों के सहयोग से 1903 में बने नेशनल विमेन्स ट्रेड यूनियन लीग का समर्थन पाकर, ‘शर्ट वेइस्ट’ (कोट के अन्दर पहना जाता है) बनाने वाले न्यूयार्क के ही बड़ी मजदूर दुकानों में से दो लीसरसन एंड कंपनी तथा कुख्यात कंपनी-ट्रयांगिल वेइस्ट कंपनी-के खिलाफ हड़तालों एक दौर और शुरू कर दिया गया था.

कुछ महीनों तक छोटी दुकानों की कार्रवाई करने के बाद सार्वत्रिक हड़ताल की घोषणा करके इस लड़ाई को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने का उन औरतों ने निर्णय लिया. यूनियन के अधिकारियों का तिरस्कार करके 22 नवम्बर, 1909 को “अपराइजिंग आॅफ टवेंटी थउजेंड” (20 हजार लोगों का विद्रोह) शुरू हुआ. लम्बा और कठिन लड़ाई को ज्यादा दिन नहीं चल सकेंगी-इस तरह की बकवास को झूठा सबित करते हुए उस लड़ाई ने औरतों द्वारा की गई एक दीर्घकालीन हड़ताल का रूप ले लिया.

ट्रयांगिल शर्ट-वेइस्ट कंपनी से आई एक पोशाक बनाने वाली मजदूर औरत ने उस घटना का इस प्रकार वर्णन किया-“सब तरफ से हजारों की तादाद में लोग कारखाने छोड़कर आने लगे. वे सब यूनियन स्कवेयर की ओर चल पड़े. नवम्बर का महीना था, बहुत ठंड पड़ रही थी. हमारे पास गरम फरकोट (लोम चर्म के कोर्ट) नहीं थे. फिर भी हवा से और ठंड से बचकर थोड़ी-सी गरमी पाने के लिए कोई प्रोग्राम (हाॅल) मिलने तक उत्साह ने हमें चलते रहने की ताकत दी. आगे क्या होने वाले हैंं, इस बात की किसी को परवाह नहीं थी, बस हजारों युवा, उनमें से अधिकांश स्त्रियां, चले आ रहे थे. मैंने यह दृश्य देखा तो लगा कि एक शक्ति, जीतने वाले के अन्दर की एक प्रकार की शक्ति, उन्हें चला रही थी. उन्हें नहीं मालुम था कि उनका इंतजार करने चीचइ कैसी है, क्या है. भूख, ठंड, अकेलापन अपना भविष्य इन सबके बारे में वे सचमुच नहीं सोच रही थीं. उस खास दिन वे किसी भी बात की परवाह नहीं कर रही थीं. वह उनका दिन था.

13 हफ्तों तक, बर्फ की तरह ठंड़े मौसम में, 16 और 25 साल के बीच की उम्र वाली औरतों ने हर रोज पिकेटिंग की. हर रोज पुलिस की लाठियां खाई. उन्हें ‘ब्लैक मरिया’ पुलिस गाड़ियों में बिठाकर ले जाया जाता था. अदालतें भी ‘स्वेट-शांप’ के मालिकों के पक्ष में थीं. हड़ताल करने वाली औरतों से एक मजिस्ट्रेट ने कहा था, “भगवान और प्रकृति के खिलाफ तुम इस हड़ताल में भाग ले रही हो. पूरूष अपने माथे के पसीने से अपनी रोटी कमाए, यही भगवान का न्यायसूत्र है. तुम उसके खिलाफ हड़ताल में भाग ले रही हो.” अमेरिका के मजदूर इतिहास के चलन को अन्य यूरोप निवासियों के साथ ध्यान से देखने वाले जार्ज बेर्नाई शा को एक केबलग्राम देने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने उसमें लिखा, “अच्छी बात है. मध्ययुगीन अमेरिका हमेशा भगवान में घनिष्ठ व्यक्तिगत विश्वास रखता था.

कैद किए गए हड़तालियों की जमानत के लिए जरूरी पैसों का और हड़ताल-निधि के लिए जरूरी पैसों का, महिला ट्रेड यूनियन ने इंतजाम कर दिया.

एक-एक करके सारी दुकानें समझौता कर बैठीं, तो हड़ताल टूट गई. फिर भी स्त्रियों की निपुणता और सहनशक्ति ने यह दिखा दिया कि मजदूर संघ सिर्फ पुरूषों के लिए ही नहीं होते. हड़ताल महीनों चली. दूसरी जगहों पर हड़ताल की ज्वालाएं लगाई. काम की परिस्थितियों को बदलने में तो हड़ताल एक हद तक ही कामयाब हुई थी, पर ‘विद्रोह’ ने कुछ खास चीजों को बदलकर रख दिया. अनपढ़ प्रवासी महिलाएं कुछ भी नहीं कर सकेंगी, इस धारणा को इसने ललकारा. वह ईस्ट साइड में, बहुत सारी महिलाओं में, प्रवासी बनकर आए लोगों में, शोषण के शिकार विस्तृत जन समूहों में आत्मसम्मान और शक्ति को जगाने में कामयाब हुई.

25 मार्च, 1911 को कुख्यात (इनफेमस) ट्रयांगिल आग-दुर्घटना

हड़ताल टूटने के एक साल बाद 25 मार्च, 1911 को कुख्यात (इनफेमस) ट्रयांगिल आग-दुर्घटना हुई. ऊपरी मंजिलों पर काम करती औरतों को घेरने वाली लपटों में 146 स्त्रियां जलकर शख हो गई. (मजदुरों के कर्तव्यों का बहिष्कार रोकने के लिए आपातकलीन द्वारों पर ताले लगा दिए गए थे) उनमें से कई 13-25 उम्र की थीं. अमेरिका में नई आई थीं. मरने का कारण सुरक्षा के प्रमाणों की कमी बताया गया था. अमेरिका के श्रम कानूनों पर इस घटना का विशेष प्रभाव रहा. इस विनाश की सृष्टि करनेवाली परिस्थितियों के बारे में बाद के अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवसों में सवाल उठते रहे.

कारखाना के मालिकोंं पर मुकदमा चलाया गया. एक को 20 डॉलर का जुर्माना लगाया गया. हर एक मरी हुई औरत के परिवार को 75 डॉलर देने का समझौता किया गया. इस तरह के हादसों को संभव बनाने वाले कानून का और व्यवस्था का समर्थन करने की बात को लेकर पोशाक बनाने वाले श्रमिकों की आयोजक रोज स्क्रीइरमैन ने समाज को कोसा. “मुझे खुद के अनुभव से यह मालूम है कि काम करने वालों को अपनी रक्षा खुद करनी पड़ती है. ताकतवर श्रमिक आंदोलन ही एक ऐसा मार्ग है जिसके द्वारा वे अपनी रक्षा कर सकेंगे”, उन्होंने अपना मत प्रकट किया.

अमेरिका की श्रमिक स्त्रियों की गाथाओं को अक्सर, मदर जोन्स, एल्ला रीव ब्लूएर, केट मुल्लानी, सोजोर्नर ट्रूथ, एलिजबेत गर्ली फ्लिन जैसी महान आंदोलनकारी वीर नारियों के नाम से जाना रहा है. ये विशिष्ट महिलाएं हैंं और इनकी कहानियां भी उतनी ही विशिष्ट हैं. पर ये स्वतंत्र स्त्रियांं थीं. संगठन बनाना, लड़ना, जीतना, हारना, ये सब काम करने वाली उन अनाम औरतों के नाम हम कभी नहीं जान सकेंगे, इस बात को कभी हमें नहीं भूलना चाहिए. वे ऐसी महिलाएं थीं जिन्होंने यह जाना कि अगर हमें नष्ट नहीं होना है तो खड़े रहकर, साथ मिलकर, योजनाएं बनानी हैं. “स्त्रियों का जगह” नामक हास्यास्पद सिद्धांतों को शर्म से झुक जाने के लिए मजबूर किया था उन औरतों ने. सिर्फ जिन्दगी चलाने के लिए ही नहीं, सम्मान से जीने क लिए जरूरी मांगों के उदाहरण के रूप में मजदूर लाॅरेन्स टेक्सटाइल की हड़ताल में, ‘‘हमें रोटी भी चाहिए और गुलाब के फूल भी’’-इन शब्दों कार्डों पर लिखकर जुलूस निकालने वाली औरतें थी. वे इस दृष्टि से जेम्स ओप्पेनहीम का गाना, ‘‘ब्रेड एंड रोजेस’’ को प्रेरणा देने वाली भी ये ही औरतें थीं.

‘‘खूबसूरत दिन था हम आई थी कवायद करती हुई
सैकड़ों अंधेरे रसोईघर, शख के रंग की ऊंची उठी हजारों चक्कियां
अचानक एक सूरज के तेज से स्पंदित हो गए
हमारे गाने को सुनने वालों के लिए ब्रेड एंड रोजेस, बे्रड एंड रोजेस
हम कवायद करते हुए आएंगी महत्वपूर्ण दिन साथ लाएंगी
महिलाओं का ऊपर उठना है जाति का ऊपर उठना
आगे से न रहेगा बेगार न रहेगा कोई बेकार-
एक आराम करे दस काम करे-यह भी न होगा मुमकिन
जीवन की प्रभुता को बांटा जाएगा, ब्रेड एंड रोजेस, बे्रड एंड रोजेस”

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मोर्चा निकालने वाले अक्सर हड़तालियों के ‘ब्रेड एंड रोजेस’ गीत को गाते थे.

अमेरिका में महिला दिवस का प्रारंभ

अधिकारिक छुट्टी का दिन 1908 में धीरे-से शुरू हुआ था. उस साल अमेरिका में वोट डालने के हक के प्रचार के लिए समाजवादी पार्टी ने एक राष्ट्रीय महिला कमेटी नियुक्त की. सभा के बाद, हर समाजवादी पार्टी ने साल के किसी एक दिन को स्त्रियों के वोट-हक के प्रचार के लिए नियत करने की सिफारिश की. समाजवादियों के लिए यह एक बहुत बड़ा कदम था. वोट के हक के लिए लड़ने वाली स्त्रियों ने इसका स्वागत किया.

28 फरवरी, 1909 को पूरे अमेरिका में पहला महिला दिवस मनाया गया था. औरतों के वोट-हक के लिए, राजनीतिक तथा आर्थिक हकों की मांग करते हुए बड़े-बड़े जुलूस निकाले गए (उन दिनों में सिर्फ पुरूषों को ही मतदान का अधिकार था). 1909 में मेनहट्टन में हुई महिला-दिवस की रैली (जमघट ) में दो हजार लोग आए. 1913 से औरतें उस महीने की आखिरी रविवार को महिला-दिवस के रूप में मनाने लगीं.

1910 में समाजवादियों और नारीवादियों ने महिला-दिवस को पूरे अमेरिका में मनाया. मई, 1910 में आयोजित समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कांग्रेस में फरवरी महीने की आखिरी रविवार को महिला-दिवस के रूप में पहचान देने की सिफारिश महिला राष्ट्रीय कमेटी के द्वारा की गई थी. उसके बाद, महिला-दिवस को अन्तरराष्ट्रीय घटना के रूप में घोषित करने के उद्देश्य से, उसी साल कोपेनहैगन में आयोजित दूसरे समाजवादी महिला अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रतिनिधि बनकर औरते गई.

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की घोषणा, उस घटना के उद्घाटन समारोह

अमेरीकी स्त्री श्रमिक, उनकी समाजवादी बहनों की कार्रवाईयों से प्रेरणा पाने वाली जर्मनी की सुप्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात क्लारा जेट्किन ने पहले से एक योजना बना ली थी कि हर साल एक निश्चित दिन को, दुनिया के सभी देशों की औरतें, अपनी मांगों पर जोर देने के लिए जुड जाएंगी. इस प्रस्ताव को जेट्किन श्रमिक स्त्रियों के दूसरे अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में पेश करना चाहती थी. अन्तरराष्ट्रीय लक्षणों से युक्त, महिलाओं के अधिकारों को सम्मान देने की दृष्टि से, दुनिया भर की औरतों को वोट देने का अधिकार दिलाने में मदद करने के लिए, 1910 में कोपेनहैगन में हुए सम्मेलन में एक महिला-दिवस स्थापित किया. उस दिन अमरीकी आन्दोलनों को याद करते हुए दुनिया भर की श्रमिक स्त्रियों का सम्मान किया जाएगा. इससे जुड़ी अन्य ऐतिहासिक घटनाओं के साथ 146 स्त्रियों के प्राण लेने वाली (न्यूयार्क, 1911) की दुर्घटना को भी याद किया जायेगा.

शुरू से ही अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस कम्युनिस्टों की क्रान्ति से जुड़ा था. दूसरे इंटरनेशनल की औरतों की कोशिश की उपज ही है अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस. जेट्किन और दूसरी औरतों ने अपनी दृष्टिकोण का अंतरराष्ट्रीय स्वभाव को उजागर किया और उन्होंने यह आवाज दी, ‘‘समस्त देशों की समाजवादी महिलाओं, हर साल एक महिला दिवस मनाइएं’’. उन्होंने यह घोषणा भी की, ‘‘महिला दिवस को एक अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि निहित होना चाहिए.’’ सम्मेलन ने यह निर्णय लिया कि ‘‘हर साल, औरतों को वोट देने का अधिकार होना ‘समाजवाद के लिए की जाने वाली लड़ाई में हम सब की ताकत को एकताबद्ध करेगी’, इस नारे के साथ, हर देश में औरतें एक ही दिन ‘महिला दिवस’ मनाएंगी. श्रमिक महिलाओं को वोट का अधिकार देने के लिए संघर्ष के एक रूप के तहत् हर देश में एक महिला दिवस मनाने का निर्णय लिया गया है. यह दिन ऐसा हो कि साझे लक्ष्यों के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई में अंतर्राष्ट्रीय एकता से युक्त दिवस हो और समाजवाद के झंडे के नीचे स्त्री श्रमिकों को संघठित करने वाली ताकत की समीक्षा करने वाला दिन हो.

यूनियनों में, समाजवादी पार्टियों में और श्रमिक स्त्रियों के क्लबों में प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त महिलाओं ने, फिनलैंड के संसद के लिए पहली बार चुनी गई तीन औरतों, और 17 देशों से आई 100 महिलाओं ने जेट्किन के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार किया. इसके फलस्वरूप ही अंतरर्राष्ट्रीय महिला दिवस बना. (कुछ दिनों बाद, अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में इसको फिर से सबकी सहमति प्राप्त हुई. इस परंपरा की स्थापना के पक्ष में वोट देने वालों में बोल्शेविक पार्टी और रूस की क्रांति में भाग लेने वाले महान नायक वी. आई. लेनिन भी थे) तब से दुनिया भर में वर्ग चेतना से भरे श्रमिक, स्त्री-मुक्ति के लिए लड़ने वाले तथा समूची मानव जाति की विमुक्ति के लिए लड़ने वाले इसे मनाते आ रहे हैं.

महिलाओं के वोट डालने के अधिकार के बारे में उस सम्मेलन में फिर से जोर देकर कहा गया था. संपत्ति के अधिकारों पर निर्भर चुनाव-व्यवस्था से अपने आप को उसने अलग कर लिया. सार्वत्रिक वोट-हक के लिए व्यस्क औरतों और मर्दों के वोट के हक के लिए आवाज उठाई गई. वोट-हक के आंदोलन में तत्परता से निमग्न, ‘विमेन्स फ्रीडम लीग’ नामक अंगे्रजी समूह की मिसेस डेसपार्ड ने इस निर्णय पर अपनी असहमति प्रकट की.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को मनाने के लिए इस सम्मेलन में किसी खास तारीख को नहीं चुना गया था. 1913 तक उसे दुनिया के अलग-अलग देशों में विभिन्न तारीखों पर मनाया गया था. अमरिका में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस फरवरी में मनाया जाता था. अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर यह दिवस औरतों के वोट-हक से जुड़े आन्दोलनों को महत्व देने के लिए मौका देता रहा.

1911 से 1915 सामाजवादियों की मदद से कई यूरोपीय शहरों में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस, स्त्रियों के परेडों और जुलूसों के रूप में मनाया जाता रहा. पहली मई के श्रमिक दिवस के ही बराबर यह दिन भी मनाया गया था. पहले अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के उत्सव का वर्णन अलेंग्जाड्रा कोल्लमताय ने इस प्रकार किया, ‘‘समाजवादी महिलाओं के दूसरे सम्मेलन में लिया गया निर्णय सिर्फ कागज पर लिखा हुआ निर्णय नहीं रहा. 19 मार्च, 1911 को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का निर्णय लिया गया था.’’

तारीख को यूं ही नहीं चुना गया था. जर्मनी के श्रमिकों के साथ उस तारीख का ऐतिहासिक महत्व जुड़ा था इसलिए जर्मनी के कामरेडों ने वह तारीख चुनी थी. 1848 की क्रान्ति में, 19 मार्च को हथियारबंद जनता की ताकत को पहली बार पहचानने वाला प्रशिया का राजा श्रमिक वर्ग की बगावत के डर से पहले ही घुटने टेक चुका था. उन्होंने कई वादे किए पर जिन्हें वह निभा न सका. उन वादों में औरतों को वोट डालने का हक दिलाने का वादा भी एक था.

11 जनवरी के बाद महिला दिवस मनाने के लिए जर्मनी और आस्ट्रिया देशों में कोशिशें हुई. एक जुलूस के लिए जो योजना बनाई गई थी, उसके बारे में मौखिक रूप से और अखबारों के माध्यम से जानकारी दी गयी थी. महिला दिवस के एक हफ्ते पहले दो पत्रिकाओं में ‘‘जर्मनी में औरतों को वोट’’ और ‘‘आस्ट्रिया में महिला दिवस’’ के बारे में खबरें छपी. महिला दिवस के लिए उनके आलेख समर्पित किए गए. उनमें से कुछ थे, ‘‘महिलाएं और संसद’’, ‘‘श्रमिक स्त्रियां और नगरपालिका के कार्य’’, ‘‘गृहिणी राजनीति-क्षेत्र में क्या करेगी ?’’ आदि लेखों में सरकारी क्षेत्र में और समाज में औरतों को समानता दिए जाने की समस्या के बारे में विस्तार से विश्लेषण किया गया थ. सभी आलेखों में एक ही बात पर जोर दिया गया था, कि “औरतों को वोट का अधिकार देकर संसद को और भी जनवादी बनाना बिल्कुल जरूरी है”.

1911 में पहला अन्तरराष्ट्रीय दिवस मनाया गया था. उसकी विजय ने सारे आशय पूरे कर दिए. श्रमिक महिला दिवस के दिन जर्मनी और आस्ट्रिया उबलते कांपते महिला-सागर बन गए. छोटेे शहरों में, आखिर गांवों के हाॅल ही इस तरह खचाखच भर गए थे कि महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों पर बैठे पुरूष श्रमिकों को उठने के लिए कहना पड़ा.

श्रमिक स्त्रियों की मिलिटेन्सी (युद्ध संलन्ता) को दिखाने वाल यह पहला समारोह था. एक खास बदलाव के लिए अब तक घर में बंदी बनी बैठी औरतें समारोहों में जाने लगी और पुरूष घर में बच्चों की देखभाल करते बैठे रहे. 30,000 स्त्रियों के द्वारा किये गये अत्यंत भारी सड़क-प्रदर्शन में, लोगों ने जो बैनर लगाए थे, उन्हें हटाने का पुलिस ने निश्चय किया. श्रमिक औरतें बैनरों की रक्षा में डटकर खड़ी रहीं. संसद के समाजवादी सदस्यों की मदद से ही बाद में हुए दंगे में रक्त-पात को रोका जा सका था. 1913 में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की तारीख बदलकर 8 मार्च हो गई वह दिन श्रमिक स्त्रियों का ‘मिलिटेन्सी दिवस’ बनकर रह गया.’

19 मार्च 1911 में आस्ट्रिया, डेन्मार्क, जर्मनी, स्विट्जरलैंड और अन्य यूरोपीय देशों में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया था उसमें भाग लेने के लिए दस लाख से भी अधिक स्त्री-पुरूष चले आए. उसी दिन समाजवादियों ने धरने और कवायदों के साथ-साथ उन्होंने काम करने का अधिकार, वृत्ति-शिक्षण (वोकेशनल ट्रेनिंग) के लिए और नौकरी में भेदभाव आदि को खत्म करने की मांग की.

19 मार्च, 1911 को जर्मनी में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस क्लारा जेट्किन की देखरेख में मनाया गया था. इस दिन से पहले 1911 में पूरे जर्मनी में वोट-हक पर कार्रवाई करने की मांग करते हुए दस लाख पर्चा बांटी गई.

रुस में श्रमिक स्त्रियों के दिवस का वर्णन कोल्लंताय ने निम्नलिखित शब्दों में किया- “रुसी श्रमिक महिलाएं 1913 में ‘महिला-श्रमिक विकास दिवस’ में पहली बार शरीक हुई. जारिजम जब श्रमिकों को और किसानों को फौलदी मुट्ठी में दबोचे हुए था, उस वक्त यह विरोध प्रकट किया गया था. सार्वजनिक प्रदर्शनों के द्वारा, ‘श्रमिक-महिला दिवस’ मनाने की सोच भी असंभव थी. पर संगठित श्रमिक स्त्रियां अपने अन्तरराष्ट्रीय दिवस को एक पहचान देने में सफल हुई.

श्रमिक वर्ग की खुली पत्रिकाओं-बोल्शेविकों की ‘प्रव्दा’ मेन्शेविकों का ‘लूच’, दोेनों में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस से संबंधित आलेख प्रकाशित हुए. इनमें विशेष आलेख, श्रमिक महिला आन्दोलन में भाग लेने वाले कुछ लोगों के चित्र, बेबेल तथा जेट्किन जैसे कामरेडों की शुभकामनाएं आदि प्रकाशित किए गए थे.

उन दुर्भर सालों में सभाओं का निषेध किया गया था. पर पेत्रोग्राड के कलहैकोव्स्की एक्सचेंज के पास पार्टी से जुड़ी श्रमिक स्त्रियों ने महिलाओं की समस्याओं’ पर एक सार्वजनिक मंच का आयोजन किया था. पांच कोपेक देकर उसमें प्रवेश पाया जा सकता था. यह गैरकानूनी समावेश था, फिर भी हाॅल लोगों से खचाखच भर गई. पार्टी के सदस्यों ने भाषण दिए. पर, इन कार्रवाईयों को देखकर पुलिस जगरूक हो गई. भाषणकर्ताओं को कैद कर लिया गया था, जिससे यह ‘गोपनीय सभा’ खत्म हो गया था.

जार के नियंत्रण के अधीन जीने वाली रूसी महिलाएं अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के कार्रवाईयों से किसी तरह पहचान पाना, उसके साथ चलना, दुनिया के श्रमिकों के लिए एक महान पहचान पाने के बराबर है. रूस का जागना, जार के शासन में जेल और सूलियां, श्रमिकों की लड़ाई और प्रतिरोध की स्फूर्ती को खत्म करने की शक्ति से रहित थीं. यह एक स्वागत करने योग्य पहचान बनी.

1914 में ‘महिला श्रमिक दिवस’ को रूस में और भी अच्छी तरह मनाया गया था. श्रमिक-वर्ग के दोनों अखबार इस दिवस के उत्सवों से जुड़े थे. ‘श्रमिक महिला दिवस’ के इंतजामों के लिए हमारे कामरेडों ने बहुत प्रयास किया. पुलिस की दखल की वजब से वे उस प्रदर्शन का आयोजन नहीं कर पाए. ‘श्रमिक महिला दिवस’ के आयोजन में लगे लोगों को जार की सरकार ने जेल में डाल दिया. उसके बाद कई लोगों को भरे उत्तरी प्रांत में भेेज दिया गया था. ‘श्रमिक महिलाओं के लिए वोट का अधिकार’, यह नारा जार के शासन की निरंकुशता को नष्ट करने के लिए, रूस में एक सार्वजनिक पुकार बना.

इस नवजात साल की घटना में विकसित होते-होते महिला-हकों के साथ-साथ शांति के संदेश को भी अपनाया. पहले विश्वयुध्द के दौरान 7 मार्च, 1913 में पूरे यूरोप में स्त्रियों ने शांति-सम्मेलन आयोजित किए. अगले साल, यूरोप के बाहर , 8 मार्च को, या युद्ध के खिलाफ, या अपनी बहनों के साथ चलने की भावना से स्त्रियों ने सम्मेलनों का आयोजन किया. 1914 में जेट्किन ने स्विट्जरलैड के बेर्न में विश्वयुद्ध की समाप्ति के लिए अपील करते हुए एक प्रदर्शन किया. युद्ध के विरोध में दोनों पक्ष की औरतें उसमें शरीक हुई.

“साम्राज्यवादी युद्ध के समय में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” के बारे में भी कोल्लंताय ने लिखा- “पहला विश्वयुद्ध छिड़ गया. हर देश में श्रमिक वर्ग शडून से सराबोर हो गया. 1914, 1916 के दौरान ‘श्रमिक महिला दिवस’ विदेशों मेंं कमजोर पड़ा हुआ था. रूसी बोल्शेविक पार्टी के नजरिए को अपनाने वाली वामपक्षीय समाजवादी स्त्रियों ने 7 मार्च को श्रमिक महिलाओं के युद्ध विरोधी प्रदर्शन का रूप देने की कोशिश की. जर्मनी और अन्य देशों के समाजवादी पार्टी के शत्रुुओं ने समाजवादी महिलाओं को प्रदर्शित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय महासभाओं का आयोजन करने की इच्छा प्रकट करने वाली औरतों के समूह तटस्थ देशों में काम कर रहे थे. समाजवादी महिलाओं को उन देशों में जाने के लिए पासर्पोर्ट नहीं दिए गए थे.

1915 में सिर्फ नार्वे में महिला दिवस को अंतर्राष्ट्रीय समारोह आयोजित किया जा सका था. रूस से और तटस्थ देशों से प्रतिनिधि समारोह में भाग लेने गई. सैनिक तंत्र की शक्ति सीमायें पार कर चुकी थी इसलिए रूस में महिला दिवस मनाने की बात सोची भी नहीें जा सकती थी.

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का प्रबंध,  रूस की महिला श्रमिक वर्ग

महिलाओं से और उनकी समस्याओं से जुड़े कामोें के बारे में कई आलेख पार्टी की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए. उस वक्त लेनिन के द्वारा जोर डाले जाने से श्रमिक वर्ग की महिलाओंं के लिए श्रमिक महिला की स्थापना की गई थी. पहली संपादकीय मंडली के सदस्यों को निंरकुश जार की पुलिस ने कैद कर लिया था. फिर भी 1914 में पत्रिका का पहला अंक प्रकाशित हुआ. उसी साल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सभाओं के प्रबंध के लिए एक विशेष कमेटी का इंतजाम करने में भाग लेने वालों में से, नई कमेटी में काम करने के लिए प्रतिनिधि चुनने के लिए कारखानों में और सार्वजनिक प्रदेशों में सभाओं को आयोजित किए गए.

समय बीतता गया और युवा श्रमिक-स्त्री और पुरूष अपने अपने ट्रेड यूनियनों में बड़ी तादाद में आकर जुड़ने लगे. वे बोल्शेविक पार्टी में भी शामिल होना चाहते थे. अब से वे अपनी तकलीफ के कारणों को, चाहे वे काम करने की जगह से जुड़ी हो या साम्राज्यवादी युद्ध से, नष्ट किए बिना चुप नहीं रहेंगे. श्रमिकों में सबसे ज्यादा पिछडे माने जाने वाले लांड्री (धोबी) का काम करने वालों ने स्थानीय नगरपालिका के तहत रहने वाली लांड्रियों को राष्ट्रीयकरण करने की मांग करते हुए हड़ताल की. बोल्शेविकों ने इनका समर्थन किया था, पर उस मांग को अपरिपक्व कहकर उसका विरोध किया था.

‘रबोत नित्सा’ पत्रिका का प्रचार-कार्यक्रम बोल्शेविक कार्यक्रम के लिए ऐसा केंद्र बनने लगी, जो पहले कभी देखने में नहीं आई थी. उसके संपादकों में क्रूपस्कया, इनेस्सा अरमंड, स्ताल, कोल्लंताय, एलियजरोवा, कुदेल्ली, समायलोवा, निकोलयेवा, और सेंट पीटर्सबर्ग में रहने वाली श्रमिक महिलाएं, स्त्राी-मुक्ति आन्दोलन से जुड़ी नामी औरतें भी थी. ये सब क्रान्ति के आशय के लिए पूरी तरह से समर्पित थी. उन्होंने सभाओं का आयोजन किया. मिलकर क्रान्ति के विकास के लिए बड़ी लगन से काम करती थीं. ‘रबोतनित्सा’ संपादक मंडली में हर कारखाने से प्रतिनिधि होती थीं। विभिन्न प्रदेशों से आई पत्रकारों की समीक्षा करने के लिए साप्ताहिक बैठक होते थे, जिनमें सब मिलकर भाग लेते थे. उस वक्त लोगों को, राजनीति की और ट्रेड यूनियनों की बनावट के बारे में, जानकारी की कमी थी. इन दोनों के साथ-साथ महिला श्रमिकों की भूमिका की जानकारी भी देने के लिए यह पत्रिका एक अच्छा साधन बनी. 1917 के मार्च महीने में महिला श्रमिकों में क्रान्ति की भावना को बढ़ाने के लिए बोल्शेविक ने एक ब्यूरो का इंतजाम किया. उस समय सर उठाने वाले क्रान्तिकारी संघर्षों में स्त्रियोंं को हिस्सा लेने का मौका दिलाने के लिए, और उन्हें संघटित करने के लिए, एक बहुत अच्छे मार्ग के बारे में चर्चा करने के लिए पार्टी ने महिला श्रमिक कांग्रेस को आवाज दी. उस वक्त स्त्रियों को सामजवाद की तरफ आकृष्ट करने के लिए नए रणनीति, संघटित करने वाले विशेष नमूनों को ईजाद करने की जरूरत के बारे में लेनिन ने अनेक लेख लिखे.

दुनिया को बदलने वाला अत्यंत प्रसिद्ध अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस को किया गया विरोध-प्रदर्शन

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर रूस में किए गए प्रदर्शन रूस की क्रांति की पहली दशा के द्योतक तक थे. बीस लाख रूसी सैनिक युद्ध में मारे गए, तो “रोटी और शांति” के लिए हड़ताल करने की रूसी औरतों ने फरवरी के आखरी इतवार को चुना. इसका नेतृत्व करने वाली भी सेंट पीटर्सबर्ग की औरतें थी. उस हड़ताल को रोकने के लिए सरकार ने कोशिश की और कहा कि वे अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस को मनाएं. इस हड़ताल ने श्रमिकों में, विशेषकर सेंटपीटर्सबर्ग के पुतिलोव कारखाने में संघर्ष को और भड़का दिया और फलस्वरूप बड़े पैमाने पर श्रमिकों को एकसूत्र में बांध दिया. गल्लियों में आई महिलाओं ने सैनिकों से बातचीत शुरू की तो उसके बाद उन्होंन हड़तालियों पर गोलियां चलाने से इनकार कर दिया बल्कि अपने बायनेटों को जार की तानाशाही पर तान दिया. 1917 में आम राय साम्राज्यवाद के विरूद्ध बढ़ गई. 1914 से बड़े साहस के साथ साम्राज्यवादी युद्ध का विरोध करने वाले बोल्शेविकों को इसने बल दिया. लम्बी लड़ाईयां, बढ़ती हड़तालें, खाद्यान्न पदार्थोंं की भीषण कमी, बढ़ती कीमतें, विश्वयुद्ध, इन सबको बहुत समय से बरदाश्त करती आने वाली रूसी महिलाओं ने हजारों की संख्या में अपने घरों और कारखानों को छोड़ दिया और बाहर निकल आई. इसके पीछे 1917 का अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की प्रेरणा थी. इस तिरस्कृति ने क्रांति को आखिरी धक्का दिया. पेत्रोग्राद में हड़ताल पूरी तरह फैल गई. 8 मार्च से 12 मार्च तक शहर भर में फैले दंगों के साथ अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की हड़ताल भी जा मिली.

अब बाकी रह गया था इतिहास

सब जिसे ‘फरवरी क्रान्ति’ के नाम से जानते थे, वह क्रान्ति, जार दूसरे निकोलस को अपने पद को छोड़ने के लिए मजबूर करने वाली क्रान्ति थी. चार दिन बाद अस्थायी सरकार ने औरतों को वोट का हक दे दिया. रूस में उस इस्तेमाल किए जाने वाले जुलियन कैलंडर के मुताबिक वह ऐतिहासिक रविवार था 23 फरवरी. पर बाकी सब जगह इस्तेमाल किए जाने वाले ग्रेगोरियन कैलंडर में वह 8 मार्च रहा. (1918 में रूस जुलियन कैलंडर को छोड़कर ग्रेगोरियन कैलंडर इस्तेमाल करने लगा इसलिए पुरानी तारीखें-बदलकर वहां भी मार्च में ही यह दिवस मनाया जाने लगा.)

उस 1917 में उठी बाढ़ के उफान को अलेग्जान्ड्रा कोल्लेंताय ने यूं चिन्हित किया, “तब आया अदभुत साल, 1917 भूख, ठंड, युद्ध के साये, इन सबने श्रमिक और किसान औरतों की सहनशीलता को तोड़कर रख दिया. 8 मार्च 1917 (23 फरवरी) महिला श्रमिकों के दिवस पर वे बड़ी दिलेरी से साथ पेत्रोग्राद की बीवियां थीं. ‘हमारे बच्चों को रोटी चाहिए’, खंदकोें में से हमारी पति लौट आ जाएं’, कहते हुए मांग की. इस तरह के निर्णायक समय में, श्रमिक स्त्रियों का विरोधी रवैया ने आखिर जार के सुरक्षा-बलोंं को भी बहुत डरा दिया था. फलस्वरूप विद्रोहियों के खिलाफ वे सामान्यत जैसा व्यवहार करते थे, वैसा नहीं कर सके. उनमें साहस कम हो गई थी. जनता के गुस्से के तूफान से भयभीत होकर सिर्फ देखते रह गए.

1917 का श्रमिक महिला दिवस इतिहास में चिरस्मणीय हो गया. इस दिन रूसी महिलाएं श्रमिक वर्ग की क्रांति की मशाल को ऊंचा उठाकर दुनियां भर में आग सुलगाने में कामयाब हुई. फरवरी की क्रांति ने अपनी शुरूआत को इसी दिन से दर्ज कर लिया.

अक्तुबर क्रांति के बाद अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को अधिकारिक छुट्टी का दिन बना लिया गया था. सोवियत संघ में “वीर श्रमिक नारी” को त्योहार की तरह मनाने का रिवाज जारी रहा.

चीन की स्त्रियों द्वारा, 1924 से ही, चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी मेंं एक सशक्त महिला आंदोलन के समातंर रूप में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाना शुरू हो गया. क्रांंति के बाद सोवियत रूस की ही तरह चीन भी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को अधिकारिक छुट्टी के दिन के रूप में मनाने लगा.

अलेग्जाड्रा कोल्लंताय ने दूरहष्टि से जो बात कही थी, उसी के साथ इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास को खत्म करेंगे, “पूंजीवादी व्यवस्था को मिटाकर, सोवियत के आधिपत्य की स्थापित करना ही पूंजीवादी देशोें में रहने वाली श्रमिक स्त्रियों के जीवन को कठिनतम बनाने वाली पीड़ा, असमानताओं की दुनिया से उनकी रक्षा करने का एकमात्र मार्ग है. ‘श्रमिक महिला दिवस’ वोट के अधिकार के लिए लड़ाई शुरू करने के दिन से शुरू होकर स्त्रियों की संपूर्ण मुक्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में, यानी, सोवियत रूस और कम्यूनिज्म (साम्यवाद) की जीत के लिए किए जाने वाले संघर्ष के रूप में परिवर्तित हो गया”!

– निलिम्मा से संकलित इस अंग्रेजी लेख का हिन्दी अनुवाद आर. शांता सुंदरी

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